Sunday, October 9, 2016

सरकार के शिक्षकों की संख्या अतिशेष रहेगी तो नई भर्ती करने का तो सवाल हीं पैदा नहीं होता - विष्णु पाटीदार ( खरगोन )

 विष्णु पाटीदार - आज का विषय प्राथमिक शालाओं में गिरती छात्र संख्या के कारण बंद होते प्राथमिक विद्यालय और अतिशेष होते शिक्षक एवं  माध्यमिक विद्यालय में नवीन पद संरचना का प्रभाव और प्रथम राष्ट्र भाषा को अन्तिम क्रम पर रखना सही है
         सर्वप्रथम तो प्राथमिक विद्यालयों में गिरती  छात्र संख्या का मुख्य कारण शासकीय शालाओं के शिक्षकों को पढ़ाने का कार्य छोड़कर बाकी सारे कार्य करवाया जाना  जैसे - बीएलओ, पोलियो की दवा, मध्याह्न भोजन, समय समय पर सर्वे कार्य करवाना निःशुल्क पाठ्य पुस्तक, साईकिल वितरण, गणवेश वितरण और भी अन्य समसामयिक कार्य की वजह से शिक्षक अपना मूल कार्य पढ़ाना तो कर हीं नहीं पाता इसलिए जनता में यह संदेश जाता है कि सरकारी स्कूल में तो पढ़ाई बिल्कुल नहीं होती तथा दूसरा कारण यह कि अंग्रेजी माध्यम में बच्चों को पढ़ाने का भूत सभी पर सवार है तो पालक अपने बच्चों को निजी विद्यालय में भर्ती करवाते है जिससे सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होती चली जा रही है अगर ऐसे ही छात्र संख्या का स्तर गिरता रहा तो आने वाले वर्षों में सारे सरकारी स्कूल बंद हो जायेंगे और सारे शिक्षक अतिशेष हो जायेंगे ।
         माध्यमिक शालाओं में आरटीई नार्मस् के हिसाब से  सभी विद्यालयों में 100 से कम दर्ज संख्या रह जाएगी और साईंस, संस्कृत और हिंदी के सारे शिक्षक अतिशेष हो जायेंगे तथा राष्ट्र भाषा हिन्दी को अंतिम स्थान पर रखना इस देश का दुर्भाग्य है साथ ही सारे प्रधानाध्यापक भी अतिशेष हो जायेंगे । इसका नतीजा यह होगा कि सरकार के शिक्षकों की संख्या अतिशेष रहेगी तो नई भर्ती करने का तो सवाल हीं पैदा नहीं होता । इसका प्रभाव हाईस्कूल एवं हायरसेकेण्डरी पर भी पड़ेगा । जब स्कूलों में बच्चे नहीं होंगे तो स्कूल बंद करना हीं पड़ेगा ।
( लेखक स्वय अध्यापक है और यह उनके  निजी विचार हैं ,शुक्रवार और शनिवार का विषय था  प्राथमिक शालाओ में गिरती छात्र संख्या ,के कारण बंद होते विद्यालय  और अतिशेष होते शिक्षक ,एवं माध्यमिक विद्यालय मे नविन पद संरचना का प्रभाव और प्रथम (राष्ट्र) भाषा को अंतिम क्रम पर रखना कितना सही है। इस विषय पर आप का लेख द्वितीय स्थान पर चयनित किया  गया है  )

विश्वास से, छल कहे ,या वादा खिलाफी कहे। तू ही बता ऐ सरकार तेरी इस दोहरी नीती को, हम क्या कहे ? - राशी राठौर देवास

राशी राठौर देवास - एक जनवरी 2016 के बाद बने अध्यापक मतलब 2013 के संविदा शिक्षक को  छटवे वेतनमान से वंचित रखने की खबर हर संविदा साथी पर आसमानी बिजली बनकर गिरी।संविदा शिक्षक  अध्यापको के साथ सरकार से ही वादा निभाओ कहता रहा उसे क्या पता था की अचानक स्थिति बदल जायेगी है और जिनके विश्वास के बल पर चल पडे है वो ही मोन धारण कर लेंगे । 2013 के संविदा को तो अब सरकार और अध्यापक संघर्ष समिति दोनों से ही वादा निभाओ कहना है।
" फूट डालो और शासन करो " नीती अंग्रेज तो चले गये पर यह नीती यंही छोड गये। इसी नीती से इस बार संविदा का शिकार करने का विचार है। एक तीर से कई शिकार - अध्यापको मै फूट, अध्यापको के संख्या बल का बिखराव, 2013 और उसके पहले के अध्यापको मे आपसी संघर्ष और शिक्षा विभाग लक्ष्य से दूरी बढाना। यदि यही करना है तो समान कार्य और समान वेतन क्या होता है फिर ? कम से कम इसे तो समान कार्य और समान वेतन नही कह सकते। शिक्षको के बाद शिक्षा कर्मी की भर्ती करके। शिक्षाकर्मी को हर सुविधा से वंचित कर दिया था। इस समय सबसे बडी भूल शिक्षको ने की इस नाजायज व्यवस्था का विरोध नही करके। आज शिक्षको की प्रजाति ही विलुप्ति की कगार पर पहुंच गयी है। अध्यापक संघर्ष समिति को मौन तोडकर सरकार के इस षडयंत्र को विफल करना चाहिए। चाणक्य ने कहा है " हमे दूसरो की गलती से भी सिखना चाहिए, क्योंकि खुद गलती करके सीखने के लिए ये जीवन बहुत छोटा है।" कम से कम वर्तमान अध्यापक संघर्ष समिति द्वारा इस गलती को पूर्व के शिक्षकों की भांती दोहराना नही चाहिए। जब मित्र कहा है तो फिर कर्ण सी मित्रता अध्यापक संघर्ष समिति ने संविदा शिक्षक के साथ निभानी चाहिए। कंधे से कंधा मिला कर सरकार का पुरजोर विरोध होना चाहिये ।
( लेखक  स्वयं अध्यापक है और यह उनकी निजी राय है । )

सरकार का भरोसा नहीं इसीलिए आंदोलन का हिस्सा बनें 2016 में अध्यापक बने संविदा शिक्षक - वसुदेव शर्मा ( छिंदवाड़ा


वैसे तो यह संभव नहीं है कि सरकार 2016 में संविदा शिक्षक से
अध्यापक बनने वालों को छठवें वेतनमान के लाभ से वंचित कर दे।
यह इसीलिए भी संभव नहीं है कि सरकार नियम कायदों से
चलती है, किसी की सनक से नहीं। चूंकि सरकार अध्यापक संवर्ग
को छठवें वेतनमान के दायरे में नियमों के तहत ला चुकी है
इसीलिए छठवें वेतनमान का लाभ हर किसी को मिलेगा, यह
सत्य है और यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह शिवराज सिंह की सरकार
की मनमानी और तानाशाही ही कही जाएगी और इस
तानाशाही को सिर्फ और सिर्फ आंदोलन और संघर्ष के जरिए
ही रोका जा सकता है, इसीलिए 2016 में अध्यापक संवर्ग में
शामिल होने वाले संविदा शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वह
अध्यापक संघर्ष समिति के आंदोलनों में आगे आकर शामिल हों।
चूंकि शिवराज सिंह की सरकार अप्रैल एवं मार्च 2016 में प्रदेश
के विभिन्न विभागों से 10,000 संविदाकर्मियों की छंटनी कर
चुकी है, इसीलिए ऐसी किसी संभावना से इंकार नहीं किया
जा सकता कि अध्यापक संवर्ग सरकार के हमले का शिकार न
हो। 2016 में अध्यापक बने संविदा शिक्षकों के बारे में सामने
आई जानकारी चौंकाने वाली है, इसीलिए आज सभी को
चौकन्ने रहने की जरूरत है। इसके लिए जरूरी है कि शहडोल से लेकर
विधानसभा घेराव के प्रस्तावित आंदोलनों में हर अध्यापक की
हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए। जितने अधिक अध्यापक
आंदोलन का हिस्सा बनेंगे, उतना ही अधिक सरकार और
मुख्यमंत्री डरेंगे और डरी हुई सरकार छठवें वेतन से वंचित नहीं कर
सकती।
जिस तरह सरकार ने 10,000 संविदाकर्मियों की छंटनी कर दी
और इनके संगठनों के नेताओं ने चुपचाप इसे स्वीकार कर लिया है,
हो सकता है इससे सरकार में हिम्मत आ गई हो और वह दूसरे संवर्ग
को भी निशाने पर लेने की सोच रही हो। 16 अक्टूबर को
शहडोल और 13 नवंबर को भोपाल में ताकत दिखाकर
अध्यापकों को सरकार की इस सोच को बदलने का काम भी
करना है, यह समय डरने का नहीं बल्कि सरकार को डराने का है
और सरकार डरती है एकता से, जो अध्यापकों में बन चुकी है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और यह उनके निजी विचार हैं )


सिर्फ वेतन भत्तों की लड़ाई यही वरन विभाग बचाने की भी लड़ाई है - सुरेश यादव रतलाम

 सुरेश यादव रतलाम - कल दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपार्ट के अनुसार प्रदेश के 10  हजार संविदा कर्मचारियों की छंटनी ( सरकार की तरफ से पैसो की कमी या कुछ वजह बता कर सेवा समाप्त करना) कर दी गयी है । इसमें में से  चार हजार  तो सीर्फ स्वास्थ्य विभाग के संविदा कर्मचारी है ,जो ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन अंतर्गत काम कर रहे थे । इसी प्रकार अगस्त माह में प्रदेश की लगभग पाँच  हजार नर्स ,ANM  और  MPW .( बहुउद्देशिय स्वास्थ्य कार्यकर्ता ) को 60 वर्ष की आयु पूर्ण करने के चलते अचानक सेवा निवृत्ति  कर दिया गया । जबकि  सेवा शर्तो में सेवा निवृत्ति की आयु 65 वर्ष थी ,लेकिन एक नया आदेश जारी कर  पाँच  हजार कर्मचारियों को अचानक सेवा निवृत्ती दे दि गयी ।
        कुल मिलाकर के  स्वास्थ्य विभाग के 9000 कर्मचारियों को दबे पांव घर भेज दिया और कंही कोई हलचल , विरोध के स्वर नजर नहीं आये ,जानते है क्यों क्योकि सावस्थ्य सेवाओं को सरकार द्वारा अपनी नीतियो द्वारा पहले बदनाम किया गया फिर बर्बाद कर दिया गया और अब बंद करने की कागार पर ले जाकर ,कर्मचारियों की छंटनी  प्रारंभ कर दी गयी  । जैसे की रोडवेज को बंद कर दिया गया था । असलियत यह है कि प्रदेश में अब 9 नए  मेडिकल कॉलेज खुल रहे है सभी PPP  मॉडल पर खुल रहे है । पिछले दरवाजे से पूंजीवादियो की दखल  और दबे पांव निजीकरण । आप जानते है ,सावस्थ्य विभाग के नो हजार कर्मचारियों को एक दम से घर भेज दिया जाता है और कंही कोई विरोध के स्वर नहीं सुनाई देते  क्यों ,क्योकि समाज मुंह मोड़ चूका है । सावस्थ्य सेवाओं को  ,सरकार ने इतना बदनाम कर के रख दिया है ।
        इसकी एक वजह यह भी रही की स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कर्मचारी संगठन अपने वेतन और सेवा शर्तों की बात तो करते रहे लेकिन समाज को यह बताने में असफल रहे की दूर दराज के गावो में एक ANM और MPW  की स्वास्थ्य सेवाओं में  क्या भूमिका है।  और दूसरी वजह उन्होने अपने विभाग पर हो रहे निजीकरण के हमले को लेकर कभी मुद्दा नहीं बनाया ।
          मुझे याद है में सविदा स्वास्थ्य कर्मचारियों की हड़ताल में गया था पास में ही ANM और MPW  की हड़ताल भी हो रही थी दोनों टेंट पास पास ही लगे हुए थे । मेने दोनों जगह अपने संबोधन में कहा था कि " आप अपने वेतन भत्तों के लिए तो लड़ रहे है लेकिन सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य को निजी हाथों में देने का सैद्धान्तिक निर्णय ले चुकी है। (अलीराजपुर जिले में सावस्थ्य सेवाओं को  निजी हाथो में सौंप दिया गया था  )  मैंने कहा था कि हमें मिलकर लड़ाई लड़नी चाहिए ,हमारी सेवा में भी 25 प्रतिशत बच्चों  को निजी विद्यालय में भेज कर क धीमें जहर की तरह निजीकरण की शुरुवात कर दी  है ,जो हमारे विभाग की जड़ो खोखला कर रहा है (छात्रों की दर्ज संख्या में कमी ) ।  मैंने कहा था कि शिक्षा और स्वास्थ्य तो आम नागरिक का मौलिक अधिकार होना चाहिए और यदि सिस्टम में  कंही कोई  बिमारी है तो ,उसका इलाज किया जाना चहिये ,प्रत्येक बिमारी का इलाज निजीकरण तो नहीं है।  क्या एक व्यापारी  बिना लाभ के कोई सेवा देगा ? क्या यह सम्भव है ,की दूरस्थ अंचल में  कोई व्यापारी ANM  बहनों की तरह या MPW भाइयो की तरह  सेवा देगा ? उसका उद्देश्य तो अपना व्यापर बढ़ाना होगा । मैंने कहा था की जब हमारी नोकरी बचेगी तभी तो हम वेतन भत्तों की बात करेगे ,इस लिए समाज को साथ लाओ ।उसे अपने मोल का अंदाजा  करवाओ  "
           साथियो बात हमारे विभाग की भी । क्या आप जानते है शिक्षणिक सत्र 2015-16 में और वर्तमान सत्र में लगभग 2500 शालाऐं  (5000 शिक्षक) कम दर्ज संख्या के कारण बंद कर के पास की शालाओं  में मर्ज कर दि गई   ?  इसके अतिरिक्त प्राथमिक शालाओं के लगभग 10 हजार शिक्षक अभी होने वाले यूक्तियुक्तकरण मे अतिशेष होने वाले  हैं , इस प्रकार प्राथमिक शालाओं के कुल 15 हजार शिक्षक अतिशेष हो जाएंगे ,जबकि रिक्त स्थान लगभग 5000 ही बचे हैं (हमारी भी अचानक से छंटनी  हो जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी ) ।  एक अन्य खतरा जो अभी हम तक नहीं पहुंचा है वह है ।माध्यमिक शालाओं  की नविन पद संरचना जिसके चलते 2 तिहाई शालाओं पर एक शिक्षकीय शाला  होने का खतरा मंडराने लगा है ।
           सरकार ने अपनी नीतियों के द्वारा  पहले प्राथमिक शालाओं से आमजन का मोह भंग किया , अब धीमे धीमे बंद भी कर दिया ,क्या कंही किसी गाँव में विद्यालय बंद होने पर आमजन का विरोध नजर आया ?  अब इस प्रकार नई पद संरचना के कारण माध्यमिक शालाओे को एक शिक्षकीय कर के विद्यार्थियों को शालाओ से दूर किया जाएगा ।
          साथियो अब बात हामारे वेतन भत्तों की भी कर ली जाये । कल ही एक समाचार आया की 1 जनवरी 2016 के बाद अध्यापक बने साथियो को 6 टे वेतन का लाभ नहीं मिलेगा । वैसे यह संभव तो नहीं है लेकिन जब सरकार शिक्षा विभाग को बर्बाद करने का ठान ही चुकी है तो ,कब क्या कर दे कह नहीं सकते । इस लिये आप हम सब मिल कर ईस लड़ाई को लडे ,क्योकि अब लड़ाई  सिर्फ वेतन भत्तों की लड़ाई यही वरन विभाग बचाने की भी लड़ाई है। यदि विभाग और हमारी नोकरी बचेगी तभी तो हम वेतन भत्तों की बात कर पायेगें। यह लड़ाई हमारी आने वाली पीढ़ियों के अधिकार की लड़ायी है क्योकि शिक्षा विभाग ही तो सबसे अधिक रोजगार सृजन वाला  विभाग है । हमारे कई  साथी इस विषय पर भी गहन चिंतन मनन कर रहेै हैं  और मुद्दे आप तक पंहुचा रहे हैं । अभी हमने पहली बार हमारे ज्ञापन में विभाग की व्यस्था में सुधार कें लिए भी मांग की है (  परिवीक्षा में भर्ती आरम्भ की जाए ।  निजीकरण के  प्रयास बन्द किये जावें। पच्चीस प्रतिशत सीटें में शुल्क अशासकीय विद्यालकी द्वारा ही प्रदान किया जाए।   कम दर्ज संख्या के फलस्वरूप बन्द/मर्ज किये जाने के पूर्व उक्त शाला के शिक्षकों को कम से कम , तीन शैक्षणिक वर्षों का समय दर्ज संख्या बढ़ाने हेतु दिया जाये। 5000 तक की आबादी वाले गांव एवं कस्बे में निजी विद्यालय खोलने की अनुमति न दी जावे। माध्यमिक शालाओं में  2010 की पद संरचना लागु की जाए। प्रदेश के विद्यालयों में N C E R T का पाठ्यक्रम लागु किया जाये । ) यह मुद्दे अब आमजन में चर्चा के मुद्दे है । आप सभी साथियो से अनुरोध है कि इस आर पार की नहीं " पार ही पार  "  की लड़ाई को जीतना है । और शिक्षा विभाग में संविलियन करवाना है । एकता बनाये रखें और संघर्ष समिति पर विश्वास कायम रखें । यह हिन्द ,इंकलाब जिंदाबाद। 
याद रखें 
16 अक्टूबर शहडोल
23 अक्टूबर विकासखंड 
06 नवम्बर जिला13 नवम्बर भोपाल

Saturday, October 8, 2016

जोश, जुनून एबं अनुभव का संगम अध्यापक संघर्ष समिति-वासुदेव शर्मा (छिंदवाड़ा)

वासुदेव शर्मा (छिंदवाड़ा) - 18 साल से संघर्ष कर रहे अध्यापक समुदाय के बीच से ऐसी भी आवाजें आ रही हैं कि सालों से होते आ रहे अन्याय को एक-दो दिन में ही समाप्त कराया जा सकता है। इससे एक बात स्पष्ट है कि अध्यापक अन्याय के खिलाफ पूरे जोश एवं जुनून के साथ लडऩा चाहता है और तब तक लडऩा चाहता है जब तक कि जीत हासिल न हो जाए। संघर्ष से जो हासिल होता है, वह जीत ही होती है, इसीलिए आंदोलनों से जीत का विश्वास और भरोसा सही है। लेकिन यहां सवाल यह है कि यह जीत एक दिन में मिलेगी या इसके लिए अनवरत संघर्ष करना होगा। इतना तय है कि  शिक्षा विभाग में संविलियन के लिए लड़ रहा अध्यापक सरकार के हलक से छठवां एवं सातवां वेतनमान जरूर निकाल लाएगा। यह बात दावे से इसीलिए कही जा सकती है कि इस बार अध्यापक जोश, जुनून  एवं अनुभव के साथ मैदान में उतरा है।
अध्यापक संघर्ष समिति में आजाद अध्यापक संघ का जोश, राज्य अध्यापक संघ का जुनून और शासकीय अध्यापक संघ, अध्यापक संविदा शिक्षक संघ एवं अध्यापक कांग्रेस का अनुभव समाया हुआ है इसीलिए अध्यापक संघर्ष समिति को जोश, जुनून एवं अनुभव का संगम कहना सही रहेगा। अध्यापक संघर्ष समिति के रूप में तीन लाख अध्यापकों को ऐसा मंच मिला है, जिसका हर पाया इतना मजबूत है कि उसे अब शिवराज सिंह की सरकार हिला नहीं सकती। अध्यापक संघर्ष समिति बनने के बाद एक और अच्छा काम यह हुआ है कि अध्यापकों के आंदोलन का नेतृत्व करने योग्य दूसरी पंक्ति की कतार भी सामने आ गई है, जो इतनी सुलझी हुई है कि वह 18 सितंबर के लक्ष्य को हासिल किए बिना न तो खुद इधर-उधर होगी और न ही किसी को इधर-उधर होने देगी। सोशल मीडिया पर आ रही तमाम किन्तु-परन्तु के बावजूद उसका निष्कर्ष यही निकल रहा है कि अध्यापक शहडोल में सरकार को चेताएगा और भोपाल में उसके सामने सीना तानकर खड़ा नजर आएगा।
18 सितंबर को अध्यापक संघर्ष समिति की घोषणा के वक्त तय किया गया लक्ष्य था सरकार को यह बताना कि प्रदेश का अध्यापक सरकार की तिकड़मों से हारा नहीं है बल्कि पहले से अधिक ऊर्जा के साथ मैदान में आने वाला है। 25 सितंबर को प्रदेश में तिरंगा रैलियों का ऐलान इसी मकसद से  किया गया, जो ऐतिहासिक रूप से सफल रहा। तिरंगा रैलियों में अध्यापकों के जोश, जुनून देखने लायक था, यही वजह रही होगी कि   अध्यापकों के गुस्से से सरकार डरी भी और उसी दिन विसंगति रहित गणपत्रक जारी करने के संकेत  मीडिया के जरिए देकर अध्यापको के गुस्से को थामने की कोशिश भी की गई। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
2 अक्टूबर को भोपाल में अध्यापक संघर्ष समिति अध्यक्षमंडल के सदस्य भरत पटेल, जगदीश यादव, बृजेश शर्मा, मनोहर दुबे एवं राकेश नायक एक साथ बैठे और एक स्वर से ऐलान किया कि सरकार तिकड़मबाजी छोडक़र अध्यापकों की लंबित मांगों का तत्काल निराकरण करे और 25 सितंबर को सौंपे गए 21 सूत्रीय मांगपत्र की मांगों का समाधान करे। जोश, जुनून और अनुभव से तैयार हुई अध्यापक संघर्ष समिति के अध्यक्षमंडल ने उसी दिन तीन लाख अध्यापकों की इच्छा के अनुसार 13 नवंबर को विधानसभा के घेराव की घोषणा की। 16 अक्टूबर को शहडोल में प्रदर्शन कर सरकार को चेतावनी देने, इसके बाद  23 अक्टूबर को ब्लाक स्तर पर धरने, रैलियां, 6 नवंबर को जिला स्तर पर रैली एवं धरने  की घोषणा अध्यक्षमंडल के सदस्यों ने एक स्वर से की। 2 अक्टूबर को घोषित हुए इस कार्यक्रम से सरकार चिंतित है, उसकी चिंता इस बात से सामने आ जाती है कि उसने महीनों से लटके गणना पत्रक पर काम करना शुरू कर दिया है हो सकता है शहडोल से पहले वह जारी हो जाए, लेकिन अध्यापक जिस जोश, जुनून और उत्साह से संघर्ष के मैदान में उतरे हैं, उससे इतना स्पष्ट है कि वे सरकार से शिक्षा विभाग में संविलियन की मांग पर दो टूक बात करने के बाद ही संतुष्ट होंगे। जैसे-जैसे 16 अक्टूबर की तारीख करीब आती जा रही है, वैसे-वैसे अध्यापकों का उत्साह बढ़ता जा रहा है, वे हजारों की संख्या में शहडोल पहुंचने वाले हैं और लाखों की संख्या में पहुंचकर 13 नवंबर का विधानसभा घेराव करेंगे। चूंकि अध्यापक अपने अनुभव से यह समझ चुका है कि बिना लड़े कुछ नहीं मिलने वाला, इसीलिए वह इस बार सिर्फ और सिर्फ लडऩे के लिए एकजुट हुआ है, उसकी यही एकजुटता उसे जीत  दिलाएगी, यह भरोसा भी उसे हो चुका है।

अब लड़ाई मेरी और मेरे मुखिया की है,कोई बीच में न आये - मनीष शंकर तिवारी ( नरसिंहपुर )

क्या हार में, क्या जीत में
किंचित् नहीं भयभीत मैं,
कर्तव्य-पथ पर जो भी मिला
यह भी सही वो भी सही।
मैं एक सामान्य अध्यापक हूँ। न कोई मेरा नेता है, न ही मैं किसी व्यक्ति, समूह या संघ का समर्थक। जो भी मेरे लिए, मेरे हक के लिए लड़ा , मैं हमेशा उसके साथ खड़ा दिखाई देता हूँ और दिखाई देता रहूँगा। क्योंकि पराजय मेरा स्वभाव नहीं है, मैंने सदैव विजय ही प्राप्त की है और आगे भी विजयमाल को ही प्राप्त करूँगा।
1995 से आज 2016 तक मेरी ही तो शक्ति है जिसने मुझे आज यहाँ तक लाकर खड़ा किया है। ये मेरी ही तो ताकत है जिसने मेरे अध्यापक नेताओ को महत्वाकांक्षी बना दिया।
अब ताजा ताजा उदाहरण ही देख लीजिये। 2013 का विसंगतिपूर्ण चार किश्त का आदेश मुझे स्वीकार नहीं था तो मैं इस अन्याय में सहभागी नेतृत्व के खिलाफ हो गया। 2015 के सितम्बर माह की 13 तारीख को शाहजहाँनी पार्क में मेरी ही तो शक्ति थी जिसने सरकार के माथे पर बल ला दिए। 28 सितम्बर 2015 को लालघाटी के मैदान को हल्दीघाटी मैंने ही बनाया।
अब मेरी ताकत और मेरी ऊर्जा को जब मेरे अपने नेताओं ने खुद की तरफ मोड़ने की भूल की तब उस नेतृत्व को पराजित होना पड़ा। सारे संघ नए या पुराने सीमिति आँकड़ो में सिमट गए।
तब फिर मैं सजग हुआ और मजबूर किया अपने पराजित नेतृत्व को कि मैं सामान्य अध्यापक किसी का गुलाम नहीं। तब ये व्यक्ति, ये समूह, ये संघ 18 सितम्बर 2016 को बिना मन के एक हुए। तारिख 25 सितम्बर 2016 सूबे के हर जिले में सिर्फ मैं था और मेरा तिरंगा। मैं फिर विजयी हुआ। बड़े भैया को खबर पूरी हो गई।
तारिख 2 अक्टूबर 2016 मेरे नेता फिर बैठ गए 16 अक्टूबर 2016 दी है तारीख , स्थान दिया है शहडोल परंतु सबके सब लग रहे हैं डांवाडोल। किसी में वो साहस नहीं दिख रहा है जो साहस मेरे अंदर है। अपने अपने हजार पाँच सौ वाले मेरे नेता शायद फिर पराजित हो जाएँ।
किन्तु मुझे ख़ुशी है कि सरकार तक मेरा सन्देश पहुच गया है 25 सितम्बर 2016 को ही कि मेरे मन में क्या है? और अगली सम संख्यांक वाले वर्ष की चिंता उसे अवश्य हो रही होगी।
मेरे जैसे 3 लाख और हैं जो पीड़ित हैं, शोषित हैं, परन्तु हारे हुए नहीं हैं। न कभी हार सकते हैं।
अंत में,
अब लड़ाई मेरी और मेरे मुखिया की है।
कोई बीच में न आये।
हर हर अध्यापक
घर घर अध्यापक
(लेखक सव्य अध्यापक है और यह उनके निजी विचार है )

13 नवंबर को भोपाल घेरेंगे अध्यापक -वासुदेव शर्मा (छिंदवाड़ा)

वासुदेव शर्मा - एक ही दिन, एक ही वक्त, प्रदेशभर में जब 1 लाख अध्यापक एक साथ 25 सितंबर को तिरंगा लेकर सडक़ों पर उतरे, तो सभी हैरान-परेशान थे। हैरानी की वजह, ऐसा इससे पहले कभी नहीं हुआ।
सरकार हैरान थी। मुख्यमंत्री परेशान थे।

 हैरान परेशान अध्यापकों का नेतृत्व भी था। उसे भी ऐसी उम्मीद नहीं थी कि बिना उनके दौरो, अपीलों एवं आव्हान के बाद भी एक साथ इतनी अधिक संख्या में अध्यापक एकजुट होकर सरकार को ललकार देंगे।
सरकार की समस्या थी कि वह किससे बात करे, अध्यापकों को सडक़ पर आने से रोकने के लिए।
तिरंगा रैली के बाद अध्यापकों के नेतृत्व को उत्साह में आना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 2 अक्टूबर की बैठक में यह साबित भी हुआ।

 बहरहल,
चूंकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद अध्यापक नेताओं से बातचीत की कमान संभाले हुए हैं। सीएम साहब भी खुद यह कह चुके हैं कि वे ही अध्यापकों के अच्छे दिन लाएंगे। अच्छे दिनों का इंतजार काफी लंबा हो गया है, अब इससे अधिक इंतजार करने के लिए अध्यापक तैयार नहीं है। 25 सितंबर की तिरंगा रैलियों के जरिए प्रदेशभर के अध्यापकों ने 21 सूत्रीय ज्ञापन देकर मुख्यमंत्री से यह कह दिया है।
अलग-अलग स्थानों से 9-10 बार छठवां वेतनमान दे चुके सीएम साहब 25 सितंबर के बाद खामोश हैं, उनकी यह खामोशी अध्यापकों के गुस्से को बढ़ाने का काम कर रही है, जिसकी अभिव्यक्ति 16 अक्टूबर को शहडोल

एवं 13 नवंबर को भोपाल में होगी। 
जिस दिन अध्यापकों का गुस्सा चरम पर पहुंचेगा, उस दिन से शिवराज की सरकार लडख़ड़ाना शुरू कर देगी। यह चेतावनी 2 अक्टूबर को आर्य समाज धर्मशाला से अध्यापक संघर्ष समिति ने एक स्वर से दी है।
एकजुट हो चुके अध्यापकों ने इसकी तैयारियां शुरू कर दी हैं।
16 अक्टूबर को शहडोल में रैली कर सरकार को चेताया जाएगा।  यदि अध्यापकों को संतुष्ट करने वाला गणपत्रक जारी नहीं हुआ और शिक्षा विभाग में संविलियन का रास्ता नहीं बनाया तो 13 नवंबर को राजधानी

भोपाल के रास्ते जाम कर दिए जाएंगे।
2 अक्टूबर को आर्य समाज धर्मशाला में हुई अध्यापक संघर्ष समिति की बैठक ने निर्णय लिया था कि 13 नवंबर को भोपाल में रैली की जाएगी, जिसमें प्रदेश भर से 2 लाख से अधिक अध्यापक हिस्सा लेंगे।
13 नवंबर की रैली की तैयारियों के लिए 6 नवंबर को जिला मुख्यालयों पर विशाल धरने दिए जाएंगे, जिनमें 100 प्रतिशत अध्यापकों की भागीदारी सुनिश्चित कराने का संकल्प भी अध्यापक संघर्ष समिति ने 2 अक्टूबर की बैठक में लिया है यानि इस बार अध्यापक संगठनों की सीमाओं से ऊपर जाकर अपने भविष्य को बचाने की लड़ाई खुद लड़ रहा है, 25 सितंबर की तिरंगा रैली यह साबित कर चुकी है और 13 नवंबर की भोपाल रैली के वक्त अध्यापकों की एकजुटता का इतिहास लिखा जाएगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और यह उनके निजी विचार हैं .

Friday, October 7, 2016

युक्तियुक्तकरन हेतु मार्गदर्शन

सारे बच्चे शासकीय शालाओं में दर्ज हो जायेंगे और अशासकीय शालाऐं खुदबखुद बंद हो जाएगी -विष्णु पाटीदार (खरगोन)

विष्णु पाटीदार खरगोन - आज का विषय माननीय ईलाहाबाद उच्च न्यायलय का आदेश जिसमें प्रत्येक लोकसेवक अफसर, कर्मचारी, विधायक और सांसद को अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने का आदेश है तो मेरे विचार से तो आज के परिवेश में अशासकीय शालाओं में अंग्रेजी माध्यम के कारण हीं आकर्षण बढ़ा है वरना हिन्दी माध्यम की स्कूलों से तुलना की जाय तो शासकीय शालाओं का परीक्षा परिणाम अशासकीय शालाओं के परीक्षा परिणाम से हमेशा 20 हीं रहा है । वैसे भी शासकीय शालाओं में स्टाॅफ अशासकीय शालाओं की तुलना में अधिक योग्यता वाले हैं । खासकर हाईस्कूल तथा हायरसेकेण्डरी में, जिन बच्चों को शासकीय शालाओं के शिक्षकों ने पढ़ाया है वेही अशासकीय शालाओं में पढ़ा रहे हैं । अगर शासकीय शालाओं में भी सरकार अंग्रेजी माध्यम की शालाऐं खोल दे तो न्यायालय के बगैर आदेश के हीं सभी लोकसेवक क्या सभी उद्योगपति, करोड़पति, उच्च वर्ग, निम्न वर्ग, मध्यम वर्ग सारे शासकीय शालाओं में दर्ज हो जायेंगे और अशासकीय शालाऐं खुदबखुद बंद हो जाएगी । लेकिन शायद सरकार हीं नहीं चाहती की अशासकीय शालाऐं बंद हो सरकार की मंशा तो नीजीकरण करने की हीं है इसलिए तो अभी तक भी शासकीय अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की कमी है अशासकीय शालाओं में तो बस बाहरी चमक धमक और दिखावा है वे बच्चों को रट्टू तोता बना देते हैं जो आगे जा के प्रतियोगी परीक्षाओं में फैल हो जाते हैं । अशासकीय शालाओं के पास अगर शासकीय शालाओं के कमजोर वर्ग के बच्चे हो तो उनका परिणाम और भी घट जायेगा । इसलिए मैं चाहता हूँ कि सरकार अंग्रेजी माध्यम के भी सभी शासकीय स्कूल प्रारंभ कर दे तो माननीय न्यायालय के आदेश की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी और सभी लोकसेवक अफसर, कर्मचारी, विधायक, सांसद, निम्न वर्ग ,उच्च वर्ग ,व्यापारी, उद्योगपति, आदि सभी के बच्चे  शासकीय शालाओं में हीं पढ़ेगे!

लेखक सवयं अध्यापक है और यह इनके निजी विचार है -यह लेख बुधवार और गुरूवार को शिक्षा विमर्श में चर्चा के विषय 
'  माननीय ईलाहबाद उच्च न्यायालय का आदेश जिसमे प्रत्येक लोकसेवक "अफसर ,कर्मचारी ,विधायक और सांसद " को अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने का आदेश  ' में संयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर चुना गया है ' 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला बिल्कुल उचित ,निजी विद्यालयों की मनमानी खत्म होगी सरकारी विद्यालयों और शिक्षकों की दशा सुधरेगी -रूपेश सराठे (होशंगाबाद )

रूपेश सराठे - इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला बिल्कुल उचित है। इससे निजी विद्यालयों की मनमानी खत्म हो जायेगी और सरकारी विद्यालयों और शिक्षकों की दशा और दिशा दोनों में सुधार हो जायेगा।क्योंकि जब सभी लोकसेवकों और जनप्रितिनिधियों के बच्चे एक ही स्थान पर पढ़ेंगे तो उनके बेहतर अध्यापन हेतु वे विद्यालयों और शिक्षकों के प्रति वे बहुत गम्भीरता से प्रयासरत रहेंगे।जिससे सरकारी विद्यालयों में व्याप्त भौतिक एवं शैक्षिक समस्याएं अतिशीघ्र ही दूर हो जाएंगी। जब सभी लोगों के बच्चे एक साथ पढ़ेंगे तो सामाजिक भेदभाव में भी कमी आएगी जिससे समाज में समरसता का माहौल बनेगा जो सभी के लिए सुखद होगा। अभीशिक्षकों से जो गैर शैक्षणिक कार्य करवाये जा रहे हैं उन पर स्वतः रोक लग जाएगी। आज जो अधिकारीगण अनाप शनाप आदेश निकाल रहा हैं अपने वातानुकूलित कार्यालयों में बैठकर उन पर भी लगाम स्वतः लग जाएगी। जैसा कि शासन कि सोच बन गई है कि सरकारी शिक्षक काम नहीं करते वह भी बदल जायेगी।और यदि कुछ अपवाद स्परूप हमारे साथी यदि काम नहीं कर रहे हैं वे भी स्वतः सुधर जायेंगे। अतः मेरे मतानुसार माननीय सर्वोच्च न्यायालय को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को पूरे भारत में लागू कर  देना सर्वथा उचित रहेगा।
 

लेखक सवयं अध्यापक है और यह इनके निजी विचार है -यह लेख बुधवार और गुरूवार को शिक्षा विमर्श में चर्चा के विषय '  माननीय ईलाहबाद उच्च न्यायालय का आदेश जिसमे प्रत्येक लोकसेवक "अफसर ,कर्मचारी ,विधायक और सांसद " को अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने का आदेश  ' में संयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर चुना गया है ' 



माननीय हाईकोर्ट इलाहबाद के यह निर्णय के पीछे एक व्यापक सोच हे -विजय तिवारी ( सुवासरा- मंदसौर )

विजय तिवारी - माननीय हाईकोर्ट इलाहबाद के यह निर्णय कि सभी शासकीय सेवक व् जनप्रतिनिधि अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयो में ही पढ़ाये ।। के पीछे एक व्यापक सोच हे । अब यही निर्णय सुप्रीम कोर्ट को भी देना चाहिए और समस्त देश में लागू करवाना चाहिये ।। यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय की व्यापकता को देखे तो यह पाएंगे की भारतीय संस्कृति "गुरुर देवो म्हेश्वरः " वाली रही जहाँ गुरु की अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान सदैव ही रहा हे ।। यदि सांसद विधायक व् उच्च अधिकारी अपने बच्चों को इन शासकीय विद्द्यालयो में भेजते हे तो ।जो शिक्षिकिय प्रतिष्ठा आज जन मानस के बीच कम हो रही हे उसमे स्वतः वृद्धि होगी ।। इस निर्णय का दूसरा और गम्भीर पहलू यह भी हे की वर्तमान में बढ़ रही शिक्षा की व्यवसायीकरण को रोकना हे । आज यदि सर्वे कराया जाए तो अधिकाँश उच्च श्रेणी के विद्यालय जिन्हें इंटर नेशनल स्कूल भी कहा जाता हे । इन्ही जनप्रतिनिधियो या अधिकारियो के ही हे । जो पूर्णरूपेण मात्र धन कमाने में लगे हुए हे । जिनका शिक्षा के द्वारा होने वाला सर्वांगीण विकास से कोई लेना देना नही हे ।। यदि इलाहबाद हाईकोर्ट का निर्णय मान्य हो तो इस बढ़ती व्यवसायीकरण पर भी नियंत्रण किया जा सकता हे ।।
         इस निर्णय का एक और व्यापक और सकारात्मक पहलू यह भी हे की शासकीय विद्यालयो के मूलभूत सुविधओं का विकास करना यदि उक्त लोगो के बच्चे शासकीय विद्यालयो में अध्ययन करेंगे तो वहा आवश्यक शिक्षक , फर्नीचर , सुविधा सम्पन्न शौचालय खेल का मैदान व् सामान और स्वच्छ वातावरण का निर्माण पर ये स्वयम् जोर देकर कराएँगे ।। जिसका आज अधिकांश विद्यालयोमे आभाव इन्ही की भरष्टाचारि के कारण नही हो पा रहा हे ।।
          इस निर्णय का विशेष पहलू की यह निर्णय लागू होने से जो गरीब बच्चे शिक्षक या सुविधाओ के अभाव में वांछित शिक्षा नही प्राप्त क्र पा रहे हे इस निर्णय के क्रियान्वित होने के वाद अपनी क्षमता को विकसित क्र सकेंगे ।। हमारे शासकीय विद्यालयो में पढ़ाने वाले शिक्षक प्राइवेट स्कूल के शिक्षक से कहि अधिक योग्यता वाले हे और सरकार द्वारा आयोजित व्यापम TET जैसी परीक्षाओ को पास कर व् पूर्ण  ट्रेंड हो के अपनी सेवाये दे रहे हे ।
                अतः इलाहावाद हाईकोर्ट का निर्णय के पीछे इक व्यापक और सकारात्म सोच हे । जिसका सकारात्मक लाभ सम्पूर्ण समाज को होगा ।।
      लेखक सवयं अध्यापक है और यह इनके निजी विचार है -यह लेख बुधवार और गुरूवार को शिक्षा विमर्श में चर्चा के विषय 
'  माननीय ईलाहबाद उच्च न्यायालय का आदेश जिसमे प्रत्येक लोकसेवक "अफसर ,कर्मचारी ,विधायक और सांसद " को अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने का आदेश  ' यह लेख दुसरे स्थान के लिए  चुना गया है . 

आखिर, इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐसा आदेश क्यों ?......सचिन गुप्ता ( खितौली )

सचिन गुप्ता ( खितौली ) - लोकसेवकों(अफसर,कर्मचारी,विधायक,सांसद) के बच्चे ही क्यों ? अभिनेता,व्यापारी,उधोगपतियों,पत्रकारों व अन्य वर्गो या देश के समस्त बच्चों का  नामांकन सरकारी स्कूलों में कराने का आदेश क्यों नहीं ?
क्या केवल लोकसेवकों के बच्चों के नामांकन करा देने मात्र से शिक्षा का स्तर सुधर जाएगा क्या वाकई में ये इतने प्रभावशाली हैं ?

इस प्रयोग में दो बातें छिपी है ,
1. लोकसेवकों के माध्यम से शिक्षकों पर अध्यापन कार्य के लिए अतिरिक्त दबाव निर्मित करवाने की मंशा।
2. लोकसेवकों को उनके अपने बच्चे के माध्यम से सरकारी स्कूलों की हालत का प्रत्यक्ष रूप से सामना करवाने की मंशा
 
  उपर्युक्त दोनों मंशाओ में शोषण छिपा है पहली बात में शिक्षक का और दूसरी बात में लोकसेवकों के बच्चों का जिनका उपयोग किया जाना है।
अगर आप मान रहें हैं कि लोकसेवकों के बच्चों के नामांकन मात्र भर से सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर सुधर जाएगा तो थोडा रूकिए , फिर सोचिए ........ कही ये अभिभावकों का अपने बच्चे के सुरक्षित भविष्य के लिए निर्णय लेने के अधिकार का हनन तो नहीं ?

एक जिले में कितने विधायक हैं औसतन 4-5 ,सांसद की संख्या जिले में 1 भी नहीं होती प्रथम द्वितीय श्रेणी के अधिकारी 200-400 की सीमा में ही होंगे और तृतीय श्रेणी के कर्मचारियों के बच्चे प्राय: सरकारी स्कूल में ही पढते हैं जबकि सरकारी स्कूल सैकड़ो की तादात में ।

महज 500 बच्चें जो बाध्यता की स्थिति में जिले में ही स्थित सरकारी स्कूलों को प्राथमिकता देंगे तो क्या इस आदेश से अंतिम छोर में सुदूर स्थित ग्रामीण अंचलों की, जहाँ पहुँचने के लिए आज भी पक्का रास्ता नहीं है ,शिक्षा स्तर में सुधार हो पाएगा और इस बात की क्या गारंटी है कि शहरी क्षेत्र के सरकारी स्कूलों का स्तर ऐसा होने पर सुधर जाएगा अगर सुधार न हुआ तो कल को दलीलें दी जाएगी सारी स्कूलों को बंद करके जिले में केवल एक विशाल सर्वसुविधायुक्त स्कूल खोल दिया जाएँ जहाँ सब पढें तब भी सफल न हुए तो कहा जाएगा कि शिक्षा केवल जागरूक  कर धनाढ्यौ को दी जाए और वंचित ,कमजोर वर्ग के हाथों से शिक्षा फिसल जाएँ 
।

मामला उलझता जाएगा अंत में शिक्षा का मजाक बन जाएगा ।
वर्तमान में समस्त लोकसेवकों के बच्चें भव्य निजी स्कूलों में पढ रहे हैं तो क्या ये सभी पूर्णतः दक्ष हो जाते हैं। अपेक्षित परिणाम न आने पर क्या ये लोग निजी विधालयों पर  दबाव बना पाते हैं ?

वैसे भी निजी स्कूलों की तरफ लोगों का बढता हुआ आर्कषण उनकी शिक्षा देने की कला व तरीका नहीं बल्कि अँग्रेजी भाषा के ग्लोबलाइज होने के कारण उसकी बढती हुयी माँग ,खेल विधा ,कंप्यूटर व अन्य सांस्कृतिक ,आधुनिक गतिविधियाँ हैं जिससे छात्र का सर्वागीण विकास होता है जबकि सरकारी स्कूल इन सारी सुविधाओं से आज भी वंचित हैं जबकि सयकारी स्कूलों की उपयोगिता आज भी ग्रामीण अंचलों में ज्यादा है
निष्कर्ष यह है कि अनावश्यक रूप से नए नए प्रयोगों को जन्म देकर; शिक्षक समुदाय पर किसी भी तरह के दबाव डालने की छिपी हुयी मंशा को पूरा करने की कोशिश करने के बजाए ; शिक्षा के स्तर को सुधारने हेतु ; शिक्षकों का सहयोग लेकर वास्तविक समस्याओं को चिन्हित कर; उनको दूर करने के सकारात्मक उपाय किए जाएँ ।
            
लेखक सवयं अध्यापक है और यह इनके निजी विचार है -यह लेख बुधवार और गुरूवार को शिक्षा विमर्श में चर्चा के विषय 
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इलाहबाद हाई कोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है - नरेन्द्र कुमार पासी ( रतलाम )

नरेन्द्र कुमार पासी - इलाहबाद हाई कोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है | यह किसी की अस्मिता से जुड़ा प्रश्न नही होना चाहिए | क्यों की आज भारत का बहुत बड़ा वर्ग किसान है या गरीब है या दलित समुदाय से आता है | ऐसे में जब उनके बच्चो को शिक्षा न मिले तो उनके दिलो पर क्या बीतती होगी | यह सहज अहसास कर पाना बड़ा ही कठिन सवाल ?आज जहाँ सरकार द्वारा शिक्षा के अनेको प्रावधान कियेगए फिर भी हम आज शिक्षा के अधिकार से ही वंचित है | संविधान के अनुच्छेद 41 A के तहत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत मान्यता दी गई थी जिसके अनुसार, "राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर, शिक्षा और बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और विकलांगता के मामले में सार्वजनिक सहायता करने के लिए काम करते हैं, सही हासिल करने के लिए प्रभावीव्यवस्था करे “ /हालांकि संविधान निर्माणी सभा के अनेको सदस्य और स्वतः बाबा साहब अम्बेडकर यह चाहते थे कि समान शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार में शामिल हो और न्यायिक आदेश से लागू होने की व्यवस्था हो। परन्तु उस समय केन्द्र सरकार के मुखिया और निंयत्रको का यह तर्क था कि सरकार का खर्च और साधन इतने विकसित नही है कि इसे वैधानिक अधिकार या कानून के रुप में लागू कियाजा सके। अतः कुछ समय ढांचे के विकास को चाहिये और इसलिये अन्य मुद्दों की तरह इसे भी नीति निर्देशक मुद्दों के खण्ड में शामिल किया जाये जो कि सरकारों के लिये आदर्श हो और कुछ समय पश्चात जब आधार रुप ढांचे का विकास हो जाये तब अन्य मुद्देां के साथ समानशिक्षा के मुद्दे को भी मूल अधिकार के रुप में शामिल किया जा सकता है। पर अफ़सोस व दुखद यहाँ रहा की इसका कोई ठोस नियम या आदेश न बन सका | इसके पीछे तर्क था की भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत नही की इस खर्च को झेल चुके |एक यह भी अनुमान लगाया गया की आने वाली सरकारे 10-20-30 वर्षो में इसका नियम व आदेश बना लेंगे पर आज आजादी के 68 वर्ष बीत चुके है फिर भी हम लोगो को शिक्षा का समान अधिकार नही दे पाये | निजी स्कूलो के नाम पर आर्य समाज ईसाई मिशनरी संस्थायें, इस्लामिक मदरसा, गुरुद्वारा प्रंबधक सभायें जैसी अन्य धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से शिक्षा के प्रसार के लिये स्कूल कालेज आदि खोले गये थे परन्तु यह सामाजिक हित में और गरीब लोगो को भी शिक्षा देने के लिये न्यूनतम फीस आदि के आधार पर शुरुकिये गये थे।इनमें व्यापार या मुनाफा नही था और न ही निजी मालकियत थी बल्कि इनके पीछे समाज सेवा शिक्षा का विकास और परोपकार की भावना थी। परन्तु कुछ वर्षो के पश्चात समाज के ताकतवर सपन्न और प्रभावी लोगो ने अपने बच्चों के लिये पृथक और मंहगे स्कूल शुरु कराये जैसे दून स्कूल डेली कालेज और ऐसी ही अन्य शिक्षण संस्थाओं को राजा महाराजा या उद्योगपतियों के पैसे से खड़ा करना आंरम्भ हुआ तथा शिक्षा को अमीर और गरीब-बड़े और छोटे ताकतवर और कमजोर राजा और रंक के बीच बांट दिया गया। पुराने राजाओं, धनपतियों और राज सत्ता पर बैठे नेताओं तथा अफसर शाहो के बच्चे इन बड़ेस्कूलों में पढ़ाये जाने लगे जहां पढ़ाई का माध्यम सत्ता प्रतिष्ठान की भाषा अंग्रेजी हो गई और उच्चवर्गीय और उच्च वर्णीय ढ़ाचे को स्थाई तौर पर बरकरार रखने के लिये शिक्षण संस्थाओं में भाषा महत्वपूर्ण माध्यम बन गई।डा.राममनोहर लोहिया ने नारा दिया था ’’राष्ट्रपति हो या चपरासी की संतान सबकी शिक्षा एक समान’’ लोहिया इस बात को जानते थे कि अगर अफसर और चपरासी का बेटा, सम्पन्न और गरीब का बेटा , उद्योगपति और किसान का बेटा, बड़ी जात और दलित का बेटा जब एक ही स्कूल में साथ-साथ पढ़ेगे तो भेद-भाव मिटेगा |राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी तथा सबको समान अवसर प्राप्त होगे,जिससे योग्यता और क्षमता का विकास भी उसी के अनुसार होगा। यह बड़ा विचित्र है कि हमारे देश के कुछ नौजवान और कुछ लेाग जो आरक्षण को समानता का विरोधी मानते है आरक्षण तो मिटाना चाहते है| आरक्षण मुक्त भारत का नारा लगाते है परन्तु समान शिक्षा की बात नही करते। वे यह तो कहते है कि 68 साल आरक्षण को हो गये इसे खत्म करना चाहिये परन्तु वो यह नही कहते कि 68 साल हो गये कि अब नीति निर्देशक मुद्दों को संवैधानिक प्रावधान बनना चाहिये तथा सबको समान शिक्षा का अवसर मिलना चाहिये।असमान शिक्षा भी एक प्रकार का आरक्षण है जिसमें सम्पन्न और ताकतवर के बच्चो को पद और पैसे के आधार पर शिक्षा के विशेष अवसर है। इसका आधार योग्यता नही है बल्कि मात्र आर्थिक या सत्ता प्रतिष्ठान की ताकत ही योग्यता है। यह नौजवान मित्र बड़े-बड़े डोनेशन वाली (जो वस्तुतः भ्रष्ट व काला धन होता है) उस शिक्षा प्रणाली का भी विरोध नही करते जिसमें लाखो करोड़ रुपये देकर अयोग्य छात्र डाक्टर, इंजीनियर आदि बन जाते है और इसीलिये समाज के एक बड़े हिस्से में उनकी मांग और नीयत संदिग्ध रहती है। अब देश में सरकारी शिक्षण संस्थाये और विशेषतः प्राथमिक शिक्षा मैदान के बाहर नजर आती है। नये सरकारी स्कूल खुलने के बजाय बंद हो रहे है। परोपकार के नाम पर शुरु किये जाने वाली धार्मिक और सामाजिक संगठनों के द्वारा चलाये जाने वाले स्कूल बंद हो रहे है| कहने को तो सरकार ने शिक्षा का कानून RTE 2009 में पारित कर दिया है , निजी शिक्षक संस्थाओ को 25 प्रतिशत स्थान गरीबो के बच्चो को आरक्षित रखने का प्रावधान कर दिया है। पर यहतो कानून की किताबो में ही सिकुड़ कर रह गया है | स्कूलो में प्रवेश भी मिल जाये पर विद्यालय में लगने वाली वर्दी (यूनिफार्म) महँगी किताबे ,कापियां ,स्कूलकी दुरी की वजह से साधन याने स्कूल प्रबंधन की चलने वाली महँगी किराये वाली बस (BUS) ,एवं विद्यालय में लगने वाली शिक्षण शुल्क के अलावा अन्य लगने वाली शुल्क की भरपाई कौन करेगा ,,कोर्स में अनेक प्रकार के प्रोजेक्ट बनाने के लिए सहायक सामग्री स्टेशनरी कम्प्यूटर ,प्रिंटर आदि कहाँ से लाये जाये ,यह सारी बाते या समस्याए एक गरीब परिवार नही झेल सकता |भारत की 15 वी जनगणना(वर्ष 2015) के अनुसार देश में साक्षरता 74.04 फीसदी है| जिसमे पुरुष साक्षरता 82.14 फीसदी और महिला साक्षरता 65.46 फीसदी हो गई | परइस बात का ध्यान रहे की शिक्षित होना और साक्षर होना दोनों में भिन्नता है | अब समय आ गया है जब”” शिक्षा कीही नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात होनी चाहिये”” |यही कारण है कि””सबको शिक्षा-अच्छी शिक्षा”” हमारा नारा है।जब सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर ,लिपिक,चपरासी,किसान ,दलित आदि जब सभी के बच्चे एक ही स्कूल में एक ही छत के नीचे एक ही अध्यापक से शिक्षा ग्रहण करेंगे |तभी हम सभी समान शिक्षा का अधिकार दे पाएंगे |आज मध्यप्रदेश में शिक्षा की हालत बहुत ही दयनीय है जिसके कारण आज शिक्षा का व्यापारीकरण हो गया है| सरकारी स्कुलो का रुख खासकर प्रायमरी स्तर पर केवल गरीब के बच्चे मध्यान भोजन के लिए या छात्रवृत्ति के लिए नाम मात्र को स्कूल पहुँच रहे है | वही शिक्षको में अनेक कटेगिरी का निर्माण शासन ने कर रखा है /अतिथि , गुरूजी, संविदा शिक्षक ,शिक्षाकर्मी ,नियमित शिक्षक ,पद एक ,कक्षाए भी पढ़ाने को एक ,पर दुर्भाग्य कीइनका वेतन अलग-अलग है |ऐसे में मानसिक तनाव झेल रहा मध्यप्रदेश का शिक्षक अपने नियमतीकरण के लिए कही स्कूल बंद ,कही हड़ताल ,कही ज्ञापन ,कही जेल में बंद रहकर सरकार की नीतियों व वादा खिलाफी के प्रति अपनी जंग जारी रखे हुए है ,,,ऐसे में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा,विद्यालयों का सही सञ्चालन हो पाना आज “”दूर की कौड़ी साबित”” हो रहा है |

सरकारी विद्यालयों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की कमी के कारण :---------------------------------------------------
01. विद्यालयों को सही संचालित करने में सरकार की इच्छाशक्ति की कमी |
02. नेताओ के द्वारा आपने वोटर्स तैयार करने के लिए शैक्षणिक घोषणाए |
03. गुणवत्तापूर्ण शिक्षक/ शिक्षिका की कमी
04. शिक्षक/शिक्षिका को अन्य शैक्षणिक कार्यो में उलझाये हुए रखना |
05. शिक्षको को पुरे वर्ष स्कूल के बाहर जनगणना, मतदाता सूचि का संधारण,ग्राम सर्वे ,BPL सूचि तैयार करना ,पशु गणना ,मध्यान भोजन कीजानकारिया जुटानाआदि अनेक ऐसी ही योजनाओ को राष्ट्रिय कार्य का नामदेकर शिक्षक/शिक्षिका से करवाया जाता है |
06. गुणवत्तापूर्ण व नियमानुसार एवं सर्व सुविधायुक्त विद्यालय ईमारतका न होना |
07 .विद्यालयों में पानी ,साफ-सफाई,रौशनी,साफसुथरे लैट्रिन-बाथरूमोका न होना |
08. विद्यालय का सही प्रबंधन न होना |
09. विद्यालयों में होने वाली मानिटरिंग को सही अन्जाम न देना ,,यह केवल खानापूर्ति तक सीमित रहा गया है |
10. अधिकारियों का अपनी जेब गरम करने से फुर्सत नही जिसकारण विद्यालयों की सुविधा एवं पढाई लिखाई पर ध्यान देनेका ढुलमुल रवैया |

यदि सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर,लिपिक,चपरासी, किसान ,दलित आदि जब सभी के बच्चे एक ही स्कूल में एक ही छत के नीचे एक ही अध्यापक से शिक्षा ग्रहण करेंगे तो इसके परिणाम भी बेहद रोचक होंगे |साथही भारत देश का जो एक बड़ा तबका जो की शिक्षा से अछूता या कहे शिक्षा के नाम पर साक्षर तो है पर शिक्षित नही है |ऐसे बदलाव से समाज पर भी गहरा और भविष्य में सामाजिक भेदभाव मिटाने में कभी सहायक सिद्ध होगा |

समाज पर प्रभाव :---------------------
01. सभी छात्र एक जैसी वर्दी (यूनिफार्म) पहनेगें तो न कोई आमिर दिखेगा न ही कोई गरीब दिखेगा
02. सभी छात्र एक जैसी किताबो का अध्ययन करेंगे जिससेसभी का ज्ञान बुद्धि-लब्धि के हिसाब से एक जैसा होगा|
03. सरकार के द्वारा स्कुलो में उपलब्ध करवाए गए पढाई–लिखाई के साधन भी एक जैसे होंगे |
04. सबसे अहम बात की गरीब बच्चो को पढाई करने में हीन भावना का शिकार भी नही होना पढ़ेगा |
05. कक्षा में एक अध्यापक सभी छात्रो को एक जैसा ही पढ़ेगा ,यह नही होगा की ये गरीब छात्र है की यह अमीर छात्र है |किसी एक पक्ष को इंगित नही करेगा |
06. अमीर छात्रो को अलग से कोई अन्य भाषा नही पढ़ाई जाएगी ,जैसा की बड़े निजी विद्यालयों में होता है |सभी को एक ही पाठ्यक्रम से पढाया जायेगा |
07. एक साथ स्कूलो में बैठक व्यवस्था होगी | क्यों की अमीर गरीब का भेदभाव अभी भी समाज में व्याप्त है |
08. जब सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर , व्यापारीके पुत्र/पुत्री जब सरकारी स्कूलो में पढेंगे तो आपने आप ही सभी स्कुलो पर विशेष ध्यान देना शुरूकर देंगे और स्कुलो की खस्ता हालत या लचर व्यवस्था में सुधार आना शुरू हो जायेगा |
09. शिक्षको को सही वेतनमान और सही समय पर पगार(पेमेंट) मिलना शुरू हो जाएगी |
10. वर्तमान में जो हम भारत की साक्षरता 74 प्रतिशत बताते है यही शिक्षा में परिवर्तित हो जाएगी ,फिर हर वर्ग का छात्र देश के प्रति देशप्रेम और देश के संसाधनों कोगुणवत्तापूर्ण उपयोग के बारे में सोचेगायह इलाहबाद हाई कोर्ट का बहुत ही सराहनीय कदम है|
इससे समाज ही नही देश में भी शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव आएंगे | 

लेखक सवयं अध्यापक है और यह इनके निजी विचार है -यह लेख बुधवार और गुरूवार को शिक्षा विमर्श में चर्चा के विषय 
'  माननीय ईलाहबाद उच्च न्यायालय का आदेश जिसमे प्रत्येक लोकसेवक "अफसर ,कर्मचारी ,विधायक और सांसद " को अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने का आदेश  ' में प्रथम स्थान पर चुना गया है . 

Wednesday, October 5, 2016

RTE रूपी कमान से निकला एक तीर 25% फ्री....निशाने दो शिक्षक और समुदाय-श्रीराम राठौर (खातेगांव)

श्रीराम राठौर  -साथियों सादर वंदे.......RTE (शिक्षा का अधिकार अधिनियम) के प्रावधान अनुसार वंचित और कमजोर वर्ग के बच्चों का अशासकीय शालाओं की न्यूनतम कक्षा में 25% (न्यूनतम) प्रवेश के संबंध में बात करने से पहले यह सोचना आवश्यक हो जाता है कि हर सिक्के के 2 पहलू होते हैं इस विषय पर यदि दोनों पहलुओं को साथ लेकर चला जाए तभी हम सही निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं।
मेरे विचार से सर्वप्रथम इसकी बिंदुवार पक्ष विपक्ष के साथ समीक्षा कर ली जाये.....
25% निःशुल्क प्रवेशित बच्चों का शासकीय विद्यालयों पर पड़ने वाले प्रभावों तथा उनके कारणों के संबंध में यदि विस्तृत रूप से चिंतन किया जाये तो निम्न तथ्य सामने आते है......
1)  शासकीय शालाओं में प्रवेश की कमी :- अशासकीय शालाओं में न्यूनतम कक्षाओं में 25% निःशुल्क प्रवेश के कारण हमारे शास.विद्यालयो में साल-दर-साल नव प्रवेशी बच्चों का अकाल सा पड़ गया है, इस प्रवेश रूपी अकाल को हम समुदाय से अपना जीवित संपर्क कर अपनी शाला की विशेषता बता कर और हमारे कार्यो से दूर कर सकते है 25% फ्री का शासकीय विद्यालयों पर पड़ने वाला यह मुख्य प्रभाव है।
2) यह योजना शासकीय शालाओं का निजीकरण की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है,शासकीय शाला की न्यूनतम कक्षा से साल दर साल बच्चो की संख्या उसी अनुपात में अगली कक्षाओ में आगे भी बढती चली जाती है विगत तीन चार वर्षो में 25% न्यूनतम तथा इससे भी अधिक बच्चों का प्रवेश निजी विद्यालयों में प्रवेश दिया जाकर शासन द्वारा इसकी फीस प्रतिपूर्ति भी की गई परन्तु इस वर्ष शासन द्वारा  निजी विद्यालयों हेतु इस प्रक्रिया को ऑनलाइन के माध्यम से किया जाकर विभिन्न कठिन प्रावधान भी इसमें जोड़े गए जो की शास.शालाओ और हमारे पक्ष में रहा है यह हमारे लिए एक अच्छा संकेत भी है।
3) एक प्रश्न यह भी उठता है की 25% फ्री बच्चों पर खर्च की जाने वाली राशि का उपयोग निश्चित रुप से शासकीय विद्यालयों में होना चाहिए था जिससे शासकीय विद्यालयों की अपूर्ण व्यवस्थाओं को पूर्ण किया जा सकता था वैसे शासन हमेशा पूर्ण व्यवस्था के झूठे दावे करता रहता है इस सम्बन्ध में भी हमें शासन का ध्यान आकृष्ट करना चाहिए।
समुदाय पर 25% फ्री भर्ती के पड़ने वाले प्रभाव के बारे में भी हमें चिंतन और मनन करना होगा...
1) आज वर्तमान में अशासकीय विद्यालयों की चकाचौध के कारण कमजोर वंचित समूह के लोग भी अपने बच्चो का प्रवेश अशासकीय शालाओ में कराना चाहते है RTE में 25% का प्रावधान भी समुदाय की भावना को ध्यान में रखकर किया गया है, कही न कही हम भी इसके लिए जबाबदार है हमें समुदाय को हमारी और हमारी शालाओ का प्रचार प्रसार कर स्वयं की योग्यता को साबित करना ही पडेगा।
2) वंचित वर्ग के लोग जो अपने बच्चो को अच्छे सर्वसुविधा युक्त अशासकीय  शाला में 25% के माध्यम से प्रवेश दिलाते है वो शाला के अन्य खर्च जैसे गणवेश पुस्तकें टिफिन और आवागमन के साधन आदि वहन नहीं कर पाते कही न कही ये बात समाज में कुंठा की भावना एवं बच्चो एवं पालको में हीन भावना पैदा करती है यह 25% फ्री योजना का एक कमजोर बिंदु है।
3) बड़े और सर्वसुविधायुक्त अशासकीय विधालय 25% भर्ती के संबंध में सहयोग की भावना नहीं रखते तथा छोटे ऐसे विद्यालय जिनकी फीस RTE वाले फ्री बच्चो से कम है वे विद्यालय इस योजना में अधिक रुचि लेते है, अशासकीय शालाओ के इस प्रकार के रवैये से भी कही न कही समुदाय भ्रम में पड़ रहा है।
निष्कर्ष:- साथियों सारे बिन्दुओ पर विचार करने के पश्चात यह कहना उचित होगा समाज को इस योजना में लाभ के साथ साथ अप्रत्यक्ष रूप से हानि भी हो रही है, साथ ही कहीं ना कहीं इस मामले में कमजोर पक्ष के रूप में हम लोग भी नजर आते हैं निश्चित रूप से समुदाय को हम हमारी विशेषताएँ नहीं समझा पा रहे है, और नहीं समुदाय से आपसी सामंजस्य भी बैठा  पा रहे है और न ही वर्तमान में पालको से हमारा जीवित संपर्क ही रहा है।
एक बात और भी सामने आती है साथियो, हमारे द्वारा होने वाले आंदोलनों में भी 25% फ्री बच्चो का मुद्दा तथा शास.विद्यालयों का निजीकरण का मुद्दा भी हमें सम्मिलित करना चाहिए तथा हम शिक्षकों को समुदाय से अशासकीय विद्यालयों के प्रति समुदाय की भावना को भी हमारे उत्कृष्ट कार्यो के द्वारा बदलना ही पड़ेगा। साथियों यह तो निश्चित है कि यदि हम अपने कर्तव्य पर 100%खरे उतरे तो शासन 25% फ्री भर्ती के साथ ही ऐसे और भी सैकड़ों प्रयोग हमारे विद्यालय और हमारे समाज पर कर ले तो भी इस तरह के कपटता पूर्वक रवैये में कभी भी सफल नहीं हो सकती क्योंकि हम राष्ट्रनिर्माता  और युगद्रष्टा की भूमिका में है,आज भी समाज हमारा अनुसरण करता है। हमारे  अस्तित्व को बचाने और हमारी शक्ति को पहचानने की आवश्यकता और जरूरत मात्र है, सरकार का यह जो RTE की कमान से निकला हुआ 25% का तीर है निश्चित रुप से हम इस तीर को मोड़ सकते हैं इतना सामर्थ और शक्ति तो हमारे अन्दर मौजूद है।।
(लेखक स्वयं  अध्यापक और यह उनके निजी विचार है ।)RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव )
संयुक्त रूप से प्रथम स्थान  पर पर यह लेख चयनित किया गया।

25% नही 100% छात्रों को निजी स्कूलों में भेजने की साजिश है ये नियम - सचिन गुप्ता (खितौली)


RTE के तहत 25% छात्रों को निजी स्कूलों में भेजने की सरकार की मंशा चाहे जो भी हो लेकिन इस निर्णय से सरकारी विधालय ,वंचित वर्ग ,और समाज इन सभी पर परोक्ष अपरोक्ष रूप से गहरा असर हो रहा है।
हम सभी और सरकार भी यह जानती है कि सरकारी स्कूलों में कमजोर,वंचित और सामाजिक रूप से पिछडे गरीब लोगों के छात्र ही बहुतायत संख्या में दर्ज होते हैं जिनकी निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था सरकार खुद करती है।
यह सब जानते हुए भी 25% छात्रों को सरकारी स्कूल से छीनने का सफलतम प्रयोग सरकार ने कर लिया जिसका सीधा असर सरकारी स्कूल की दर्ज संख्या पर हुआ। इस निर्णय ने यह दिखाने की कोशिश कि सरकारी स्कूल में छात्र नहीं पढना चाहता अगर हम 100% कर दे तो सरकारी स्कूल बंद हो जाँएगे शायद इनकी मंशा भी यही है क्योंकि समय समय पर सरकारी स्कूलों के निजीकरण की बातें अखबारों व बयानों के माध्यम से सुनने को मिलती रहती हैं
यह निर्णय हर सरकारी स्कूल पर हमला है, हर अध्यापक ,हर शिक्षक पर हमला है ये हमारी योग्यता पर हमला है ।
मैं जानना चाहता हूँ कि निजी स्कूलों ने उन 25% छात्रों के शैक्षणिक स्तर पर कितना सुधार किया ।
जहाँ एक ओर सरकार को इनकी निशुल्क शिक्षा के लिए अतिरिक्त वित्तीय भार सहना पड रहा है वही सरकारी स्कूलों में तमाम सुविधाएँ उपलब्ध कराने के बावजूद उसे कमतर आँका जा रहा है।
अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन यह सीमा 50% होगी फिर 100% और हमें सौप दिया जाएगा किसी अन्य विभाग व संस्था के अधीन नये सिरे से शोषण करने के लिए ।
वही ये 25% छात्र भी निजी स्कूलों की चकाचौंध में अपने से मजबूत आर्थिक परिस्तिथि के छात्रों के रहन सहन, हाव भाव, तौर तरीके में सामंजस्य बिठाने के चक्कर में अपने अभिभावकों पालको से उनके समतुल्य वस्तुओं की चाहत की हठ करने लगता है जो उसके पालको की सीमा से बाहर होता है ऐसे में छात्र पर क्या असर होता होगा ये हर अभिभावक महसूस कर सकता है
वंचित वर्ग ,सरकारी स्कूल और निजी स्कूल की खाई में फँसता जा रहा है  क्योंकि इस वर्ग ने जिस परिणाम की लालसा में इस नियम का लाभ उठाकर अपने छात्रों का दाखिला निजी विधालयों में कराया था उसे अपनी उम्मीद के मुताबिक परिणाम नही मिल पा रहें हैं जिसकी लालसा में वे सरकारी स्कूलों से अलग हुए थे।
मैं कहना चाहता हूँ कि सरकारी स्कूलों का निजीकरण करने की साजिश को बेनकाब करने का जिम्मा तो हमारा है ही वही हर रोज खुल रहे निजी स्कूलों के छात्रों का सरकारी स्कूल में नामांकन कराकर इन स्कूलों को बंद करवाने का एक प्रयास करना बहुत जरूरी है ।( लेखक स्वयं अध्यापक है और यह उनके निजी विचार है ) RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव )
द्वितीय  स्थान पर पर यह लेख चयनित किया गया।

न रहेगा शिक्षा विभाग... न रहेगी वेतनमान की माँग और समस्या...विवेक मिश्रा ( नरसिंहपुर )

 विवेक मिश्रा   - सभी बुद्धिजीवी भाई बहनों द्वारा अनेक पहलुओं पर अनेक प्रकार के तर्क दिए गए हैं, जो किसी न किसी दृष्टिकोण से तर्कसंगत व उचित ठहराये जा सकते हैं, परंतु इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है - शासन की २५ प्रतिशत बच्चों को निजी शालाओं में स्वयं शासकीय शालाओं के शिक्षकों /अध्यापकों द्वारा प्रवेश दिलाने की नीति- इस संबंध में मेरा कहना है कि क्या यह नीति जब प्रस्तावित की गई थी तो तत्कालीन समय में शिक्षक समाज के विभिन्न संगठन चाहे वो अधिकारी /लिपिकीय/शिक्षक/अध्यापक /चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संवर्ग के हों, क्या इनमें से किसी भी संगठन ने इस नीति का विरोध किया था, यदि हां तो कब और किसने और किस स्तर पर (प्रमाण सहित) और नहीं तो क्यों नहीं. क्या वो इस नीति के दूरगामी परिणाम के बारे में दूरदर्शिता नहीं रखते थे, कि इस नीति के तहत जिस "शिक्षा विभाग रूपी मातृ विभाग" से उनका और उनके परिवार का पालन-पोषण हो रहा है, उसे सुनियोजित तरीके से समाप्त करने की यह योजना बनाई गई है, साथ ही शासन स्वयं इन २५ प्रतिशत बच्चों की राशि भी निजी शालाओं में जमा करके उन्हें बढ़ावा देकर फलने फूलने के पर्याप्त अवसर दे रही है, कारण साफ है कि ज्यादातर पूँजीवादी निजी स्कूल उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, राजनेता और अधिकारियों के हैं, जिनमें मनचाही फीस और नियम कानून अपनाए जाते हैं,कुछ तथ्यों पर आप भी सोचकर देखें तो आप भी सहजता से स्वीकार करेंगे कि शासकीय शालाओं में ज्यादातर गरीब तबके के बच्चे अध्ययनरत रहते हैं, यदि इनको बढ़ावा देने के लिए यदि इन्हें पूँजीवादी निजी स्कूलों में दाखिल करा भी दिया जाता है तो वहां पर इनके साथ पढ़ने वाले अमीर परिवार के बच्चों के जैसा बराबरी का बर्ताव या सलीका नहीं अपनाया जाता, जब ये गरीब बच्चे जो कि शासन की नीति के तहत इन निजी स्कूलों द्वारा मजबूरी में दाखिल कराये जाते हैं तो इन पूँजीवादी निजी स्कूलों के स्टाफ, अमीर बच्चों द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाता है, साथ ही जब ये गरीब बच्चे इन निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अमीर बच्चों के आने जाने के लिए लगे निजी वाहनों, उनके पहनने के कपड़ों की क्वालिटी, उनके भोजन की क्वालिटी, उनके माता-पिता के द्वारा इन निजी स्कूलों को दिए जाने वाले डोनेशन इत्यादि के बारे में सोचते हैं तो इन गरीब बच्चों के मन में हीन भावना घर कर जाती है. साथ ही निजीकरण के माध्यम से शासन अनुत्पादक समझे जाने वाले इस मौलिक अधिकार से अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति भी पाना चाहती है, परंतु किसी भी राजनीतिक दल के लिए हर चुनाव में शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रमुख मुद्दे होते हैं, जिन्हें चाहकर भी ये समाप्त नहीं कर सकते, नहीं तो कल से जनता भी इनसे कहने को तत्पर रहेगी कि अब आपकी (सरकार को चुनने की ) भी कोई आवश्यकता नहीं है और आपका भी निजीकरण कर दिया जाए, परन्तु इन सबके बीच में हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि शासन की नीति अनुरूप अलग अलग समय पर अलग अलग संवर्गो में भर्ती किए गए अहं और महत्वाकांक्षाओं में घिरकर हम और हमारे संगठन, विरोध करने पर बैकफुट पर दिखाई देने को विवश हैं,उनकी इस विवशता का भी एक नहीं बल्कि अनेक वाजिब कारण हैं, पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि इस संवर्ग के स्वयं के परिवार के बच्चे निजी शालाओं में अध्ययनरत रहते हैं, दूसरा इस संवर्ग के स्वयं के या इनके रिश्ते नातेदारों के निजी स्कूल हैं,          आज के विषय के संदर्भ में ,यह भी आशंका व्यक्त की जा सकती है कि २५ % नीति के तहत जिन शासकीय शालाओं को बँद कर समीपस्थ शालाओं में मर्ज किया जाना है, तो बँद करने के बाद उन बंद हुई शासकीय शालाओं की बहुमूल्य जमीनों(शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों  की) पर स्थानीय निकायों जैसे नगरपालिका/नगर निगम/नगर पंचायत अथवा जनपद/जिला पंचायत का नियंत्रण होना तय माना जा सकता है, तदुपरांत कालांतर में इन बेशकीमती जमीनों और उन पर बने भवनों का उपयोग व्यावसायिक दृष्टि से लाभ कमाने के लिए लिये किया जा सकता है. यह भी समझा जा सकता है कि इनमें से शहरी क्षेत्रों की शास शालाओं की बेशकीमती भूमियों पर निकट भविष्य में शापिंग माॅल या काम्पलेक्स जैसी इमारतों का निर्माण कर उन्हें नीलाम कर करोड़ों अरबों का लाभ कमाया जा सकता है. साथ ही स्थानीय निकाय के कर्मचारी कहलाने के कारण निकट भविष्य में कभी भी हमें घर पर बिठा दिया जा सकता है... यह भी एक कटु सत्य है जिसे झुठलाना अपने आपको धोखे में रखने जैसा होगा.    स्थानीय निकायों की नियोक्ता संस्थाओं के नियंत्रण में ही ये बंद हुए शाला भवन जायेंगे अन्य किसी निकाय के द्वारा इन पर अपना हक नहीं ठहराया जा सकता है, जैसे कि स्कूल शिक्षा विभाग, क्योंकि हमारे संवर्ग की नियुक्ति तत्समय इन्हीं स्थानीय निकायों द्वारा की गई थी.. ईवन ट्राईबल की शालाओं और आश्रम शालाओं के साथ ही भविष्य में आँगनवाड़ी केन्द्रों में भी इसी तरह के नियमों का पालन किया जा सकता है....        अगर सारांश रूप में कहा जाए तो इस प्रकार की नीति केवल हमारे अकेले विभाग पर ही लागू की जा रही है, एेसा कहना गलत होगा.. इस प्रकार की नीतियों की शुरुआत तो 1990 के दशक से ही देश भर में प्रारंभ कर दी गई थी... हमें इस तथ्य को भली भांति समझ लेना होगा कि देश व्यापी स्तर पर आज का दौर उदारीकरण, निजीकरण और विश्वव्यापीकरण का है और इन सबके कारण किसी भी प्रकार की अप्रत्याशित नीतियों का प्रकटीकरण असंभव प्रतीत नहीं हो सकता...(लेखक स्वय अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार है )RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव ) प्रथम स्थान पर पर यह लेख चयनित किया गया।

निजी विद्यालय है भेदभाव की जगह - विष्णु पाटीदार

विष्णु पाटीदार -RTE  अंतर्गत निजी विद्यालय में कमजोर वर्ग के 25 प्रतिशत भर्ती के कारण शासकीय शालाओं में दर्ज संख्या में काफी कमी आ गई क्योंकि वैसे भी शासकीय शालाओं में इन कमजोर वर्ग के बच्चों का हीं अधिक प्रवेश होता था उच्च वर्ग के बच्चे तो वैसे भी कम ही आते थे इससे सरकारी विद्यालय के साथ साथ समाज पर भी बहूत असर हुआ, कमजोर वर्ग के बच्चे उच्च वर्ग के बच्चों के साथ पढ़ने लगे जिससे कमजोर वर्ग अपने आप को गौरवान्वित महसूस करने लगा तथा उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलने लगी । नीजी स्कूलों ने भी इसका भरपूर फायदा उठाया क्योंकि बच्चों की फीस तो सरकार वहन कर हीं देती है लेकिन निजी स्कूल वाले इन बच्चो के साथ भेदभाव कर अलग से कक्ष में बैठाकर मुख्य धारा से अलग रखते हैं नियमों का पालन करते हुए इन बच्चों को उच्च वर्ग के बच्चों के साथ बैठाकर नहीं पढ़ाते साथ हीं टारगेट पूरा करने के लिए निर्धारित आयु से कम आयु या अधिक आयु के बच्चों को भी भर्ती कर लेते हैं । सरकार की कमजोर तबके को मुख्य धारा में जोड़ने की पहल अच्छी थी लेकिन कतिपय निजी विद्यालयों ने इसका नाजायज फायदा उठाया और इसी के कारण सरकारी विद्यालयों में दर्ज संख्या में कमी आने का एक कारण यह भी हो सकता है ।(लेखक स्वयं अध्यापक है और यह उनके निजी विचार है ।)



( RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25  प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव )

तृतीय  स्थान पर पर यह लेख चयनित किया गया। 

Saturday, October 1, 2016

शिक्षक,शिक्षा और नैनिहाल के हाल बेहाल जबाबदार कौन......? - श्रीराम राठौर ( खातेगांव जिला देवास )

 श्रीराम राठौर  - 1995 के बाद से ही शिक्षकों की भर्ती पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को सौंपी दी गई थी, 1998 के बाद से पंचायतो ने सरकारी नियमानुसार शिक्षाकर्मी गुरूजी तथा संविदा शिक्षको की भर्तियाँ की गयी, जिनमे शिक्षको की विभिन्न श्रेणीयो वाले शिक्षाकर्मी संविदा शिक्षक वर्ग 1,2,3 एवं गुरूजी आदि शिक्षक के रूप में थे। बाद में सरकार ने पंचायती नियमो एवं अर्थव्यवस्था का हवाला देकर नियमित शिक्षकों के वेतन की अपेक्षा अति न्यूनतम वेतन देकर शिक्षाकर्मीयों एवं अन्य प्रकार के शिक्षको का भरपूर शोषण किया ।बिडम्बना यह थी की हमारे साथियो का वेतन चपरासी से भी अत्यधिक कम था। शिक्षाकर्मीयों संविदा शिक्षको व गुरुजियो का मानदेय उस समय वेतन न होकर मानदेय था, जबकि नियमित शिक्षको को चौथा,पांचवाँ और छटवां वेतनमान दिया जा रहा था।मुझे अच्छे से याद है एक समय था जब हमारे वर्ग 03 वाले शिक्षाकर्मी  साथियो की तो 2256 के नाम से समुदाय में पहचान ही बन गई थी। और हमारा साथी न्यूनतम मानदेय की इस स्तिथि के कारण जीवन यापन के अन्य स्त्रोत भी तलाशने में लगा था। हमारे साथियो की ख़राब स्थिति यही नहीं रुकी सरकारों की दमनकारी और शोषण की निति के खिलाफ आख़िरकार हमारे साथियो ने आन्दोलन की राह पकड़ी काफ़ी संघर्ष और आन्दोलन के बाद 2007 में म.प्र. सरकार ने फिर राष्ट्रनिर्माताओ को एकबार फिर छलते हुए अध्यापक संवर्ग का गठन किया जिसमे हमारी जायज मांगों के फलस्वरूप हमें सिर्फ नाम ही मिला हमारी मेहनत का दाम नहीं।
         आज तक भी आम अध्यापक छटवे वेतनमान की लड़ाई लड़ रहा है  और अन्य शिक्षकों को सातवां वेतनमान मिलने वाला है । 1995 के बाद से ही सरकारों के शोषण का प्रतिफल यह हुआ की  शिक्षा के स्तर और गुणवत्ता में कमी आती गई तथा न्यूनतम वेतन तथा विभाग में छोटे बड़े,कम ज्यादा,स्थायी अस्थायी और विभिन्न नामो श्रेणियों में बंटने के कारण कही न कही इन सब बातों का प्रभाव शिक्षक की मानसिकता पर भी पड़ा। उसके बाद शिक्षा के स्तर में थोड़ी बहुत गिरावट तो आना स्वभाभिक ही थी, स्तर की इस गिरावट को और ज्यादा बड़ी खाई बनाने का काम किया सरकारों के विभाग पर,शिक्षको पर विभिन्न नित नए प्रयोगों और लाल फीताशाही ने, जिनके कारण आम अध्यापक आज तक ठगा जा रहा है तथा अपने अधिकारों को पाने के लिए संघर्षरत है।
        अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत अध्यापक तो आज भी शिक्षातंत्र की भलाई के लिए सोंचते हुये शिक्षा का बेड़ा पार लगाते हुये नन्हे-मुन्हो का भविष्य संवारना चाहता है और अपने मूल कर्तव्य राष्ट्र निर्माता की भूमिका को बखूबी निभाना चाहता है...
         पर सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग यह समझ ले की आम अध्यापको के बेड़ापार से ही शिक्षातंत्र का बेड़ापार होगा अन्यथा नैनिहालो के भविष्य के लिए यदि कोई जबाबदार होगा तो सिर्फ और सिर्फ सरकार ही होगी.....
जय हिन्द साथियो......
( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में प्रथम   स्थान पर इस रचना को रखा गया )

1998 के बाद शिक्षा के मायने बदल गये - सचिन गुप्ता

 सचिन गुप्ता -यही वह समय है जब शिक्षक को आम जनता 500-1000 हजार रूपये का मास्टर कहकर पुकारने लगी और पहली बार शिक्षक को उसकी योग्यता से न नवाजकर उसकी तनख्वाह से उसकी सामाजिक और शैक्षणिक क्षमता का आँकलन किया जाने लगा 
         परिणाम हुआ शिक्षक और शिक्षा दोनो का स्तर गिरना ,जहाँ एक ओर शिक्षक अपनी समस्याओ को लेकर धरना प्रदर्शन आंदोलन करने लगा वही दूसरी ओर शिक्षा प्रभावित होने लगी और ऊपर से समय समय पर शासन प्रशासन की दमनकारी जवाबी कार्यवाही ने आग मे घी डालने का काम किया जबकि सरकार को उनकी माँगे पूरी करके शिक्षा की बाधाओ को दूर करने मे अध्यापको का साथ लेना चाहिए था
        वही दूसरी ओर शिक्षक शिक्षक मे क ई मतभेद सामने आने लगे शिक्षक मानसिक रूप से शासन प्रशासन अधिकारी अपने वरिष्ठ नियमित शासकीय शिक्षको के द्वारा उनके व्यंगो का सामना करने के लिए तैयार हो गया
        इतनी समस्याओ के बावजूद भी शैक्षणिक कार्य मे लगा रहा लेकिन समयानुसार उसका शोषण सरकारे करती रही जिसका असर शिक्षा व शिक्षक की पारिवारिक स्थिति पर भी हुआ
लेकिन उम्मीद यही है कि शिक्षक और शिक्षा दोनो की स्थितियाँ जल्द सुधरेगी

( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से दुसरे  स्थान पर इस रचना को रखा गया )

कम सुविधाओ एवं शोषण के बीच हमारे शिक्षक साथियो के कठिन परिश्रम से शिक्षा के स्तर को ऊँचा किया - रकीब खान

रकीब खान - वाजपयी सरकार ने 2003-04 मे  संविधान मे शंषोधन करके देश मे पेंशन बंद करवाने के साथ स्थाई पदो के .साथ कई विभागो मे अस्थाई पदो पर भर्ती के लिए कानून बनाया जिससे  मध्य प्रदेश मे स्थाई शिक्षको की भर्ती को खत्म कर अस्थाई शिक्षा कर्मी , एवं संविदा शिक्षको की भर्ती शुरू की जिनको BED, DED, धारी कुशल कर्मचारी होने के बावजूद भी एक अकुशल मज्दूर के बराबर अल्प वेतन पर रखा जाता  हे  साथ मे स्थाई कर्मचारियो के समान भत्ते (आवास , यात्रा आदि ) , पेंशंन (2004 से पहले )  तथा वेतन मान आदि से भी महरूम रखा जाता है जिस कारण इनका अधिकाश समय अपने हक़ को पाने की लड़ाई मे रैली ,धरना,  सभा आदि मे चला जाता है , साथ ही एक ही शाला मै एक ही कार्य को करने वाले LDT का वेतन जहाँ 40हज़ार के पार है वही उसी कार्य को ईमान दारी से करने वाले सहायक अध्यापक का वेतन मात्र 15 हज़ार ही है साथ ही ग्रेड पेय मे भी ज़मींन आसमान का अंतर है यही हाल अन्य वर्गो (1 व 2) का भी है इस कारण  अस्थाई पदो पर नियुक्त अध्यापक साथियो मे हीन भावना के साथ  सरकार एवं व्यवस्था  के प्रति रोष भी उत्पन्न होता है जिसका प्राभाव कक्षा मे भी पड़ता है साथ ही अल्प वेतन पर नियुक्त कर इनसे अन्य गैर शैक्षणिक कार्य (बी.एल.ओ. ,  SDM. कार्यालय मे अन्य निर्वाचन कार्य , मध्यान भोजन जानकारी , छात्रव्रत्ति, सायकिल आदि ) लिए जाते है , लगातार एसे कार्यो मे नियुक्ति से एक शिक्षक की अपने विषय पर एवं छात्रो पर पकड़ कमज़ोर हो जाती है साथ ही शिक्षक अधिकारियो का भी दबाव भी इनही पर होता है , जिससे इनमे मानसिक परेशानी के साथ ही अवसाद की स्तथि भी आ जाती है एसे मामले मे कई अध्यापक साथी आत्महत्या जेसे कठोर कदम भी उठा चुके  है !
जिससे अध्यापक एवं शिक्षा जगत पर एक विक्राल दुषप्रभाव पड़ता है , साथ यदि शिक्षक अपने हक़ के लिए धरना रैली जागरूकता लाता है तो मीडिया उसे कवरेज नही देता और यदि  एक शिक्षक शाला मे किसी उत्पाती छात्र को मार दे तो न्यूज पेपर मे ये खबर बड़ी बड़ी हेड लाईन मे छपती है जग हसाई होती है ,  जिससे समाज मे अध्यापको के प्रति गलत संदेश जाता है साथ ही शिक्षक छात्रो पर पड़ाई के लिए दबाव भी नही बना सकता है  इनही सभी कारणो से छात्र शासकीय शालाओ मे पड़ाई मे विशेष रुची नही ले पाते एवं दिनो दिन पड़ाई का स्तर समाज मे गिरता जा रहा है ,
लेकिन फिर भी कम सुविधाओ एवं शोषण के बीच हमारे शिक्षक साथियो के कठिन परिश्रम से बलीदान से ईमान दारी से किए गऐ शिक्षणीय कार्य से सत्र 2015-16 का कक्षा 10वी एवं 12 वी का बोर्ड परीक्षा परीणाम निजी शालाओ से अच्छा रहा है जिसके लिए समस्त अध्यापक बधाई के पात्र है धन्य वाद | 
( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से  दुसरे स्थान पर इस रचना को रखा गया )
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आज शिक्षक समुदाय की सबसे बड़ी समस्या अस्तित्व ,गरिमा एवं स्वाभिमान को बचाने की है - सीमा चावल

सीमा चावल - आज शिक्षक  डरा सहमा व भयग्रस्त  है । समुदाय की सबसे बड़ी समस्या अस्तित्व ,गरिमा एवं स्वाभिमान को बचाने की है ।  प्रशासन ने शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर अनाप शनाप धन खर्च करने के लिए ऐसी नीतियों को निर्माण करवाया है जिससे निजी स्कूल फले फुले व् सरकारी स्कूल व् शिक्षक की बदनामी हो । समाज व्  सरकार इन स्कूलो से घृणा करे ताकि सम्पन्न लोगो के बच्चे निजी स्कूलो में पढ़े । गरीबो की पहुँच  में शिक्षा  रहे ही नही । यह अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने का प्रयास भी है । आज समाज को भी इस समस्या की सच्चाई को समझना होगा । मुझे यह बताने में शर्म आती है कि हमारे अधिकारियो ने शैक्षणिक गुणवत्ता बढ़ाने के लिए हर सप्ताह प्रति माह संकूल स्तर पर विषयवार प्रशिक्षण आयोजित करने का कार्यक्रम तय किया है आप जानकर हैरान हो जाएंगे कि प्राथमिक विद्यालय में दो शिक्षक में से 5वीं पढ़ाने वाले को प्रतिमाह 8 दिन प्रशिक्षण लेने जाना है । जिनकी गुणवत्ता के लिए उसे महीने में 10 से 12 दिन पढ़ाने का समय मिलता है । प्रशिक्षण उन्ही शिक्षको में एक को देना है कुछ नही होता केवल बैठने के ।  क्या इससे गुणवत्ता बढ़ेगी ? 
       इससे भी बड़ी बात तो यह है कि इन प्रशासनिक विशेषकर IAS ने शिक्षको को  डाकू लुटेरे चोर समझकर स्कूलो में निरीक्षण अवलोकन व् सरकूलर जारी किए है । नीतियों को बनवाया है ।  छात्रवृति सायकल mdm पाठ्यपुस्तक वितरण गणवेश आदि योजनाओ में हमारे साथ अविश्वास किया जाता है । इसी कारण हर साल ,आए दिन बदलाव कर, निरीक्षण में शंकाए व्यक्त होती है ।जबकि बहुत सी बातो के लिए हमसे अविश्वास कर योजना सञ्चालन किसी ओर से कराया जाता है व् जिम्मेदार शिक्षक को बनाया जाता है ।
आज बड़वानी की घटना से हमे सोचना चाहिए कि जब mdm समूह बनाता है । उससे सम्बन्ध जनपद का है । तो मात्र जनशिक्षक को दोषी मानना क्या शिक्षक के प्रति प्रशासन की दुर्भावनाए नही तो क्या है ? क्या केवल आत्महत्या हमारे अस्तित्व स्वाभिमान व् गरिमा को बचाने का हल है ?क्या यह सबसे बड़ी समस्या नही है ? हम स्व प्रकाशजी चौहान बड़वानी को इस रूप में अपनी श्रद्धांजलि दे कि किसी ओर शिक्षक को ऐसा कदम उठाने कि अवश्यकता नही महूसस हो ।
   मित्रो अब समय आ गया है कि हम इनकी कुत्सित चालो को समझकर सारे थोपे गए गैर शैक्षणिक कार्य छोड़े और मात्र हमारा मूल कार्य पढ़ाई के लिए संघर्ष करे । सङ्कल्प करे कि हम बच्चों के आलावा किसी से नही डरेंगे । पढ़ाने के आलावा कोई  गैर शैक्षिक कार्य नही करेंगे । सरकार से पढ़ाने के लिए लडेंगे ।
( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर इस रचना को रखा गया )

कविता @ शिक्षाकर्मी बना दिया -अर्जुन पटेल


जीवन उधार जैसा बेशर्मी बना दिया।
वर्षों की साधना ने शिक्षाकर्मी बना दिया।
सन्98में एक ऐसी नीति आई।
पढे लिखे युवकों की जवानी शरमाई।
मजबूरी बस शेरों ने घास खाना स्वीकारा था।
500 के वेतन में महीने किया गुजारा था।
फिर भी जोश नहीँ था कम पूरे दम से काम किया।
तनिक दया न आई शाशन ने सौतेली सन्तान किया ।
फिर से काबिज होने सत्ता पर एक निवाला फेका था ।
लाचार शिक्षाकर्मी ने उसे आशा की नजर से देखा था।
फिर उम्मीदे टूट गयी।
किस्मत ही जैसे रूठ गई।
फिर इनकी अगवाई में कई बार बजाई है ताली।
पर पूरा भोजन भरकर कभी न दी इनने थाली।
उतने पर भी सभाजीत नीति लाते हैं जाली।
कल भी हाथ ख़ाली थे
आज भी हाथ हैं खाली।
बार बार मझधार में आपने ला छोड़ा है।
पर हमने अब भी उम्मीद को नहीं तोडा है।
जो आप बने हैं धर्मपिता।
तो अपना धर्म निभाना।
अपने वादे को पूरा कर
शिक्षक हमें बनाना।
वेतन भी दो गर पूरा
तो हम वो कर दिखलायेंगे।
मध्यप्रदेश को शिक्षा में
नम्बर एक पर लाएंगे।।

( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर इस रचना को रखा गया )

Thursday, September 29, 2016

केवल सरकारी विद्यालयों की ही दुर्दशा क्यों ? राहुल रूसिया

      जब से शिक्षा का अधिकार लागू हुआ है तब से हमने देखा है की शिक्षा की दुर्दशा केवल सरकारी स्कूलों के छात्रों के लिए ही हुई है और उनका पढ़ाई में स्तर वास्तव में गिरा है यह सोचने वाली बात है की शिक्षा के अधिकार अधिनियम के सभी प्रावधान प्राइवेट स्कूलों में भी लागू होते हैं परंतु उधर पर इतनी बुरी स्थिति नहीं है बल्कि इस अधिनियम का फायदा उधर पर छात्रों एवं स्कूलों को हुआ है तो फिर सरकारी स्कूल शिक्षा के अधिकार को अभिशाप क्यों मानते हैं यहां पर सबसे गंभीर प्रश्न यही है की जो चीज निजी क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर रही है वही शासकीय क्षेत्र में प्रभावहीन क्यों है.      जहां तक मेरा मानना है तो शासकीय क्षेत्र में शिक्षा का स्तर गिरने की सबसे बड़ी वजह शिक्षा का अधिकार अधिनियम का पालन सरकार के द्वारा अभी तक स्वयं नहीं किया जाना है ना तो सरकारों ने अधिनियम के अनुसार विद्यालयों का सेटअप बनाया नाही शिक्षकों को उचित प्रशिक्षण दिया और ना ही विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक भेजें बल्कि इसके उलट जो विद्यालय पहले अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे उधर पर भी शिक्षकों को जाति प्रमाण पत्र आधार कार्ड मैपिंग रजिस्ट्रेशन स्वच्छता अभियान led वितरण मध्यान भोजन आदि में उलझा दिया और विचारा शिक्षक चाह कर भी विद्यार्थियों को शिक्षित नहीं कर सका इसके अतिरिक्त नाम न काटने की बाधा एक ऐसी समस्या है जिससे पलायन करने वाले छात्र जबरदस्ती उसी विद्यालय में दर्ज रह जाते हैं और विचारा शिक्षक उनका नाम जबरदस्ती क्लास दर क्लास आगे बढ़ाता रहता है मेरे हिसाब से इस अधिनियम में एक दो चीजों को छोड़कर कोई भी बंधन शिक्षा की राह में और विद्यालय के स्तर में रुकावट नहीं डालता बल्कि बाधाओं को दूर करता है परंतु सरकारी संसाधन सीमित है और गैर शिक्षकीय कार्य भरमार है यदि संसाधन बढ़ा दिए जाएं और गैर शिक्षकीय कार्य शिक्षकों से ना कराए जाएं तो यह अधिनियम निश्चित रूप से शासकीय क्षेत्र में भी शिक्षा का स्तर सुधार देगा  


( लेखक स्वयं अध्यापक हैं  और यह उनके निजी विचार हैं ,१९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में इस  लेख को  तृतीय स्थान प्रदान  किया गया है  )

सरकारी शालाएं ही क्यों निशाना बनी ? - कुलदीप श्रीवास्तव डबरा

कुलदीप श्रीवास्तव -यहाँ एक बात मेरे मन में आती है कि सरकारी शालाएं ही क्यों निशाना बनी ..सरकार के लिए,दरअसल एक ऐसा समय भी था जब शिक्षा प्राप्त करना एक विशेष वर्ग के लिए ही सुनिश्चित था सेवा कार्य करने वाले लोगो के लिए शिक्षा प्राप्त करना टेडी खीर थी ...तब तक यह भी था सरकारी शालाओ में इतनी व्यवस्था ख़राब नही रही शिक्षको को भी उचित सम्मान और सुविधाये मिलती रही समस्या तब से शुरू हुई है जब शिक्षा को मौलिक अधिकारो में शामिल कर लिया गया अब हर वर्ग को शिक्षित करना राज्य और संघ की जिम्मेदारी हो गई यहाँ से आप देखते है नीतिओ में बदलाव कैसा है
        स्कूलो में मध्यान्ह भोजन निशुल्क पुस्तके और अन्य सुविधाये विशेष वर्ग को छात्रवृतिया और सरकारी नुमाइंदे प्रयोग पर प्रयोग करने लगे यहाँ तक कि शिक्षक अब शिक्षक नही रहा उसके कई नाम कर दिए और सुविधाये समय दर समय कम होती गई अब सरकार ने यह पूरी तरह से मान ही लिया कि सरकारी विद्यालय में केवल निर्धन मजदूर किसान आदि के बच्चे पढ़ते है योजनाये भी वैसे ही अपना आकार लेने लगी है और तब ख़ास वर्ग के बच्चों की शिक्षा हेतु निजी विद्यालयो की आवश्यकता महसूस हुई और धड़ल्ले से मान्यताये मिलने लगी और खुल गई दुकाने शिक्षा की पर यहाँ हो सकता है कुछ अध्यापक अपवाद हो सकते है पर अध्यापक आज भी पढ़ाना ही चाहता है पर सच्चाई तो यही है कि ये सरकारें नही चाहती है कि विद्यालयो में ऐसा कुछ हो उन्हें अपने वोट बैंक पर खतरा नजर आता होगा शिक्षा और निर्धन के बीच दूरी बनी रहे यही सोच के साथ काम कर रही है सरकारें और तभी तो अल्प वेतन विना सुविधाओ वाले अध्यापको को सरकारी काम से लाद कर घोड़े की तरह दौड़ाने का प्रयास कर रही है सरकार
   परिणाम अपेक्षित कभी नही आयेगे . इसी सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश कोर्ट ने शिव भाई की याचिका पर निर्णय दिया था कि अधिकारियो के बच्चों को सरकारी विद्यालयो में पढ़ाना चाहिए ...सब सरकार चुप्पी साध के बैठ गई

( लेखक स्वयं अध्यापक हैं  और यह उनके निजी विचार हैं ,१९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में इस  लेख को  तृतीय स्थान प्रदान  किया गया है  )

कविता @ शिक्षा का निजीकरण -विवेक मिश्र नरसिंहपुर

शिक्षा के निजीकरण- व्यवसायीकरण की हो चुकी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, राजनेताओं, अधिकारियों के बोर्डिंग स्कूल चलाने की यह कूटनीतिक तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षण, परिवहन और उच्च शिक्षा हेतु लोन व्यवस्था कर बच्चों के पालकों को लूटने की फिर से तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
कापी-किताबें, पेंट-शर्ट, टाई-बैच, बस्ता-बेल्ट, जूते - मोजे,महंगे और चिन्हित दुकान से ही खरीदवाने की तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
स्वयं के, परिजनों के और खासम-खासों के बच्चों को. स्वयं के स्कूलों में पढ़ाकर आगे बढ़ाने की कूटनीतिक तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
बोर्डिंग स्कूल, हाॅस्टल सुविधा, समर कैंप, एक्स्ट्रा क्लासेस, पिकनिक विजिट की महिमा न्यारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
दूध, एमडीएम, साइकिल, गणवेश, छात्रवृत्ति, लेपटाप देने के बाद भी छात्रसंख्या में कमी जारी है....
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
२५ प्रतिशत वंचित समूह के बच्चों को निजी शालाओं में भर्ती कराकर सरकारी स्कूल बंद कराने की कूटनीतिक तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
यही नहीं, इन २५ प्रतिशत बच्चों पर व्यय होने वाली सरकारी राशि भी ठिकाने लगाने की पूरी कूटनीतिक तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजी स्कूलों में अमीर- गरीब बच्चों के लिए भेदभावपूर्ण दोहरी शिक्षाव्यवस्था और मापदंड अपनाने की पूरी हुई तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
हजारों शिक्षकों और उनपर आश्रित परिवारों को बेरोजगार कर भूखा मारने की हो चुकी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
लाखों पढ़े - लिखे सुशिक्षित नौजवान पीढ़ी की रोजगार की उम्मीद पर पानी फेरने की ये तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजीकरण से गुलामी वाली मानसिकता और तानाशाही रवैया अपनाने की हो चुकी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजीकरण से शिक्षा को संविधान के मौलिक अधिकारों से पृथक करने की सुनियोजित षड्यंत्रकारी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
विवादित नीतियां और लालफीताशाही की पेंचीदियाॅं हो रहीं निःशुल्क शिक्षा पर भारी हैं...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
धर्म, सम्प्रदाय, जाति, समुदाय, आरक्षण के आधार पर उच्च शिक्षा के शिक्षण पर पाबंदी की कुटिल नीति जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजीकरण से शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार, काला धन निवेश, विदेशी पूंजी निवेश कर मुनाफाखोरी करने की तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षक, शिक्षाकर्मी, संविदा, गुरुजी, अतिथि आदि संवर्गो के माध्यम से "divide & rule" जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
राजीव गांधी शिक्षा मिशन, सर्व शिक्षा अभियान के बाद राज्य शिक्षा सेवा से वर्ल्ड बैंक की राशि ठिकाने लगाने की तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
१ली से ८वीं तक पास कराने की नीति द्वारा केवल साक्षर कर पंगु बनाने की नीति जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
"प्रतिशत सिस्टम" हटाकर "ग्रेडिंग सिस्टम"  के द्वारा मेहनती बच्चों के वास्तविक मूल्यांकन से खिलवाड़ जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षकों को शिक्षा के अतिरिक्त अन्यान्य कार्यों में लगाकर परिणाम प्रभावित होने पर बदनाम करने की तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षा के निजीकरण द्वारा इसे संविधान के मौलिक अधिकार में उल्लेखित अपनी महती जिम्मेदारी से मुक्ति पाने की तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षकों के वेतन को छोड़ RTE के सभी नियमों का कागजी आंकड़ों पर पालन कराने की लीला न्यारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षक पद की गरिमा, स्वाभिमान, मान-सम्मान को कलंकित करने की सिस्टेमेटिक तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है..
शिक्षा बेचारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
नालंदा, तक्षशिला की बर्बादी जैसी साजिश हुए, स्कूल सरकारी हैं.
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
गली, मुहल्ले, कूचों में 2 कमरों में स्कूल! मान्यता नीति न्यारी है.
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...

( लेखक स्वयं अध्यापक हैं यह कविता १९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में द्वितीय स्थान पर रही है )

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Sunday, October 9, 2016

सरकार के शिक्षकों की संख्या अतिशेष रहेगी तो नई भर्ती करने का तो सवाल हीं पैदा नहीं होता - विष्णु पाटीदार ( खरगोन )

 विष्णु पाटीदार - आज का विषय प्राथमिक शालाओं में गिरती छात्र संख्या के कारण बंद होते प्राथमिक विद्यालय और अतिशेष होते शिक्षक एवं  माध्यमिक विद्यालय में नवीन पद संरचना का प्रभाव और प्रथम राष्ट्र भाषा को अन्तिम क्रम पर रखना सही है
         सर्वप्रथम तो प्राथमिक विद्यालयों में गिरती  छात्र संख्या का मुख्य कारण शासकीय शालाओं के शिक्षकों को पढ़ाने का कार्य छोड़कर बाकी सारे कार्य करवाया जाना  जैसे - बीएलओ, पोलियो की दवा, मध्याह्न भोजन, समय समय पर सर्वे कार्य करवाना निःशुल्क पाठ्य पुस्तक, साईकिल वितरण, गणवेश वितरण और भी अन्य समसामयिक कार्य की वजह से शिक्षक अपना मूल कार्य पढ़ाना तो कर हीं नहीं पाता इसलिए जनता में यह संदेश जाता है कि सरकारी स्कूल में तो पढ़ाई बिल्कुल नहीं होती तथा दूसरा कारण यह कि अंग्रेजी माध्यम में बच्चों को पढ़ाने का भूत सभी पर सवार है तो पालक अपने बच्चों को निजी विद्यालय में भर्ती करवाते है जिससे सरकारी स्कूलों में बच्चों की संख्या कम होती चली जा रही है अगर ऐसे ही छात्र संख्या का स्तर गिरता रहा तो आने वाले वर्षों में सारे सरकारी स्कूल बंद हो जायेंगे और सारे शिक्षक अतिशेष हो जायेंगे ।
         माध्यमिक शालाओं में आरटीई नार्मस् के हिसाब से  सभी विद्यालयों में 100 से कम दर्ज संख्या रह जाएगी और साईंस, संस्कृत और हिंदी के सारे शिक्षक अतिशेष हो जायेंगे तथा राष्ट्र भाषा हिन्दी को अंतिम स्थान पर रखना इस देश का दुर्भाग्य है साथ ही सारे प्रधानाध्यापक भी अतिशेष हो जायेंगे । इसका नतीजा यह होगा कि सरकार के शिक्षकों की संख्या अतिशेष रहेगी तो नई भर्ती करने का तो सवाल हीं पैदा नहीं होता । इसका प्रभाव हाईस्कूल एवं हायरसेकेण्डरी पर भी पड़ेगा । जब स्कूलों में बच्चे नहीं होंगे तो स्कूल बंद करना हीं पड़ेगा ।
( लेखक स्वय अध्यापक है और यह उनके  निजी विचार हैं ,शुक्रवार और शनिवार का विषय था  प्राथमिक शालाओ में गिरती छात्र संख्या ,के कारण बंद होते विद्यालय  और अतिशेष होते शिक्षक ,एवं माध्यमिक विद्यालय मे नविन पद संरचना का प्रभाव और प्रथम (राष्ट्र) भाषा को अंतिम क्रम पर रखना कितना सही है। इस विषय पर आप का लेख द्वितीय स्थान पर चयनित किया  गया है  )

विश्वास से, छल कहे ,या वादा खिलाफी कहे। तू ही बता ऐ सरकार तेरी इस दोहरी नीती को, हम क्या कहे ? - राशी राठौर देवास

राशी राठौर देवास - एक जनवरी 2016 के बाद बने अध्यापक मतलब 2013 के संविदा शिक्षक को  छटवे वेतनमान से वंचित रखने की खबर हर संविदा साथी पर आसमानी बिजली बनकर गिरी।संविदा शिक्षक  अध्यापको के साथ सरकार से ही वादा निभाओ कहता रहा उसे क्या पता था की अचानक स्थिति बदल जायेगी है और जिनके विश्वास के बल पर चल पडे है वो ही मोन धारण कर लेंगे । 2013 के संविदा को तो अब सरकार और अध्यापक संघर्ष समिति दोनों से ही वादा निभाओ कहना है।
" फूट डालो और शासन करो " नीती अंग्रेज तो चले गये पर यह नीती यंही छोड गये। इसी नीती से इस बार संविदा का शिकार करने का विचार है। एक तीर से कई शिकार - अध्यापको मै फूट, अध्यापको के संख्या बल का बिखराव, 2013 और उसके पहले के अध्यापको मे आपसी संघर्ष और शिक्षा विभाग लक्ष्य से दूरी बढाना। यदि यही करना है तो समान कार्य और समान वेतन क्या होता है फिर ? कम से कम इसे तो समान कार्य और समान वेतन नही कह सकते। शिक्षको के बाद शिक्षा कर्मी की भर्ती करके। शिक्षाकर्मी को हर सुविधा से वंचित कर दिया था। इस समय सबसे बडी भूल शिक्षको ने की इस नाजायज व्यवस्था का विरोध नही करके। आज शिक्षको की प्रजाति ही विलुप्ति की कगार पर पहुंच गयी है। अध्यापक संघर्ष समिति को मौन तोडकर सरकार के इस षडयंत्र को विफल करना चाहिए। चाणक्य ने कहा है " हमे दूसरो की गलती से भी सिखना चाहिए, क्योंकि खुद गलती करके सीखने के लिए ये जीवन बहुत छोटा है।" कम से कम वर्तमान अध्यापक संघर्ष समिति द्वारा इस गलती को पूर्व के शिक्षकों की भांती दोहराना नही चाहिए। जब मित्र कहा है तो फिर कर्ण सी मित्रता अध्यापक संघर्ष समिति ने संविदा शिक्षक के साथ निभानी चाहिए। कंधे से कंधा मिला कर सरकार का पुरजोर विरोध होना चाहिये ।
( लेखक  स्वयं अध्यापक है और यह उनकी निजी राय है । )

सरकार का भरोसा नहीं इसीलिए आंदोलन का हिस्सा बनें 2016 में अध्यापक बने संविदा शिक्षक - वसुदेव शर्मा ( छिंदवाड़ा


वैसे तो यह संभव नहीं है कि सरकार 2016 में संविदा शिक्षक से
अध्यापक बनने वालों को छठवें वेतनमान के लाभ से वंचित कर दे।
यह इसीलिए भी संभव नहीं है कि सरकार नियम कायदों से
चलती है, किसी की सनक से नहीं। चूंकि सरकार अध्यापक संवर्ग
को छठवें वेतनमान के दायरे में नियमों के तहत ला चुकी है
इसीलिए छठवें वेतनमान का लाभ हर किसी को मिलेगा, यह
सत्य है और यदि ऐसा नहीं हुआ तो यह शिवराज सिंह की सरकार
की मनमानी और तानाशाही ही कही जाएगी और इस
तानाशाही को सिर्फ और सिर्फ आंदोलन और संघर्ष के जरिए
ही रोका जा सकता है, इसीलिए 2016 में अध्यापक संवर्ग में
शामिल होने वाले संविदा शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वह
अध्यापक संघर्ष समिति के आंदोलनों में आगे आकर शामिल हों।
चूंकि शिवराज सिंह की सरकार अप्रैल एवं मार्च 2016 में प्रदेश
के विभिन्न विभागों से 10,000 संविदाकर्मियों की छंटनी कर
चुकी है, इसीलिए ऐसी किसी संभावना से इंकार नहीं किया
जा सकता कि अध्यापक संवर्ग सरकार के हमले का शिकार न
हो। 2016 में अध्यापक बने संविदा शिक्षकों के बारे में सामने
आई जानकारी चौंकाने वाली है, इसीलिए आज सभी को
चौकन्ने रहने की जरूरत है। इसके लिए जरूरी है कि शहडोल से लेकर
विधानसभा घेराव के प्रस्तावित आंदोलनों में हर अध्यापक की
हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए। जितने अधिक अध्यापक
आंदोलन का हिस्सा बनेंगे, उतना ही अधिक सरकार और
मुख्यमंत्री डरेंगे और डरी हुई सरकार छठवें वेतन से वंचित नहीं कर
सकती।
जिस तरह सरकार ने 10,000 संविदाकर्मियों की छंटनी कर दी
और इनके संगठनों के नेताओं ने चुपचाप इसे स्वीकार कर लिया है,
हो सकता है इससे सरकार में हिम्मत आ गई हो और वह दूसरे संवर्ग
को भी निशाने पर लेने की सोच रही हो। 16 अक्टूबर को
शहडोल और 13 नवंबर को भोपाल में ताकत दिखाकर
अध्यापकों को सरकार की इस सोच को बदलने का काम भी
करना है, यह समय डरने का नहीं बल्कि सरकार को डराने का है
और सरकार डरती है एकता से, जो अध्यापकों में बन चुकी है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और यह उनके निजी विचार हैं )


सिर्फ वेतन भत्तों की लड़ाई यही वरन विभाग बचाने की भी लड़ाई है - सुरेश यादव रतलाम

 सुरेश यादव रतलाम - कल दैनिक भास्कर में प्रकाशित रिपार्ट के अनुसार प्रदेश के 10  हजार संविदा कर्मचारियों की छंटनी ( सरकार की तरफ से पैसो की कमी या कुछ वजह बता कर सेवा समाप्त करना) कर दी गयी है । इसमें में से  चार हजार  तो सीर्फ स्वास्थ्य विभाग के संविदा कर्मचारी है ,जो ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन अंतर्गत काम कर रहे थे । इसी प्रकार अगस्त माह में प्रदेश की लगभग पाँच  हजार नर्स ,ANM  और  MPW .( बहुउद्देशिय स्वास्थ्य कार्यकर्ता ) को 60 वर्ष की आयु पूर्ण करने के चलते अचानक सेवा निवृत्ति  कर दिया गया । जबकि  सेवा शर्तो में सेवा निवृत्ति की आयु 65 वर्ष थी ,लेकिन एक नया आदेश जारी कर  पाँच  हजार कर्मचारियों को अचानक सेवा निवृत्ती दे दि गयी ।
        कुल मिलाकर के  स्वास्थ्य विभाग के 9000 कर्मचारियों को दबे पांव घर भेज दिया और कंही कोई हलचल , विरोध के स्वर नजर नहीं आये ,जानते है क्यों क्योकि सावस्थ्य सेवाओं को सरकार द्वारा अपनी नीतियो द्वारा पहले बदनाम किया गया फिर बर्बाद कर दिया गया और अब बंद करने की कागार पर ले जाकर ,कर्मचारियों की छंटनी  प्रारंभ कर दी गयी  । जैसे की रोडवेज को बंद कर दिया गया था । असलियत यह है कि प्रदेश में अब 9 नए  मेडिकल कॉलेज खुल रहे है सभी PPP  मॉडल पर खुल रहे है । पिछले दरवाजे से पूंजीवादियो की दखल  और दबे पांव निजीकरण । आप जानते है ,सावस्थ्य विभाग के नो हजार कर्मचारियों को एक दम से घर भेज दिया जाता है और कंही कोई विरोध के स्वर नहीं सुनाई देते  क्यों ,क्योकि समाज मुंह मोड़ चूका है । सावस्थ्य सेवाओं को  ,सरकार ने इतना बदनाम कर के रख दिया है ।
        इसकी एक वजह यह भी रही की स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कर्मचारी संगठन अपने वेतन और सेवा शर्तों की बात तो करते रहे लेकिन समाज को यह बताने में असफल रहे की दूर दराज के गावो में एक ANM और MPW  की स्वास्थ्य सेवाओं में  क्या भूमिका है।  और दूसरी वजह उन्होने अपने विभाग पर हो रहे निजीकरण के हमले को लेकर कभी मुद्दा नहीं बनाया ।
          मुझे याद है में सविदा स्वास्थ्य कर्मचारियों की हड़ताल में गया था पास में ही ANM और MPW  की हड़ताल भी हो रही थी दोनों टेंट पास पास ही लगे हुए थे । मेने दोनों जगह अपने संबोधन में कहा था कि " आप अपने वेतन भत्तों के लिए तो लड़ रहे है लेकिन सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य को निजी हाथों में देने का सैद्धान्तिक निर्णय ले चुकी है। (अलीराजपुर जिले में सावस्थ्य सेवाओं को  निजी हाथो में सौंप दिया गया था  )  मैंने कहा था कि हमें मिलकर लड़ाई लड़नी चाहिए ,हमारी सेवा में भी 25 प्रतिशत बच्चों  को निजी विद्यालय में भेज कर क धीमें जहर की तरह निजीकरण की शुरुवात कर दी  है ,जो हमारे विभाग की जड़ो खोखला कर रहा है (छात्रों की दर्ज संख्या में कमी ) ।  मैंने कहा था कि शिक्षा और स्वास्थ्य तो आम नागरिक का मौलिक अधिकार होना चाहिए और यदि सिस्टम में  कंही कोई  बिमारी है तो ,उसका इलाज किया जाना चहिये ,प्रत्येक बिमारी का इलाज निजीकरण तो नहीं है।  क्या एक व्यापारी  बिना लाभ के कोई सेवा देगा ? क्या यह सम्भव है ,की दूरस्थ अंचल में  कोई व्यापारी ANM  बहनों की तरह या MPW भाइयो की तरह  सेवा देगा ? उसका उद्देश्य तो अपना व्यापर बढ़ाना होगा । मैंने कहा था की जब हमारी नोकरी बचेगी तभी तो हम वेतन भत्तों की बात करेगे ,इस लिए समाज को साथ लाओ ।उसे अपने मोल का अंदाजा  करवाओ  "
           साथियो बात हमारे विभाग की भी । क्या आप जानते है शिक्षणिक सत्र 2015-16 में और वर्तमान सत्र में लगभग 2500 शालाऐं  (5000 शिक्षक) कम दर्ज संख्या के कारण बंद कर के पास की शालाओं  में मर्ज कर दि गई   ?  इसके अतिरिक्त प्राथमिक शालाओं के लगभग 10 हजार शिक्षक अभी होने वाले यूक्तियुक्तकरण मे अतिशेष होने वाले  हैं , इस प्रकार प्राथमिक शालाओं के कुल 15 हजार शिक्षक अतिशेष हो जाएंगे ,जबकि रिक्त स्थान लगभग 5000 ही बचे हैं (हमारी भी अचानक से छंटनी  हो जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी ) ।  एक अन्य खतरा जो अभी हम तक नहीं पहुंचा है वह है ।माध्यमिक शालाओं  की नविन पद संरचना जिसके चलते 2 तिहाई शालाओं पर एक शिक्षकीय शाला  होने का खतरा मंडराने लगा है ।
           सरकार ने अपनी नीतियों के द्वारा  पहले प्राथमिक शालाओं से आमजन का मोह भंग किया , अब धीमे धीमे बंद भी कर दिया ,क्या कंही किसी गाँव में विद्यालय बंद होने पर आमजन का विरोध नजर आया ?  अब इस प्रकार नई पद संरचना के कारण माध्यमिक शालाओे को एक शिक्षकीय कर के विद्यार्थियों को शालाओ से दूर किया जाएगा ।
          साथियो अब बात हामारे वेतन भत्तों की भी कर ली जाये । कल ही एक समाचार आया की 1 जनवरी 2016 के बाद अध्यापक बने साथियो को 6 टे वेतन का लाभ नहीं मिलेगा । वैसे यह संभव तो नहीं है लेकिन जब सरकार शिक्षा विभाग को बर्बाद करने का ठान ही चुकी है तो ,कब क्या कर दे कह नहीं सकते । इस लिये आप हम सब मिल कर ईस लड़ाई को लडे ,क्योकि अब लड़ाई  सिर्फ वेतन भत्तों की लड़ाई यही वरन विभाग बचाने की भी लड़ाई है। यदि विभाग और हमारी नोकरी बचेगी तभी तो हम वेतन भत्तों की बात कर पायेगें। यह लड़ाई हमारी आने वाली पीढ़ियों के अधिकार की लड़ायी है क्योकि शिक्षा विभाग ही तो सबसे अधिक रोजगार सृजन वाला  विभाग है । हमारे कई  साथी इस विषय पर भी गहन चिंतन मनन कर रहेै हैं  और मुद्दे आप तक पंहुचा रहे हैं । अभी हमने पहली बार हमारे ज्ञापन में विभाग की व्यस्था में सुधार कें लिए भी मांग की है (  परिवीक्षा में भर्ती आरम्भ की जाए ।  निजीकरण के  प्रयास बन्द किये जावें। पच्चीस प्रतिशत सीटें में शुल्क अशासकीय विद्यालकी द्वारा ही प्रदान किया जाए।   कम दर्ज संख्या के फलस्वरूप बन्द/मर्ज किये जाने के पूर्व उक्त शाला के शिक्षकों को कम से कम , तीन शैक्षणिक वर्षों का समय दर्ज संख्या बढ़ाने हेतु दिया जाये। 5000 तक की आबादी वाले गांव एवं कस्बे में निजी विद्यालय खोलने की अनुमति न दी जावे। माध्यमिक शालाओं में  2010 की पद संरचना लागु की जाए। प्रदेश के विद्यालयों में N C E R T का पाठ्यक्रम लागु किया जाये । ) यह मुद्दे अब आमजन में चर्चा के मुद्दे है । आप सभी साथियो से अनुरोध है कि इस आर पार की नहीं " पार ही पार  "  की लड़ाई को जीतना है । और शिक्षा विभाग में संविलियन करवाना है । एकता बनाये रखें और संघर्ष समिति पर विश्वास कायम रखें । यह हिन्द ,इंकलाब जिंदाबाद। 
याद रखें 
16 अक्टूबर शहडोल
23 अक्टूबर विकासखंड 
06 नवम्बर जिला13 नवम्बर भोपाल

Saturday, October 8, 2016

जोश, जुनून एबं अनुभव का संगम अध्यापक संघर्ष समिति-वासुदेव शर्मा (छिंदवाड़ा)

वासुदेव शर्मा (छिंदवाड़ा) - 18 साल से संघर्ष कर रहे अध्यापक समुदाय के बीच से ऐसी भी आवाजें आ रही हैं कि सालों से होते आ रहे अन्याय को एक-दो दिन में ही समाप्त कराया जा सकता है। इससे एक बात स्पष्ट है कि अध्यापक अन्याय के खिलाफ पूरे जोश एवं जुनून के साथ लडऩा चाहता है और तब तक लडऩा चाहता है जब तक कि जीत हासिल न हो जाए। संघर्ष से जो हासिल होता है, वह जीत ही होती है, इसीलिए आंदोलनों से जीत का विश्वास और भरोसा सही है। लेकिन यहां सवाल यह है कि यह जीत एक दिन में मिलेगी या इसके लिए अनवरत संघर्ष करना होगा। इतना तय है कि  शिक्षा विभाग में संविलियन के लिए लड़ रहा अध्यापक सरकार के हलक से छठवां एवं सातवां वेतनमान जरूर निकाल लाएगा। यह बात दावे से इसीलिए कही जा सकती है कि इस बार अध्यापक जोश, जुनून  एवं अनुभव के साथ मैदान में उतरा है।
अध्यापक संघर्ष समिति में आजाद अध्यापक संघ का जोश, राज्य अध्यापक संघ का जुनून और शासकीय अध्यापक संघ, अध्यापक संविदा शिक्षक संघ एवं अध्यापक कांग्रेस का अनुभव समाया हुआ है इसीलिए अध्यापक संघर्ष समिति को जोश, जुनून एवं अनुभव का संगम कहना सही रहेगा। अध्यापक संघर्ष समिति के रूप में तीन लाख अध्यापकों को ऐसा मंच मिला है, जिसका हर पाया इतना मजबूत है कि उसे अब शिवराज सिंह की सरकार हिला नहीं सकती। अध्यापक संघर्ष समिति बनने के बाद एक और अच्छा काम यह हुआ है कि अध्यापकों के आंदोलन का नेतृत्व करने योग्य दूसरी पंक्ति की कतार भी सामने आ गई है, जो इतनी सुलझी हुई है कि वह 18 सितंबर के लक्ष्य को हासिल किए बिना न तो खुद इधर-उधर होगी और न ही किसी को इधर-उधर होने देगी। सोशल मीडिया पर आ रही तमाम किन्तु-परन्तु के बावजूद उसका निष्कर्ष यही निकल रहा है कि अध्यापक शहडोल में सरकार को चेताएगा और भोपाल में उसके सामने सीना तानकर खड़ा नजर आएगा।
18 सितंबर को अध्यापक संघर्ष समिति की घोषणा के वक्त तय किया गया लक्ष्य था सरकार को यह बताना कि प्रदेश का अध्यापक सरकार की तिकड़मों से हारा नहीं है बल्कि पहले से अधिक ऊर्जा के साथ मैदान में आने वाला है। 25 सितंबर को प्रदेश में तिरंगा रैलियों का ऐलान इसी मकसद से  किया गया, जो ऐतिहासिक रूप से सफल रहा। तिरंगा रैलियों में अध्यापकों के जोश, जुनून देखने लायक था, यही वजह रही होगी कि   अध्यापकों के गुस्से से सरकार डरी भी और उसी दिन विसंगति रहित गणपत्रक जारी करने के संकेत  मीडिया के जरिए देकर अध्यापको के गुस्से को थामने की कोशिश भी की गई। लेकिन ऐसा हुआ नहीं।
2 अक्टूबर को भोपाल में अध्यापक संघर्ष समिति अध्यक्षमंडल के सदस्य भरत पटेल, जगदीश यादव, बृजेश शर्मा, मनोहर दुबे एवं राकेश नायक एक साथ बैठे और एक स्वर से ऐलान किया कि सरकार तिकड़मबाजी छोडक़र अध्यापकों की लंबित मांगों का तत्काल निराकरण करे और 25 सितंबर को सौंपे गए 21 सूत्रीय मांगपत्र की मांगों का समाधान करे। जोश, जुनून और अनुभव से तैयार हुई अध्यापक संघर्ष समिति के अध्यक्षमंडल ने उसी दिन तीन लाख अध्यापकों की इच्छा के अनुसार 13 नवंबर को विधानसभा के घेराव की घोषणा की। 16 अक्टूबर को शहडोल में प्रदर्शन कर सरकार को चेतावनी देने, इसके बाद  23 अक्टूबर को ब्लाक स्तर पर धरने, रैलियां, 6 नवंबर को जिला स्तर पर रैली एवं धरने  की घोषणा अध्यक्षमंडल के सदस्यों ने एक स्वर से की। 2 अक्टूबर को घोषित हुए इस कार्यक्रम से सरकार चिंतित है, उसकी चिंता इस बात से सामने आ जाती है कि उसने महीनों से लटके गणना पत्रक पर काम करना शुरू कर दिया है हो सकता है शहडोल से पहले वह जारी हो जाए, लेकिन अध्यापक जिस जोश, जुनून और उत्साह से संघर्ष के मैदान में उतरे हैं, उससे इतना स्पष्ट है कि वे सरकार से शिक्षा विभाग में संविलियन की मांग पर दो टूक बात करने के बाद ही संतुष्ट होंगे। जैसे-जैसे 16 अक्टूबर की तारीख करीब आती जा रही है, वैसे-वैसे अध्यापकों का उत्साह बढ़ता जा रहा है, वे हजारों की संख्या में शहडोल पहुंचने वाले हैं और लाखों की संख्या में पहुंचकर 13 नवंबर का विधानसभा घेराव करेंगे। चूंकि अध्यापक अपने अनुभव से यह समझ चुका है कि बिना लड़े कुछ नहीं मिलने वाला, इसीलिए वह इस बार सिर्फ और सिर्फ लडऩे के लिए एकजुट हुआ है, उसकी यही एकजुटता उसे जीत  दिलाएगी, यह भरोसा भी उसे हो चुका है।

अब लड़ाई मेरी और मेरे मुखिया की है,कोई बीच में न आये - मनीष शंकर तिवारी ( नरसिंहपुर )

क्या हार में, क्या जीत में
किंचित् नहीं भयभीत मैं,
कर्तव्य-पथ पर जो भी मिला
यह भी सही वो भी सही।
मैं एक सामान्य अध्यापक हूँ। न कोई मेरा नेता है, न ही मैं किसी व्यक्ति, समूह या संघ का समर्थक। जो भी मेरे लिए, मेरे हक के लिए लड़ा , मैं हमेशा उसके साथ खड़ा दिखाई देता हूँ और दिखाई देता रहूँगा। क्योंकि पराजय मेरा स्वभाव नहीं है, मैंने सदैव विजय ही प्राप्त की है और आगे भी विजयमाल को ही प्राप्त करूँगा।
1995 से आज 2016 तक मेरी ही तो शक्ति है जिसने मुझे आज यहाँ तक लाकर खड़ा किया है। ये मेरी ही तो ताकत है जिसने मेरे अध्यापक नेताओ को महत्वाकांक्षी बना दिया।
अब ताजा ताजा उदाहरण ही देख लीजिये। 2013 का विसंगतिपूर्ण चार किश्त का आदेश मुझे स्वीकार नहीं था तो मैं इस अन्याय में सहभागी नेतृत्व के खिलाफ हो गया। 2015 के सितम्बर माह की 13 तारीख को शाहजहाँनी पार्क में मेरी ही तो शक्ति थी जिसने सरकार के माथे पर बल ला दिए। 28 सितम्बर 2015 को लालघाटी के मैदान को हल्दीघाटी मैंने ही बनाया।
अब मेरी ताकत और मेरी ऊर्जा को जब मेरे अपने नेताओं ने खुद की तरफ मोड़ने की भूल की तब उस नेतृत्व को पराजित होना पड़ा। सारे संघ नए या पुराने सीमिति आँकड़ो में सिमट गए।
तब फिर मैं सजग हुआ और मजबूर किया अपने पराजित नेतृत्व को कि मैं सामान्य अध्यापक किसी का गुलाम नहीं। तब ये व्यक्ति, ये समूह, ये संघ 18 सितम्बर 2016 को बिना मन के एक हुए। तारिख 25 सितम्बर 2016 सूबे के हर जिले में सिर्फ मैं था और मेरा तिरंगा। मैं फिर विजयी हुआ। बड़े भैया को खबर पूरी हो गई।
तारिख 2 अक्टूबर 2016 मेरे नेता फिर बैठ गए 16 अक्टूबर 2016 दी है तारीख , स्थान दिया है शहडोल परंतु सबके सब लग रहे हैं डांवाडोल। किसी में वो साहस नहीं दिख रहा है जो साहस मेरे अंदर है। अपने अपने हजार पाँच सौ वाले मेरे नेता शायद फिर पराजित हो जाएँ।
किन्तु मुझे ख़ुशी है कि सरकार तक मेरा सन्देश पहुच गया है 25 सितम्बर 2016 को ही कि मेरे मन में क्या है? और अगली सम संख्यांक वाले वर्ष की चिंता उसे अवश्य हो रही होगी।
मेरे जैसे 3 लाख और हैं जो पीड़ित हैं, शोषित हैं, परन्तु हारे हुए नहीं हैं। न कभी हार सकते हैं।
अंत में,
अब लड़ाई मेरी और मेरे मुखिया की है।
कोई बीच में न आये।
हर हर अध्यापक
घर घर अध्यापक
(लेखक सव्य अध्यापक है और यह उनके निजी विचार है )

13 नवंबर को भोपाल घेरेंगे अध्यापक -वासुदेव शर्मा (छिंदवाड़ा)

वासुदेव शर्मा - एक ही दिन, एक ही वक्त, प्रदेशभर में जब 1 लाख अध्यापक एक साथ 25 सितंबर को तिरंगा लेकर सडक़ों पर उतरे, तो सभी हैरान-परेशान थे। हैरानी की वजह, ऐसा इससे पहले कभी नहीं हुआ।
सरकार हैरान थी। मुख्यमंत्री परेशान थे।

 हैरान परेशान अध्यापकों का नेतृत्व भी था। उसे भी ऐसी उम्मीद नहीं थी कि बिना उनके दौरो, अपीलों एवं आव्हान के बाद भी एक साथ इतनी अधिक संख्या में अध्यापक एकजुट होकर सरकार को ललकार देंगे।
सरकार की समस्या थी कि वह किससे बात करे, अध्यापकों को सडक़ पर आने से रोकने के लिए।
तिरंगा रैली के बाद अध्यापकों के नेतृत्व को उत्साह में आना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। 2 अक्टूबर की बैठक में यह साबित भी हुआ।

 बहरहल,
चूंकि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद अध्यापक नेताओं से बातचीत की कमान संभाले हुए हैं। सीएम साहब भी खुद यह कह चुके हैं कि वे ही अध्यापकों के अच्छे दिन लाएंगे। अच्छे दिनों का इंतजार काफी लंबा हो गया है, अब इससे अधिक इंतजार करने के लिए अध्यापक तैयार नहीं है। 25 सितंबर की तिरंगा रैलियों के जरिए प्रदेशभर के अध्यापकों ने 21 सूत्रीय ज्ञापन देकर मुख्यमंत्री से यह कह दिया है।
अलग-अलग स्थानों से 9-10 बार छठवां वेतनमान दे चुके सीएम साहब 25 सितंबर के बाद खामोश हैं, उनकी यह खामोशी अध्यापकों के गुस्से को बढ़ाने का काम कर रही है, जिसकी अभिव्यक्ति 16 अक्टूबर को शहडोल

एवं 13 नवंबर को भोपाल में होगी। 
जिस दिन अध्यापकों का गुस्सा चरम पर पहुंचेगा, उस दिन से शिवराज की सरकार लडख़ड़ाना शुरू कर देगी। यह चेतावनी 2 अक्टूबर को आर्य समाज धर्मशाला से अध्यापक संघर्ष समिति ने एक स्वर से दी है।
एकजुट हो चुके अध्यापकों ने इसकी तैयारियां शुरू कर दी हैं।
16 अक्टूबर को शहडोल में रैली कर सरकार को चेताया जाएगा।  यदि अध्यापकों को संतुष्ट करने वाला गणपत्रक जारी नहीं हुआ और शिक्षा विभाग में संविलियन का रास्ता नहीं बनाया तो 13 नवंबर को राजधानी

भोपाल के रास्ते जाम कर दिए जाएंगे।
2 अक्टूबर को आर्य समाज धर्मशाला में हुई अध्यापक संघर्ष समिति की बैठक ने निर्णय लिया था कि 13 नवंबर को भोपाल में रैली की जाएगी, जिसमें प्रदेश भर से 2 लाख से अधिक अध्यापक हिस्सा लेंगे।
13 नवंबर की रैली की तैयारियों के लिए 6 नवंबर को जिला मुख्यालयों पर विशाल धरने दिए जाएंगे, जिनमें 100 प्रतिशत अध्यापकों की भागीदारी सुनिश्चित कराने का संकल्प भी अध्यापक संघर्ष समिति ने 2 अक्टूबर की बैठक में लिया है यानि इस बार अध्यापक संगठनों की सीमाओं से ऊपर जाकर अपने भविष्य को बचाने की लड़ाई खुद लड़ रहा है, 25 सितंबर की तिरंगा रैली यह साबित कर चुकी है और 13 नवंबर की भोपाल रैली के वक्त अध्यापकों की एकजुटता का इतिहास लिखा जाएगा।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और यह उनके निजी विचार हैं .

Friday, October 7, 2016

युक्तियुक्तकरन हेतु मार्गदर्शन

सारे बच्चे शासकीय शालाओं में दर्ज हो जायेंगे और अशासकीय शालाऐं खुदबखुद बंद हो जाएगी -विष्णु पाटीदार (खरगोन)

विष्णु पाटीदार खरगोन - आज का विषय माननीय ईलाहाबाद उच्च न्यायलय का आदेश जिसमें प्रत्येक लोकसेवक अफसर, कर्मचारी, विधायक और सांसद को अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने का आदेश है तो मेरे विचार से तो आज के परिवेश में अशासकीय शालाओं में अंग्रेजी माध्यम के कारण हीं आकर्षण बढ़ा है वरना हिन्दी माध्यम की स्कूलों से तुलना की जाय तो शासकीय शालाओं का परीक्षा परिणाम अशासकीय शालाओं के परीक्षा परिणाम से हमेशा 20 हीं रहा है । वैसे भी शासकीय शालाओं में स्टाॅफ अशासकीय शालाओं की तुलना में अधिक योग्यता वाले हैं । खासकर हाईस्कूल तथा हायरसेकेण्डरी में, जिन बच्चों को शासकीय शालाओं के शिक्षकों ने पढ़ाया है वेही अशासकीय शालाओं में पढ़ा रहे हैं । अगर शासकीय शालाओं में भी सरकार अंग्रेजी माध्यम की शालाऐं खोल दे तो न्यायालय के बगैर आदेश के हीं सभी लोकसेवक क्या सभी उद्योगपति, करोड़पति, उच्च वर्ग, निम्न वर्ग, मध्यम वर्ग सारे शासकीय शालाओं में दर्ज हो जायेंगे और अशासकीय शालाऐं खुदबखुद बंद हो जाएगी । लेकिन शायद सरकार हीं नहीं चाहती की अशासकीय शालाऐं बंद हो सरकार की मंशा तो नीजीकरण करने की हीं है इसलिए तो अभी तक भी शासकीय अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की कमी है अशासकीय शालाओं में तो बस बाहरी चमक धमक और दिखावा है वे बच्चों को रट्टू तोता बना देते हैं जो आगे जा के प्रतियोगी परीक्षाओं में फैल हो जाते हैं । अशासकीय शालाओं के पास अगर शासकीय शालाओं के कमजोर वर्ग के बच्चे हो तो उनका परिणाम और भी घट जायेगा । इसलिए मैं चाहता हूँ कि सरकार अंग्रेजी माध्यम के भी सभी शासकीय स्कूल प्रारंभ कर दे तो माननीय न्यायालय के आदेश की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी और सभी लोकसेवक अफसर, कर्मचारी, विधायक, सांसद, निम्न वर्ग ,उच्च वर्ग ,व्यापारी, उद्योगपति, आदि सभी के बच्चे  शासकीय शालाओं में हीं पढ़ेगे!

लेखक सवयं अध्यापक है और यह इनके निजी विचार है -यह लेख बुधवार और गुरूवार को शिक्षा विमर्श में चर्चा के विषय 
'  माननीय ईलाहबाद उच्च न्यायालय का आदेश जिसमे प्रत्येक लोकसेवक "अफसर ,कर्मचारी ,विधायक और सांसद " को अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने का आदेश  ' में संयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर चुना गया है ' 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला बिल्कुल उचित ,निजी विद्यालयों की मनमानी खत्म होगी सरकारी विद्यालयों और शिक्षकों की दशा सुधरेगी -रूपेश सराठे (होशंगाबाद )

रूपेश सराठे - इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला बिल्कुल उचित है। इससे निजी विद्यालयों की मनमानी खत्म हो जायेगी और सरकारी विद्यालयों और शिक्षकों की दशा और दिशा दोनों में सुधार हो जायेगा।क्योंकि जब सभी लोकसेवकों और जनप्रितिनिधियों के बच्चे एक ही स्थान पर पढ़ेंगे तो उनके बेहतर अध्यापन हेतु वे विद्यालयों और शिक्षकों के प्रति वे बहुत गम्भीरता से प्रयासरत रहेंगे।जिससे सरकारी विद्यालयों में व्याप्त भौतिक एवं शैक्षिक समस्याएं अतिशीघ्र ही दूर हो जाएंगी। जब सभी लोगों के बच्चे एक साथ पढ़ेंगे तो सामाजिक भेदभाव में भी कमी आएगी जिससे समाज में समरसता का माहौल बनेगा जो सभी के लिए सुखद होगा। अभीशिक्षकों से जो गैर शैक्षणिक कार्य करवाये जा रहे हैं उन पर स्वतः रोक लग जाएगी। आज जो अधिकारीगण अनाप शनाप आदेश निकाल रहा हैं अपने वातानुकूलित कार्यालयों में बैठकर उन पर भी लगाम स्वतः लग जाएगी। जैसा कि शासन कि सोच बन गई है कि सरकारी शिक्षक काम नहीं करते वह भी बदल जायेगी।और यदि कुछ अपवाद स्परूप हमारे साथी यदि काम नहीं कर रहे हैं वे भी स्वतः सुधर जायेंगे। अतः मेरे मतानुसार माननीय सर्वोच्च न्यायालय को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश को पूरे भारत में लागू कर  देना सर्वथा उचित रहेगा।
 

लेखक सवयं अध्यापक है और यह इनके निजी विचार है -यह लेख बुधवार और गुरूवार को शिक्षा विमर्श में चर्चा के विषय '  माननीय ईलाहबाद उच्च न्यायालय का आदेश जिसमे प्रत्येक लोकसेवक "अफसर ,कर्मचारी ,विधायक और सांसद " को अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने का आदेश  ' में संयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर चुना गया है ' 



माननीय हाईकोर्ट इलाहबाद के यह निर्णय के पीछे एक व्यापक सोच हे -विजय तिवारी ( सुवासरा- मंदसौर )

विजय तिवारी - माननीय हाईकोर्ट इलाहबाद के यह निर्णय कि सभी शासकीय सेवक व् जनप्रतिनिधि अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयो में ही पढ़ाये ।। के पीछे एक व्यापक सोच हे । अब यही निर्णय सुप्रीम कोर्ट को भी देना चाहिए और समस्त देश में लागू करवाना चाहिये ।। यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय की व्यापकता को देखे तो यह पाएंगे की भारतीय संस्कृति "गुरुर देवो म्हेश्वरः " वाली रही जहाँ गुरु की अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान सदैव ही रहा हे ।। यदि सांसद विधायक व् उच्च अधिकारी अपने बच्चों को इन शासकीय विद्द्यालयो में भेजते हे तो ।जो शिक्षिकिय प्रतिष्ठा आज जन मानस के बीच कम हो रही हे उसमे स्वतः वृद्धि होगी ।। इस निर्णय का दूसरा और गम्भीर पहलू यह भी हे की वर्तमान में बढ़ रही शिक्षा की व्यवसायीकरण को रोकना हे । आज यदि सर्वे कराया जाए तो अधिकाँश उच्च श्रेणी के विद्यालय जिन्हें इंटर नेशनल स्कूल भी कहा जाता हे । इन्ही जनप्रतिनिधियो या अधिकारियो के ही हे । जो पूर्णरूपेण मात्र धन कमाने में लगे हुए हे । जिनका शिक्षा के द्वारा होने वाला सर्वांगीण विकास से कोई लेना देना नही हे ।। यदि इलाहबाद हाईकोर्ट का निर्णय मान्य हो तो इस बढ़ती व्यवसायीकरण पर भी नियंत्रण किया जा सकता हे ।।
         इस निर्णय का एक और व्यापक और सकारात्मक पहलू यह भी हे की शासकीय विद्यालयो के मूलभूत सुविधओं का विकास करना यदि उक्त लोगो के बच्चे शासकीय विद्यालयो में अध्ययन करेंगे तो वहा आवश्यक शिक्षक , फर्नीचर , सुविधा सम्पन्न शौचालय खेल का मैदान व् सामान और स्वच्छ वातावरण का निर्माण पर ये स्वयम् जोर देकर कराएँगे ।। जिसका आज अधिकांश विद्यालयोमे आभाव इन्ही की भरष्टाचारि के कारण नही हो पा रहा हे ।।
          इस निर्णय का विशेष पहलू की यह निर्णय लागू होने से जो गरीब बच्चे शिक्षक या सुविधाओ के अभाव में वांछित शिक्षा नही प्राप्त क्र पा रहे हे इस निर्णय के क्रियान्वित होने के वाद अपनी क्षमता को विकसित क्र सकेंगे ।। हमारे शासकीय विद्यालयो में पढ़ाने वाले शिक्षक प्राइवेट स्कूल के शिक्षक से कहि अधिक योग्यता वाले हे और सरकार द्वारा आयोजित व्यापम TET जैसी परीक्षाओ को पास कर व् पूर्ण  ट्रेंड हो के अपनी सेवाये दे रहे हे ।
                अतः इलाहावाद हाईकोर्ट का निर्णय के पीछे इक व्यापक और सकारात्म सोच हे । जिसका सकारात्मक लाभ सम्पूर्ण समाज को होगा ।।
      लेखक सवयं अध्यापक है और यह इनके निजी विचार है -यह लेख बुधवार और गुरूवार को शिक्षा विमर्श में चर्चा के विषय 
'  माननीय ईलाहबाद उच्च न्यायालय का आदेश जिसमे प्रत्येक लोकसेवक "अफसर ,कर्मचारी ,विधायक और सांसद " को अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने का आदेश  ' यह लेख दुसरे स्थान के लिए  चुना गया है . 

आखिर, इलाहाबाद हाईकोर्ट का ऐसा आदेश क्यों ?......सचिन गुप्ता ( खितौली )

सचिन गुप्ता ( खितौली ) - लोकसेवकों(अफसर,कर्मचारी,विधायक,सांसद) के बच्चे ही क्यों ? अभिनेता,व्यापारी,उधोगपतियों,पत्रकारों व अन्य वर्गो या देश के समस्त बच्चों का  नामांकन सरकारी स्कूलों में कराने का आदेश क्यों नहीं ?
क्या केवल लोकसेवकों के बच्चों के नामांकन करा देने मात्र से शिक्षा का स्तर सुधर जाएगा क्या वाकई में ये इतने प्रभावशाली हैं ?

इस प्रयोग में दो बातें छिपी है ,
1. लोकसेवकों के माध्यम से शिक्षकों पर अध्यापन कार्य के लिए अतिरिक्त दबाव निर्मित करवाने की मंशा।
2. लोकसेवकों को उनके अपने बच्चे के माध्यम से सरकारी स्कूलों की हालत का प्रत्यक्ष रूप से सामना करवाने की मंशा
 
  उपर्युक्त दोनों मंशाओ में शोषण छिपा है पहली बात में शिक्षक का और दूसरी बात में लोकसेवकों के बच्चों का जिनका उपयोग किया जाना है।
अगर आप मान रहें हैं कि लोकसेवकों के बच्चों के नामांकन मात्र भर से सरकारी स्कूलों की शिक्षा का स्तर सुधर जाएगा तो थोडा रूकिए , फिर सोचिए ........ कही ये अभिभावकों का अपने बच्चे के सुरक्षित भविष्य के लिए निर्णय लेने के अधिकार का हनन तो नहीं ?

एक जिले में कितने विधायक हैं औसतन 4-5 ,सांसद की संख्या जिले में 1 भी नहीं होती प्रथम द्वितीय श्रेणी के अधिकारी 200-400 की सीमा में ही होंगे और तृतीय श्रेणी के कर्मचारियों के बच्चे प्राय: सरकारी स्कूल में ही पढते हैं जबकि सरकारी स्कूल सैकड़ो की तादात में ।

महज 500 बच्चें जो बाध्यता की स्थिति में जिले में ही स्थित सरकारी स्कूलों को प्राथमिकता देंगे तो क्या इस आदेश से अंतिम छोर में सुदूर स्थित ग्रामीण अंचलों की, जहाँ पहुँचने के लिए आज भी पक्का रास्ता नहीं है ,शिक्षा स्तर में सुधार हो पाएगा और इस बात की क्या गारंटी है कि शहरी क्षेत्र के सरकारी स्कूलों का स्तर ऐसा होने पर सुधर जाएगा अगर सुधार न हुआ तो कल को दलीलें दी जाएगी सारी स्कूलों को बंद करके जिले में केवल एक विशाल सर्वसुविधायुक्त स्कूल खोल दिया जाएँ जहाँ सब पढें तब भी सफल न हुए तो कहा जाएगा कि शिक्षा केवल जागरूक  कर धनाढ्यौ को दी जाए और वंचित ,कमजोर वर्ग के हाथों से शिक्षा फिसल जाएँ 
।

मामला उलझता जाएगा अंत में शिक्षा का मजाक बन जाएगा ।
वर्तमान में समस्त लोकसेवकों के बच्चें भव्य निजी स्कूलों में पढ रहे हैं तो क्या ये सभी पूर्णतः दक्ष हो जाते हैं। अपेक्षित परिणाम न आने पर क्या ये लोग निजी विधालयों पर  दबाव बना पाते हैं ?

वैसे भी निजी स्कूलों की तरफ लोगों का बढता हुआ आर्कषण उनकी शिक्षा देने की कला व तरीका नहीं बल्कि अँग्रेजी भाषा के ग्लोबलाइज होने के कारण उसकी बढती हुयी माँग ,खेल विधा ,कंप्यूटर व अन्य सांस्कृतिक ,आधुनिक गतिविधियाँ हैं जिससे छात्र का सर्वागीण विकास होता है जबकि सरकारी स्कूल इन सारी सुविधाओं से आज भी वंचित हैं जबकि सयकारी स्कूलों की उपयोगिता आज भी ग्रामीण अंचलों में ज्यादा है
निष्कर्ष यह है कि अनावश्यक रूप से नए नए प्रयोगों को जन्म देकर; शिक्षक समुदाय पर किसी भी तरह के दबाव डालने की छिपी हुयी मंशा को पूरा करने की कोशिश करने के बजाए ; शिक्षा के स्तर को सुधारने हेतु ; शिक्षकों का सहयोग लेकर वास्तविक समस्याओं को चिन्हित कर; उनको दूर करने के सकारात्मक उपाय किए जाएँ ।
            
लेखक सवयं अध्यापक है और यह इनके निजी विचार है -यह लेख बुधवार और गुरूवार को शिक्षा विमर्श में चर्चा के विषय 
'  माननीय ईलाहबाद उच्च न्यायालय का आदेश जिसमे प्रत्येक लोकसेवक "अफसर ,कर्मचारी ,विधायक और सांसद " को अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने का आदेश  ' में संयुक्त रूप से प्रथम स्थान पर चुना गया है . 

इलाहबाद हाई कोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है - नरेन्द्र कुमार पासी ( रतलाम )

नरेन्द्र कुमार पासी - इलाहबाद हाई कोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है | यह किसी की अस्मिता से जुड़ा प्रश्न नही होना चाहिए | क्यों की आज भारत का बहुत बड़ा वर्ग किसान है या गरीब है या दलित समुदाय से आता है | ऐसे में जब उनके बच्चो को शिक्षा न मिले तो उनके दिलो पर क्या बीतती होगी | यह सहज अहसास कर पाना बड़ा ही कठिन सवाल ?आज जहाँ सरकार द्वारा शिक्षा के अनेको प्रावधान कियेगए फिर भी हम आज शिक्षा के अधिकार से ही वंचित है | संविधान के अनुच्छेद 41 A के तहत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत मान्यता दी गई थी जिसके अनुसार, "राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर, शिक्षा और बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और विकलांगता के मामले में सार्वजनिक सहायता करने के लिए काम करते हैं, सही हासिल करने के लिए प्रभावीव्यवस्था करे “ /हालांकि संविधान निर्माणी सभा के अनेको सदस्य और स्वतः बाबा साहब अम्बेडकर यह चाहते थे कि समान शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार में शामिल हो और न्यायिक आदेश से लागू होने की व्यवस्था हो। परन्तु उस समय केन्द्र सरकार के मुखिया और निंयत्रको का यह तर्क था कि सरकार का खर्च और साधन इतने विकसित नही है कि इसे वैधानिक अधिकार या कानून के रुप में लागू कियाजा सके। अतः कुछ समय ढांचे के विकास को चाहिये और इसलिये अन्य मुद्दों की तरह इसे भी नीति निर्देशक मुद्दों के खण्ड में शामिल किया जाये जो कि सरकारों के लिये आदर्श हो और कुछ समय पश्चात जब आधार रुप ढांचे का विकास हो जाये तब अन्य मुद्देां के साथ समानशिक्षा के मुद्दे को भी मूल अधिकार के रुप में शामिल किया जा सकता है। पर अफ़सोस व दुखद यहाँ रहा की इसका कोई ठोस नियम या आदेश न बन सका | इसके पीछे तर्क था की भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत नही की इस खर्च को झेल चुके |एक यह भी अनुमान लगाया गया की आने वाली सरकारे 10-20-30 वर्षो में इसका नियम व आदेश बना लेंगे पर आज आजादी के 68 वर्ष बीत चुके है फिर भी हम लोगो को शिक्षा का समान अधिकार नही दे पाये | निजी स्कूलो के नाम पर आर्य समाज ईसाई मिशनरी संस्थायें, इस्लामिक मदरसा, गुरुद्वारा प्रंबधक सभायें जैसी अन्य धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से शिक्षा के प्रसार के लिये स्कूल कालेज आदि खोले गये थे परन्तु यह सामाजिक हित में और गरीब लोगो को भी शिक्षा देने के लिये न्यूनतम फीस आदि के आधार पर शुरुकिये गये थे।इनमें व्यापार या मुनाफा नही था और न ही निजी मालकियत थी बल्कि इनके पीछे समाज सेवा शिक्षा का विकास और परोपकार की भावना थी। परन्तु कुछ वर्षो के पश्चात समाज के ताकतवर सपन्न और प्रभावी लोगो ने अपने बच्चों के लिये पृथक और मंहगे स्कूल शुरु कराये जैसे दून स्कूल डेली कालेज और ऐसी ही अन्य शिक्षण संस्थाओं को राजा महाराजा या उद्योगपतियों के पैसे से खड़ा करना आंरम्भ हुआ तथा शिक्षा को अमीर और गरीब-बड़े और छोटे ताकतवर और कमजोर राजा और रंक के बीच बांट दिया गया। पुराने राजाओं, धनपतियों और राज सत्ता पर बैठे नेताओं तथा अफसर शाहो के बच्चे इन बड़ेस्कूलों में पढ़ाये जाने लगे जहां पढ़ाई का माध्यम सत्ता प्रतिष्ठान की भाषा अंग्रेजी हो गई और उच्चवर्गीय और उच्च वर्णीय ढ़ाचे को स्थाई तौर पर बरकरार रखने के लिये शिक्षण संस्थाओं में भाषा महत्वपूर्ण माध्यम बन गई।डा.राममनोहर लोहिया ने नारा दिया था ’’राष्ट्रपति हो या चपरासी की संतान सबकी शिक्षा एक समान’’ लोहिया इस बात को जानते थे कि अगर अफसर और चपरासी का बेटा, सम्पन्न और गरीब का बेटा , उद्योगपति और किसान का बेटा, बड़ी जात और दलित का बेटा जब एक ही स्कूल में साथ-साथ पढ़ेगे तो भेद-भाव मिटेगा |राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी तथा सबको समान अवसर प्राप्त होगे,जिससे योग्यता और क्षमता का विकास भी उसी के अनुसार होगा। यह बड़ा विचित्र है कि हमारे देश के कुछ नौजवान और कुछ लेाग जो आरक्षण को समानता का विरोधी मानते है आरक्षण तो मिटाना चाहते है| आरक्षण मुक्त भारत का नारा लगाते है परन्तु समान शिक्षा की बात नही करते। वे यह तो कहते है कि 68 साल आरक्षण को हो गये इसे खत्म करना चाहिये परन्तु वो यह नही कहते कि 68 साल हो गये कि अब नीति निर्देशक मुद्दों को संवैधानिक प्रावधान बनना चाहिये तथा सबको समान शिक्षा का अवसर मिलना चाहिये।असमान शिक्षा भी एक प्रकार का आरक्षण है जिसमें सम्पन्न और ताकतवर के बच्चो को पद और पैसे के आधार पर शिक्षा के विशेष अवसर है। इसका आधार योग्यता नही है बल्कि मात्र आर्थिक या सत्ता प्रतिष्ठान की ताकत ही योग्यता है। यह नौजवान मित्र बड़े-बड़े डोनेशन वाली (जो वस्तुतः भ्रष्ट व काला धन होता है) उस शिक्षा प्रणाली का भी विरोध नही करते जिसमें लाखो करोड़ रुपये देकर अयोग्य छात्र डाक्टर, इंजीनियर आदि बन जाते है और इसीलिये समाज के एक बड़े हिस्से में उनकी मांग और नीयत संदिग्ध रहती है। अब देश में सरकारी शिक्षण संस्थाये और विशेषतः प्राथमिक शिक्षा मैदान के बाहर नजर आती है। नये सरकारी स्कूल खुलने के बजाय बंद हो रहे है। परोपकार के नाम पर शुरु किये जाने वाली धार्मिक और सामाजिक संगठनों के द्वारा चलाये जाने वाले स्कूल बंद हो रहे है| कहने को तो सरकार ने शिक्षा का कानून RTE 2009 में पारित कर दिया है , निजी शिक्षक संस्थाओ को 25 प्रतिशत स्थान गरीबो के बच्चो को आरक्षित रखने का प्रावधान कर दिया है। पर यहतो कानून की किताबो में ही सिकुड़ कर रह गया है | स्कूलो में प्रवेश भी मिल जाये पर विद्यालय में लगने वाली वर्दी (यूनिफार्म) महँगी किताबे ,कापियां ,स्कूलकी दुरी की वजह से साधन याने स्कूल प्रबंधन की चलने वाली महँगी किराये वाली बस (BUS) ,एवं विद्यालय में लगने वाली शिक्षण शुल्क के अलावा अन्य लगने वाली शुल्क की भरपाई कौन करेगा ,,कोर्स में अनेक प्रकार के प्रोजेक्ट बनाने के लिए सहायक सामग्री स्टेशनरी कम्प्यूटर ,प्रिंटर आदि कहाँ से लाये जाये ,यह सारी बाते या समस्याए एक गरीब परिवार नही झेल सकता |भारत की 15 वी जनगणना(वर्ष 2015) के अनुसार देश में साक्षरता 74.04 फीसदी है| जिसमे पुरुष साक्षरता 82.14 फीसदी और महिला साक्षरता 65.46 फीसदी हो गई | परइस बात का ध्यान रहे की शिक्षित होना और साक्षर होना दोनों में भिन्नता है | अब समय आ गया है जब”” शिक्षा कीही नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात होनी चाहिये”” |यही कारण है कि””सबको शिक्षा-अच्छी शिक्षा”” हमारा नारा है।जब सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर ,लिपिक,चपरासी,किसान ,दलित आदि जब सभी के बच्चे एक ही स्कूल में एक ही छत के नीचे एक ही अध्यापक से शिक्षा ग्रहण करेंगे |तभी हम सभी समान शिक्षा का अधिकार दे पाएंगे |आज मध्यप्रदेश में शिक्षा की हालत बहुत ही दयनीय है जिसके कारण आज शिक्षा का व्यापारीकरण हो गया है| सरकारी स्कुलो का रुख खासकर प्रायमरी स्तर पर केवल गरीब के बच्चे मध्यान भोजन के लिए या छात्रवृत्ति के लिए नाम मात्र को स्कूल पहुँच रहे है | वही शिक्षको में अनेक कटेगिरी का निर्माण शासन ने कर रखा है /अतिथि , गुरूजी, संविदा शिक्षक ,शिक्षाकर्मी ,नियमित शिक्षक ,पद एक ,कक्षाए भी पढ़ाने को एक ,पर दुर्भाग्य कीइनका वेतन अलग-अलग है |ऐसे में मानसिक तनाव झेल रहा मध्यप्रदेश का शिक्षक अपने नियमतीकरण के लिए कही स्कूल बंद ,कही हड़ताल ,कही ज्ञापन ,कही जेल में बंद रहकर सरकार की नीतियों व वादा खिलाफी के प्रति अपनी जंग जारी रखे हुए है ,,,ऐसे में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा,विद्यालयों का सही सञ्चालन हो पाना आज “”दूर की कौड़ी साबित”” हो रहा है |

सरकारी विद्यालयों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की कमी के कारण :---------------------------------------------------
01. विद्यालयों को सही संचालित करने में सरकार की इच्छाशक्ति की कमी |
02. नेताओ के द्वारा आपने वोटर्स तैयार करने के लिए शैक्षणिक घोषणाए |
03. गुणवत्तापूर्ण शिक्षक/ शिक्षिका की कमी
04. शिक्षक/शिक्षिका को अन्य शैक्षणिक कार्यो में उलझाये हुए रखना |
05. शिक्षको को पुरे वर्ष स्कूल के बाहर जनगणना, मतदाता सूचि का संधारण,ग्राम सर्वे ,BPL सूचि तैयार करना ,पशु गणना ,मध्यान भोजन कीजानकारिया जुटानाआदि अनेक ऐसी ही योजनाओ को राष्ट्रिय कार्य का नामदेकर शिक्षक/शिक्षिका से करवाया जाता है |
06. गुणवत्तापूर्ण व नियमानुसार एवं सर्व सुविधायुक्त विद्यालय ईमारतका न होना |
07 .विद्यालयों में पानी ,साफ-सफाई,रौशनी,साफसुथरे लैट्रिन-बाथरूमोका न होना |
08. विद्यालय का सही प्रबंधन न होना |
09. विद्यालयों में होने वाली मानिटरिंग को सही अन्जाम न देना ,,यह केवल खानापूर्ति तक सीमित रहा गया है |
10. अधिकारियों का अपनी जेब गरम करने से फुर्सत नही जिसकारण विद्यालयों की सुविधा एवं पढाई लिखाई पर ध्यान देनेका ढुलमुल रवैया |

यदि सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर,लिपिक,चपरासी, किसान ,दलित आदि जब सभी के बच्चे एक ही स्कूल में एक ही छत के नीचे एक ही अध्यापक से शिक्षा ग्रहण करेंगे तो इसके परिणाम भी बेहद रोचक होंगे |साथही भारत देश का जो एक बड़ा तबका जो की शिक्षा से अछूता या कहे शिक्षा के नाम पर साक्षर तो है पर शिक्षित नही है |ऐसे बदलाव से समाज पर भी गहरा और भविष्य में सामाजिक भेदभाव मिटाने में कभी सहायक सिद्ध होगा |

समाज पर प्रभाव :---------------------
01. सभी छात्र एक जैसी वर्दी (यूनिफार्म) पहनेगें तो न कोई आमिर दिखेगा न ही कोई गरीब दिखेगा
02. सभी छात्र एक जैसी किताबो का अध्ययन करेंगे जिससेसभी का ज्ञान बुद्धि-लब्धि के हिसाब से एक जैसा होगा|
03. सरकार के द्वारा स्कुलो में उपलब्ध करवाए गए पढाई–लिखाई के साधन भी एक जैसे होंगे |
04. सबसे अहम बात की गरीब बच्चो को पढाई करने में हीन भावना का शिकार भी नही होना पढ़ेगा |
05. कक्षा में एक अध्यापक सभी छात्रो को एक जैसा ही पढ़ेगा ,यह नही होगा की ये गरीब छात्र है की यह अमीर छात्र है |किसी एक पक्ष को इंगित नही करेगा |
06. अमीर छात्रो को अलग से कोई अन्य भाषा नही पढ़ाई जाएगी ,जैसा की बड़े निजी विद्यालयों में होता है |सभी को एक ही पाठ्यक्रम से पढाया जायेगा |
07. एक साथ स्कूलो में बैठक व्यवस्था होगी | क्यों की अमीर गरीब का भेदभाव अभी भी समाज में व्याप्त है |
08. जब सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर , व्यापारीके पुत्र/पुत्री जब सरकारी स्कूलो में पढेंगे तो आपने आप ही सभी स्कुलो पर विशेष ध्यान देना शुरूकर देंगे और स्कुलो की खस्ता हालत या लचर व्यवस्था में सुधार आना शुरू हो जायेगा |
09. शिक्षको को सही वेतनमान और सही समय पर पगार(पेमेंट) मिलना शुरू हो जाएगी |
10. वर्तमान में जो हम भारत की साक्षरता 74 प्रतिशत बताते है यही शिक्षा में परिवर्तित हो जाएगी ,फिर हर वर्ग का छात्र देश के प्रति देशप्रेम और देश के संसाधनों कोगुणवत्तापूर्ण उपयोग के बारे में सोचेगायह इलाहबाद हाई कोर्ट का बहुत ही सराहनीय कदम है|
इससे समाज ही नही देश में भी शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव आएंगे | 

लेखक सवयं अध्यापक है और यह इनके निजी विचार है -यह लेख बुधवार और गुरूवार को शिक्षा विमर्श में चर्चा के विषय 
'  माननीय ईलाहबाद उच्च न्यायालय का आदेश जिसमे प्रत्येक लोकसेवक "अफसर ,कर्मचारी ,विधायक और सांसद " को अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने का आदेश  ' में प्रथम स्थान पर चुना गया है . 

Wednesday, October 5, 2016

RTE रूपी कमान से निकला एक तीर 25% फ्री....निशाने दो शिक्षक और समुदाय-श्रीराम राठौर (खातेगांव)

श्रीराम राठौर  -साथियों सादर वंदे.......RTE (शिक्षा का अधिकार अधिनियम) के प्रावधान अनुसार वंचित और कमजोर वर्ग के बच्चों का अशासकीय शालाओं की न्यूनतम कक्षा में 25% (न्यूनतम) प्रवेश के संबंध में बात करने से पहले यह सोचना आवश्यक हो जाता है कि हर सिक्के के 2 पहलू होते हैं इस विषय पर यदि दोनों पहलुओं को साथ लेकर चला जाए तभी हम सही निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं।
मेरे विचार से सर्वप्रथम इसकी बिंदुवार पक्ष विपक्ष के साथ समीक्षा कर ली जाये.....
25% निःशुल्क प्रवेशित बच्चों का शासकीय विद्यालयों पर पड़ने वाले प्रभावों तथा उनके कारणों के संबंध में यदि विस्तृत रूप से चिंतन किया जाये तो निम्न तथ्य सामने आते है......
1)  शासकीय शालाओं में प्रवेश की कमी :- अशासकीय शालाओं में न्यूनतम कक्षाओं में 25% निःशुल्क प्रवेश के कारण हमारे शास.विद्यालयो में साल-दर-साल नव प्रवेशी बच्चों का अकाल सा पड़ गया है, इस प्रवेश रूपी अकाल को हम समुदाय से अपना जीवित संपर्क कर अपनी शाला की विशेषता बता कर और हमारे कार्यो से दूर कर सकते है 25% फ्री का शासकीय विद्यालयों पर पड़ने वाला यह मुख्य प्रभाव है।
2) यह योजना शासकीय शालाओं का निजीकरण की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है,शासकीय शाला की न्यूनतम कक्षा से साल दर साल बच्चो की संख्या उसी अनुपात में अगली कक्षाओ में आगे भी बढती चली जाती है विगत तीन चार वर्षो में 25% न्यूनतम तथा इससे भी अधिक बच्चों का प्रवेश निजी विद्यालयों में प्रवेश दिया जाकर शासन द्वारा इसकी फीस प्रतिपूर्ति भी की गई परन्तु इस वर्ष शासन द्वारा  निजी विद्यालयों हेतु इस प्रक्रिया को ऑनलाइन के माध्यम से किया जाकर विभिन्न कठिन प्रावधान भी इसमें जोड़े गए जो की शास.शालाओ और हमारे पक्ष में रहा है यह हमारे लिए एक अच्छा संकेत भी है।
3) एक प्रश्न यह भी उठता है की 25% फ्री बच्चों पर खर्च की जाने वाली राशि का उपयोग निश्चित रुप से शासकीय विद्यालयों में होना चाहिए था जिससे शासकीय विद्यालयों की अपूर्ण व्यवस्थाओं को पूर्ण किया जा सकता था वैसे शासन हमेशा पूर्ण व्यवस्था के झूठे दावे करता रहता है इस सम्बन्ध में भी हमें शासन का ध्यान आकृष्ट करना चाहिए।
समुदाय पर 25% फ्री भर्ती के पड़ने वाले प्रभाव के बारे में भी हमें चिंतन और मनन करना होगा...
1) आज वर्तमान में अशासकीय विद्यालयों की चकाचौध के कारण कमजोर वंचित समूह के लोग भी अपने बच्चो का प्रवेश अशासकीय शालाओ में कराना चाहते है RTE में 25% का प्रावधान भी समुदाय की भावना को ध्यान में रखकर किया गया है, कही न कही हम भी इसके लिए जबाबदार है हमें समुदाय को हमारी और हमारी शालाओ का प्रचार प्रसार कर स्वयं की योग्यता को साबित करना ही पडेगा।
2) वंचित वर्ग के लोग जो अपने बच्चो को अच्छे सर्वसुविधा युक्त अशासकीय  शाला में 25% के माध्यम से प्रवेश दिलाते है वो शाला के अन्य खर्च जैसे गणवेश पुस्तकें टिफिन और आवागमन के साधन आदि वहन नहीं कर पाते कही न कही ये बात समाज में कुंठा की भावना एवं बच्चो एवं पालको में हीन भावना पैदा करती है यह 25% फ्री योजना का एक कमजोर बिंदु है।
3) बड़े और सर्वसुविधायुक्त अशासकीय विधालय 25% भर्ती के संबंध में सहयोग की भावना नहीं रखते तथा छोटे ऐसे विद्यालय जिनकी फीस RTE वाले फ्री बच्चो से कम है वे विद्यालय इस योजना में अधिक रुचि लेते है, अशासकीय शालाओ के इस प्रकार के रवैये से भी कही न कही समुदाय भ्रम में पड़ रहा है।
निष्कर्ष:- साथियों सारे बिन्दुओ पर विचार करने के पश्चात यह कहना उचित होगा समाज को इस योजना में लाभ के साथ साथ अप्रत्यक्ष रूप से हानि भी हो रही है, साथ ही कहीं ना कहीं इस मामले में कमजोर पक्ष के रूप में हम लोग भी नजर आते हैं निश्चित रूप से समुदाय को हम हमारी विशेषताएँ नहीं समझा पा रहे है, और नहीं समुदाय से आपसी सामंजस्य भी बैठा  पा रहे है और न ही वर्तमान में पालको से हमारा जीवित संपर्क ही रहा है।
एक बात और भी सामने आती है साथियो, हमारे द्वारा होने वाले आंदोलनों में भी 25% फ्री बच्चो का मुद्दा तथा शास.विद्यालयों का निजीकरण का मुद्दा भी हमें सम्मिलित करना चाहिए तथा हम शिक्षकों को समुदाय से अशासकीय विद्यालयों के प्रति समुदाय की भावना को भी हमारे उत्कृष्ट कार्यो के द्वारा बदलना ही पड़ेगा। साथियों यह तो निश्चित है कि यदि हम अपने कर्तव्य पर 100%खरे उतरे तो शासन 25% फ्री भर्ती के साथ ही ऐसे और भी सैकड़ों प्रयोग हमारे विद्यालय और हमारे समाज पर कर ले तो भी इस तरह के कपटता पूर्वक रवैये में कभी भी सफल नहीं हो सकती क्योंकि हम राष्ट्रनिर्माता  और युगद्रष्टा की भूमिका में है,आज भी समाज हमारा अनुसरण करता है। हमारे  अस्तित्व को बचाने और हमारी शक्ति को पहचानने की आवश्यकता और जरूरत मात्र है, सरकार का यह जो RTE की कमान से निकला हुआ 25% का तीर है निश्चित रुप से हम इस तीर को मोड़ सकते हैं इतना सामर्थ और शक्ति तो हमारे अन्दर मौजूद है।।
(लेखक स्वयं  अध्यापक और यह उनके निजी विचार है ।)RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव )
संयुक्त रूप से प्रथम स्थान  पर पर यह लेख चयनित किया गया।

25% नही 100% छात्रों को निजी स्कूलों में भेजने की साजिश है ये नियम - सचिन गुप्ता (खितौली)


RTE के तहत 25% छात्रों को निजी स्कूलों में भेजने की सरकार की मंशा चाहे जो भी हो लेकिन इस निर्णय से सरकारी विधालय ,वंचित वर्ग ,और समाज इन सभी पर परोक्ष अपरोक्ष रूप से गहरा असर हो रहा है।
हम सभी और सरकार भी यह जानती है कि सरकारी स्कूलों में कमजोर,वंचित और सामाजिक रूप से पिछडे गरीब लोगों के छात्र ही बहुतायत संख्या में दर्ज होते हैं जिनकी निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था सरकार खुद करती है।
यह सब जानते हुए भी 25% छात्रों को सरकारी स्कूल से छीनने का सफलतम प्रयोग सरकार ने कर लिया जिसका सीधा असर सरकारी स्कूल की दर्ज संख्या पर हुआ। इस निर्णय ने यह दिखाने की कोशिश कि सरकारी स्कूल में छात्र नहीं पढना चाहता अगर हम 100% कर दे तो सरकारी स्कूल बंद हो जाँएगे शायद इनकी मंशा भी यही है क्योंकि समय समय पर सरकारी स्कूलों के निजीकरण की बातें अखबारों व बयानों के माध्यम से सुनने को मिलती रहती हैं
यह निर्णय हर सरकारी स्कूल पर हमला है, हर अध्यापक ,हर शिक्षक पर हमला है ये हमारी योग्यता पर हमला है ।
मैं जानना चाहता हूँ कि निजी स्कूलों ने उन 25% छात्रों के शैक्षणिक स्तर पर कितना सुधार किया ।
जहाँ एक ओर सरकार को इनकी निशुल्क शिक्षा के लिए अतिरिक्त वित्तीय भार सहना पड रहा है वही सरकारी स्कूलों में तमाम सुविधाएँ उपलब्ध कराने के बावजूद उसे कमतर आँका जा रहा है।
अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन यह सीमा 50% होगी फिर 100% और हमें सौप दिया जाएगा किसी अन्य विभाग व संस्था के अधीन नये सिरे से शोषण करने के लिए ।
वही ये 25% छात्र भी निजी स्कूलों की चकाचौंध में अपने से मजबूत आर्थिक परिस्तिथि के छात्रों के रहन सहन, हाव भाव, तौर तरीके में सामंजस्य बिठाने के चक्कर में अपने अभिभावकों पालको से उनके समतुल्य वस्तुओं की चाहत की हठ करने लगता है जो उसके पालको की सीमा से बाहर होता है ऐसे में छात्र पर क्या असर होता होगा ये हर अभिभावक महसूस कर सकता है
वंचित वर्ग ,सरकारी स्कूल और निजी स्कूल की खाई में फँसता जा रहा है  क्योंकि इस वर्ग ने जिस परिणाम की लालसा में इस नियम का लाभ उठाकर अपने छात्रों का दाखिला निजी विधालयों में कराया था उसे अपनी उम्मीद के मुताबिक परिणाम नही मिल पा रहें हैं जिसकी लालसा में वे सरकारी स्कूलों से अलग हुए थे।
मैं कहना चाहता हूँ कि सरकारी स्कूलों का निजीकरण करने की साजिश को बेनकाब करने का जिम्मा तो हमारा है ही वही हर रोज खुल रहे निजी स्कूलों के छात्रों का सरकारी स्कूल में नामांकन कराकर इन स्कूलों को बंद करवाने का एक प्रयास करना बहुत जरूरी है ।( लेखक स्वयं अध्यापक है और यह उनके निजी विचार है ) RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव )
द्वितीय  स्थान पर पर यह लेख चयनित किया गया।

न रहेगा शिक्षा विभाग... न रहेगी वेतनमान की माँग और समस्या...विवेक मिश्रा ( नरसिंहपुर )

 विवेक मिश्रा   - सभी बुद्धिजीवी भाई बहनों द्वारा अनेक पहलुओं पर अनेक प्रकार के तर्क दिए गए हैं, जो किसी न किसी दृष्टिकोण से तर्कसंगत व उचित ठहराये जा सकते हैं, परंतु इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है - शासन की २५ प्रतिशत बच्चों को निजी शालाओं में स्वयं शासकीय शालाओं के शिक्षकों /अध्यापकों द्वारा प्रवेश दिलाने की नीति- इस संबंध में मेरा कहना है कि क्या यह नीति जब प्रस्तावित की गई थी तो तत्कालीन समय में शिक्षक समाज के विभिन्न संगठन चाहे वो अधिकारी /लिपिकीय/शिक्षक/अध्यापक /चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संवर्ग के हों, क्या इनमें से किसी भी संगठन ने इस नीति का विरोध किया था, यदि हां तो कब और किसने और किस स्तर पर (प्रमाण सहित) और नहीं तो क्यों नहीं. क्या वो इस नीति के दूरगामी परिणाम के बारे में दूरदर्शिता नहीं रखते थे, कि इस नीति के तहत जिस "शिक्षा विभाग रूपी मातृ विभाग" से उनका और उनके परिवार का पालन-पोषण हो रहा है, उसे सुनियोजित तरीके से समाप्त करने की यह योजना बनाई गई है, साथ ही शासन स्वयं इन २५ प्रतिशत बच्चों की राशि भी निजी शालाओं में जमा करके उन्हें बढ़ावा देकर फलने फूलने के पर्याप्त अवसर दे रही है, कारण साफ है कि ज्यादातर पूँजीवादी निजी स्कूल उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, राजनेता और अधिकारियों के हैं, जिनमें मनचाही फीस और नियम कानून अपनाए जाते हैं,कुछ तथ्यों पर आप भी सोचकर देखें तो आप भी सहजता से स्वीकार करेंगे कि शासकीय शालाओं में ज्यादातर गरीब तबके के बच्चे अध्ययनरत रहते हैं, यदि इनको बढ़ावा देने के लिए यदि इन्हें पूँजीवादी निजी स्कूलों में दाखिल करा भी दिया जाता है तो वहां पर इनके साथ पढ़ने वाले अमीर परिवार के बच्चों के जैसा बराबरी का बर्ताव या सलीका नहीं अपनाया जाता, जब ये गरीब बच्चे जो कि शासन की नीति के तहत इन निजी स्कूलों द्वारा मजबूरी में दाखिल कराये जाते हैं तो इन पूँजीवादी निजी स्कूलों के स्टाफ, अमीर बच्चों द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाता है, साथ ही जब ये गरीब बच्चे इन निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अमीर बच्चों के आने जाने के लिए लगे निजी वाहनों, उनके पहनने के कपड़ों की क्वालिटी, उनके भोजन की क्वालिटी, उनके माता-पिता के द्वारा इन निजी स्कूलों को दिए जाने वाले डोनेशन इत्यादि के बारे में सोचते हैं तो इन गरीब बच्चों के मन में हीन भावना घर कर जाती है. साथ ही निजीकरण के माध्यम से शासन अनुत्पादक समझे जाने वाले इस मौलिक अधिकार से अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति भी पाना चाहती है, परंतु किसी भी राजनीतिक दल के लिए हर चुनाव में शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रमुख मुद्दे होते हैं, जिन्हें चाहकर भी ये समाप्त नहीं कर सकते, नहीं तो कल से जनता भी इनसे कहने को तत्पर रहेगी कि अब आपकी (सरकार को चुनने की ) भी कोई आवश्यकता नहीं है और आपका भी निजीकरण कर दिया जाए, परन्तु इन सबके बीच में हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि शासन की नीति अनुरूप अलग अलग समय पर अलग अलग संवर्गो में भर्ती किए गए अहं और महत्वाकांक्षाओं में घिरकर हम और हमारे संगठन, विरोध करने पर बैकफुट पर दिखाई देने को विवश हैं,उनकी इस विवशता का भी एक नहीं बल्कि अनेक वाजिब कारण हैं, पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि इस संवर्ग के स्वयं के परिवार के बच्चे निजी शालाओं में अध्ययनरत रहते हैं, दूसरा इस संवर्ग के स्वयं के या इनके रिश्ते नातेदारों के निजी स्कूल हैं,          आज के विषय के संदर्भ में ,यह भी आशंका व्यक्त की जा सकती है कि २५ % नीति के तहत जिन शासकीय शालाओं को बँद कर समीपस्थ शालाओं में मर्ज किया जाना है, तो बँद करने के बाद उन बंद हुई शासकीय शालाओं की बहुमूल्य जमीनों(शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों  की) पर स्थानीय निकायों जैसे नगरपालिका/नगर निगम/नगर पंचायत अथवा जनपद/जिला पंचायत का नियंत्रण होना तय माना जा सकता है, तदुपरांत कालांतर में इन बेशकीमती जमीनों और उन पर बने भवनों का उपयोग व्यावसायिक दृष्टि से लाभ कमाने के लिए लिये किया जा सकता है. यह भी समझा जा सकता है कि इनमें से शहरी क्षेत्रों की शास शालाओं की बेशकीमती भूमियों पर निकट भविष्य में शापिंग माॅल या काम्पलेक्स जैसी इमारतों का निर्माण कर उन्हें नीलाम कर करोड़ों अरबों का लाभ कमाया जा सकता है. साथ ही स्थानीय निकाय के कर्मचारी कहलाने के कारण निकट भविष्य में कभी भी हमें घर पर बिठा दिया जा सकता है... यह भी एक कटु सत्य है जिसे झुठलाना अपने आपको धोखे में रखने जैसा होगा.    स्थानीय निकायों की नियोक्ता संस्थाओं के नियंत्रण में ही ये बंद हुए शाला भवन जायेंगे अन्य किसी निकाय के द्वारा इन पर अपना हक नहीं ठहराया जा सकता है, जैसे कि स्कूल शिक्षा विभाग, क्योंकि हमारे संवर्ग की नियुक्ति तत्समय इन्हीं स्थानीय निकायों द्वारा की गई थी.. ईवन ट्राईबल की शालाओं और आश्रम शालाओं के साथ ही भविष्य में आँगनवाड़ी केन्द्रों में भी इसी तरह के नियमों का पालन किया जा सकता है....        अगर सारांश रूप में कहा जाए तो इस प्रकार की नीति केवल हमारे अकेले विभाग पर ही लागू की जा रही है, एेसा कहना गलत होगा.. इस प्रकार की नीतियों की शुरुआत तो 1990 के दशक से ही देश भर में प्रारंभ कर दी गई थी... हमें इस तथ्य को भली भांति समझ लेना होगा कि देश व्यापी स्तर पर आज का दौर उदारीकरण, निजीकरण और विश्वव्यापीकरण का है और इन सबके कारण किसी भी प्रकार की अप्रत्याशित नीतियों का प्रकटीकरण असंभव प्रतीत नहीं हो सकता...(लेखक स्वय अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार है )RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव ) प्रथम स्थान पर पर यह लेख चयनित किया गया।

निजी विद्यालय है भेदभाव की जगह - विष्णु पाटीदार

विष्णु पाटीदार -RTE  अंतर्गत निजी विद्यालय में कमजोर वर्ग के 25 प्रतिशत भर्ती के कारण शासकीय शालाओं में दर्ज संख्या में काफी कमी आ गई क्योंकि वैसे भी शासकीय शालाओं में इन कमजोर वर्ग के बच्चों का हीं अधिक प्रवेश होता था उच्च वर्ग के बच्चे तो वैसे भी कम ही आते थे इससे सरकारी विद्यालय के साथ साथ समाज पर भी बहूत असर हुआ, कमजोर वर्ग के बच्चे उच्च वर्ग के बच्चों के साथ पढ़ने लगे जिससे कमजोर वर्ग अपने आप को गौरवान्वित महसूस करने लगा तथा उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलने लगी । नीजी स्कूलों ने भी इसका भरपूर फायदा उठाया क्योंकि बच्चों की फीस तो सरकार वहन कर हीं देती है लेकिन निजी स्कूल वाले इन बच्चो के साथ भेदभाव कर अलग से कक्ष में बैठाकर मुख्य धारा से अलग रखते हैं नियमों का पालन करते हुए इन बच्चों को उच्च वर्ग के बच्चों के साथ बैठाकर नहीं पढ़ाते साथ हीं टारगेट पूरा करने के लिए निर्धारित आयु से कम आयु या अधिक आयु के बच्चों को भी भर्ती कर लेते हैं । सरकार की कमजोर तबके को मुख्य धारा में जोड़ने की पहल अच्छी थी लेकिन कतिपय निजी विद्यालयों ने इसका नाजायज फायदा उठाया और इसी के कारण सरकारी विद्यालयों में दर्ज संख्या में कमी आने का एक कारण यह भी हो सकता है ।(लेखक स्वयं अध्यापक है और यह उनके निजी विचार है ।)



( RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25  प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव )

तृतीय  स्थान पर पर यह लेख चयनित किया गया। 

Saturday, October 1, 2016

शिक्षक,शिक्षा और नैनिहाल के हाल बेहाल जबाबदार कौन......? - श्रीराम राठौर ( खातेगांव जिला देवास )

 श्रीराम राठौर  - 1995 के बाद से ही शिक्षकों की भर्ती पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को सौंपी दी गई थी, 1998 के बाद से पंचायतो ने सरकारी नियमानुसार शिक्षाकर्मी गुरूजी तथा संविदा शिक्षको की भर्तियाँ की गयी, जिनमे शिक्षको की विभिन्न श्रेणीयो वाले शिक्षाकर्मी संविदा शिक्षक वर्ग 1,2,3 एवं गुरूजी आदि शिक्षक के रूप में थे। बाद में सरकार ने पंचायती नियमो एवं अर्थव्यवस्था का हवाला देकर नियमित शिक्षकों के वेतन की अपेक्षा अति न्यूनतम वेतन देकर शिक्षाकर्मीयों एवं अन्य प्रकार के शिक्षको का भरपूर शोषण किया ।बिडम्बना यह थी की हमारे साथियो का वेतन चपरासी से भी अत्यधिक कम था। शिक्षाकर्मीयों संविदा शिक्षको व गुरुजियो का मानदेय उस समय वेतन न होकर मानदेय था, जबकि नियमित शिक्षको को चौथा,पांचवाँ और छटवां वेतनमान दिया जा रहा था।मुझे अच्छे से याद है एक समय था जब हमारे वर्ग 03 वाले शिक्षाकर्मी  साथियो की तो 2256 के नाम से समुदाय में पहचान ही बन गई थी। और हमारा साथी न्यूनतम मानदेय की इस स्तिथि के कारण जीवन यापन के अन्य स्त्रोत भी तलाशने में लगा था। हमारे साथियो की ख़राब स्थिति यही नहीं रुकी सरकारों की दमनकारी और शोषण की निति के खिलाफ आख़िरकार हमारे साथियो ने आन्दोलन की राह पकड़ी काफ़ी संघर्ष और आन्दोलन के बाद 2007 में म.प्र. सरकार ने फिर राष्ट्रनिर्माताओ को एकबार फिर छलते हुए अध्यापक संवर्ग का गठन किया जिसमे हमारी जायज मांगों के फलस्वरूप हमें सिर्फ नाम ही मिला हमारी मेहनत का दाम नहीं।
         आज तक भी आम अध्यापक छटवे वेतनमान की लड़ाई लड़ रहा है  और अन्य शिक्षकों को सातवां वेतनमान मिलने वाला है । 1995 के बाद से ही सरकारों के शोषण का प्रतिफल यह हुआ की  शिक्षा के स्तर और गुणवत्ता में कमी आती गई तथा न्यूनतम वेतन तथा विभाग में छोटे बड़े,कम ज्यादा,स्थायी अस्थायी और विभिन्न नामो श्रेणियों में बंटने के कारण कही न कही इन सब बातों का प्रभाव शिक्षक की मानसिकता पर भी पड़ा। उसके बाद शिक्षा के स्तर में थोड़ी बहुत गिरावट तो आना स्वभाभिक ही थी, स्तर की इस गिरावट को और ज्यादा बड़ी खाई बनाने का काम किया सरकारों के विभाग पर,शिक्षको पर विभिन्न नित नए प्रयोगों और लाल फीताशाही ने, जिनके कारण आम अध्यापक आज तक ठगा जा रहा है तथा अपने अधिकारों को पाने के लिए संघर्षरत है।
        अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत अध्यापक तो आज भी शिक्षातंत्र की भलाई के लिए सोंचते हुये शिक्षा का बेड़ा पार लगाते हुये नन्हे-मुन्हो का भविष्य संवारना चाहता है और अपने मूल कर्तव्य राष्ट्र निर्माता की भूमिका को बखूबी निभाना चाहता है...
         पर सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग यह समझ ले की आम अध्यापको के बेड़ापार से ही शिक्षातंत्र का बेड़ापार होगा अन्यथा नैनिहालो के भविष्य के लिए यदि कोई जबाबदार होगा तो सिर्फ और सिर्फ सरकार ही होगी.....
जय हिन्द साथियो......
( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में प्रथम   स्थान पर इस रचना को रखा गया )

1998 के बाद शिक्षा के मायने बदल गये - सचिन गुप्ता

 सचिन गुप्ता -यही वह समय है जब शिक्षक को आम जनता 500-1000 हजार रूपये का मास्टर कहकर पुकारने लगी और पहली बार शिक्षक को उसकी योग्यता से न नवाजकर उसकी तनख्वाह से उसकी सामाजिक और शैक्षणिक क्षमता का आँकलन किया जाने लगा 
         परिणाम हुआ शिक्षक और शिक्षा दोनो का स्तर गिरना ,जहाँ एक ओर शिक्षक अपनी समस्याओ को लेकर धरना प्रदर्शन आंदोलन करने लगा वही दूसरी ओर शिक्षा प्रभावित होने लगी और ऊपर से समय समय पर शासन प्रशासन की दमनकारी जवाबी कार्यवाही ने आग मे घी डालने का काम किया जबकि सरकार को उनकी माँगे पूरी करके शिक्षा की बाधाओ को दूर करने मे अध्यापको का साथ लेना चाहिए था
        वही दूसरी ओर शिक्षक शिक्षक मे क ई मतभेद सामने आने लगे शिक्षक मानसिक रूप से शासन प्रशासन अधिकारी अपने वरिष्ठ नियमित शासकीय शिक्षको के द्वारा उनके व्यंगो का सामना करने के लिए तैयार हो गया
        इतनी समस्याओ के बावजूद भी शैक्षणिक कार्य मे लगा रहा लेकिन समयानुसार उसका शोषण सरकारे करती रही जिसका असर शिक्षा व शिक्षक की पारिवारिक स्थिति पर भी हुआ
लेकिन उम्मीद यही है कि शिक्षक और शिक्षा दोनो की स्थितियाँ जल्द सुधरेगी

( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से दुसरे  स्थान पर इस रचना को रखा गया )

कम सुविधाओ एवं शोषण के बीच हमारे शिक्षक साथियो के कठिन परिश्रम से शिक्षा के स्तर को ऊँचा किया - रकीब खान

रकीब खान - वाजपयी सरकार ने 2003-04 मे  संविधान मे शंषोधन करके देश मे पेंशन बंद करवाने के साथ स्थाई पदो के .साथ कई विभागो मे अस्थाई पदो पर भर्ती के लिए कानून बनाया जिससे  मध्य प्रदेश मे स्थाई शिक्षको की भर्ती को खत्म कर अस्थाई शिक्षा कर्मी , एवं संविदा शिक्षको की भर्ती शुरू की जिनको BED, DED, धारी कुशल कर्मचारी होने के बावजूद भी एक अकुशल मज्दूर के बराबर अल्प वेतन पर रखा जाता  हे  साथ मे स्थाई कर्मचारियो के समान भत्ते (आवास , यात्रा आदि ) , पेंशंन (2004 से पहले )  तथा वेतन मान आदि से भी महरूम रखा जाता है जिस कारण इनका अधिकाश समय अपने हक़ को पाने की लड़ाई मे रैली ,धरना,  सभा आदि मे चला जाता है , साथ ही एक ही शाला मै एक ही कार्य को करने वाले LDT का वेतन जहाँ 40हज़ार के पार है वही उसी कार्य को ईमान दारी से करने वाले सहायक अध्यापक का वेतन मात्र 15 हज़ार ही है साथ ही ग्रेड पेय मे भी ज़मींन आसमान का अंतर है यही हाल अन्य वर्गो (1 व 2) का भी है इस कारण  अस्थाई पदो पर नियुक्त अध्यापक साथियो मे हीन भावना के साथ  सरकार एवं व्यवस्था  के प्रति रोष भी उत्पन्न होता है जिसका प्राभाव कक्षा मे भी पड़ता है साथ ही अल्प वेतन पर नियुक्त कर इनसे अन्य गैर शैक्षणिक कार्य (बी.एल.ओ. ,  SDM. कार्यालय मे अन्य निर्वाचन कार्य , मध्यान भोजन जानकारी , छात्रव्रत्ति, सायकिल आदि ) लिए जाते है , लगातार एसे कार्यो मे नियुक्ति से एक शिक्षक की अपने विषय पर एवं छात्रो पर पकड़ कमज़ोर हो जाती है साथ ही शिक्षक अधिकारियो का भी दबाव भी इनही पर होता है , जिससे इनमे मानसिक परेशानी के साथ ही अवसाद की स्तथि भी आ जाती है एसे मामले मे कई अध्यापक साथी आत्महत्या जेसे कठोर कदम भी उठा चुके  है !
जिससे अध्यापक एवं शिक्षा जगत पर एक विक्राल दुषप्रभाव पड़ता है , साथ यदि शिक्षक अपने हक़ के लिए धरना रैली जागरूकता लाता है तो मीडिया उसे कवरेज नही देता और यदि  एक शिक्षक शाला मे किसी उत्पाती छात्र को मार दे तो न्यूज पेपर मे ये खबर बड़ी बड़ी हेड लाईन मे छपती है जग हसाई होती है ,  जिससे समाज मे अध्यापको के प्रति गलत संदेश जाता है साथ ही शिक्षक छात्रो पर पड़ाई के लिए दबाव भी नही बना सकता है  इनही सभी कारणो से छात्र शासकीय शालाओ मे पड़ाई मे विशेष रुची नही ले पाते एवं दिनो दिन पड़ाई का स्तर समाज मे गिरता जा रहा है ,
लेकिन फिर भी कम सुविधाओ एवं शोषण के बीच हमारे शिक्षक साथियो के कठिन परिश्रम से बलीदान से ईमान दारी से किए गऐ शिक्षणीय कार्य से सत्र 2015-16 का कक्षा 10वी एवं 12 वी का बोर्ड परीक्षा परीणाम निजी शालाओ से अच्छा रहा है जिसके लिए समस्त अध्यापक बधाई के पात्र है धन्य वाद | 
( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से  दुसरे स्थान पर इस रचना को रखा गया )
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आज शिक्षक समुदाय की सबसे बड़ी समस्या अस्तित्व ,गरिमा एवं स्वाभिमान को बचाने की है - सीमा चावल

सीमा चावल - आज शिक्षक  डरा सहमा व भयग्रस्त  है । समुदाय की सबसे बड़ी समस्या अस्तित्व ,गरिमा एवं स्वाभिमान को बचाने की है ।  प्रशासन ने शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर अनाप शनाप धन खर्च करने के लिए ऐसी नीतियों को निर्माण करवाया है जिससे निजी स्कूल फले फुले व् सरकारी स्कूल व् शिक्षक की बदनामी हो । समाज व्  सरकार इन स्कूलो से घृणा करे ताकि सम्पन्न लोगो के बच्चे निजी स्कूलो में पढ़े । गरीबो की पहुँच  में शिक्षा  रहे ही नही । यह अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने का प्रयास भी है । आज समाज को भी इस समस्या की सच्चाई को समझना होगा । मुझे यह बताने में शर्म आती है कि हमारे अधिकारियो ने शैक्षणिक गुणवत्ता बढ़ाने के लिए हर सप्ताह प्रति माह संकूल स्तर पर विषयवार प्रशिक्षण आयोजित करने का कार्यक्रम तय किया है आप जानकर हैरान हो जाएंगे कि प्राथमिक विद्यालय में दो शिक्षक में से 5वीं पढ़ाने वाले को प्रतिमाह 8 दिन प्रशिक्षण लेने जाना है । जिनकी गुणवत्ता के लिए उसे महीने में 10 से 12 दिन पढ़ाने का समय मिलता है । प्रशिक्षण उन्ही शिक्षको में एक को देना है कुछ नही होता केवल बैठने के ।  क्या इससे गुणवत्ता बढ़ेगी ? 
       इससे भी बड़ी बात तो यह है कि इन प्रशासनिक विशेषकर IAS ने शिक्षको को  डाकू लुटेरे चोर समझकर स्कूलो में निरीक्षण अवलोकन व् सरकूलर जारी किए है । नीतियों को बनवाया है ।  छात्रवृति सायकल mdm पाठ्यपुस्तक वितरण गणवेश आदि योजनाओ में हमारे साथ अविश्वास किया जाता है । इसी कारण हर साल ,आए दिन बदलाव कर, निरीक्षण में शंकाए व्यक्त होती है ।जबकि बहुत सी बातो के लिए हमसे अविश्वास कर योजना सञ्चालन किसी ओर से कराया जाता है व् जिम्मेदार शिक्षक को बनाया जाता है ।
आज बड़वानी की घटना से हमे सोचना चाहिए कि जब mdm समूह बनाता है । उससे सम्बन्ध जनपद का है । तो मात्र जनशिक्षक को दोषी मानना क्या शिक्षक के प्रति प्रशासन की दुर्भावनाए नही तो क्या है ? क्या केवल आत्महत्या हमारे अस्तित्व स्वाभिमान व् गरिमा को बचाने का हल है ?क्या यह सबसे बड़ी समस्या नही है ? हम स्व प्रकाशजी चौहान बड़वानी को इस रूप में अपनी श्रद्धांजलि दे कि किसी ओर शिक्षक को ऐसा कदम उठाने कि अवश्यकता नही महूसस हो ।
   मित्रो अब समय आ गया है कि हम इनकी कुत्सित चालो को समझकर सारे थोपे गए गैर शैक्षणिक कार्य छोड़े और मात्र हमारा मूल कार्य पढ़ाई के लिए संघर्ष करे । सङ्कल्प करे कि हम बच्चों के आलावा किसी से नही डरेंगे । पढ़ाने के आलावा कोई  गैर शैक्षिक कार्य नही करेंगे । सरकार से पढ़ाने के लिए लडेंगे ।
( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर इस रचना को रखा गया )

कविता @ शिक्षाकर्मी बना दिया -अर्जुन पटेल


जीवन उधार जैसा बेशर्मी बना दिया।
वर्षों की साधना ने शिक्षाकर्मी बना दिया।
सन्98में एक ऐसी नीति आई।
पढे लिखे युवकों की जवानी शरमाई।
मजबूरी बस शेरों ने घास खाना स्वीकारा था।
500 के वेतन में महीने किया गुजारा था।
फिर भी जोश नहीँ था कम पूरे दम से काम किया।
तनिक दया न आई शाशन ने सौतेली सन्तान किया ।
फिर से काबिज होने सत्ता पर एक निवाला फेका था ।
लाचार शिक्षाकर्मी ने उसे आशा की नजर से देखा था।
फिर उम्मीदे टूट गयी।
किस्मत ही जैसे रूठ गई।
फिर इनकी अगवाई में कई बार बजाई है ताली।
पर पूरा भोजन भरकर कभी न दी इनने थाली।
उतने पर भी सभाजीत नीति लाते हैं जाली।
कल भी हाथ ख़ाली थे
आज भी हाथ हैं खाली।
बार बार मझधार में आपने ला छोड़ा है।
पर हमने अब भी उम्मीद को नहीं तोडा है।
जो आप बने हैं धर्मपिता।
तो अपना धर्म निभाना।
अपने वादे को पूरा कर
शिक्षक हमें बनाना।
वेतन भी दो गर पूरा
तो हम वो कर दिखलायेंगे।
मध्यप्रदेश को शिक्षा में
नम्बर एक पर लाएंगे।।

( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर इस रचना को रखा गया )

Thursday, September 29, 2016

केवल सरकारी विद्यालयों की ही दुर्दशा क्यों ? राहुल रूसिया

      जब से शिक्षा का अधिकार लागू हुआ है तब से हमने देखा है की शिक्षा की दुर्दशा केवल सरकारी स्कूलों के छात्रों के लिए ही हुई है और उनका पढ़ाई में स्तर वास्तव में गिरा है यह सोचने वाली बात है की शिक्षा के अधिकार अधिनियम के सभी प्रावधान प्राइवेट स्कूलों में भी लागू होते हैं परंतु उधर पर इतनी बुरी स्थिति नहीं है बल्कि इस अधिनियम का फायदा उधर पर छात्रों एवं स्कूलों को हुआ है तो फिर सरकारी स्कूल शिक्षा के अधिकार को अभिशाप क्यों मानते हैं यहां पर सबसे गंभीर प्रश्न यही है की जो चीज निजी क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर रही है वही शासकीय क्षेत्र में प्रभावहीन क्यों है.      जहां तक मेरा मानना है तो शासकीय क्षेत्र में शिक्षा का स्तर गिरने की सबसे बड़ी वजह शिक्षा का अधिकार अधिनियम का पालन सरकार के द्वारा अभी तक स्वयं नहीं किया जाना है ना तो सरकारों ने अधिनियम के अनुसार विद्यालयों का सेटअप बनाया नाही शिक्षकों को उचित प्रशिक्षण दिया और ना ही विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक भेजें बल्कि इसके उलट जो विद्यालय पहले अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे उधर पर भी शिक्षकों को जाति प्रमाण पत्र आधार कार्ड मैपिंग रजिस्ट्रेशन स्वच्छता अभियान led वितरण मध्यान भोजन आदि में उलझा दिया और विचारा शिक्षक चाह कर भी विद्यार्थियों को शिक्षित नहीं कर सका इसके अतिरिक्त नाम न काटने की बाधा एक ऐसी समस्या है जिससे पलायन करने वाले छात्र जबरदस्ती उसी विद्यालय में दर्ज रह जाते हैं और विचारा शिक्षक उनका नाम जबरदस्ती क्लास दर क्लास आगे बढ़ाता रहता है मेरे हिसाब से इस अधिनियम में एक दो चीजों को छोड़कर कोई भी बंधन शिक्षा की राह में और विद्यालय के स्तर में रुकावट नहीं डालता बल्कि बाधाओं को दूर करता है परंतु सरकारी संसाधन सीमित है और गैर शिक्षकीय कार्य भरमार है यदि संसाधन बढ़ा दिए जाएं और गैर शिक्षकीय कार्य शिक्षकों से ना कराए जाएं तो यह अधिनियम निश्चित रूप से शासकीय क्षेत्र में भी शिक्षा का स्तर सुधार देगा  


( लेखक स्वयं अध्यापक हैं  और यह उनके निजी विचार हैं ,१९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में इस  लेख को  तृतीय स्थान प्रदान  किया गया है  )

सरकारी शालाएं ही क्यों निशाना बनी ? - कुलदीप श्रीवास्तव डबरा

कुलदीप श्रीवास्तव -यहाँ एक बात मेरे मन में आती है कि सरकारी शालाएं ही क्यों निशाना बनी ..सरकार के लिए,दरअसल एक ऐसा समय भी था जब शिक्षा प्राप्त करना एक विशेष वर्ग के लिए ही सुनिश्चित था सेवा कार्य करने वाले लोगो के लिए शिक्षा प्राप्त करना टेडी खीर थी ...तब तक यह भी था सरकारी शालाओ में इतनी व्यवस्था ख़राब नही रही शिक्षको को भी उचित सम्मान और सुविधाये मिलती रही समस्या तब से शुरू हुई है जब शिक्षा को मौलिक अधिकारो में शामिल कर लिया गया अब हर वर्ग को शिक्षित करना राज्य और संघ की जिम्मेदारी हो गई यहाँ से आप देखते है नीतिओ में बदलाव कैसा है
        स्कूलो में मध्यान्ह भोजन निशुल्क पुस्तके और अन्य सुविधाये विशेष वर्ग को छात्रवृतिया और सरकारी नुमाइंदे प्रयोग पर प्रयोग करने लगे यहाँ तक कि शिक्षक अब शिक्षक नही रहा उसके कई नाम कर दिए और सुविधाये समय दर समय कम होती गई अब सरकार ने यह पूरी तरह से मान ही लिया कि सरकारी विद्यालय में केवल निर्धन मजदूर किसान आदि के बच्चे पढ़ते है योजनाये भी वैसे ही अपना आकार लेने लगी है और तब ख़ास वर्ग के बच्चों की शिक्षा हेतु निजी विद्यालयो की आवश्यकता महसूस हुई और धड़ल्ले से मान्यताये मिलने लगी और खुल गई दुकाने शिक्षा की पर यहाँ हो सकता है कुछ अध्यापक अपवाद हो सकते है पर अध्यापक आज भी पढ़ाना ही चाहता है पर सच्चाई तो यही है कि ये सरकारें नही चाहती है कि विद्यालयो में ऐसा कुछ हो उन्हें अपने वोट बैंक पर खतरा नजर आता होगा शिक्षा और निर्धन के बीच दूरी बनी रहे यही सोच के साथ काम कर रही है सरकारें और तभी तो अल्प वेतन विना सुविधाओ वाले अध्यापको को सरकारी काम से लाद कर घोड़े की तरह दौड़ाने का प्रयास कर रही है सरकार
   परिणाम अपेक्षित कभी नही आयेगे . इसी सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश कोर्ट ने शिव भाई की याचिका पर निर्णय दिया था कि अधिकारियो के बच्चों को सरकारी विद्यालयो में पढ़ाना चाहिए ...सब सरकार चुप्पी साध के बैठ गई

( लेखक स्वयं अध्यापक हैं  और यह उनके निजी विचार हैं ,१९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में इस  लेख को  तृतीय स्थान प्रदान  किया गया है  )

कविता @ शिक्षा का निजीकरण -विवेक मिश्र नरसिंहपुर

शिक्षा के निजीकरण- व्यवसायीकरण की हो चुकी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, राजनेताओं, अधिकारियों के बोर्डिंग स्कूल चलाने की यह कूटनीतिक तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षण, परिवहन और उच्च शिक्षा हेतु लोन व्यवस्था कर बच्चों के पालकों को लूटने की फिर से तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
कापी-किताबें, पेंट-शर्ट, टाई-बैच, बस्ता-बेल्ट, जूते - मोजे,महंगे और चिन्हित दुकान से ही खरीदवाने की तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
स्वयं के, परिजनों के और खासम-खासों के बच्चों को. स्वयं के स्कूलों में पढ़ाकर आगे बढ़ाने की कूटनीतिक तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
बोर्डिंग स्कूल, हाॅस्टल सुविधा, समर कैंप, एक्स्ट्रा क्लासेस, पिकनिक विजिट की महिमा न्यारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
दूध, एमडीएम, साइकिल, गणवेश, छात्रवृत्ति, लेपटाप देने के बाद भी छात्रसंख्या में कमी जारी है....
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
२५ प्रतिशत वंचित समूह के बच्चों को निजी शालाओं में भर्ती कराकर सरकारी स्कूल बंद कराने की कूटनीतिक तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
यही नहीं, इन २५ प्रतिशत बच्चों पर व्यय होने वाली सरकारी राशि भी ठिकाने लगाने की पूरी कूटनीतिक तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजी स्कूलों में अमीर- गरीब बच्चों के लिए भेदभावपूर्ण दोहरी शिक्षाव्यवस्था और मापदंड अपनाने की पूरी हुई तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
हजारों शिक्षकों और उनपर आश्रित परिवारों को बेरोजगार कर भूखा मारने की हो चुकी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
लाखों पढ़े - लिखे सुशिक्षित नौजवान पीढ़ी की रोजगार की उम्मीद पर पानी फेरने की ये तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजीकरण से गुलामी वाली मानसिकता और तानाशाही रवैया अपनाने की हो चुकी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजीकरण से शिक्षा को संविधान के मौलिक अधिकारों से पृथक करने की सुनियोजित षड्यंत्रकारी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
विवादित नीतियां और लालफीताशाही की पेंचीदियाॅं हो रहीं निःशुल्क शिक्षा पर भारी हैं...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
धर्म, सम्प्रदाय, जाति, समुदाय, आरक्षण के आधार पर उच्च शिक्षा के शिक्षण पर पाबंदी की कुटिल नीति जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजीकरण से शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार, काला धन निवेश, विदेशी पूंजी निवेश कर मुनाफाखोरी करने की तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षक, शिक्षाकर्मी, संविदा, गुरुजी, अतिथि आदि संवर्गो के माध्यम से "divide & rule" जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
राजीव गांधी शिक्षा मिशन, सर्व शिक्षा अभियान के बाद राज्य शिक्षा सेवा से वर्ल्ड बैंक की राशि ठिकाने लगाने की तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
१ली से ८वीं तक पास कराने की नीति द्वारा केवल साक्षर कर पंगु बनाने की नीति जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
"प्रतिशत सिस्टम" हटाकर "ग्रेडिंग सिस्टम"  के द्वारा मेहनती बच्चों के वास्तविक मूल्यांकन से खिलवाड़ जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षकों को शिक्षा के अतिरिक्त अन्यान्य कार्यों में लगाकर परिणाम प्रभावित होने पर बदनाम करने की तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षा के निजीकरण द्वारा इसे संविधान के मौलिक अधिकार में उल्लेखित अपनी महती जिम्मेदारी से मुक्ति पाने की तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षकों के वेतन को छोड़ RTE के सभी नियमों का कागजी आंकड़ों पर पालन कराने की लीला न्यारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षक पद की गरिमा, स्वाभिमान, मान-सम्मान को कलंकित करने की सिस्टेमेटिक तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है..
शिक्षा बेचारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
नालंदा, तक्षशिला की बर्बादी जैसी साजिश हुए, स्कूल सरकारी हैं.
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
गली, मुहल्ले, कूचों में 2 कमरों में स्कूल! मान्यता नीति न्यारी है.
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...

( लेखक स्वयं अध्यापक हैं यह कविता १९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में द्वितीय स्थान पर रही है )