Thursday, June 9, 2016

वर्तमान अध्यापक संवर्ग के परिवेश का चित्रण एक नजर में करता दृष्टान्त-सियाराम पटेल, नरसिंहपुर।

वर्तमान अध्यापक संवर्ग के परिवेश का चित्रण एक नजर में  करता दृष्टान्त
 "एक औरत थी,
जो अंधी थी,
जिसके कारण उसके बेटे को स्कूल
में बच्चे चिढाते थे,
कि अंधी का बेटा आ गया,
हर बात पर उसे ये शब्द सुनने
को मिलता था कि “अन्धी का बेटा” .इसलिए वो अपनी माँ से चिडता था . उसे कही भी अपने
साथ लेकर जाने में हिचकता था
उसे नापसंद करता था..
उसकी माँ ने उसे पढ़ाया..
और उसे इस लायक बना दिया कि वो अपने पैरो पर खड़ा हो सके..
लेकिन जब वो बड़ा आदमी बन
गया तो अपनी माँ को छोड़
अलग रहने लगा..
एक दिन एक बूढी औरत उसके घर आई और गार्ड से बोली..
मुझे तुम्हारे साहब से मिलना है जब गार्ड ने अपने मालिक से
बोल तो मालिक ने कहा कि बोल
दो मै अभी घर पर नही हूँ.
गार्ड ने जब बुढिया से
बोला कि वो अभी नही है..
तो वो वहा से चली गयी..!!
थोड़ी देर बाद जब लड़का अपनी कार से ऑफिस के लिए जा रहा होता है.., तो देखता है कि सामने बहुत भीड़ लगी है.. और जानने के लिए कि वहा क्यों भीड़ लगी है वह
वहा गया तो देखा उसकी माँ वहा मरी पड़ी थी.., उसने
देखा की उसकी मुट्ठी में कुछ है उसने जब मुट्ठी खोली तो देखा की एक लेटर जिसमे यह लिखा था कि बेटा जब तू छोटा था तो खेलते वक़्त तेरी आँख में सरिया धंस
गयी थी और तू अँधा हो गया था तो मैंने तुम्हे अपनी आँखे दे दी थी.., इतना पढ़ कर लड़का जोर-जोर से रोने लगा..
उसकी माँ उसके पास नही आ
सकती थी..
दोस्तों वक़्त रहते ही लोगो की वैल्यू करना सीखो..
माँ-बाप का कर्ज हम
कभी नही चूका सकते..
हमारी प्यास का अंदाज़ भी अलग है दोस्तों-
"कभी समंदर को ठुकरा देते है,
तो कभी आंसू तक पी जाते है..!!!
“बैठना भाइयों के बीच,
चाहे “बैर” ही क्यों ना हो..
और खाना माँ के हाथो का,
चाहे “ज़हर” ही क्यों ना हो..!!…
 उक्त दृष्टान्त वर्तमान में अध्यापक संवर्ग में व्याप्त माहौल पर  बिलकुल फिट बैठता है।राज्य अध्यापक संघ म.प्र. ठीक उसी माँ के समान मातृ संघ हैं और इसी की कोख से जन्मे कुछ नवोदित संघ ठीक उसी बेटे के समान हैं जो अपने अस्तित्व के लिए अपनी माँ से ठीक उसी तरह ईर्ष्या करते हैं जैसे उस बेटे ने  जिसके सुनहरे भविष्य की नींव में संघर्ष करते हुए अपना सर्वस्व न्योछावर करते हुए जीवन के अंतिम पड़ाव  को प्राप्त किया और वह बेटा अपनी नासमझी के चलते माँ को ईर्ष्या करता रहा और ईर्ष्या भी इतनी क़ि शिष्टाचार को भूलते हुए आपसी प्रेम, व्यवहार व पारिवारिक भाव व मर्यादाएं भी दांव पर लगाते हुए सभी सीमायें पार कर दी हैं। आज भी लगभग हमारी भी यही स्थिति है,  जो एक माँ (राज्य अध्यापक संघ) के द्वारा अपने बेटे (अध्यापक संवर्ग) के सुनहरे भविष्य के लिए किये गए संघर्ष व प्रयास को बेटे ( नवोदित संघों) के द्वारा नजर अंदाज करने के समान ही है। जैसा कि हम विगत सितम्बर 2015 से जहा से चले और आज  भी वही के वही खड़े हैं...., जागो अध्यापक ....जागो............ हम इस आधुनिकता और प्रतिस्पर्धी युग में अपने नैतिक एवं   चारित्रिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए आपसी मान मर्यादाओं का ध्यान रखकर ही कार्य करें, तब   ही हम सही मायने में अपने मूल लक्ष्य प्राप्ति की ओर अग्रसर हो सकेंगें.....।।। अध्यापक हित में जारी..,अगर आप अपने मातृ संघ को।     बेहद प्यार करते है तो इस मैसेज को इतना फैलाओ जितना तुम अपनी माँ को चाहतें हो…                  
 आपका अपना भाई-
सियाराम पटेल, नरसिंहपुर।  


वेतन मान की गणना का आदेश स्थगित होने के बाद अब क्या ? - सुरेश यादव

    सुरेश यादव  रतलाम -  अध्यापकों को 6 टा वेतनमान प्रदान करने के  गणना पत्रक ( पंचायत एवं ग्रामीण  विकास विभाग के पत्र ,एफ-131/2013/22/पं -2 ,भोपाल  दिनांक 31 मई 2016 )  के पालन पर आगामी आदेश पर रोक लग गयी है । गणना पत्रक  के स्थगन पर  तीन प्रमुख बहस चल रहीं हैं। 

        स्थगन हुआ है निरस्त नहीं हुआ ,निश्चित रूप से रोक लगायी गयी है तो जब तक यह रोक नहीं हटाई जाएगी तब तक अध्यापकों को लाभ प्राप्त नहीं होगा ,और जब लागू करने का आदेश होगा तो निश्चित रूप से कुछ सुधार भी होगा ।
        दूसरी चर्चा यह चल रही है की , पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के आदेश को स्कुल शिक्षा विभाग ने कैसे स्थगित किया  ? हमारे लिए स्कुल शिक्षा विभाग नोडल विभाग है ,हमारे सभी आदेशो की फ़ाइल स्कूल शिक्षा विभाग से ही प्रारम्भ  होती  है ।इस  लिए यह विभाग इस आदेश पर रोक लगा सकता है।
        तीसरी चर्चा है की इस रोकने वाले आदेश में विसंगति का कोई उल्लेख नहीं है, वास्तविकता यह है की आदेश का विसंगतियों के कारण पुरजोर विरोध हुआ है इसी लिए इस आदेश के पालन को रोका  गया है । सब ठीक होता तो आदेश रोका ही क्यों जाता  ।
      साथियों असलियत यह है की सरकार द्वारा 25 फरवरी 2016 ( पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग का पत्र क्रमांक एफ़ -1-31/2013/22/ पं-2 भोपाल दिनाक 25 फरवरी 2016 
) को जारी आदेश  पर स्थगन नहीं किया  गया है । सरकार ने 31 मई 2016 को जारी वेतन निर्धारण के लिए जारी आदेश पर ही रोक लगाईं है ।
       मेरे मतानुसार 31 मई 2016 के आदेश में सिर्फ इतना सा ही संशोधन कर दिया जाए की , आदेश का परिशिष्ट 1, "गणना पत्रक" परिरिष्ठ 2 " उदाहरण " को हटा देवे और ।
        
 आदेश की कंडिका " 2.4 " जो सेवा की गणना करने का कहती है इसमें सिर्फ इतना सुधार कर दिया जाए या जोड़ दिया जाए की ," वेतन मान की काल्पनिक गणना 1 अप्रैल 2007 से की जायेगी और 1 सितम्बर 2013 से सेवा पुस्तिका में दर्ज कर के नगद लाभ एक जनवरी 2016 से  प्रदान किया जाएगा ।" 2013 से वेतन मान निर्धारण के कारण हमें 7 वें वेतन मान के लिए अनावश्यक  संघर्ष नहीं करना होगा ,क्योकि आप भी जानते हैं की 7 वे वेतन मान पर वेतन निर्धारण 31 दिसंबर 15 की स्थिति में किया जाएगा । 31 दिसंबर 15 और 1 जनवरी 2016 की स्थिति काफी अंतर आसकता  है। 

        साथ ही कंडिका "2.5"  जो पदोन्नति में सेवा की गणना करने का कहती है उसे वलोपित कर दिया जाये ।क्योकि काल्पनिक वेतन की गणना ही 1 अप्रैल 2007 से की जाये तो इस कंडिका की आवश्यकता  ही नहीं है  ।
       साथियों इस प्रकार वेतन निर्धारण होने पर राज्य शासन  पर कुल 125 करोड़ प्रतिमाह का अतिरिक्त वित्तीय भार आएगा । जबकि सरकार ने अभी 1125 करोड़ का वित्तीय भार का आकलन किया है यह  वित्तीय भार तीन वित्त वर्षो का ज्ञात किया गया है ,पहला जनवरी 16 से मार्च 16 का 141 करोड़, अप्रैल 16 से मार्च 17 तक 704 करोड़ ,और अप्रैल 17 से मार्च 18 तक 280 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय  भार  आकलन किया है ।सरकार का आकलन 58 करोड़ प्रतिमाह का है और यदि सब कुछ व्यवस्थित कर दिया जाए तो 121 करोड़ प्रतिमाह । सथियो सब कुछ व्यवस्थित करने पर सहायक अध्यापक को  न्यूनतम 7000 ,अध्यापक को 4500 और वरिष्ठ अध्यापक को 5500 का लाभ होगा । सरकार सब ठीक करना चाहती है तो  इच्छा शक्ति में बढ़ोतरी करे  और अध्यापको की समस्याओ का जड़ से अंत कर  दे । -उक्त विचार लेखक के निजी विचार है। 

       

Wednesday, June 8, 2016

स्वयं के व्यय पर DEd/BEd करने पर अवकाश प्रदान करने के लिए आदेश 2010

स्वयं के व्यय पर DEd/BEd करने पर वेतन वृद्धि स्वीकृत नहीं करने के समबंध में आदेश 2011

शिक्षाकर्मी को परिवीक्षा अवधि की वेतन वृद्धि के संबद्ध में जारी आदेश 2009

अध्यापक संवर्ग को बैंक ऋण सुविधा ,CPEd/DPEd, यात्रा भत्ता ,चिकित्सा बिमा

अध्यापक संवर्ग को बैंक  ऋण सुविधा देने ,CPEd/DPEd  करने की सुविधा  देने , अध्यापक संवर्ग को यात्रा भत्ता देने, अध्यापक संवर्ग को चिकित्सा बिमा देने के लिए निकायों को  अधिकार  देने  के संबद्ध में  आदेश
सभी आदेश PDF में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें




अध्यापक संवर्ग को ग्रीन कार्ड का लाभ प्रदान करने के संबंध में

शिक्षाकर्मियों अध्यापको को आज तक जो मिला वह राजनैतिक लड़ाई और सत्ताधारियो के वोटरो के एक बड़े वर्ग के छिटकने के भय के फलस्वरूप ही मिला. -रिज़वान खान

 सम्मानीय अध्यापक साथियो
आज माननीय मुख्यमंत्री महोदय के निर्देश पर स्कूल शिक्षा विभाग ने छठे वेतनमान के नियमो का मखौल उडाता तथाकथित गणना पत्रक आदेश निरस्त/स्थगित कर दिया है. यह एक राजनैतिक निर्णय है क्योकि जो प्रशासकीय निर्णय पर भारी पड़ा. मै शुरू से लिखता रहा हू की शिक्षाकर्मियों अध्यापको को आज तक जो मिला वह राजनैतिक लड़ाई और सत्ताधारियो के वोटरो के एक बड़े वर्ग के छिटकने के भय के फलस्वरूप ही मिला.........आगे भी इसी तरह मिलेगा. अध्यापक नेतागण चाहे अपनी अलग खिचड़ी पकाने का प्रयास करे प्रदेश का आम अध्यापक सदैव साथ मिलकर लड़ा है और आगे भी लड़ेगा. रतलाम में बना मोर्चा इसका उदाहरण है. प्रदेश का राजनैतिक ने नेतृत्व अध्यापक के अंदर सुलगती आग को समय रहते ठंडा करने की कोशिश के तहद अपना ही आदेश निरस्त कर दिया है अब फिर गेंद हमारे पाले में है. हम भी रिटर्न गोल कर सकते है क्योकि अध्यापको में अनुभवी वरिष्ठ आंदोलनों में तपे तपाये गुणी लोगो की कमी नही है जो दो दशको पुराने इस आंदोलन को तार्किक परिणीति तक पहुंचाने में पूर्णतः सक्षम है.

आगे होने वाला संघर्ष किसी मांग को मनवाने के लिए नही वरन जनवरी 2016 में पूर्ण हो चुकी छठे वेतनमान की मांग को नियमानुसार लागू कराने एवं वर्षो से लम्बित तबादला नीति की न्यायोचित मांग को पूर्ण करने के लिए होगा. आज 2015 के आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी चार लाइन का छठे वेतन का आदेश हमारे पास है शासन कितना भी विलंब करे कुत्सित प्रयास करे (जो की करके देख चुका आज आदेश निरस्त किया है) अंततः छठे वेतन के नियमानुसार अध्यापको का वेतन निर्धारण उसको करना ही होगा.....मगर कब ? यही यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर शासन नही हमारे पास है. जितनी जल्दी हमारा नेतृत्व एकजुट होकर शासन को चुनौती देगा उतनी ही शीघ्रता से हमारी समस्याओ का अंत हो जाएगा.

अभी कुछ दिन पूर्व लिपिक वर्गीय कर्मचारियों की मांगो के सम्बन्ध में बनी शासकीय अधिकार संपन्न कमेटी में कर्मचारी नेता भी शामिल किये गए है पूर्व में भी अनेक कमेटियो में कर्मचारी नेताओ को सम्मिलित किया जाता रहा है. माननीय सीएम साहब सार्वजनिक मंचो से हमारे प्रति सदाशयता दिखाते है उन्होंने पूर्व में भी लीक से हटकर निर्णय लेकर हमारा हिट किया है अतः एक अधिकार सम्पन्न कमेटी बने जिसमे स्कूल शिक्षा वित्त सहित सम्बंधित विभागों के अधिकारी सहित अध्यापक प्रतिनिधि सम्मिलित हो. उक्त कमेटी अध्यापको से सम्बंधित समस्त समस्याओ पर समय सीमा में रिपोर्ट देवे. अगर शासन पर दबाव बनाकर हम इसी प्रकार समस्या निवारण कमेटी बना सके और अपने नेताओ को उसमे सम्मिलित करा सके तो हमारे नेताओ की भी परीक्षा हो जायेगी क्योकि कमेटी की कार्यवाही रिकार्ड की जाती है. कहने का आशय यह है की आगे जो भी हो निश्चित रूपरेखा बनाकर समन्वयित प्रयासों से किया जाये. इससे अध्यापक भी निश्चिन्त होकर अपना कार्य कर सकेंगे अफवाहों पर विराम लगेगा प्रशासन से रोज रोज की टकराव से बचा जा सकता है. सम्पूर्ण क्रांति के इस आंदोलनकारी माहौल में यह प्रस्ताव बहुतो को अटपटा लग सकता है किन्तु वास्तविकता यही है की हमारी माँगे चरणबद्ध रूप से ही पूर्ण हो सकती है.

2016 लगभग आधा होने को है और छह माह बाद 2017 के शुरुवाती महीनो से प्रदेश में राजनैतिक बिसात बिछने लगेगी जिसमे आगे हर निर्णय राजनैतिक लाभ हानि के दृष्टिकोण से होगा. यदि हम धैर्य रखकर योजनाबद्ध तरीके से कार्य करेंगे हमारी हर मांग पूरी हो सकती है. नियमित वेतनमान लेने के लिए 17 वर्ष प्रतीक्षा की है साल छह महीने और सही........ अगर एकता नही हुई तो विधानसभा चुनावो के पूर्व शासन अलग अलग संघो से समझौते कर दीर्घकालीन नुकसान कर देगा. पूर्व का अनुभव सबको पता है. कोई एक संघ आंदोलन करे इससे आज की परिस्तिथियो में शासन पर कोई दबाव नही बन सकता है.

आपका रिज़वान खान, सामान्य अध्यापक.

अध्यापकों के लिए छठे वेतनमान के गणना पत्रक में विसंगति के चलते इसे मंगलवार को स्थगीत कर दिया गया, अब वित्त विभाग परीक्षण के बाद विसंगति दूर कर इसे जारी करेगा।

भोपाल। अध्यापकों के लिए छठे वेतनमान के गणना पत्रक में विसंगति के चलते इसे मंगलवार को निरस्त कर दिया गया। अब वित्त विभाग परीक्षण के बाद विसंगति दूर कर इसे जारी करेगा। विसंगति से नाराज राज्य अध्यापक संघ  15  जून को भोपाल में धरना-रैली की तैयारी में हैं।
      सुसनेर विधायक मुरलीधर पाटीदार इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मिले, उधर राज्य  अध्यापक संघ के अध्यक्ष जगदीश यादव  समेत कई पदाधिकारी शिक्षामंत्री पारसचंद्र जैन से मिलने उनके निवास पर  पहुंचे।
       पदाधिकारियों ने मंत्री जैन का घेराव किया । सूत्र बताते हैं कि मंत्री जैन ने भी मुख्यमंत्री को मामले की जानकारी दी। इसके बाद मुख्यमंत्री ने गणना पत्रक निरस्त करने के निर्देश दिए हैं। ज्ञात हो कि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने कुछ दिनों पूर्व गणना पत्रक जारी किया था।
इसमें चार माह निकल गए और अध्यापकों को अप्रैल पेड मई के वेतन से छठे वेतनमान का लाभ नहीं मिल सका। मुख्यमंत्री के निर्देशों को लेकर रात करीब 8 बजे एसीएस एसआर मोहंती के कक्ष में विभाग के अफसरों की बैठक हुई जिसमें पत्रक निरस्त करने का निर्णय हो गया। हालांकि मोहंती ने कहा कि हम अपने स्तर पर परीक्षण कर रहे हैं। 

असर : 
अध्यापकों को छठे वेतनमान के लाभ के लिए और इंतजार करना पड़ेगा। 5 जनवरी को कैबिनेट ने एक जनवरी-16 से अध्यापकों को छठा वेतनमान देने का फैसला लिया था। उन्हें अप्रैल माह के वेतन से यह लाभ मिलना था, लेकिन गणना पत्रक जारी न होने के कारण अप्रैल एवं मई में छठे वेतनमान के आधार पर अध्यापकों का वेतन नहीं बनाया जा सका।

" वेतनमान गणना से संबंधित जो आदेश  जारी किया था ,उसे मुख्य्मंत्री ने स्थगित कर दिया है। सीएम ने गणना पत्रक से संबंधित फ़ाइल तलब की है ,उसका परिक्षण करने के बाद संशोधित आदेश जारी होगा। " 
पारस चन्द्र जैन ,मंत्री स्कुल शिक्षा 

" वेतनमान गणना आदेश में काफी विसंगतियां थीं। हम मांग करते हैं की वर्ष 2013 का जो आदेश था  उसी के अनुसार अन्य शिक्षकों एवं कर्मचारियों की भाँती लाभ मिलना चाहिए। सीएम को यही समस्या बताइ गयी। " 
मुरलीधर पाटीदार  विधायक सुसनेर 

Tuesday, June 7, 2016

विसंगति पूर्ण गणना पत्रक नितस्त ,जल्द संशोधित आदेश जारी होगा ।


   राज्य अध्यापक संघ ने श्री जगदीश जी यादव के नेतृत्व में शिक्षा मंत्री का किया घेराव ।। शिक्षा मंत्री को माननीय मुख्यमंत्री के नाम।ज्ञापन सौंपा । स्कूल शिक्षा मंत्री श्री पारस जैन ने अध्यापकों के वेतनमान के संबंध में 31 मई, 2016 को जारी आदेश को स्थगित कर आदेश का परीक्षण करने के निर्देश दिये श्री जैन ने कहा है कि आदेश का भलीभाँति परीक्षण करने के बाद ही उसे लागू किया जायेगा  । इसके बाद शासन ने देर शाम को 31 मई को जारी आदेश तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया है।अब परिक्षण के बाद ही आगामी आदेश होगा।
        
 उल्लेखनीय है कि   राज्य अध्यापक संघ के सरक्षक श्री मुरलीधर पाटीदार ने  आदेश के संबंध में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान   कोअपनी  आपत्तियों से अवगत करवाया था , माननीय मुख्यमंत्री जी ने तुरंत , अपने प्रमुख सचिव को को बुलाकर आधेश की विसंगतियों को सुधारने व् छटा वेतनमान शिक्षको की भाँति देने के निर्देश दिए । 

      संशोधित गणना पत्रक जारी होगा । 25 फरवरी 2016 को जारी आदेश यथावत है ।उसी आदेश में नविन वेतनमान का लाभ 1 जनवरी 2016 से देना को कहा गया है । प्रांताध्यक्ष श्री जगदीश यादव के साथ कई जिलो के प्रतिनिधि व जिलाध्यक्ष उपस्थित थे ।

    



Monday, June 6, 2016

राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा शिक्षण सत्र 2016-17 एवं आगामी वर्षों हेतु अहर्ताधारी एवं अनुभवी विशेषज्ञ प्रशिक्षको के आवेदन-पत्र का आमंत्रित किये गए हैं।

राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा  शिक्षण सत्र 2016-17 एवं आगामी वर्षों हेतु अहर्ताधारी  एवं अनुभवी विशेषज्ञ  प्रशिक्षको  के आवेदन-पत्र का आमंत्रित  किये गए हैं। इसमें कोई शासकीय  या  अशासकीय  कर्मचारी/अधिकारी अपना आवेदन प्रस्तुत कर सकता है । 

राज्य स्त्रोत ग्रुप( SRG )के लिए  स्नातकोत्तर ,PHd ,MEd ,10  वर्ष का अध्यापन अनुभव  5 वर्ष का प्रशिक्षण अनुभव आवश्यक  है।  जिला स्त्रोत ग्रुप ( DRG )के लिए  स्नातकोत्तर ,MEd/BEd , 8  वर्ष का अध्यापन अनुभव  4 वर्ष का प्रशिक्षण अनुभव आवश्यक  है। विकासखण्ड  स्तर पर मास्टर ट्रेनर  ( MT ) के लिए स्नत्कोत्तर/ स्नातक BEd , 6 वर्ष का अध्यापन अनुभव  3 वर्ष का प्रशिक्षण अनुभव आवश्यक  है। विज्ञापन का प्रारूप आप हमारे अध्यापक जगत  ब्लॉग  के इस ब्लॉग के अंत में दी गयी लिंक से प्राप्त  कर सकते हैं। आवेदन का प्रारूप इस ब्लॉग में इमेज के रूप में भी उपलब्ध है। 

शासकीय और  अशासकीय  आवेदक को अपने नियोक्ता का आपत्ति प्रमाणपत्र  अवश्य  संलग्न करना है ,राज्य स्तरीय SRG के लिए आवेदन training.rsk2012@gmail.com पर 15 जून तक  प्रेषित करने हैं जिले के लिए डाइट में आवेदन भेजना है । प्रशिक्षको को सेवाकालिन,इंडक्शन प्रशिक्षन ,गतिविधि आधारित प्रशिक्षण ,दक्षता  संवर्धन संबंधी अन्य गतिविधियों और मॉड्यूल तैयार करने के लिए तैनात किया जाएगा। 
 SRG को राज्य शिक्षा केंद्र और DRG ,MT को डाइट के साथ  अनुबंध  करना होगा। आवेदको का चयन लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के  माध्यम से होगा।  इसके अतरिक्त राज्य शिक्षा केंद्र अन्य प्रशिक्षनो में भी इन शिक्षको की दक्षता का उपयोग कर सकता हैं।
आदेश और आवेदन पीडीएफ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को।




मेडिक्लेम और क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी लेते समय इन बातो का ध्यान रखें - वसीम अहमद ( रतलाम )

        स्वास्‍थ्‍य हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण विषय है। आप किसी भी उम्र या लिंग के हों आपके लिए स्वास्‍थ्‍य का ध्यान रखना बहुत महत्वपूर्ण है आज के इस आधुनिक युग में जब कि जीवन इतना अप्रत्याशित है। बीमारियों की बात करें तो हर साल नयी बीमारियों की संख्या बढ़ जाती है और ऐसे में स्वास्‍थ्‍य बीमा योजना लेना एक उचित निर्णय है  हमारा स्वास्‍थ्‍य इसलिए सुरक्षा और सावधानी का विषय बन गया है। आपको स्वास्‍थ्‍य बीमा महंगा लग सकता है लेकिन यह सुरक्षित भविष्य का एक अच्छा विकल्प है । स्वास्‍थ्‍य बीमा योजना सामान्यत: 3 महीने से कम उम्र के बच्चों से लेकर 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए होता है। अपने खर्चे को देखते हुए आप फैमिली फ्लोटर या व्यक्तिगत स्वास्‍थ्‍य बीमा भी करा सकते हैं ।
         आयकर अधिनियम की धारा 80डी के तहत स्वास्थ्य बीमा या हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियों का प्रीमियम चुकाने पर इनकम टैक्स से छूट मिलती है। इसके तहत खुद के, जीवनसाथी, आप पर आश्रित बच्चों और अपने माता-पिता के लिए ली गई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी पर एक साल में अधिकतम 15,000 रुपए तक के प्रीमियम भुगतान पर टैक्स छूट प्राप्त है। अगर आप अपने माता-पिता का भी हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम चुका रहे हैं, चाहे वे आप पर आश्रित हों या नहीं, तो आपको अतिरिक्त 15,000 रुपए यानी कुल 30,000 रुपए पर छूट मिलेगी। वरिष्ठ नागरिकों के हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम में छूट 20,000 रुपए तक है। अगर आपके माता-पिता वरिष्ठ नागरिक हैं, तो आपको कुल 35,000 रुपए और यदि आप भी वरिष्ठ नागरिक हैं, तो हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर कुल 40,000 रुपए पर इनकम टैक्स से छूट मिलेगी।
     
 हेल्थ इंश्योरेंश दो प्रकार के होते है सामान्य  और क्रिटिकल इलनेस
सामन्य पॉलिसी 

      एक बुनियादी स्वास्‍थ्‍य बीमा चिकित्सा का शुल्क‍, दवाओं का खर्च, चिकित्सा जाँच, अस्पताल के कमरे और दूसरे खर्च को कवर करता है । आपकी ज़रूरतों के अनुसार यह आपको सुरक्षा प्रदान करता है ,इनसे गंभीर बीमारियों और हृदय के दौरे जैसी समस्याओं को कवर मिलता है । बहुत सी बीमा कंपनियां गंभीर बीमारियों की स्थिति के लिए योजनाएं देती हैं ।डायबिटीज़ और कैंसर जैसी बीमारियों को कवर करने के लिए कुछ विस्तृत रूप से बीमा योजनाएं दी जाती हैं । ऐसी योजनाएं सर्जिकल चिकित्सा‍ और अस्पाताल में भर्ती करने के खर्च को भी कवर करती हैं ।

क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी 
       
 हॉस्पिटल और हेल्थकेयर के खर्च आजकल बढ़ते ही जा रहे हैं। इसके चलते ये सुविधाएं आम आदमी के दायरे से बाहर होती जा रही हैं। खासतौर पर हार्ट अटैक, आर्टरी की बीमारियां, किडनी फेल्यूअर, कैंसर या स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारी होने पर इलाज का खर्च बहुत ज्यादा हो जाता है। कोई भी इस तरह की गंभीर बीमारी होने पर न सिर्फ परिवार की आय बंद हो जाती है, बल्कि लाइफ स्टाइल में भी कई बदलाव आते हैं। कई लोगों का तो शरीर ही काम करना बंद कर देता है। कई बार इन बीमारियों के इलाज का खर्च इतना ज्यादा होता है कि यह हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी से भी कवर नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में जनरल इंश्योरेंस कंपनियों की तरफ से दी जाने वाली क्रिटिकल इलनेस इंश्योरेंस (गंभीर बीमारियों का इंश्योरेंस) पॉलिसी बहुत काम आती है।

मेडिक्लेम और क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी में अंतर     मेडिक्लेम पॉलिसी एक तरह हॉस्पिटल के खर्च उठाने वाली पॉलिसी है। इसमें ग्राहक के चुने हुए सम इंश्योर्ड के हिसाब से हॉस्पिटल में हुए इलाज का खर्च मिलता है। मतलब 2 लॉख की पॉलिसी ली है तो आपको उतना खर्च मिलेगा। क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी में मरीज अगर पहले से तय बीमारी की शर्तों को पूरा करता है तो उसको इंश्योरेंस का सारा पैसा इकट्ठा मिल जाता है। इसका हॉस्पिटल के खर्च और इलाज से लेना देना नहीं है। इस पैसे को ग्राहक किसी भी तरह उपयोग कर सकता है। सीधे शब्दों में किसी को अगर कोई गंभीर बीमारी हो गई है तो इंश्योरेंस कंपनी सम अश्योर्ड का पूरा पैसा मरीज को दे देगी। मरीज अपने हिसाब से उस पैसे का उपयोग कर सकता है।
     मेडिक्लेम पॉलिसी में कई तरह की बीमारियों का इलाज होता है। जबकि क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी में कुछ गंभीर बीमारियां तय हैं इन्हीं का इंश्योरेंस होता है। इसमें कैंसर, आर्टरी बायपास सर्जरी, पहला हार्ट अटैक, किडनी फैल्युअर, बड़े अंगों का ट्रांसप्लांट, स्केलेरोसिस, स्ट्रोक अरोटा ग्राफ्ट सर्जरी, लकवा, ब्रेन ट्यूमर, कोमा, अंधापन, पार्किनसंस और अल्जाइमर जैसी बीमारियां शामिल हैं। अलग-अलग इंश्योरेंस कंपनियां कई तरह की दूसरी बीमारियों को भी कवर करती हैं। इस पॉलिसी में क्लैम लेने के लिए हॉस्पिटल में भर्ती होना जरूरी नहीं है। अधिकतर इंश्योरेंस कंपनियां बीमारी का पता चलते ही क्लैम दे देती हैं। मेडिक्लेम में कंपनी नेटवर्क हॉस्पिटल में कैशलेस की सुविधा देती है। वहीं बिना नेटवर्क वाले हॉस्पिटल में इलाज के खर्च को रिइंबर्स किया जाता है।
मेडिक्लेम में पॉलिसी में 3 महीने का वेटिंग पीरियड रहता है जबकि क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी में 30 दिन का होता है।
 क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान
        पॉलिसी में इंट्री की उम्र जितनी ज्यादा होगी आपके लिए ये उतना फायदेमंद होगा। इससे आपको अधिक उम्र में भी पॉलिसी खरीदने की सुविधा मिलती है।
      इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदते समय पॉलिसी रिन्यूअल की उम्र को भी देखें। ये उम्र जितनी ज्यादा होगी आपको उतना फायदा होगा। अगर कोई कंपनी रिन्यूवल की उम्र साठ साल या कम रखती है तो शायद वो पॉलिसी कई लोगों के काम न आएं क्योंकि कई गंभीर बीमारियां इस उम्र के बाद भी होती हैं।
          क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी का सम इंश्योर्ड ( बिमा राशि ) आपकी सालाना कुल आय का डेढ़ से 2 गुना होना चाहिए। मतलब अगर आपकी सालाना आय 4 लाख है तो आप कम से कम 6 लाख या 8 लाख की पॉलिसी लें।   इस तरह की पॉलिसी में एक सर्वाइवल पीरियड भी रहता है। मतलब बीमारी होने के बाद कितने दिन जीवित रहने पर क्लैम मिलेगा। सामन्य तौर पर अलग अलग कंपनियों में ये समय 1 से 6 महीने का होता है।

क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी में टैक्स छूट का फायदा भी मिलता है।

     
      पॉलिसी में फ्री लुक पीरियड जितना ज्यादा होगा उतना ही अच्छा रहेगा। अगर आपको पॉलिसी पसंद नहीं आती है तो इस समय में आप पॉलिसी लौटा सकते हैं।क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी में जितनी ज्यादा बीमारियां कवर होंगी उतना ही पॉलिसी लेने वाले के लिए फायदेमंद रहता है।

इस पॉलिसी का कवर वेटिंग पीरियड खत्म होने के बाद ही शुरू होता है। वेटिंग पीरियड जितना कम होगा उतना ही अच्छा रहता है। कई कंपनियों में 4 साल तक का वेटिंग पीरियड होता है।

  कौन सी चीजें पॉलिसी में शामिल नहीं होतीं
       हर क्रिटिकल इलनेस इंश्योरेंस पॉलिसी सभी गंभीर बीमारियों को कवर नहीं करती हैं। कई बीमारियां पॉलिसी से बाहर भी होती हैं आमतौर पर सारी बड़ी बीमारियां इसमें कवर होती हैं। लेकिन कुछ सामन्य चीजें जो पॉलिसी से बाहर होती हैं। इसका मतलब ये होने पर क्लैम की रकम नहीं मिलेगी।

बिना मेडिकल के आधार पर ये बातें बाहर रहती हैं।

युद्ध या युद्घ की स्थिति
कानून तोड़ना (आत्महत्या भी शामिल)
खतरनाक गतिविधी में शामिल होना (जैसे की मिलिट्री एक्सरसाइज और खेल गतिविधि)
इन आधार पर होने वाली बीमारियों पर क्लेम नहीं मिलेगा
अत्यधिक शराब पीना और नशा मुक्ति कार्यक्रम का हिस्सा बनने पर
जन्मजात और जेनेटिक बीमारियां
कोई भी बीमारी जो एचआईवी संक्रमण से जुड़ी हो या एड्स
कोई भी इलाज जो गर्भावस्था से जुड़ा हो। इसमें गर्भपात और बच्चे के जन्म देने जिसमें सिजेरियन डिलेवरी भी शामिल है।


ध्यान रखें

आजकल की लाइफस्टाइल को देखते हुए कई तरह की बीमारियों के होने का खतरा पैदा हो गया है। कई बीमारियां जो पहले बुढ़ापे में होती थी आजकल युवाओं में भी हो रही हैं। इसका कारण ज्यादा काम के घंटे, तनाव, एक्सरसाइज का अभाव, खानेपान की अनियमित आदतें, जंक फूड, शराब और धूम्रपान है। आज की तनावभरी लाइफस्टाइल में मेडिक्लेम के साथ क्रिटिकल इलनेस कवर भी बहुत जरूरी है। ये पॉलिसी सभी जनरल इंश्योरेंस कंपनियां बेचती हैं। आज कल कई कम्पनी आप को मेडिक्लेम में दोनों तरह की  बिमा योजना साथ में भी उपलब्ध करवा रहे हैं। इस लिए सोच समझ कर ही स्वास्थ्य  बिमा पॉलिसी खरीदे। 

लेखक  श्री  वसीम  अहमद  (  रतलाम  )  वित्तीय  प्रबंधन   के  जानकार  है  व   AMFI  प्रमाणित वित्त   सलाहकार  हैं 

एक अध्यापक के मन में उपजने वाली जिज्ञास - राशी राठौर देवास

राशी  राठौर  देवास
         क्या हम सिर्फ और सिर्फ एक बार में ही इतना विशाल आंदोलन नहीं कर सकते की एक ही बार में अध्यापकों की सारी समस्याओं का समाधान हो जाए ताकि बाकी की बची नोकरी में हम अच्छे से बच्चों को पढा सकें और अपना जीवन भी आराम से गुजर सकें।बार बार आंदोलन करके ऐसा लगने लगा है कि हम अध्यापक कम आंदोलनकारी ज्यादा हैं।कई बार हम आंदोलनों के माध्यम से निर्णायक स्थिति में पहुँच जाते है और ऐन वक़्त पर हमारी आधी अधूरी मांगो पर समझोता हो जाता है। आधी मांगे हम अगले आंदोलन के लिए छोड़ देते हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है की सरकार सब कुछ देना चाहती है लेकिन हम शायद उसके सही हक़दार नहीं है। पंक्ति का आखरी अध्यापक अपना वेतन कटवाकर जोर शोर से आंदोलन करता है और शीर्ष से आधी अधूरी मांगों पर सहमति बनकर आंदोलन ख़त्म करने का फरमान आ जाता है।विसंगति युक्त गणना पत्रक से उन अध्यापकों को सबसे ज्यादा नुकसांन हो रहा है जो केवल अध्यापकीय नौकरी से ही आँक्सीजन ले रहे है।जिनके पास आँक्सीजन के दूसरे विकल्प है उन्हें इस गणना पत्रक से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अध्यापकों के सामने सबसे बड़ी चुनोती अध्यापक नेताओं के चयन की है।अध्यापकीय नेता बनने की कोई निर्धारित योग्यता तो है नहीं और न हीं कोई चुनाव प्रक्रिया है जिसका मन चाहे,जिसकी राजनीती में अच्छी पकड़ हो, जो आर्थिक रूप से सक्षम हो,जो महत्वाकांक्षी हो या शीर्ष नेता द्वारा अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया हो,ऐसे लोग अध्यापकीय नेता बनकार अध्यापकों को गुमराह करते है और संघ संघ खेलकर अपने वर्चस्व हेतु अध्यापकों की एकता में बाधा बनते हैं।अध्यापकीय नेताओं द्वारा अध्यापकों की सेवा करने का उद्देश्य तो धरा के धरा रह जाता है। रही बात आम अध्यापक की तो उसमे उपरोक्त गुण नहीं होते है इसलिए वो मजबूरी में दूसरों के इशारों के गुलाम हो जाते है।
     " एक बार दिल से जिद करो दुनिया बदलो। "

नहीं तो जो परम्परा पिछले 20 साल से चलती आ रही है वही चलती रहेगी।वोट देते रहो और सरकार बनाते रहो और शोषित होते रहो।  

लेखिका स्वयं अध्यापक हैं ।और यह उनके निजी विचार हैं ।

Sunday, June 5, 2016

रतलाम में अध्यापक महासंघ के गठन का ऐतिहासिक निर्णय

                 आज रतलाम जिले में सभी अध्यापक संघो के अध्यक्षगण पदाधिकारीगण एवम् समस्त अध्यापक पूर्व नियोजित कार्यक्रम अनुसार बैठक में उपस्थित हुए सभी ने एकमत होकर निर्णय लिया की ," जब तक प्रांत के सभी संघ एक मंच पर नही आते तब तक रतलाम जिले के समस्त अध्यापक संघ किसी भी संघ के प्रांतीय निर्णय का पालन नही करेंगे और रतलाम जिले का अपना कार्यक्रम सर्वानुमति से स्थानीय स्तर पर तय करेंगे और जिला स्तर पर अपना कार्यक्रम तय किया जाएगा   "  

       साथ ही  " यह निर्णय भी लिया गया की किसी भी प्रकार से  शोष्यल   मिडिया ,प्रत्य्क्ष या अप्रत्य्क्ष  रूप से  किसि भी संघ - संगठन और नेता के विरुद्ध कोई नकारात्मक टीपन्नी नहीं करेगा  न ही कॉपी पेस्ट कर के आगे बढ़ाएंगे  पिछली घटनाओं पर नकारात्मक टिपण्णी नहीं करेंगे या चर्चा नहीं करेंगे। '' 
             जिलास्तर पर आगामी रणनीति  पर 9 जून  को सायं काल 5 बजे " गुलाब चक़्कर  " पर बैठक कर के तय कर  की जायेगी--!!
अध्यापक महासंघ 
जिला रतलाम 



अशासकीय विद्यालयों के धंधे लिप्त शासकीय शिक्षक - एक अध्यापक

अशासकीय विद्यालयों के धंधे लिप्त शासकीय शिक्षक
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पिछला सत्र सभी शासकीय विद्यालय मै गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा वर्ष के रूप मै मनाया गया है। सरकार भी मुक्त हाथों से धनराशी प्रदान कर गुणवत्ता सुधारने के लिए  पुरजोर प्रयास कर रही है। प्रत्येक छात्र को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। किन्तु शासन के इन मन्सूबो पर शासन के द्वारा ही नियुक्त शिक्षक, अध्यापक, संविदाशिक्षक ही पानी फेर रहै है। ये शिक्षक पदस्थापना वाले विद्यालय की अपेक्षा स्वयं के विद्यालय को अधिक समय देते है। अपने निजीविद्यालय का संचालन ये स्वयं ही करते है। पदस्थापना वाली शाला का समय चुराकर स्वयं की निजीशाला के शिक्षण से लेकर प्रबन्धन तक के सभी कार्यों को अन्जाम ये शासकीय शिक्षक ही देते है।यही नही ये सब शिक्षा विभाग के नाक के नीचे ही चल रहा है। हद तो तब हो जाती है जब समय समय पर होने वाली बैठक जिसमै अशाशकीय शालाओ के लिऐ शासकीय अमले समय समय पर दिशा निर्देश जारी करने हेतु बैठक लेते है।, ये बैठक शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों द्वारा ली जाती है। ऐसी बैठको मै भी स्वयं के निजी शाला के संचालक के रूप मै ये शासकीय शिक्षक बडी शान से शिरकत करते है और आला अधिकारी चुप रहते है। यही नही इनकी निजी शाला के विज्ञापन तक मै ये अपना नाम गर्व से अंकित करवा शासन के नियमो को अंगूठा तक दिखाते है। शासन को ऐसे शिक्षको को चिन्हित कर इनकी पदस्थापना इनके अशासकीय विद्यालय से दूर करनी चाहिए व इस दिशा मै उचित कदम उठा देश के गरीब नोनिहालो का भविष्य सुरक्षित करना चाहिए।
लेखक के कहने पर नाम सार्वजानिक नहीं किया जा रहा है ।लेखक एक अध्यापक हैं।

राज्य अध्यापक संघ के संरक्षक श्री पाटीदार ने गणना पत्रक निरस्त करने की मांग की

    राज्य अध्यापक संघ के संरक्षक और सुसनेर के माननिय विधायक श्री मुरलीधर पाटीदार ने अध्यापक सवर्ग के लिए जारी 6 टवा वेतनमान के विसंगतिपूर्ण गणना पत्रक को निरस्त करने की मांग प्रदेश के मुख्यमंत्री से की है ।
    श्री पाटीदार ने अपने पत्र में कहा है की वर्त्तमान में जारी आदेश किसी भी प्रकार से शिक्षक के समान नहीं है और इस आदेश में 6 टा वेतन मान के सिद्धान्तों और नियमो  का उल्लंघन किया गया है ।
     श्री पाटीदार ने अपने पत्र में कहा है की इस आदेश में अंतरिम राहत के लिए जारी आदेश की अवहेलना भी की गई है ।
      श्री पाटीदार ने अध्यापको में व्याप्त आक्रोश से भी मुख्यमंत्री  को अवगत करवाया है ।


सरकार वास्तविक लाभ क्यों नहीं देना चाहती अध्यापको को - रिजवान खान बैतूल


कुछ अंदर की बाते.........

रिजवान खान -  वर्षो से पीड़ित संवर्ग से इंतिहा की हद तक दुश्मनी का क्या कारण हो सकता है जबकि विधायक मंत्री यहाँ तक की मुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से हमारे पक्ष में बयान देते है ? इसी यक्ष प्रश् का उत्तर और कारणों की पड़ताल में कुछ अनदेखे अनसमझे पहलू उजागर हुए है जिसमे से एक रोचक पहलू पर गौर करे........... 

वरिष्ठ वेतनमान से जुड़ा एक तथ्य जो हमारे वेतन निर्धारण में सबसे बड़ी रुकावट बन रहा है वह यह की हमारे 1998 2001 और 2003 के वरिष्ठ अध्यापक भाइयो को नियमानुसार नियमानुसार छठे वेतन निर्धारण के फलस्वरूप क्रमोन्नत हाई स्कूल प्राचार्य का वेतनमान और ग्रेड पे मिल जायेगी जो की एक संवर्ग विशेष बिलकुल नही चाहता. क्योकि जब वेतनमान और ग्रेड पे मिल जायेगी तो राजपत्रित अधिकारी का दर्जा भी देना होगा.......फिर ddo पॉवर का मामला.......फिर dpi में मलाईदार पदों पर नियुक्ति .................राज्य शिक्षा केंद्र में बड़े पदों पर नियुक्ति........ जनपद ceo जैसे पदों पर प्रतिनियुक्ति का मामला........... ऐसे

बहुत से दरवाजे बन्द करने की साजिश है.
अध्यापक सुचना क्रांति के युग में कंप्यूटर लेपटोप स्मार्टफोन से लैस है. बड़ी संख्या में pgdca bca mca यहाँ तक की सॉफ्टवेयर इंजीनियर तक हमारे संवर्ग में भरे पड़े है. अब चुनाव में sms भी ना कर सकने वाले हमारा रास्ता रोकने में लगे है. आज अध्यापक की योग्यता ही उसके रास्ते में रुकावट बन रही है.

लेखक खेल अनुदेशक ( अध्यापक ) हैं और यह उनके निजी विचार है

18 सालों में अध्यापक नहीं समझेे सरकारी भाषा - वीरेंद्र कुमार पटेल,शहडोल

वीरेंद्र कुमार पटेल/शहडोल। छठे वेतन का गणना-पत्रक जारी होने के बाद अध्यापकों में हाहाकार मचा हुआ है। 31 मई के पूर्व तक गणना-पत्रक का बेसब्री से इंतजार कर रहे अध्यापक अब गणना-पत्रक जारी होने का मातम मना रहे हैं। जहां अध्यापकों ने अपने वेतन बढ़ने की उम्मीदें लगा रखी थीं, वहां वेतन बढ़ना तो दूर उलटे वेतन कम कर दिया गया है। यदि अध्यापकों की राय मानें तो कुछ अध्यापकों के वेतन में 5000 रुपए तक की कमी आ जाएगी।
यदि छठा वेतन निर्धारण से अध्यापकों के वेतन में कमी आती है तो निश्चित रूप से सरकार का यह तुगलकी फरमान किसी अत्याचार से कम नहीं है परंतु इसके पीछे अध्यापक भी कम दोषी नहीं हैं।
यदि आप छठे वेतन की घोषणा के बाद अध्यापकों की गतिविधियों पर नजर डालें तो यह बात साफ हो जाएगी। अध्यापकों ने स्वयं मुख्यमंत्री से बात करने के बजाय मध्यस्थ का सहारा लिया जिसे उसके बाद सरकार की ओर से पारितोषिक भी प्रदान किया गया। हर अध्यापक जानता था कि सरकार आदेश में ही सारा खेल खेलती है फिर भी अध्यापकों ने मात्र घोषणा पर जश्न मनाना शुरू कर दिया। मुख्यमंत्री के साथ मंच पर बैठने और फोटो खिंचवाने की अभिलाषा ने आदेश में खेले जाने वाले खेल से ध्यान हटा दिया। पूरे मध्यप्रदेश में ऐसा जश्न मनाया गया कि विरोध की कोई गुंजाइश नहीं रही। जो काम सरकार को करना था वह काम खुद अध्यापकों ने कर दिया।
एक संगठन ने तो मुख्यमंत्री का अभिनंदन समारोह तक करने की तिथि घोषित कर दी किन्तु बाद में अपनों के विरोध के चलते कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा।
सवाल यह है कि क्या सिर्फ मुख्यमंत्री के साथ फोटो खिचवाने या उसके बाजू में बैठने के लिए आंदोलन किए जाते हैं या फिर उसका सरोकार अध्यापक हितों से भी होता है। यदि आंदोलन का सरोकार अध्यापक हित है तो फिर बिना कुछ मिले और आदेश के गहन अध्ययन के अध्यापक सरकार के पक्ष में चले क्यों जाते हैं। अध्यापकों का गुस्सा स्थिर रूप से टिक क्यों नहीं पाता है?
अब इस गणना-पत्रक में संशोधन के लिए आंदोलन किया जाएगा किन्तु अध्यापक अब हर हाल में नुकसान में है। हो सकता है सरकार गणना-पत्रक की गलतियां सुधार भी दे परंतु तभी शासकीय कर्मचारियों को सातवा वेतन दिया जाएगा। यदि अध्यापक गणना-पत्रक में संशोधन से ही खुश हो जाते हैं तो उनके सातवे वेतनमान की बलि चढ़ना तय है। इसके साथ ही आगामी चुनाव पूर्व आंदोलन में शिक्षा विभाग में संविलियन की मांग प्रमुखता से उठाई जाती किन्तु यहां तो मामला छठे वेतन का ही अटका पड़ा है और ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इसमें सुधार के बाद माला पहनाने की कतार में खड़े न हो जाएं। कुल मिलाकर 18 वर्षों के संघर्ष से अध्यापक कुछ नहीं सीख पाया , सिवाय मुख्यमंत्री का कृपापात्र बनने के।

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है और स्वतन्त्र टिपण्णीकार है  यह लेखक  के निजी विचार हैं।


एक दुसरे के आंदोलनों की निंदा की बजाय प्रसंशा करके भी एका कायम रखी जा सकती है - डी के सिंगौर

डी के सिंगौर - चाहे आप और लड़कर 6th pay पूरा ले लें....7th pay ले लें और शिक्षा विभाग में सम्विलियन भी करा ले पर इतना तो समझ आ गया होगा कि सरकार से लड़ना क्या होता है और राज्य अध्यापक संघ 21 सालों से सरकार से लड़ता रहा है और आज तक जो भी पाया है वह कैसे मिला होगा ,समझा जा सकता है।  खाली झोली लेकर लड़ना और बात है और
झोली में कुछ आ जाता है तो फिर लड़ना और बात है शुक्र है शिवराज जैसे CM  से ही पाला पड़ा दिग्गी राजा से लड़ते तो और समझ आता।  पाटीदार जी के MLA  बनने से हमें आपत्ति इसलिये नहीं है कि हमने उन्हे बहुत शुरू से शिक्षा कर्मियों के लिये लड़ते देखा है और लड़ना सीखा है उनके परिश्रम का सुफल उन्हें मिला अब उनके बगैर लड़ना हमे सीखना पड़ेगा।  सरकार ने पिछले 9  महीनों में जिस तरह से अध्यापकों को छकाया,नचाया,घुमाया,सताया,तरसाया.......उससे ;यही सिद्ध  होता है कि मुख्यमंत्री छल और प्रपंच में माहिर हैं और यह व्यवहार शिक्षा जैसे उत्कृष्ट कार्य में लगे कर्मचारियों के साथ किया जाना उनकी संवेदनशीलता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है , अब एक बार फिर इस छल और प्रपंच के विरोध में अध्यापक सड़कों पर आ रहे हैं अध्यापक संगठनों के एका की बात आम अध्यापक कर रहा है एक होना उतनी बड़ी बात नही है जितनी मांग पूरी होते तक एक बने रहना।  क्योकि इसका अनुभव बहुत अच्छा नही रहा है उन अनुभवों से सबक लेकर के साथ चलने की कोशिश करनी पड़ेगी एक न हो सके तो मांगपत्र (विस्तृत) तो बैठकर एक बनाया जा सकता है जब मांगपत्र एक होगा तो धीरे धीरे एका भी होने लगेगा एक दुसरे के आंदोलनों की निंदा की बजाय प्रसंशा करके भी एका कायम रखी जा सकती है।  एका को लेकर आम अध्यापक बहुत चिंतित दिखाई दे रहा है उसकी चिंता दूर करना अध्यापक नेताओं का काम है हालाकि एका की बाते अभी मात्र ओपचारिकता ही समझ आ रही है क्योकि लोगो को दिखाने मात्र के लिये सोशल मीडिया में एका की बाते की जा रही है सीधे संवाद स्थापित नही किया जा रहा है अंत में सार की बात लड़ाई लड़ी जाये तो सही रणनीति के साथ।  आन्दोलन में कई बड़ी कमियाँ रही है जिसका नतीजा सामने है।  अब तक श्रेय के लिये लड़े पर कुछ भी श्रेय नही मिला अब एक बार श्रेय की होड़ छोड़ के लड़कर देखे जरुर श्रेय मिलेगा
लेखक मंडला में वरिष्ठ अध्यापक है और उनके निजी विचार है। 

Saturday, June 4, 2016

आखिरकार वर्चस्व की लड़ाई में हार गया अध्यापक एक आम अध्यापक - मनीष पंवार झाबुआ

आखिरकार वर्चस्व की लड़ाई में हार गया अध्यापक एक आम अध्यापक  के वह सब सपने नेस्तनाबूद हो गए जो उसने गणना पत्रक को लेकर लगाये थे,सब सपने धूमिल हो गए जो उसने बंद आँखों से देखे थे में यह नहीं कहता हु की सपना नहीं देखना चाहिए परन्तु मेरे भाई लोगो ने उन तमाम नेताओ की बातो पर विस्वाश कर सपने देखे जो सिर्फ और सिर्फ अपनी रेटिंग बढ़ाने में लगे थे और यह सब हुआ आम अध्यपको की आम खीचतान और आपसी मतभेद से वो तमाम बाते तक कही गई सोशल मिडिया पर जो हम मुँह से बोलने में शर्म महसूस करे।परन्तु सब कहा गया लोगों ने शेयर किया और यह तमाम खीचतान की बाटे cid के माध्यम से प्रशासन तक पहुची और प्रशासन ने इसीका फायदा उठाया और जो हुआ सब आपके सामने हे। 2 लाख 80 हजार अध्यापक और तेरह संगठन तेरह संगठन के हवा हवाई नेता जो सिर्फ और सिर्फ अपने गणित ज्ञान में व्यस्त और इसी गणित में कैसे किस संगठन के नेता को निचा गिराये इन तमाम प्रयासों में ये यह सब भूल गए की अब जो होने वाला हे वो सब की ताबूत में आखरी कील ठोकने का काम करेगी अब अध्यापक सजग हो गया हे अब वो बहकाने में नहीं आएगा।मेरी उन तमाम साथियो से भी गुजारिश हे जो सिर्फ स्वार्थ शिद्धि और पाटीदार के विरोध में बोलते या लिखते रहते हे पाटीदार जी जो किया वह सबके सामने हे परन्तु सिर्फ पाटीदार जी का विरोध यह समझ से परे हे ,यह तो किस्मत की बात हे पाटीदार चुनाव जित गए और विधायक बन गए परन्तु हार जाते तो क्या होता इस पर किसी ने विचार नहीं किया ।में अब सभी साथियो से यही कहना चाहता हु की आपस के मतभेद और मनभेद खत्म करे सभी अपना अपना बेनर एक कोने में रखे और सिर्फ अध्यापक संघर्ष समिति बनाकर मैदान में उतर जावे ।अब अंतींम एवम् निर्णायक समय हे अगर हमने यह समय गवा दिया तो न संघ रहेंगे न इन संघो की राजनीति करने वाले नेता,इसलिए अपने अहम एवम् अपने स्वार्थ को तिलांजलि दे कर सिर्फ और सिर्फ अध्यापक हित की सोचे लाखो परिवार आपको दुआए देंगे।और उन तमाम साथियो से भी निवेदन करना चाहता हु की अपने अध्यापक होने के सबूत दे किसी भी ग्रुप में किसी भी प्रकार की अनर्गल बयान बाजी न करे एवम् शिष्टाचार एवम् शालीनता  का व्यवहार पेश करे ताकि सभी को यह अहसास हो की हम चाणक्य वंशज हे और समाज को एक नई दिशा देने का कार्य करते हे ।धन्यवाद मनीष पंवार झाबुआ 

मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के सामने होंगे चार ऑप्शन -सैयद शाहिद मीर


           आज में जिस मुद्दे पर बात कर रहा हु वह बहुत ही अहम् और मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय  परिवारो के भविष्य से जुड़ा है । अगर इस मुद्दे पर आज विचार नहीं किया गया तो मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार को या तो परिवार बढ़ाने के लिए विचार करना पड़ेगा या फिर गरीबी का कूपन बनवाने  के किये लाइनों में लगना पड़ेगा जो बनवाना उनके लिए सम्भव नहीं होगा।
          जी हां ये मुद्दा है शिक्षा का। आज कल हर आदमी अपना पेट काटकर अपने बच्चों को शिक्षा दें रहा है। दोस्तों में एक स्कूल संचालक होने के साथ साथ पिता भी हु। में पिता होने व स्कूल संचालक होने के नाते पालको की आर्थिक व मानसिक परिस्थिति महसूस कर सकता हु।  एक और सरकार शिक्षा के निजीकरण में देश का भविष्य देख रही है तो वहीँमध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय  परिवार सरकारी व निजी स्कूलो के बीच पिसता नज़र आ रहा है। गरीबो के लिए आरटीई नियम लागू करने के साथ ही निजी स्कूलो की प्रारम्भिक कक्षा की फ़ीस पौने चार हज़ार रूपये कर दी है। इसका असर यह हो रहा है की वे छोटे स्कूल जिनकी फ़ीस हज़ार या दो हज़ार रूपये साल हुआ करती थी वे बढ़कर चार हज़ार रूपये से शुरू हो गई। और क्यों न हो सरकार खुद निशुल्क बच्चे पढ़ाने के एवज में ये शुल्क दे रही है। सरकार आरटीई के नियमो में जो शक्ति दिखा रही है उससे देश के कई मध्यमवर्गीय व् छोटे स्कूल बंद हो जायेंगे। जिसका खामियाज़ा भविष्य में  मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय  परिवार को भुगतना पड़ सकता है।मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार  जिनकी मासिक आय 5 हज़ार से 15 हज़ार रूपये है वे अपने बच्चों को जैसे तैसे 12 वी तो करा लेंगे लेकिन उच्च शिक्षा या तकनीकी शिक्षा के लिये सोचना पडेगा। उन्हें मजबूरन प्लेन यानी सामान्य कोर्स से डिग्री हासिल करना होगी जो भविष्य में किसी काम की नहीं रहेंगी। अगर बच्चे को उच्च शिक्षा दिला भी दी तो वह उसकी शादी करने या खुद का मकान बनाने का सपना पूरा नहीं कर पाएंगा। एक तरफ महंगाई तो दूसरी तरफ न मिलने वाली नौकरी आने वाली पीढ़ी पर क्या असर दिखाने वाली है उसका अंदाज़ा लगाना अभी सम्भव नहीं है। यानि अब रोटी कपड़ा और मकान के साथ शिक्षा को भी जोड़ लिया जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
ये हो सकता है इसका हल
          सरकारी स्कूलो में पहले भी पढाई होती थी और आज भी। लेकिन सरकार ने शिक्षको को कोल्हू का बैल बना कर उन्हें उनके मूल उद्देश्य से भटका दिया है। अब वे पढ़ाते कम है और सर्वे करते ज्यादा नज़र आते है। सरकार सर्वे कार्य के लिए एक सर्वे विभाग बनाये और शिक्षको को इस कार्य से मुक्त रखे। वही पालक भी सरकारी स्कूलो में अपना भरोसा जताते हुए समय समय पर बच्चे की रिपोर्ट लेने जाए और शिक्षको का भरोसा हासिल करे। वहीँ सामाजिक संस्थाये भी अपने स्तर पर स्कूलो को गोद लेकर उसका संचालन करे।  हम समय पर नहीं जागे तो मध्यमवर्गीय परिवार शिक्षा से वंचित  हो सकता है। 
ये तो मेरा विचार व् सुझाव है आपका क्या विचार व् सुझाव है वह जरूर सोचे और किसी न किसी तरह सरकार तक पहुचाये ताकि आने वाला कल सुखद व विकासशील साबित हो सके।  अभी नहीं जागे तो भविष्य में आपके सामने ये चार  ऑप्शन होंगे।
         पहला  बच्चे की पढाई दूसरा अपना घर तीसरा बच्चों की शादी और चौथा बुढ़ापे के लिए जमा पूंजी। मर्ज़ी आपकी सोच आपकी ये देश भी हमारा है और बच्चे भी। इनमे से आप किसे चुनना पसन्द करेंगे । चारो या कोई एक ।
        अभी नहीं जागे तो भविष्य में किसी को दोष देने लायक भी नहीं रहेंगे हम। जागिए और अपने साथ ही देश के हीत में सोचिये।(सैयद शाहिद मीर )

संघर्षों के साये में असली आजादी पलती है : - सियाराम पटेल नरसिंहपुर

 

।। संघर्षों के  साये में असली आजादी पलती है  ।।           

प्रिय अध्यापक भाईयो और  बहिनों, 
सादर वंदे।                                  

      सरकार द्वारा हमेशा फूट डालो   और शासन करो की नीति अपनायी जा रही है। शासन द्वारा विभिन्न वर्गों में बांटा गया है यथा -  अध्यापक, संविदा शिक्षक, गुरूजी और अतिथि शिक्षक। सभी की  योग्यता समान  होने पर विभिन्न वर्ग भेदो में बांटा जाना और सेवा  शर्तों में भी असमानता रखा जाना इसी लक्ष्य व उदेश्य की पूर्ती करता   है। इन वर्गभेदों में इतनी असमानता रखी गयी है कि हम चाहकर भी एक नही हो सकते क्योंकि हर वर्ग को अपने हितों की  चिंता होना स्वभाविक है और इसी वर्ग भेद से शासन फुट डालने में    सफल होती है। जब भी हम संघर्ष और आंदोलन के माध्यम से अपने अधिकारों की पूर्ती हेतु एकजुट  होते हैं तो शासन इसी वर्गभेद का फायदा उठाते हुए किसी एक वर्ग   की मांग को विसंगति सहित आंशिक रूप से हल करती है,  जिससे अन्य वर्ग के साथियों का आक्रोश शासन के विरुद्ध न होकर अपने ही साथियों के विरुद्ध मुखर होता है। कुछ समय हम इसी आपसी विरोधाभास, अविस्वास व सेवाशर्तों  की असमानता के चलते विभिन्न संघो में विभाजित हो जाते हैं जिसका फायदा शासन वखूबी उठाता है और हम हाथ मलते और सिर धुनते रह जाते हैं।                                      
      इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी को अपने अधिकारों व हितों को  लेकर अपना पक्ष शासन के समक्ष   रखने हेतु अधिकार प्राप्त हैं, किन्तु कुछ समय से शासन ने अपने हितों की रक्षार्थ आवाज उठाने पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए कर्मचारियों के आंदोलनों को अवैधानिक घोषित करना, एक से अधिक संघठन होने पर किसी भी एक संघ को अपने पक्ष में करते हुए दवाब खत्म किया जाने हेतु  फुट डालने का सबसे कारगर शस्त्र बना लिया है। अतएव सभी साथियों से अनुरोध है कि शासन की इस नीति को मुहतोड़ जवाब देने हेतु अपने आपसी मतभेद व मनभेद को दरकिनार करते हुए राज्य  अध्यापक संघ द्वारा म.प्र.शासन के विरुद्ध अध्यापक हित में आगाज किये गए आंदोलन में अपना अमूल्य सहयोग प्रदान करेंगे। राज्य अध्यापक संघ अल्पवेतन भोगी कर्मचारियों का मातृसंघ है जिसने कर्मचारी जगत में नए कीर्तिमान स्थापित कर सफलताएं प्राप्त की हैं। राज्य अध्यापक संघ किसी अन्य संघ के विरुद्ध टीका टिप्पणी किये वगैर सदैव अध्यापक हित में कार्य करने वाला संघ है। राज्य अध्यापक संघद् वारा 1 जून को छटे वेतन की गणना शीट की होली जलाते हुए   शासन को आगाह किया गया है कि यदि गणना शीट में व्याप्त।        
       विसंगतियां यथाशीघ्र दूर नही की गयी तो 15 जून 2016 से नवीन शैक्षणिक सत्र की शुरुवात के साथ ही तालाबंदी की जायेगी। यथाशीघ्र  आप सभी को आंदोलन की चरणबद्ध रणनीति से अवगत कराया जाएगा।।        
                    
"संघर्षों  के साये में असली आजादी पलती है "    
                                                              
सियाराम पटेल                                                                                                                  
आई टी सेल,  राज्य अध्यापक संघ  मध्यप्रदेश।।             
                   

चिन्तन करे कि शासन प्रशासन से कैसे निपटे जोश में होश न खोये - नगेन्द्र त्रिपाठी -नरसिंहपुर

          मित्रों चाहे कोई भी संगठन रहा हो सबने अपने अपने सामर्थ अनुसार गणना पत्रक सही हो को लेकर   शासन, प्रशासन तक अपनी बात पहुचायी है इसमें कोई दो राय नहीं पर शासन और प्रशासन में बैठै नहीं चाहते की अपनी समस्या का समाधान हो ।
        इतिहास गवाह है जब से हमारे वर्ग की उत्पत्ति हुयी है आदेशों के लिये लडना पडा है चाहे सरकार किसी की भी रही हो पर यह भी सत्य है कि एनकेन प्रकारेण हमने आदेशों को भी बदलवाया है । अब भी जो बिसंगति है वह भी हम सब ही अपने बल से सुधरवायेगे और सुधर के ही रहेगी बस अपने ऊपर विश्वास करना होगा इसमें अधीरता की जरूरत नहीं है । शांत चित्त से चिन्तन करे कि शासन प्रशासन से कैसे निपटे जोश में होश न खोये ,नहीं तो फिर नर्मदा जल और कसमें कि यह शरीर आदेश के साथ ही घर वापिस आयेगा और क्या हुआ यह हम सब जानते हैं ।
        अत:सभी से आग्रह  कि धैर्य के साथ सभी आपस में चर्चा करें बिना एक दूसरे की बुराई और केवल अपने को ही श्रेष्ठ मानते हुये ।
सादर ।
नगेन्द्र त्रिपाठी -नरसिंहपुर

राज्य अध्यापक संघ ने 31 मई को होली जलवाकर आंदोलन का बिगुल भी बजा दिया ,15 जून से प्रदेश के समस्त सरकारी स्कुलो में प्रवेशोत्सव का बहिष्कार करके तालाबन्दी -जगदीश यादव


                                         

मेरे स्नेह अध्यापक साथियो,        
सादर वन्दे ।
सादर वन्दे ।
अध्यापको के छटे वेतनमान के गणना पत्रक के आदेश में सरकार ने अध्यापको को उनकी मूल मांग शिक्षा विभाग में भटकाने के उद्देश्य से ही विसंगति डाली हे। इस विसंगति के पीछे सरकार की मूल मंशा यह लगती हे की प्रदेश का अध्यापक और उनके संघ अपनी प्रमुख मांग शिक्षा विभाग में सविलियन को भूलकर छटे वेतनमान की विसंगति को दूर करवाने में ही छ आठ महीने उलझते रहेगे ।साथियो राज्य अध्यापक संघ ने 31 मई को ही आदेश विसंगति पूर्ण जारी होने पर सरकार के सम्मुख अपना विरोध दर्ज करवा दिया था। और पुरे प्रदेश में गणना पत्रक की होली जलवाकर आंदोलन का बिगुल भी बजा दिया हे। राज्य अध्यापक संघ 15 जून से स्कुल खुलने के साथ ही अपनी व्यापक रणनीति की तहत सम्पूर्ण प्रदेश में स्कुलो में तालाबन्दी करके छटे वेतनमान की विसंगति दूर करवाने के साथ ही अपनी प्रमुख मांग शिक्षा विभाग में अध्यापको का सविलियन होने तक अब अपनी यह लड़ाई जारी रखेगा।अध्यापक हित में जो भी अध्यापक हितेषी संघ या हमारे भाई निस्वार्थ भाव से अध्यापको की इस लड़ाई में शामिल होना चाहते हे राज्य अध्यापक संघ उन सभी संघठनो और  साथियो का स्वागत करता हे। और उनके साथ अंतिम मांग पूरी होंने तक यह लड़ाई जारी रखने का वादा भी करता हे । राज्य अध्यापक संघ अध्यापको का सबसे पुराना और वटवृक्ष रूपी संघ हे। आज अध्यापको के जितने भी संघ हे अमूमन सभी की जड़े राज्य अध्यापक संघ से ही कही न कही जुडी हुई हे। पूर्व में जो भी साथी अध्यापक हित में बेहतर कार्य करने के उद्देश्य से राज्य अध्यापक संघ से  अलग हुए हे वह भी सरकार की तुगलती नीतियों के आगे ही छलै गए हे। अध्यापक हित में मै अध्यापको के सभी संग़ठन प्रमुखों और साथियो से हम आग्रह करते हे की अध्यापक हित में सारे पूर्वाग्रहों को त्यागकर अध्यापको की इस लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाये और हम सभी मिलकर एकजुट होकर शिक्षा विभाग में सविलियन होने तक अपनी लड़ाई जारी रखे।अध्यापक हित में राज्य अध्यापक संघ सभी संघठनो और साथियो के विचारो और सुझावो को मानकर एकजुटता से ईमानदारी पूर्वक अब भी लड़ाई लड़ने को तैयार हे।

प्रदेश के अध्यापक हित में राज्य अध्यापक संघ अध्यापको की प्रमुख मांगों के निराकरण होने तक अब अपनी आर पार की लड़ाई जारी रखेगा। हम प्रदेश के सभी अध्यापको से आव्हान करते हे कि अपने बेहतर भविष्य की खातिर आगामी 15 जून से प्रदेश के समस्त सरकारी स्कुलो में प्रवेशोत्सव का बहिष्कार करके तालाबन्दी करके अध्यापक हित की इस लड़ाई में अपना योगदान दे। प्रदेश के सभी अध्यापको की मदद से हम यह लड़ाई जीतेगे यही विश्वास भी हे।
आपका
जगदीश यादव प्रांताध्यक्ष
राज्य अध्यापक संघ म.प्र.

Friday, June 3, 2016

शासन ने अध्यापको को मज़ाक का विषय बना रखा हे - अरविन्द रावल

   अध्यापको के छटे वेतनमान के गणना पत्रक की विसंगति की चर्चा मंत्रालय में जरूर सुनाई दे रही हे किन्तु अधिकारी की कार्य प्रणाली के चलते अभी एक दो महीने इस विसंगति के  सुधरने के आसार नज़र नही आते हे। या यू कहे की बिना मुख्यमंत्रीजी की फटकार से अधिकारी अध्यापको की विसंगति दूर करने वाले नही हे।
    क्योंकि सरकार में बेठे बड़े अधिकारी इस आदेश के बाद चाशनी देखना चाहती हे कि अध्यापको की सरकार प्रति क्या राय बनती हे। शासन को यह तो अच्छी तरह से पता हे की प्रदेश के करीब तीन लाख अध्यापक तेरह से ज्यादा संघो में अलग थलग होकर बिखरे पड़े हे और इस समय कोई भी संघ इस स्थिति में नही हे कि वह अध्यापक हित को लेकर कोई बड़ी और निर्णायक लड़ाई सीधे तोर पर सरकार से लड़ सकता हे। और सरकार के कुछ नुमाइंदे इस समय यह बात भी बड़े वजनदार तरीके से करते हे की ऐसी बिखराव की और एकजुटता के अभाव की स्थिति में यदि कोई एक दो संघ अपने बीस तीस हजार अध्यापको के साथ आंदोलन वगेरह भी करता हे तो उससे सरकार के कान में जू भी रेंगने वाली नही हे। और न ही प्रदेश के अन्य अध्यापक नेता यह चाहेंगे की अध्यापक हित में किसी प्रकार के आंदोलन का हिस्सा बनकर अपनी छवि प्रदेश के  मुखिया के सामने ख़राब की जाये।
    सन्देश साफ हे की टुकड़ो में बिखर कर अध्यापको की स्थिति कमजोर और खण्डित हो चुकी हे। ऐसे में कोई भी अध्यापक संघ का नेता सीधे तोर अध्यापक हित में मुख्यमंत्रीजी की आखो की किरकिरी नही बनना चाहेगा। अध्यापको के सभी प्रमुख भी दिली तोर पर यही चाहते हे कि प्रदेश के मुखिया के वे प्रिय पात्र बने रहे और सीधे संवाद की स्थिति बनी रहे।
   अब यदि छटे वेतनमान की विसंगतियो को वास्तव में दूर करना अध्यापक संघ प्रमुखों का ध्येय हे तो उन्हें व्यक्तिगत श्रेय लेने की होड़ छोड़कर सयुक्त रूप से एकजुट होकर मुख्यमंत्रीजी से शीघ्र मुलाकात करके इस विसंगति को शासन से दूर करवाने का ही एकमात्र विकल्प बचा हे। मुख्यमंत्रीजी से यदि एकजुट होकर अध्यापक नेता बात करते हे तो एक दो महीने में विसंगति दूर हो सकती हे। अन्यथा अलग अलग मुलाकात करके अध्यापको के नेता महीनो इस विसंगति को दूर नही कर सकते हे।
     अध्यापको के सभी संघ प्रमुखों से मेरा विनम्र आग्रह हे की टुकड़ो में बिखरने की ही यही परिणीति हे की आज शासन ने  अध्यापको को मज़ाक का विषय बना रखा हे। हर आंदोलन हर आदेश के बाद हमारे अपने ही लोगो को टुकड़े में बाटना शासन में बेठे लोगो की मंशा हे। यदि सभी अध्यापक संघ प्रमुख अब और  टुकड़े नही चाहते हे और निस्वार्थ भाव से अध्यापक हित चाहते हे तो सभी एकजुट होने ऐलान करे। मुझे उम्मीद हे अब भी एक हो जायेगे तो हम गढ़ जीत जायेगे।
- अरविन्द रावल

वेतन निर्धारण हेतु जारी आदेश की विसंगतियां मेरी नजर में ( एक समीक्षा ) :- सुरेश यादव

      जिस गणना पत्रक का हमें 5 माह से इंतज़ार था वह  आक्रोश के माध्यम से आग के हवाले कर दिया गया । आखिर आक्रोश क्यों है अध्यापको में ? क्या जारी करने वाले किसी अधीकारी ने यह नहीं देखा होगा की इस ,आदेश के गणना पत्रक ( रेडी रेकनर ) परिशिष्ठ 1 और 2 के आधार पर प्रदेश का कोई अध्यापक अपना वेतन निर्धारण करना चाहे तो ,यह सम्भव ही नहीं है । कहने का मतलब यह है की, उक्त पत्रक  सिर्फ आदेश का वजन बढ़ाने के लिए है इसके अतिरिक्त इनका कोई काम नहीं है ।
   साथियो सच्चाई यह है की सरकार हमारी प्राथमिकताएं बदलना चाहती  हैं , याद कीजिए 2013 से 2015 तक चुनावो में निकल गया, मई 15 में ऐसी स्थांतरण निति बनायीं गयी की महिला और निशक्त अध्यापको के स्थान्तरण भी नहीं हो पाये और हमारा ध्यान विसंगतियों पर रहा । आप को स्मरण होगा , सितम्बर 15 में हमारी क्या माँग थी , " एक मुश्त 6 टा वेतन मान दिसंबर 15 तक  दिया जाए ,2013 से विसंगतियों का एरियर दिया जाए और शिक्षा विभाग में  संविलियन  किया जाये ।"  फिर मुख्य्मंत्री महोदय  की मुम्बई में घोषणा, उसके बाद 6 महीनो में हमारी आदेश को लेकर प्रतीक्षा और जब जारी हुआ तो होली  दहन ।

   आप विचार कीजिये ,अब हम इस विचार में लगे है की कम से कम जो मिल रहा है वह तो कम न हो ,साथ ही अब भले 1 जनवरी 2016 से ही सही सब व्यवस्थित हो जाए ।  समझें अब  हम इस बात को  भूल गए की हमारा वेतन निर्धारण 2013 से सेवा पुस्तिका में किया जाए ,और 1 सितम्बर 13 से  सहायक अध्यापक और वरिष्ठ अध्यापक  को अंतरिम राहत में कमी का एरियर प्रदान किया जाए ।
     साथियो जैसा हम सोच रहे है यदि इस प्रकार वेतन कम हुआ तो सरकार का तो एक पैसा भी खर्च नहीं होगा फिर 1125 करोड़ कैसे खर्च होंगे ?  ध्यान रहे  मुलभुत नियमो के अनुसार नविन वेतन निर्धारण होने पर यदि किसी का सकल वेतन कम होता है तो  वेतन निर्धारण उसी स्टेप पर निर्धारित किया जाता है  किसी 
का सकल  वेतन कम नही किया जा सकता है । अब अगर सभी को वही वेतन मिलता रहा तो भी सरकार का एक पैसा  खर्च नहीं होगा ,तो भी 1125 करोड़ की बात बेमानी हुई।

फिर आखिर विसंगतियां  हैं  क्या  इस आदेश में ?  साथियो मैनें जितना अध्ययन किया है और जँहा तक मेरी समझ है ।  उसके आधार पर कुछ कमियाँ मुझे नजर आई है वह इस प्रकार है ,
(1)  वेतन निर्धारण पत्रक में विद्यमान वेतन  1 अप्रैल  13 की स्थिति  में नविन वेतन निर्धारण के आधार पर बनाया गया  है । इस प्रत्रक  में अध्यापक संवर्ग का जो विद्यमान  वेतन बताया  गया है वह वर्तमान में , हम में से किसी को भी नहीं मिल रहा है ,तो छठे  वेतन मान में  निर्धारण किया ही नहीं  जा सकता है ?

(2)  इस आदेश में अंतरिम राहत के आदेश 2013 की कंडिका 2 के बिंदु  (द) ii की तरह अंतरिम राहत के समायोजन का कोई उल्लेख नहीं है कंडिका के अनुसार " अंतरिम राहत सबसे पहले ग्रेड पे में और उसके बाद मूल वेतन में जोड़ी जातीं ।"  अभी स्थिति सपष्ट नहीं है। 

(3)  2007 से सेवा की गणना करने  पर  स्थिति सपष्ट नहीं है , 2013 में अंतरिम राहत प्रदान करने के लिए 1 अगस्त 13 तक को  8 वर्ष मान कर  अंतरिम राहत ज्ञात की गई  थी , जबकी 1 अप्रैल 07 से 1 अगस्त  13 तक सिर्फ 6 वर्ष हुए थे । साथियो मेरे द्वारा RTI के  माध्यम से अंतरिम राहत की  नस्ति प्राप्त  की गयी थी , जिसमे 8 वर्ष के आधार पर अंतर ज्ञात किया गया था  अर्थात 1 अप्रैल 07 को दो-दो वेतन वृद्धि लगा कर 1 अगस्त 13 तक 8 वर्ष हुए। वर्तमान में जारी आदेश में  यह  स्थिति सपष्ट नहीं है । 
(4)  वेतन निर्धारण 1 जनवरी 16 को किया जाएगा ,जबकि आज तक का इतिहास रहा है वेतन निर्धारण सेवा पुस्तिका में उसी दिनांक  से  किया जाता है जिस दिनांक से अंतरिम राहत प्रदान की जाती है । लेकिन इस बार सभी सिद्धांतों और नियमों को ताक पर रख दिया गया है ।  1 जनवरी 16 को वेतन निर्धारण होने पर और सब ठीक  हो जाने पर भी 7 वें  वेतन मान के लागू होने पर काफी अंतर हो सकता है।  

(5) क्रमोन्नति और पदोन्नति का गणना पत्रक ( रेडी रेकनर ) वेतन  निर्धारण के समय न तो आज तक कभी जारी हुआ है न भविष्य में कभी होंगे। 


इसके अतिरिक्त मुझे कोई विसंगतियां नजर  नहीं आरही है । क्योंकि सबसे बड़ी विसंगति तो यही है की हमे इस आदेश के आधार वेतन मिलना ही नहीं है ,बाकी 2009 के नियम और मूल भुत नियम से सब ठीक हो जाएगा। 
 
         माननीय मुख्य मंत्री जी आप और आप की  सरकार की नियत सच में अध्यापकों का  भला करने की है ,तो इस आदेश तो तत्काल  निरस्त कर के  सिर्फ 2 लाइन का यह आदेश जारी कर  दें की , " अध्यापक संवर्ग को शिक्षक संवर्ग के समान 6 टे  वेतनमान  की गणना 1 अप्रैल 2007 से की जाए और सेवा  पुस्तिका  में 1 सितंबर 2013 में दर्ज कर के ,1 जनवरी 2016 से नगद लाभ प्रदान किया जाए । एवं  वेतन निर्धारण  वेतन पुनरीक्षण नियम 2009 के अनुसार कीया जाएगा । "  आदरणीय मुख्य मंत्री जी आप और आप की सरकार विगत  13 वर्षो से प्रदेश में है ,में अन्य की तरह आप के अधिकारियों को दोष नहीं दूंगा ,जिम्मेदार आप है क्योकि इस सरकार और प्रदेश के मुखिया आप  है  तो जिम्मेदार भी आप ही हैं ।  आप ने हमारी सुविधाओं को बढ़ाया नहीं हमेशा कम किया है। जैसे अनुकम्पा नियम ,  उदाहरण कई हैं उन पर बाद में बात होगी ।  
यह समीक्षा मेरे निजी विचार हैं सुरेश यादव ( रतलाम ) 

ऐसे तो महीनों इस विसंगति को दूर नही कर सकते हैं : - अरविन्द रावल

अरविन्द रावल। अध्यापकों के छठे वेतनमान के गणना पत्रक की विसंगति की चर्चा मंत्रालय में जरूर सुनाई दे रही है किन्तु अधिकारी की कार्य प्रणाली के चलते अभी एक दो महीने इस विसंगति के सुधरने के आसार नज़र नही आते हैं। या यूं कहे की बिना मुख्यमंत्रीजी की फटकार से अधिकारी अध्यापकों की विसंगति दूर करने वाले नही है।
क्योंकि सरकार में बेठे बड़े अधिकारी इस आदेश के बाद देखना चाहते है कि अध्यापकों की सरकार प्रति क्या राय बनती है। शासन को यह तो अच्छी तरह से पता है की प्रदेश के करीब तीन लाख अध्यापक तेरह से ज्यादा संघो में अलग थलग होकर बिखरे पड़े हैं और इस समय कोई भी संघ इस स्थिति में नही है कि वह अध्यापक हित को लेकर कोई बड़ी और निर्णायक लड़ाई सीधे तोर पर सरकार से लड़ सकता है और सरकार के कुछ नुमाइंदे इस समय यह बात भी बड़े वजनदार तरीके से करते हैं कि ऐसी बिखराव की और एकजुटता के अभाव की स्थिति में यदि कोई एक दो संघ अपने बीस तीस हजार अध्यापकों के साथ आंदोलन वगेरह भी करता हैं तो उससे सरकार के कान में जू भी रेंगने वाली नही है और न ही प्रदेश के अन्य अध्यापक नेता यह चाहेंगे की अध्यापक हित में किसी प्रकार के आंदोलन का हिस्सा बनकर अपनी छवि प्रदेश के  मुखिया के सामने ख़राब की जाये।
सन्देश साफ है कि टुकड़ों में बिखर कर अध्यापकों की स्थिति कमजोर और खण्डित हो चुकी है। ऐसे में कोई भी अध्यापक संघ का नेता सीधे तौर अध्यापक हित में मुख्यमंत्रीजी की आखों की किरकिरी नही बनना चाहेगा। अध्यापकों के सभी प्रमुख भी दिली तोर पर यही चाहते हैं कि प्रदेश के मुखिया के वे प्रिय पात्र बने रहे और सीधे संवाद की स्थिति बनी रहे।
अब यदि छटे वेतनमान की विसंगतियो को वास्तव में दूर करना अध्यापक संघ प्रमुखों का ध्येय है तो उन्हें व्यक्तिगत श्रेय लेने की होड़ छोड़कर संयुक्त रूप से एकजुट होकर मुख्यमंत्रीजी से शीघ्र मुलाकात करके इस विसंगति को शासन से दूर करवाने का ही एकमात्र विकल्प बचा है।  मुख्यमंत्रीजी से यदि एकजुट होकर अध्यापक नेता बात करते है तो एक दो महीने में विसंगति दूर हो सकती है अन्यथा अलग अलग मुलाकात करके अध्यापकों के नेता महीनों इस विसंगति को दूर नही कर सकते हैं।
अध्यापको के सभी संघ प्रमुखों से मेरा विनम्र आग्रह है कि टुकड़ों में बिखरने की ही यही परिणीति है की आज शासन ने  अध्यापको को मज़ाक का विषय बना रखा हे। हर आंदोलन हर आदेश के बाद हमारे अपने ही लोगो को टुकड़े में बाटना शासन में बेठे लोगो की मंशा है। यदि सभी अध्यापक संघ प्रमुख अब और टुकड़े नही चाहते है और निस्वार्थ भाव से अध्यापक हित चाहते हैं तो सभी एकजुट होने ऐलान करे। मुझे उम्मीद है अब भी एक हो जायेगे तो हम गढ़ जीत जायेगे।
( लेखक स्वयं अध्यपक है और यह उनके निजी विचार हैं ) 

प्रमोशन में आरक्षण मामले में हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर अब सरकार खुद ही उलझ गई है

      प्रमोशन में आरक्षण मामले में हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर अब सरकार खुद ही उलझ गई है। इस प्रक्रिया के बाद अब पूरे प्रदेश में प्रमोशन रोक दिए गए हैं। प्रमोशन के लिए फिलहाल मप्र में कोई नियम ही नहीं शेष रह गया है। मंत्रालय का कोई भी अफसर इस मामले में हाथ डालने से डर रहा है। सवाल यह है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता, तब तक क्या करें। सरकार ने महाधिवक्ता से इस मामले में सलाह मांगी थी, परंतु उन्होंने भी कोई सलाह नहीं दी। अब सरकार अटार्नी जनरल से सलाह मांगेगी। पदोन्न्ति में आरक्षण मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई 23 सितंबर को होनी है।

   मंत्रालय सूत्रों के मुताबिक पदोन्न्ति में आरक्षण नियम रद्द होने के कारण मंत्रालय सहित सभी विभागों में पदोन्न्तियों पर ब्रेक लग गया है। ज्यादातर विभाग डीपीसी करने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग से मार्गदर्शन मांग रहे हैं, पर वो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है। इस परिस्थिति से निपटने के लिए मुख्य सचिव अंटोनी डिसा के निर्देश पर सामान्य प्रशासन विभाग ने महाधिवक्ता से सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए यथास्थिति के निर्देश पर कानूनी स्थिति साफ करने के साथ अनारक्षित पदों पर पदोन्न्ति करने को लेकर सलाह मांगी थी।

     बताया जा रहा है कि महाधिवक्ता कार्यालय ने मंगलवार को शासन को अपना ओपिनियन भेज दिया। इसमें सिर्फ इतना कहा गया कि मामला सुप्रीम कोर्ट में होने के कारण इस पर अटार्नी जनरल से मार्गदर्शन ले लिया जाए।

    सूत्रों का कहना है कि अब इस मामले में मुख्य सचिव से बात करके सामान्य प्रशासन विभाग अटार्नी जनरल से सलाह मांगेगा। दरअसल, पदोन्न्ति में आरक्षण नियम को असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद प्रदेश में पदोन्न्ति का कोई नियम ही नहीं रह गया है। ऐसे में अनारक्षित या एकल पदों की पदोन्न्तियां भी अटक गई हैं। अतिरिक्त महाधिवक्ता पुरुषेंद्र कौरव ने सरकार को सलाह दिए जाने की पुष्टि की है। 


Wednesday, June 1, 2016

नरसिंहपुर में राज्य अध्यापक संघ द्वारा दिवंगत अध्यापक के परिजनों को सहायता प्रदान की गई

राज्य अध्यापक संघ नरसिंहपुर द्वारा आज दिनांक 01 जून 2016 को अध्यापक साथी स्वर्गीय श्री विश्वनाथ विश्वकर्मा के परिवार की सहायतार्थ एकत्रित राशि सौपने हेतु उनके गृहग्राम बिल्हरा विकासखंड चावरपाठा, जिला नरसिंहपुर पहुचकर जिलाध्यक्ष अजीत जाट, प्रांतीय प्रवक्ता नागेन्द्र त्रिपाठी, प्रदेश प्रतिनिधि कोमल सिंह पटेल, जिला उपाध्यक्ष विजय शर्मा, योगेन्द्र झारिया, ब्लाक अध्यक्ष चावरपाठा गोविन्द बुन्देला, ब्लाक चीचली अध्यक्ष दौलत सिंह पटेल, ब्लाक सांईखेड़ा अध्यक्ष मलखान सिंह मेहरा, लक्ष्मीकांत कौरव, देवराज पटेल,सियाराम पटेल , कमलेश शर्मा, महेंद्र प्रजापति, रघुबीर साहू करेली, सचिन गुप्ता, राकेश पटेल, ताराचंद चौधरी, नीतेश जैन, दुर्गेश तिवारी, श्रीमती मंजुला शर्मा, शिक्षक संघ से श्री वृन्दावन पटेल प्रधानपाठक, श्री पी.ए. खान प्रधानपाठक, श्री पूरनलाल पटेल प्रधानपाठक ने 40000 अंकन चालीस हजार की 9 वर्षीय जीवन बीमा पालिसी एवं 25000 अंकन पच्चीस हजार नगद कुल 65000 अंकन पेंसठ हजार की आर्थिक सहायता प्रदाय की गयी....

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Thursday, June 9, 2016

वर्तमान अध्यापक संवर्ग के परिवेश का चित्रण एक नजर में करता दृष्टान्त-सियाराम पटेल, नरसिंहपुर।

वर्तमान अध्यापक संवर्ग के परिवेश का चित्रण एक नजर में  करता दृष्टान्त
 "एक औरत थी,
जो अंधी थी,
जिसके कारण उसके बेटे को स्कूल
में बच्चे चिढाते थे,
कि अंधी का बेटा आ गया,
हर बात पर उसे ये शब्द सुनने
को मिलता था कि “अन्धी का बेटा” .इसलिए वो अपनी माँ से चिडता था . उसे कही भी अपने
साथ लेकर जाने में हिचकता था
उसे नापसंद करता था..
उसकी माँ ने उसे पढ़ाया..
और उसे इस लायक बना दिया कि वो अपने पैरो पर खड़ा हो सके..
लेकिन जब वो बड़ा आदमी बन
गया तो अपनी माँ को छोड़
अलग रहने लगा..
एक दिन एक बूढी औरत उसके घर आई और गार्ड से बोली..
मुझे तुम्हारे साहब से मिलना है जब गार्ड ने अपने मालिक से
बोल तो मालिक ने कहा कि बोल
दो मै अभी घर पर नही हूँ.
गार्ड ने जब बुढिया से
बोला कि वो अभी नही है..
तो वो वहा से चली गयी..!!
थोड़ी देर बाद जब लड़का अपनी कार से ऑफिस के लिए जा रहा होता है.., तो देखता है कि सामने बहुत भीड़ लगी है.. और जानने के लिए कि वहा क्यों भीड़ लगी है वह
वहा गया तो देखा उसकी माँ वहा मरी पड़ी थी.., उसने
देखा की उसकी मुट्ठी में कुछ है उसने जब मुट्ठी खोली तो देखा की एक लेटर जिसमे यह लिखा था कि बेटा जब तू छोटा था तो खेलते वक़्त तेरी आँख में सरिया धंस
गयी थी और तू अँधा हो गया था तो मैंने तुम्हे अपनी आँखे दे दी थी.., इतना पढ़ कर लड़का जोर-जोर से रोने लगा..
उसकी माँ उसके पास नही आ
सकती थी..
दोस्तों वक़्त रहते ही लोगो की वैल्यू करना सीखो..
माँ-बाप का कर्ज हम
कभी नही चूका सकते..
हमारी प्यास का अंदाज़ भी अलग है दोस्तों-
"कभी समंदर को ठुकरा देते है,
तो कभी आंसू तक पी जाते है..!!!
“बैठना भाइयों के बीच,
चाहे “बैर” ही क्यों ना हो..
और खाना माँ के हाथो का,
चाहे “ज़हर” ही क्यों ना हो..!!…
 उक्त दृष्टान्त वर्तमान में अध्यापक संवर्ग में व्याप्त माहौल पर  बिलकुल फिट बैठता है।राज्य अध्यापक संघ म.प्र. ठीक उसी माँ के समान मातृ संघ हैं और इसी की कोख से जन्मे कुछ नवोदित संघ ठीक उसी बेटे के समान हैं जो अपने अस्तित्व के लिए अपनी माँ से ठीक उसी तरह ईर्ष्या करते हैं जैसे उस बेटे ने  जिसके सुनहरे भविष्य की नींव में संघर्ष करते हुए अपना सर्वस्व न्योछावर करते हुए जीवन के अंतिम पड़ाव  को प्राप्त किया और वह बेटा अपनी नासमझी के चलते माँ को ईर्ष्या करता रहा और ईर्ष्या भी इतनी क़ि शिष्टाचार को भूलते हुए आपसी प्रेम, व्यवहार व पारिवारिक भाव व मर्यादाएं भी दांव पर लगाते हुए सभी सीमायें पार कर दी हैं। आज भी लगभग हमारी भी यही स्थिति है,  जो एक माँ (राज्य अध्यापक संघ) के द्वारा अपने बेटे (अध्यापक संवर्ग) के सुनहरे भविष्य के लिए किये गए संघर्ष व प्रयास को बेटे ( नवोदित संघों) के द्वारा नजर अंदाज करने के समान ही है। जैसा कि हम विगत सितम्बर 2015 से जहा से चले और आज  भी वही के वही खड़े हैं...., जागो अध्यापक ....जागो............ हम इस आधुनिकता और प्रतिस्पर्धी युग में अपने नैतिक एवं   चारित्रिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए आपसी मान मर्यादाओं का ध्यान रखकर ही कार्य करें, तब   ही हम सही मायने में अपने मूल लक्ष्य प्राप्ति की ओर अग्रसर हो सकेंगें.....।।। अध्यापक हित में जारी..,अगर आप अपने मातृ संघ को।     बेहद प्यार करते है तो इस मैसेज को इतना फैलाओ जितना तुम अपनी माँ को चाहतें हो…                  
 आपका अपना भाई-
सियाराम पटेल, नरसिंहपुर।  


वेतन मान की गणना का आदेश स्थगित होने के बाद अब क्या ? - सुरेश यादव

    सुरेश यादव  रतलाम -  अध्यापकों को 6 टा वेतनमान प्रदान करने के  गणना पत्रक ( पंचायत एवं ग्रामीण  विकास विभाग के पत्र ,एफ-131/2013/22/पं -2 ,भोपाल  दिनांक 31 मई 2016 )  के पालन पर आगामी आदेश पर रोक लग गयी है । गणना पत्रक  के स्थगन पर  तीन प्रमुख बहस चल रहीं हैं। 

        स्थगन हुआ है निरस्त नहीं हुआ ,निश्चित रूप से रोक लगायी गयी है तो जब तक यह रोक नहीं हटाई जाएगी तब तक अध्यापकों को लाभ प्राप्त नहीं होगा ,और जब लागू करने का आदेश होगा तो निश्चित रूप से कुछ सुधार भी होगा ।
        दूसरी चर्चा यह चल रही है की , पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के आदेश को स्कुल शिक्षा विभाग ने कैसे स्थगित किया  ? हमारे लिए स्कुल शिक्षा विभाग नोडल विभाग है ,हमारे सभी आदेशो की फ़ाइल स्कूल शिक्षा विभाग से ही प्रारम्भ  होती  है ।इस  लिए यह विभाग इस आदेश पर रोक लगा सकता है।
        तीसरी चर्चा है की इस रोकने वाले आदेश में विसंगति का कोई उल्लेख नहीं है, वास्तविकता यह है की आदेश का विसंगतियों के कारण पुरजोर विरोध हुआ है इसी लिए इस आदेश के पालन को रोका  गया है । सब ठीक होता तो आदेश रोका ही क्यों जाता  ।
      साथियों असलियत यह है की सरकार द्वारा 25 फरवरी 2016 ( पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग का पत्र क्रमांक एफ़ -1-31/2013/22/ पं-2 भोपाल दिनाक 25 फरवरी 2016 
) को जारी आदेश  पर स्थगन नहीं किया  गया है । सरकार ने 31 मई 2016 को जारी वेतन निर्धारण के लिए जारी आदेश पर ही रोक लगाईं है ।
       मेरे मतानुसार 31 मई 2016 के आदेश में सिर्फ इतना सा ही संशोधन कर दिया जाए की , आदेश का परिशिष्ट 1, "गणना पत्रक" परिरिष्ठ 2 " उदाहरण " को हटा देवे और ।
        
 आदेश की कंडिका " 2.4 " जो सेवा की गणना करने का कहती है इसमें सिर्फ इतना सुधार कर दिया जाए या जोड़ दिया जाए की ," वेतन मान की काल्पनिक गणना 1 अप्रैल 2007 से की जायेगी और 1 सितम्बर 2013 से सेवा पुस्तिका में दर्ज कर के नगद लाभ एक जनवरी 2016 से  प्रदान किया जाएगा ।" 2013 से वेतन मान निर्धारण के कारण हमें 7 वें वेतन मान के लिए अनावश्यक  संघर्ष नहीं करना होगा ,क्योकि आप भी जानते हैं की 7 वे वेतन मान पर वेतन निर्धारण 31 दिसंबर 15 की स्थिति में किया जाएगा । 31 दिसंबर 15 और 1 जनवरी 2016 की स्थिति काफी अंतर आसकता  है। 

        साथ ही कंडिका "2.5"  जो पदोन्नति में सेवा की गणना करने का कहती है उसे वलोपित कर दिया जाये ।क्योकि काल्पनिक वेतन की गणना ही 1 अप्रैल 2007 से की जाये तो इस कंडिका की आवश्यकता  ही नहीं है  ।
       साथियों इस प्रकार वेतन निर्धारण होने पर राज्य शासन  पर कुल 125 करोड़ प्रतिमाह का अतिरिक्त वित्तीय भार आएगा । जबकि सरकार ने अभी 1125 करोड़ का वित्तीय भार का आकलन किया है यह  वित्तीय भार तीन वित्त वर्षो का ज्ञात किया गया है ,पहला जनवरी 16 से मार्च 16 का 141 करोड़, अप्रैल 16 से मार्च 17 तक 704 करोड़ ,और अप्रैल 17 से मार्च 18 तक 280 करोड़ का अतिरिक्त वित्तीय  भार  आकलन किया है ।सरकार का आकलन 58 करोड़ प्रतिमाह का है और यदि सब कुछ व्यवस्थित कर दिया जाए तो 121 करोड़ प्रतिमाह । सथियो सब कुछ व्यवस्थित करने पर सहायक अध्यापक को  न्यूनतम 7000 ,अध्यापक को 4500 और वरिष्ठ अध्यापक को 5500 का लाभ होगा । सरकार सब ठीक करना चाहती है तो  इच्छा शक्ति में बढ़ोतरी करे  और अध्यापको की समस्याओ का जड़ से अंत कर  दे । -उक्त विचार लेखक के निजी विचार है। 

       

Wednesday, June 8, 2016

स्वयं के व्यय पर DEd/BEd करने पर अवकाश प्रदान करने के लिए आदेश 2010

स्वयं के व्यय पर DEd/BEd करने पर वेतन वृद्धि स्वीकृत नहीं करने के समबंध में आदेश 2011

शिक्षाकर्मी को परिवीक्षा अवधि की वेतन वृद्धि के संबद्ध में जारी आदेश 2009

अध्यापक संवर्ग को बैंक ऋण सुविधा ,CPEd/DPEd, यात्रा भत्ता ,चिकित्सा बिमा

अध्यापक संवर्ग को बैंक  ऋण सुविधा देने ,CPEd/DPEd  करने की सुविधा  देने , अध्यापक संवर्ग को यात्रा भत्ता देने, अध्यापक संवर्ग को चिकित्सा बिमा देने के लिए निकायों को  अधिकार  देने  के संबद्ध में  आदेश
सभी आदेश PDF में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें




अध्यापक संवर्ग को ग्रीन कार्ड का लाभ प्रदान करने के संबंध में

शिक्षाकर्मियों अध्यापको को आज तक जो मिला वह राजनैतिक लड़ाई और सत्ताधारियो के वोटरो के एक बड़े वर्ग के छिटकने के भय के फलस्वरूप ही मिला. -रिज़वान खान

 सम्मानीय अध्यापक साथियो
आज माननीय मुख्यमंत्री महोदय के निर्देश पर स्कूल शिक्षा विभाग ने छठे वेतनमान के नियमो का मखौल उडाता तथाकथित गणना पत्रक आदेश निरस्त/स्थगित कर दिया है. यह एक राजनैतिक निर्णय है क्योकि जो प्रशासकीय निर्णय पर भारी पड़ा. मै शुरू से लिखता रहा हू की शिक्षाकर्मियों अध्यापको को आज तक जो मिला वह राजनैतिक लड़ाई और सत्ताधारियो के वोटरो के एक बड़े वर्ग के छिटकने के भय के फलस्वरूप ही मिला.........आगे भी इसी तरह मिलेगा. अध्यापक नेतागण चाहे अपनी अलग खिचड़ी पकाने का प्रयास करे प्रदेश का आम अध्यापक सदैव साथ मिलकर लड़ा है और आगे भी लड़ेगा. रतलाम में बना मोर्चा इसका उदाहरण है. प्रदेश का राजनैतिक ने नेतृत्व अध्यापक के अंदर सुलगती आग को समय रहते ठंडा करने की कोशिश के तहद अपना ही आदेश निरस्त कर दिया है अब फिर गेंद हमारे पाले में है. हम भी रिटर्न गोल कर सकते है क्योकि अध्यापको में अनुभवी वरिष्ठ आंदोलनों में तपे तपाये गुणी लोगो की कमी नही है जो दो दशको पुराने इस आंदोलन को तार्किक परिणीति तक पहुंचाने में पूर्णतः सक्षम है.

आगे होने वाला संघर्ष किसी मांग को मनवाने के लिए नही वरन जनवरी 2016 में पूर्ण हो चुकी छठे वेतनमान की मांग को नियमानुसार लागू कराने एवं वर्षो से लम्बित तबादला नीति की न्यायोचित मांग को पूर्ण करने के लिए होगा. आज 2015 के आंदोलन की सबसे बड़ी पूंजी चार लाइन का छठे वेतन का आदेश हमारे पास है शासन कितना भी विलंब करे कुत्सित प्रयास करे (जो की करके देख चुका आज आदेश निरस्त किया है) अंततः छठे वेतन के नियमानुसार अध्यापको का वेतन निर्धारण उसको करना ही होगा.....मगर कब ? यही यक्ष प्रश्न है जिसका उत्तर शासन नही हमारे पास है. जितनी जल्दी हमारा नेतृत्व एकजुट होकर शासन को चुनौती देगा उतनी ही शीघ्रता से हमारी समस्याओ का अंत हो जाएगा.

अभी कुछ दिन पूर्व लिपिक वर्गीय कर्मचारियों की मांगो के सम्बन्ध में बनी शासकीय अधिकार संपन्न कमेटी में कर्मचारी नेता भी शामिल किये गए है पूर्व में भी अनेक कमेटियो में कर्मचारी नेताओ को सम्मिलित किया जाता रहा है. माननीय सीएम साहब सार्वजनिक मंचो से हमारे प्रति सदाशयता दिखाते है उन्होंने पूर्व में भी लीक से हटकर निर्णय लेकर हमारा हिट किया है अतः एक अधिकार सम्पन्न कमेटी बने जिसमे स्कूल शिक्षा वित्त सहित सम्बंधित विभागों के अधिकारी सहित अध्यापक प्रतिनिधि सम्मिलित हो. उक्त कमेटी अध्यापको से सम्बंधित समस्त समस्याओ पर समय सीमा में रिपोर्ट देवे. अगर शासन पर दबाव बनाकर हम इसी प्रकार समस्या निवारण कमेटी बना सके और अपने नेताओ को उसमे सम्मिलित करा सके तो हमारे नेताओ की भी परीक्षा हो जायेगी क्योकि कमेटी की कार्यवाही रिकार्ड की जाती है. कहने का आशय यह है की आगे जो भी हो निश्चित रूपरेखा बनाकर समन्वयित प्रयासों से किया जाये. इससे अध्यापक भी निश्चिन्त होकर अपना कार्य कर सकेंगे अफवाहों पर विराम लगेगा प्रशासन से रोज रोज की टकराव से बचा जा सकता है. सम्पूर्ण क्रांति के इस आंदोलनकारी माहौल में यह प्रस्ताव बहुतो को अटपटा लग सकता है किन्तु वास्तविकता यही है की हमारी माँगे चरणबद्ध रूप से ही पूर्ण हो सकती है.

2016 लगभग आधा होने को है और छह माह बाद 2017 के शुरुवाती महीनो से प्रदेश में राजनैतिक बिसात बिछने लगेगी जिसमे आगे हर निर्णय राजनैतिक लाभ हानि के दृष्टिकोण से होगा. यदि हम धैर्य रखकर योजनाबद्ध तरीके से कार्य करेंगे हमारी हर मांग पूरी हो सकती है. नियमित वेतनमान लेने के लिए 17 वर्ष प्रतीक्षा की है साल छह महीने और सही........ अगर एकता नही हुई तो विधानसभा चुनावो के पूर्व शासन अलग अलग संघो से समझौते कर दीर्घकालीन नुकसान कर देगा. पूर्व का अनुभव सबको पता है. कोई एक संघ आंदोलन करे इससे आज की परिस्तिथियो में शासन पर कोई दबाव नही बन सकता है.

आपका रिज़वान खान, सामान्य अध्यापक.

अध्यापकों के लिए छठे वेतनमान के गणना पत्रक में विसंगति के चलते इसे मंगलवार को स्थगीत कर दिया गया, अब वित्त विभाग परीक्षण के बाद विसंगति दूर कर इसे जारी करेगा।

भोपाल। अध्यापकों के लिए छठे वेतनमान के गणना पत्रक में विसंगति के चलते इसे मंगलवार को निरस्त कर दिया गया। अब वित्त विभाग परीक्षण के बाद विसंगति दूर कर इसे जारी करेगा। विसंगति से नाराज राज्य अध्यापक संघ  15  जून को भोपाल में धरना-रैली की तैयारी में हैं।
      सुसनेर विधायक मुरलीधर पाटीदार इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मिले, उधर राज्य  अध्यापक संघ के अध्यक्ष जगदीश यादव  समेत कई पदाधिकारी शिक्षामंत्री पारसचंद्र जैन से मिलने उनके निवास पर  पहुंचे।
       पदाधिकारियों ने मंत्री जैन का घेराव किया । सूत्र बताते हैं कि मंत्री जैन ने भी मुख्यमंत्री को मामले की जानकारी दी। इसके बाद मुख्यमंत्री ने गणना पत्रक निरस्त करने के निर्देश दिए हैं। ज्ञात हो कि पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने कुछ दिनों पूर्व गणना पत्रक जारी किया था।
इसमें चार माह निकल गए और अध्यापकों को अप्रैल पेड मई के वेतन से छठे वेतनमान का लाभ नहीं मिल सका। मुख्यमंत्री के निर्देशों को लेकर रात करीब 8 बजे एसीएस एसआर मोहंती के कक्ष में विभाग के अफसरों की बैठक हुई जिसमें पत्रक निरस्त करने का निर्णय हो गया। हालांकि मोहंती ने कहा कि हम अपने स्तर पर परीक्षण कर रहे हैं। 

असर : 
अध्यापकों को छठे वेतनमान के लाभ के लिए और इंतजार करना पड़ेगा। 5 जनवरी को कैबिनेट ने एक जनवरी-16 से अध्यापकों को छठा वेतनमान देने का फैसला लिया था। उन्हें अप्रैल माह के वेतन से यह लाभ मिलना था, लेकिन गणना पत्रक जारी न होने के कारण अप्रैल एवं मई में छठे वेतनमान के आधार पर अध्यापकों का वेतन नहीं बनाया जा सका।

" वेतनमान गणना से संबंधित जो आदेश  जारी किया था ,उसे मुख्य्मंत्री ने स्थगित कर दिया है। सीएम ने गणना पत्रक से संबंधित फ़ाइल तलब की है ,उसका परिक्षण करने के बाद संशोधित आदेश जारी होगा। " 
पारस चन्द्र जैन ,मंत्री स्कुल शिक्षा 

" वेतनमान गणना आदेश में काफी विसंगतियां थीं। हम मांग करते हैं की वर्ष 2013 का जो आदेश था  उसी के अनुसार अन्य शिक्षकों एवं कर्मचारियों की भाँती लाभ मिलना चाहिए। सीएम को यही समस्या बताइ गयी। " 
मुरलीधर पाटीदार  विधायक सुसनेर 

Tuesday, June 7, 2016

विसंगति पूर्ण गणना पत्रक नितस्त ,जल्द संशोधित आदेश जारी होगा ।


   राज्य अध्यापक संघ ने श्री जगदीश जी यादव के नेतृत्व में शिक्षा मंत्री का किया घेराव ।। शिक्षा मंत्री को माननीय मुख्यमंत्री के नाम।ज्ञापन सौंपा । स्कूल शिक्षा मंत्री श्री पारस जैन ने अध्यापकों के वेतनमान के संबंध में 31 मई, 2016 को जारी आदेश को स्थगित कर आदेश का परीक्षण करने के निर्देश दिये श्री जैन ने कहा है कि आदेश का भलीभाँति परीक्षण करने के बाद ही उसे लागू किया जायेगा  । इसके बाद शासन ने देर शाम को 31 मई को जारी आदेश तत्काल प्रभाव से स्थगित कर दिया है।अब परिक्षण के बाद ही आगामी आदेश होगा।
        
 उल्लेखनीय है कि   राज्य अध्यापक संघ के सरक्षक श्री मुरलीधर पाटीदार ने  आदेश के संबंध में मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान   कोअपनी  आपत्तियों से अवगत करवाया था , माननीय मुख्यमंत्री जी ने तुरंत , अपने प्रमुख सचिव को को बुलाकर आधेश की विसंगतियों को सुधारने व् छटा वेतनमान शिक्षको की भाँति देने के निर्देश दिए । 

      संशोधित गणना पत्रक जारी होगा । 25 फरवरी 2016 को जारी आदेश यथावत है ।उसी आदेश में नविन वेतनमान का लाभ 1 जनवरी 2016 से देना को कहा गया है । प्रांताध्यक्ष श्री जगदीश यादव के साथ कई जिलो के प्रतिनिधि व जिलाध्यक्ष उपस्थित थे ।

    



Monday, June 6, 2016

राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा शिक्षण सत्र 2016-17 एवं आगामी वर्षों हेतु अहर्ताधारी एवं अनुभवी विशेषज्ञ प्रशिक्षको के आवेदन-पत्र का आमंत्रित किये गए हैं।

राज्य शिक्षा केंद्र द्वारा  शिक्षण सत्र 2016-17 एवं आगामी वर्षों हेतु अहर्ताधारी  एवं अनुभवी विशेषज्ञ  प्रशिक्षको  के आवेदन-पत्र का आमंत्रित  किये गए हैं। इसमें कोई शासकीय  या  अशासकीय  कर्मचारी/अधिकारी अपना आवेदन प्रस्तुत कर सकता है । 

राज्य स्त्रोत ग्रुप( SRG )के लिए  स्नातकोत्तर ,PHd ,MEd ,10  वर्ष का अध्यापन अनुभव  5 वर्ष का प्रशिक्षण अनुभव आवश्यक  है।  जिला स्त्रोत ग्रुप ( DRG )के लिए  स्नातकोत्तर ,MEd/BEd , 8  वर्ष का अध्यापन अनुभव  4 वर्ष का प्रशिक्षण अनुभव आवश्यक  है। विकासखण्ड  स्तर पर मास्टर ट्रेनर  ( MT ) के लिए स्नत्कोत्तर/ स्नातक BEd , 6 वर्ष का अध्यापन अनुभव  3 वर्ष का प्रशिक्षण अनुभव आवश्यक  है। विज्ञापन का प्रारूप आप हमारे अध्यापक जगत  ब्लॉग  के इस ब्लॉग के अंत में दी गयी लिंक से प्राप्त  कर सकते हैं। आवेदन का प्रारूप इस ब्लॉग में इमेज के रूप में भी उपलब्ध है। 

शासकीय और  अशासकीय  आवेदक को अपने नियोक्ता का आपत्ति प्रमाणपत्र  अवश्य  संलग्न करना है ,राज्य स्तरीय SRG के लिए आवेदन training.rsk2012@gmail.com पर 15 जून तक  प्रेषित करने हैं जिले के लिए डाइट में आवेदन भेजना है । प्रशिक्षको को सेवाकालिन,इंडक्शन प्रशिक्षन ,गतिविधि आधारित प्रशिक्षण ,दक्षता  संवर्धन संबंधी अन्य गतिविधियों और मॉड्यूल तैयार करने के लिए तैनात किया जाएगा। 
 SRG को राज्य शिक्षा केंद्र और DRG ,MT को डाइट के साथ  अनुबंध  करना होगा। आवेदको का चयन लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के  माध्यम से होगा।  इसके अतरिक्त राज्य शिक्षा केंद्र अन्य प्रशिक्षनो में भी इन शिक्षको की दक्षता का उपयोग कर सकता हैं।
आदेश और आवेदन पीडीएफ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को।




मेडिक्लेम और क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी लेते समय इन बातो का ध्यान रखें - वसीम अहमद ( रतलाम )

        स्वास्‍थ्‍य हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण विषय है। आप किसी भी उम्र या लिंग के हों आपके लिए स्वास्‍थ्‍य का ध्यान रखना बहुत महत्वपूर्ण है आज के इस आधुनिक युग में जब कि जीवन इतना अप्रत्याशित है। बीमारियों की बात करें तो हर साल नयी बीमारियों की संख्या बढ़ जाती है और ऐसे में स्वास्‍थ्‍य बीमा योजना लेना एक उचित निर्णय है  हमारा स्वास्‍थ्‍य इसलिए सुरक्षा और सावधानी का विषय बन गया है। आपको स्वास्‍थ्‍य बीमा महंगा लग सकता है लेकिन यह सुरक्षित भविष्य का एक अच्छा विकल्प है । स्वास्‍थ्‍य बीमा योजना सामान्यत: 3 महीने से कम उम्र के बच्चों से लेकर 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए होता है। अपने खर्चे को देखते हुए आप फैमिली फ्लोटर या व्यक्तिगत स्वास्‍थ्‍य बीमा भी करा सकते हैं ।
         आयकर अधिनियम की धारा 80डी के तहत स्वास्थ्य बीमा या हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसियों का प्रीमियम चुकाने पर इनकम टैक्स से छूट मिलती है। इसके तहत खुद के, जीवनसाथी, आप पर आश्रित बच्चों और अपने माता-पिता के लिए ली गई हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी पर एक साल में अधिकतम 15,000 रुपए तक के प्रीमियम भुगतान पर टैक्स छूट प्राप्त है। अगर आप अपने माता-पिता का भी हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम चुका रहे हैं, चाहे वे आप पर आश्रित हों या नहीं, तो आपको अतिरिक्त 15,000 रुपए यानी कुल 30,000 रुपए पर छूट मिलेगी। वरिष्ठ नागरिकों के हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम में छूट 20,000 रुपए तक है। अगर आपके माता-पिता वरिष्ठ नागरिक हैं, तो आपको कुल 35,000 रुपए और यदि आप भी वरिष्ठ नागरिक हैं, तो हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर कुल 40,000 रुपए पर इनकम टैक्स से छूट मिलेगी।
     
 हेल्थ इंश्योरेंश दो प्रकार के होते है सामान्य  और क्रिटिकल इलनेस
सामन्य पॉलिसी 

      एक बुनियादी स्वास्‍थ्‍य बीमा चिकित्सा का शुल्क‍, दवाओं का खर्च, चिकित्सा जाँच, अस्पताल के कमरे और दूसरे खर्च को कवर करता है । आपकी ज़रूरतों के अनुसार यह आपको सुरक्षा प्रदान करता है ,इनसे गंभीर बीमारियों और हृदय के दौरे जैसी समस्याओं को कवर मिलता है । बहुत सी बीमा कंपनियां गंभीर बीमारियों की स्थिति के लिए योजनाएं देती हैं ।डायबिटीज़ और कैंसर जैसी बीमारियों को कवर करने के लिए कुछ विस्तृत रूप से बीमा योजनाएं दी जाती हैं । ऐसी योजनाएं सर्जिकल चिकित्सा‍ और अस्पाताल में भर्ती करने के खर्च को भी कवर करती हैं ।

क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी 
       
 हॉस्पिटल और हेल्थकेयर के खर्च आजकल बढ़ते ही जा रहे हैं। इसके चलते ये सुविधाएं आम आदमी के दायरे से बाहर होती जा रही हैं। खासतौर पर हार्ट अटैक, आर्टरी की बीमारियां, किडनी फेल्यूअर, कैंसर या स्ट्रोक जैसी गंभीर बीमारी होने पर इलाज का खर्च बहुत ज्यादा हो जाता है। कोई भी इस तरह की गंभीर बीमारी होने पर न सिर्फ परिवार की आय बंद हो जाती है, बल्कि लाइफ स्टाइल में भी कई बदलाव आते हैं। कई लोगों का तो शरीर ही काम करना बंद कर देता है। कई बार इन बीमारियों के इलाज का खर्च इतना ज्यादा होता है कि यह हेल्थ इंश्योरेंस पॉलिसी से भी कवर नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में जनरल इंश्योरेंस कंपनियों की तरफ से दी जाने वाली क्रिटिकल इलनेस इंश्योरेंस (गंभीर बीमारियों का इंश्योरेंस) पॉलिसी बहुत काम आती है।

मेडिक्लेम और क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी में अंतर     मेडिक्लेम पॉलिसी एक तरह हॉस्पिटल के खर्च उठाने वाली पॉलिसी है। इसमें ग्राहक के चुने हुए सम इंश्योर्ड के हिसाब से हॉस्पिटल में हुए इलाज का खर्च मिलता है। मतलब 2 लॉख की पॉलिसी ली है तो आपको उतना खर्च मिलेगा। क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी में मरीज अगर पहले से तय बीमारी की शर्तों को पूरा करता है तो उसको इंश्योरेंस का सारा पैसा इकट्ठा मिल जाता है। इसका हॉस्पिटल के खर्च और इलाज से लेना देना नहीं है। इस पैसे को ग्राहक किसी भी तरह उपयोग कर सकता है। सीधे शब्दों में किसी को अगर कोई गंभीर बीमारी हो गई है तो इंश्योरेंस कंपनी सम अश्योर्ड का पूरा पैसा मरीज को दे देगी। मरीज अपने हिसाब से उस पैसे का उपयोग कर सकता है।
     मेडिक्लेम पॉलिसी में कई तरह की बीमारियों का इलाज होता है। जबकि क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी में कुछ गंभीर बीमारियां तय हैं इन्हीं का इंश्योरेंस होता है। इसमें कैंसर, आर्टरी बायपास सर्जरी, पहला हार्ट अटैक, किडनी फैल्युअर, बड़े अंगों का ट्रांसप्लांट, स्केलेरोसिस, स्ट्रोक अरोटा ग्राफ्ट सर्जरी, लकवा, ब्रेन ट्यूमर, कोमा, अंधापन, पार्किनसंस और अल्जाइमर जैसी बीमारियां शामिल हैं। अलग-अलग इंश्योरेंस कंपनियां कई तरह की दूसरी बीमारियों को भी कवर करती हैं। इस पॉलिसी में क्लैम लेने के लिए हॉस्पिटल में भर्ती होना जरूरी नहीं है। अधिकतर इंश्योरेंस कंपनियां बीमारी का पता चलते ही क्लैम दे देती हैं। मेडिक्लेम में कंपनी नेटवर्क हॉस्पिटल में कैशलेस की सुविधा देती है। वहीं बिना नेटवर्क वाले हॉस्पिटल में इलाज के खर्च को रिइंबर्स किया जाता है।
मेडिक्लेम में पॉलिसी में 3 महीने का वेटिंग पीरियड रहता है जबकि क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी में 30 दिन का होता है।
 क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान
        पॉलिसी में इंट्री की उम्र जितनी ज्यादा होगी आपके लिए ये उतना फायदेमंद होगा। इससे आपको अधिक उम्र में भी पॉलिसी खरीदने की सुविधा मिलती है।
      इंश्योरेंस पॉलिसी खरीदते समय पॉलिसी रिन्यूअल की उम्र को भी देखें। ये उम्र जितनी ज्यादा होगी आपको उतना फायदा होगा। अगर कोई कंपनी रिन्यूवल की उम्र साठ साल या कम रखती है तो शायद वो पॉलिसी कई लोगों के काम न आएं क्योंकि कई गंभीर बीमारियां इस उम्र के बाद भी होती हैं।
          क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी का सम इंश्योर्ड ( बिमा राशि ) आपकी सालाना कुल आय का डेढ़ से 2 गुना होना चाहिए। मतलब अगर आपकी सालाना आय 4 लाख है तो आप कम से कम 6 लाख या 8 लाख की पॉलिसी लें।   इस तरह की पॉलिसी में एक सर्वाइवल पीरियड भी रहता है। मतलब बीमारी होने के बाद कितने दिन जीवित रहने पर क्लैम मिलेगा। सामन्य तौर पर अलग अलग कंपनियों में ये समय 1 से 6 महीने का होता है।

क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी में टैक्स छूट का फायदा भी मिलता है।

     
      पॉलिसी में फ्री लुक पीरियड जितना ज्यादा होगा उतना ही अच्छा रहेगा। अगर आपको पॉलिसी पसंद नहीं आती है तो इस समय में आप पॉलिसी लौटा सकते हैं।क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी में जितनी ज्यादा बीमारियां कवर होंगी उतना ही पॉलिसी लेने वाले के लिए फायदेमंद रहता है।

इस पॉलिसी का कवर वेटिंग पीरियड खत्म होने के बाद ही शुरू होता है। वेटिंग पीरियड जितना कम होगा उतना ही अच्छा रहता है। कई कंपनियों में 4 साल तक का वेटिंग पीरियड होता है।

  कौन सी चीजें पॉलिसी में शामिल नहीं होतीं
       हर क्रिटिकल इलनेस इंश्योरेंस पॉलिसी सभी गंभीर बीमारियों को कवर नहीं करती हैं। कई बीमारियां पॉलिसी से बाहर भी होती हैं आमतौर पर सारी बड़ी बीमारियां इसमें कवर होती हैं। लेकिन कुछ सामन्य चीजें जो पॉलिसी से बाहर होती हैं। इसका मतलब ये होने पर क्लैम की रकम नहीं मिलेगी।

बिना मेडिकल के आधार पर ये बातें बाहर रहती हैं।

युद्ध या युद्घ की स्थिति
कानून तोड़ना (आत्महत्या भी शामिल)
खतरनाक गतिविधी में शामिल होना (जैसे की मिलिट्री एक्सरसाइज और खेल गतिविधि)
इन आधार पर होने वाली बीमारियों पर क्लेम नहीं मिलेगा
अत्यधिक शराब पीना और नशा मुक्ति कार्यक्रम का हिस्सा बनने पर
जन्मजात और जेनेटिक बीमारियां
कोई भी बीमारी जो एचआईवी संक्रमण से जुड़ी हो या एड्स
कोई भी इलाज जो गर्भावस्था से जुड़ा हो। इसमें गर्भपात और बच्चे के जन्म देने जिसमें सिजेरियन डिलेवरी भी शामिल है।


ध्यान रखें

आजकल की लाइफस्टाइल को देखते हुए कई तरह की बीमारियों के होने का खतरा पैदा हो गया है। कई बीमारियां जो पहले बुढ़ापे में होती थी आजकल युवाओं में भी हो रही हैं। इसका कारण ज्यादा काम के घंटे, तनाव, एक्सरसाइज का अभाव, खानेपान की अनियमित आदतें, जंक फूड, शराब और धूम्रपान है। आज की तनावभरी लाइफस्टाइल में मेडिक्लेम के साथ क्रिटिकल इलनेस कवर भी बहुत जरूरी है। ये पॉलिसी सभी जनरल इंश्योरेंस कंपनियां बेचती हैं। आज कल कई कम्पनी आप को मेडिक्लेम में दोनों तरह की  बिमा योजना साथ में भी उपलब्ध करवा रहे हैं। इस लिए सोच समझ कर ही स्वास्थ्य  बिमा पॉलिसी खरीदे। 

लेखक  श्री  वसीम  अहमद  (  रतलाम  )  वित्तीय  प्रबंधन   के  जानकार  है  व   AMFI  प्रमाणित वित्त   सलाहकार  हैं 

एक अध्यापक के मन में उपजने वाली जिज्ञास - राशी राठौर देवास

राशी  राठौर  देवास
         क्या हम सिर्फ और सिर्फ एक बार में ही इतना विशाल आंदोलन नहीं कर सकते की एक ही बार में अध्यापकों की सारी समस्याओं का समाधान हो जाए ताकि बाकी की बची नोकरी में हम अच्छे से बच्चों को पढा सकें और अपना जीवन भी आराम से गुजर सकें।बार बार आंदोलन करके ऐसा लगने लगा है कि हम अध्यापक कम आंदोलनकारी ज्यादा हैं।कई बार हम आंदोलनों के माध्यम से निर्णायक स्थिति में पहुँच जाते है और ऐन वक़्त पर हमारी आधी अधूरी मांगो पर समझोता हो जाता है। आधी मांगे हम अगले आंदोलन के लिए छोड़ देते हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है की सरकार सब कुछ देना चाहती है लेकिन हम शायद उसके सही हक़दार नहीं है। पंक्ति का आखरी अध्यापक अपना वेतन कटवाकर जोर शोर से आंदोलन करता है और शीर्ष से आधी अधूरी मांगों पर सहमति बनकर आंदोलन ख़त्म करने का फरमान आ जाता है।विसंगति युक्त गणना पत्रक से उन अध्यापकों को सबसे ज्यादा नुकसांन हो रहा है जो केवल अध्यापकीय नौकरी से ही आँक्सीजन ले रहे है।जिनके पास आँक्सीजन के दूसरे विकल्प है उन्हें इस गणना पत्रक से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अध्यापकों के सामने सबसे बड़ी चुनोती अध्यापक नेताओं के चयन की है।अध्यापकीय नेता बनने की कोई निर्धारित योग्यता तो है नहीं और न हीं कोई चुनाव प्रक्रिया है जिसका मन चाहे,जिसकी राजनीती में अच्छी पकड़ हो, जो आर्थिक रूप से सक्षम हो,जो महत्वाकांक्षी हो या शीर्ष नेता द्वारा अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया हो,ऐसे लोग अध्यापकीय नेता बनकार अध्यापकों को गुमराह करते है और संघ संघ खेलकर अपने वर्चस्व हेतु अध्यापकों की एकता में बाधा बनते हैं।अध्यापकीय नेताओं द्वारा अध्यापकों की सेवा करने का उद्देश्य तो धरा के धरा रह जाता है। रही बात आम अध्यापक की तो उसमे उपरोक्त गुण नहीं होते है इसलिए वो मजबूरी में दूसरों के इशारों के गुलाम हो जाते है।
     " एक बार दिल से जिद करो दुनिया बदलो। "

नहीं तो जो परम्परा पिछले 20 साल से चलती आ रही है वही चलती रहेगी।वोट देते रहो और सरकार बनाते रहो और शोषित होते रहो।  

लेखिका स्वयं अध्यापक हैं ।और यह उनके निजी विचार हैं ।

Sunday, June 5, 2016

रतलाम में अध्यापक महासंघ के गठन का ऐतिहासिक निर्णय

                 आज रतलाम जिले में सभी अध्यापक संघो के अध्यक्षगण पदाधिकारीगण एवम् समस्त अध्यापक पूर्व नियोजित कार्यक्रम अनुसार बैठक में उपस्थित हुए सभी ने एकमत होकर निर्णय लिया की ," जब तक प्रांत के सभी संघ एक मंच पर नही आते तब तक रतलाम जिले के समस्त अध्यापक संघ किसी भी संघ के प्रांतीय निर्णय का पालन नही करेंगे और रतलाम जिले का अपना कार्यक्रम सर्वानुमति से स्थानीय स्तर पर तय करेंगे और जिला स्तर पर अपना कार्यक्रम तय किया जाएगा   "  

       साथ ही  " यह निर्णय भी लिया गया की किसी भी प्रकार से  शोष्यल   मिडिया ,प्रत्य्क्ष या अप्रत्य्क्ष  रूप से  किसि भी संघ - संगठन और नेता के विरुद्ध कोई नकारात्मक टीपन्नी नहीं करेगा  न ही कॉपी पेस्ट कर के आगे बढ़ाएंगे  पिछली घटनाओं पर नकारात्मक टिपण्णी नहीं करेंगे या चर्चा नहीं करेंगे। '' 
             जिलास्तर पर आगामी रणनीति  पर 9 जून  को सायं काल 5 बजे " गुलाब चक़्कर  " पर बैठक कर के तय कर  की जायेगी--!!
अध्यापक महासंघ 
जिला रतलाम 



अशासकीय विद्यालयों के धंधे लिप्त शासकीय शिक्षक - एक अध्यापक

अशासकीय विद्यालयों के धंधे लिप्त शासकीय शिक्षक
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पिछला सत्र सभी शासकीय विद्यालय मै गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा वर्ष के रूप मै मनाया गया है। सरकार भी मुक्त हाथों से धनराशी प्रदान कर गुणवत्ता सुधारने के लिए  पुरजोर प्रयास कर रही है। प्रत्येक छात्र को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। किन्तु शासन के इन मन्सूबो पर शासन के द्वारा ही नियुक्त शिक्षक, अध्यापक, संविदाशिक्षक ही पानी फेर रहै है। ये शिक्षक पदस्थापना वाले विद्यालय की अपेक्षा स्वयं के विद्यालय को अधिक समय देते है। अपने निजीविद्यालय का संचालन ये स्वयं ही करते है। पदस्थापना वाली शाला का समय चुराकर स्वयं की निजीशाला के शिक्षण से लेकर प्रबन्धन तक के सभी कार्यों को अन्जाम ये शासकीय शिक्षक ही देते है।यही नही ये सब शिक्षा विभाग के नाक के नीचे ही चल रहा है। हद तो तब हो जाती है जब समय समय पर होने वाली बैठक जिसमै अशाशकीय शालाओ के लिऐ शासकीय अमले समय समय पर दिशा निर्देश जारी करने हेतु बैठक लेते है।, ये बैठक शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों द्वारा ली जाती है। ऐसी बैठको मै भी स्वयं के निजी शाला के संचालक के रूप मै ये शासकीय शिक्षक बडी शान से शिरकत करते है और आला अधिकारी चुप रहते है। यही नही इनकी निजी शाला के विज्ञापन तक मै ये अपना नाम गर्व से अंकित करवा शासन के नियमो को अंगूठा तक दिखाते है। शासन को ऐसे शिक्षको को चिन्हित कर इनकी पदस्थापना इनके अशासकीय विद्यालय से दूर करनी चाहिए व इस दिशा मै उचित कदम उठा देश के गरीब नोनिहालो का भविष्य सुरक्षित करना चाहिए।
लेखक के कहने पर नाम सार्वजानिक नहीं किया जा रहा है ।लेखक एक अध्यापक हैं।

राज्य अध्यापक संघ के संरक्षक श्री पाटीदार ने गणना पत्रक निरस्त करने की मांग की

    राज्य अध्यापक संघ के संरक्षक और सुसनेर के माननिय विधायक श्री मुरलीधर पाटीदार ने अध्यापक सवर्ग के लिए जारी 6 टवा वेतनमान के विसंगतिपूर्ण गणना पत्रक को निरस्त करने की मांग प्रदेश के मुख्यमंत्री से की है ।
    श्री पाटीदार ने अपने पत्र में कहा है की वर्त्तमान में जारी आदेश किसी भी प्रकार से शिक्षक के समान नहीं है और इस आदेश में 6 टा वेतन मान के सिद्धान्तों और नियमो  का उल्लंघन किया गया है ।
     श्री पाटीदार ने अपने पत्र में कहा है की इस आदेश में अंतरिम राहत के लिए जारी आदेश की अवहेलना भी की गई है ।
      श्री पाटीदार ने अध्यापको में व्याप्त आक्रोश से भी मुख्यमंत्री  को अवगत करवाया है ।


सरकार वास्तविक लाभ क्यों नहीं देना चाहती अध्यापको को - रिजवान खान बैतूल


कुछ अंदर की बाते.........

रिजवान खान -  वर्षो से पीड़ित संवर्ग से इंतिहा की हद तक दुश्मनी का क्या कारण हो सकता है जबकि विधायक मंत्री यहाँ तक की मुख्यमंत्री सार्वजनिक रूप से हमारे पक्ष में बयान देते है ? इसी यक्ष प्रश् का उत्तर और कारणों की पड़ताल में कुछ अनदेखे अनसमझे पहलू उजागर हुए है जिसमे से एक रोचक पहलू पर गौर करे........... 

वरिष्ठ वेतनमान से जुड़ा एक तथ्य जो हमारे वेतन निर्धारण में सबसे बड़ी रुकावट बन रहा है वह यह की हमारे 1998 2001 और 2003 के वरिष्ठ अध्यापक भाइयो को नियमानुसार नियमानुसार छठे वेतन निर्धारण के फलस्वरूप क्रमोन्नत हाई स्कूल प्राचार्य का वेतनमान और ग्रेड पे मिल जायेगी जो की एक संवर्ग विशेष बिलकुल नही चाहता. क्योकि जब वेतनमान और ग्रेड पे मिल जायेगी तो राजपत्रित अधिकारी का दर्जा भी देना होगा.......फिर ddo पॉवर का मामला.......फिर dpi में मलाईदार पदों पर नियुक्ति .................राज्य शिक्षा केंद्र में बड़े पदों पर नियुक्ति........ जनपद ceo जैसे पदों पर प्रतिनियुक्ति का मामला........... ऐसे

बहुत से दरवाजे बन्द करने की साजिश है.
अध्यापक सुचना क्रांति के युग में कंप्यूटर लेपटोप स्मार्टफोन से लैस है. बड़ी संख्या में pgdca bca mca यहाँ तक की सॉफ्टवेयर इंजीनियर तक हमारे संवर्ग में भरे पड़े है. अब चुनाव में sms भी ना कर सकने वाले हमारा रास्ता रोकने में लगे है. आज अध्यापक की योग्यता ही उसके रास्ते में रुकावट बन रही है.

लेखक खेल अनुदेशक ( अध्यापक ) हैं और यह उनके निजी विचार है

18 सालों में अध्यापक नहीं समझेे सरकारी भाषा - वीरेंद्र कुमार पटेल,शहडोल

वीरेंद्र कुमार पटेल/शहडोल। छठे वेतन का गणना-पत्रक जारी होने के बाद अध्यापकों में हाहाकार मचा हुआ है। 31 मई के पूर्व तक गणना-पत्रक का बेसब्री से इंतजार कर रहे अध्यापक अब गणना-पत्रक जारी होने का मातम मना रहे हैं। जहां अध्यापकों ने अपने वेतन बढ़ने की उम्मीदें लगा रखी थीं, वहां वेतन बढ़ना तो दूर उलटे वेतन कम कर दिया गया है। यदि अध्यापकों की राय मानें तो कुछ अध्यापकों के वेतन में 5000 रुपए तक की कमी आ जाएगी।
यदि छठा वेतन निर्धारण से अध्यापकों के वेतन में कमी आती है तो निश्चित रूप से सरकार का यह तुगलकी फरमान किसी अत्याचार से कम नहीं है परंतु इसके पीछे अध्यापक भी कम दोषी नहीं हैं।
यदि आप छठे वेतन की घोषणा के बाद अध्यापकों की गतिविधियों पर नजर डालें तो यह बात साफ हो जाएगी। अध्यापकों ने स्वयं मुख्यमंत्री से बात करने के बजाय मध्यस्थ का सहारा लिया जिसे उसके बाद सरकार की ओर से पारितोषिक भी प्रदान किया गया। हर अध्यापक जानता था कि सरकार आदेश में ही सारा खेल खेलती है फिर भी अध्यापकों ने मात्र घोषणा पर जश्न मनाना शुरू कर दिया। मुख्यमंत्री के साथ मंच पर बैठने और फोटो खिंचवाने की अभिलाषा ने आदेश में खेले जाने वाले खेल से ध्यान हटा दिया। पूरे मध्यप्रदेश में ऐसा जश्न मनाया गया कि विरोध की कोई गुंजाइश नहीं रही। जो काम सरकार को करना था वह काम खुद अध्यापकों ने कर दिया।
एक संगठन ने तो मुख्यमंत्री का अभिनंदन समारोह तक करने की तिथि घोषित कर दी किन्तु बाद में अपनों के विरोध के चलते कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा।
सवाल यह है कि क्या सिर्फ मुख्यमंत्री के साथ फोटो खिचवाने या उसके बाजू में बैठने के लिए आंदोलन किए जाते हैं या फिर उसका सरोकार अध्यापक हितों से भी होता है। यदि आंदोलन का सरोकार अध्यापक हित है तो फिर बिना कुछ मिले और आदेश के गहन अध्ययन के अध्यापक सरकार के पक्ष में चले क्यों जाते हैं। अध्यापकों का गुस्सा स्थिर रूप से टिक क्यों नहीं पाता है?
अब इस गणना-पत्रक में संशोधन के लिए आंदोलन किया जाएगा किन्तु अध्यापक अब हर हाल में नुकसान में है। हो सकता है सरकार गणना-पत्रक की गलतियां सुधार भी दे परंतु तभी शासकीय कर्मचारियों को सातवा वेतन दिया जाएगा। यदि अध्यापक गणना-पत्रक में संशोधन से ही खुश हो जाते हैं तो उनके सातवे वेतनमान की बलि चढ़ना तय है। इसके साथ ही आगामी चुनाव पूर्व आंदोलन में शिक्षा विभाग में संविलियन की मांग प्रमुखता से उठाई जाती किन्तु यहां तो मामला छठे वेतन का ही अटका पड़ा है और ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इसमें सुधार के बाद माला पहनाने की कतार में खड़े न हो जाएं। कुल मिलाकर 18 वर्षों के संघर्ष से अध्यापक कुछ नहीं सीख पाया , सिवाय मुख्यमंत्री का कृपापात्र बनने के।

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है और स्वतन्त्र टिपण्णीकार है  यह लेखक  के निजी विचार हैं।


एक दुसरे के आंदोलनों की निंदा की बजाय प्रसंशा करके भी एका कायम रखी जा सकती है - डी के सिंगौर

डी के सिंगौर - चाहे आप और लड़कर 6th pay पूरा ले लें....7th pay ले लें और शिक्षा विभाग में सम्विलियन भी करा ले पर इतना तो समझ आ गया होगा कि सरकार से लड़ना क्या होता है और राज्य अध्यापक संघ 21 सालों से सरकार से लड़ता रहा है और आज तक जो भी पाया है वह कैसे मिला होगा ,समझा जा सकता है।  खाली झोली लेकर लड़ना और बात है और
झोली में कुछ आ जाता है तो फिर लड़ना और बात है शुक्र है शिवराज जैसे CM  से ही पाला पड़ा दिग्गी राजा से लड़ते तो और समझ आता।  पाटीदार जी के MLA  बनने से हमें आपत्ति इसलिये नहीं है कि हमने उन्हे बहुत शुरू से शिक्षा कर्मियों के लिये लड़ते देखा है और लड़ना सीखा है उनके परिश्रम का सुफल उन्हें मिला अब उनके बगैर लड़ना हमे सीखना पड़ेगा।  सरकार ने पिछले 9  महीनों में जिस तरह से अध्यापकों को छकाया,नचाया,घुमाया,सताया,तरसाया.......उससे ;यही सिद्ध  होता है कि मुख्यमंत्री छल और प्रपंच में माहिर हैं और यह व्यवहार शिक्षा जैसे उत्कृष्ट कार्य में लगे कर्मचारियों के साथ किया जाना उनकी संवेदनशीलता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है , अब एक बार फिर इस छल और प्रपंच के विरोध में अध्यापक सड़कों पर आ रहे हैं अध्यापक संगठनों के एका की बात आम अध्यापक कर रहा है एक होना उतनी बड़ी बात नही है जितनी मांग पूरी होते तक एक बने रहना।  क्योकि इसका अनुभव बहुत अच्छा नही रहा है उन अनुभवों से सबक लेकर के साथ चलने की कोशिश करनी पड़ेगी एक न हो सके तो मांगपत्र (विस्तृत) तो बैठकर एक बनाया जा सकता है जब मांगपत्र एक होगा तो धीरे धीरे एका भी होने लगेगा एक दुसरे के आंदोलनों की निंदा की बजाय प्रसंशा करके भी एका कायम रखी जा सकती है।  एका को लेकर आम अध्यापक बहुत चिंतित दिखाई दे रहा है उसकी चिंता दूर करना अध्यापक नेताओं का काम है हालाकि एका की बाते अभी मात्र ओपचारिकता ही समझ आ रही है क्योकि लोगो को दिखाने मात्र के लिये सोशल मीडिया में एका की बाते की जा रही है सीधे संवाद स्थापित नही किया जा रहा है अंत में सार की बात लड़ाई लड़ी जाये तो सही रणनीति के साथ।  आन्दोलन में कई बड़ी कमियाँ रही है जिसका नतीजा सामने है।  अब तक श्रेय के लिये लड़े पर कुछ भी श्रेय नही मिला अब एक बार श्रेय की होड़ छोड़ के लड़कर देखे जरुर श्रेय मिलेगा
लेखक मंडला में वरिष्ठ अध्यापक है और उनके निजी विचार है। 

Saturday, June 4, 2016

आखिरकार वर्चस्व की लड़ाई में हार गया अध्यापक एक आम अध्यापक - मनीष पंवार झाबुआ

आखिरकार वर्चस्व की लड़ाई में हार गया अध्यापक एक आम अध्यापक  के वह सब सपने नेस्तनाबूद हो गए जो उसने गणना पत्रक को लेकर लगाये थे,सब सपने धूमिल हो गए जो उसने बंद आँखों से देखे थे में यह नहीं कहता हु की सपना नहीं देखना चाहिए परन्तु मेरे भाई लोगो ने उन तमाम नेताओ की बातो पर विस्वाश कर सपने देखे जो सिर्फ और सिर्फ अपनी रेटिंग बढ़ाने में लगे थे और यह सब हुआ आम अध्यपको की आम खीचतान और आपसी मतभेद से वो तमाम बाते तक कही गई सोशल मिडिया पर जो हम मुँह से बोलने में शर्म महसूस करे।परन्तु सब कहा गया लोगों ने शेयर किया और यह तमाम खीचतान की बाटे cid के माध्यम से प्रशासन तक पहुची और प्रशासन ने इसीका फायदा उठाया और जो हुआ सब आपके सामने हे। 2 लाख 80 हजार अध्यापक और तेरह संगठन तेरह संगठन के हवा हवाई नेता जो सिर्फ और सिर्फ अपने गणित ज्ञान में व्यस्त और इसी गणित में कैसे किस संगठन के नेता को निचा गिराये इन तमाम प्रयासों में ये यह सब भूल गए की अब जो होने वाला हे वो सब की ताबूत में आखरी कील ठोकने का काम करेगी अब अध्यापक सजग हो गया हे अब वो बहकाने में नहीं आएगा।मेरी उन तमाम साथियो से भी गुजारिश हे जो सिर्फ स्वार्थ शिद्धि और पाटीदार के विरोध में बोलते या लिखते रहते हे पाटीदार जी जो किया वह सबके सामने हे परन्तु सिर्फ पाटीदार जी का विरोध यह समझ से परे हे ,यह तो किस्मत की बात हे पाटीदार चुनाव जित गए और विधायक बन गए परन्तु हार जाते तो क्या होता इस पर किसी ने विचार नहीं किया ।में अब सभी साथियो से यही कहना चाहता हु की आपस के मतभेद और मनभेद खत्म करे सभी अपना अपना बेनर एक कोने में रखे और सिर्फ अध्यापक संघर्ष समिति बनाकर मैदान में उतर जावे ।अब अंतींम एवम् निर्णायक समय हे अगर हमने यह समय गवा दिया तो न संघ रहेंगे न इन संघो की राजनीति करने वाले नेता,इसलिए अपने अहम एवम् अपने स्वार्थ को तिलांजलि दे कर सिर्फ और सिर्फ अध्यापक हित की सोचे लाखो परिवार आपको दुआए देंगे।और उन तमाम साथियो से भी निवेदन करना चाहता हु की अपने अध्यापक होने के सबूत दे किसी भी ग्रुप में किसी भी प्रकार की अनर्गल बयान बाजी न करे एवम् शिष्टाचार एवम् शालीनता  का व्यवहार पेश करे ताकि सभी को यह अहसास हो की हम चाणक्य वंशज हे और समाज को एक नई दिशा देने का कार्य करते हे ।धन्यवाद मनीष पंवार झाबुआ 

मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार के सामने होंगे चार ऑप्शन -सैयद शाहिद मीर


           आज में जिस मुद्दे पर बात कर रहा हु वह बहुत ही अहम् और मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय  परिवारो के भविष्य से जुड़ा है । अगर इस मुद्दे पर आज विचार नहीं किया गया तो मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार को या तो परिवार बढ़ाने के लिए विचार करना पड़ेगा या फिर गरीबी का कूपन बनवाने  के किये लाइनों में लगना पड़ेगा जो बनवाना उनके लिए सम्भव नहीं होगा।
          जी हां ये मुद्दा है शिक्षा का। आज कल हर आदमी अपना पेट काटकर अपने बच्चों को शिक्षा दें रहा है। दोस्तों में एक स्कूल संचालक होने के साथ साथ पिता भी हु। में पिता होने व स्कूल संचालक होने के नाते पालको की आर्थिक व मानसिक परिस्थिति महसूस कर सकता हु।  एक और सरकार शिक्षा के निजीकरण में देश का भविष्य देख रही है तो वहीँमध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय  परिवार सरकारी व निजी स्कूलो के बीच पिसता नज़र आ रहा है। गरीबो के लिए आरटीई नियम लागू करने के साथ ही निजी स्कूलो की प्रारम्भिक कक्षा की फ़ीस पौने चार हज़ार रूपये कर दी है। इसका असर यह हो रहा है की वे छोटे स्कूल जिनकी फ़ीस हज़ार या दो हज़ार रूपये साल हुआ करती थी वे बढ़कर चार हज़ार रूपये से शुरू हो गई। और क्यों न हो सरकार खुद निशुल्क बच्चे पढ़ाने के एवज में ये शुल्क दे रही है। सरकार आरटीई के नियमो में जो शक्ति दिखा रही है उससे देश के कई मध्यमवर्गीय व् छोटे स्कूल बंद हो जायेंगे। जिसका खामियाज़ा भविष्य में  मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय  परिवार को भुगतना पड़ सकता है।मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय परिवार  जिनकी मासिक आय 5 हज़ार से 15 हज़ार रूपये है वे अपने बच्चों को जैसे तैसे 12 वी तो करा लेंगे लेकिन उच्च शिक्षा या तकनीकी शिक्षा के लिये सोचना पडेगा। उन्हें मजबूरन प्लेन यानी सामान्य कोर्स से डिग्री हासिल करना होगी जो भविष्य में किसी काम की नहीं रहेंगी। अगर बच्चे को उच्च शिक्षा दिला भी दी तो वह उसकी शादी करने या खुद का मकान बनाने का सपना पूरा नहीं कर पाएंगा। एक तरफ महंगाई तो दूसरी तरफ न मिलने वाली नौकरी आने वाली पीढ़ी पर क्या असर दिखाने वाली है उसका अंदाज़ा लगाना अभी सम्भव नहीं है। यानि अब रोटी कपड़ा और मकान के साथ शिक्षा को भी जोड़ लिया जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।
ये हो सकता है इसका हल
          सरकारी स्कूलो में पहले भी पढाई होती थी और आज भी। लेकिन सरकार ने शिक्षको को कोल्हू का बैल बना कर उन्हें उनके मूल उद्देश्य से भटका दिया है। अब वे पढ़ाते कम है और सर्वे करते ज्यादा नज़र आते है। सरकार सर्वे कार्य के लिए एक सर्वे विभाग बनाये और शिक्षको को इस कार्य से मुक्त रखे। वही पालक भी सरकारी स्कूलो में अपना भरोसा जताते हुए समय समय पर बच्चे की रिपोर्ट लेने जाए और शिक्षको का भरोसा हासिल करे। वहीँ सामाजिक संस्थाये भी अपने स्तर पर स्कूलो को गोद लेकर उसका संचालन करे।  हम समय पर नहीं जागे तो मध्यमवर्गीय परिवार शिक्षा से वंचित  हो सकता है। 
ये तो मेरा विचार व् सुझाव है आपका क्या विचार व् सुझाव है वह जरूर सोचे और किसी न किसी तरह सरकार तक पहुचाये ताकि आने वाला कल सुखद व विकासशील साबित हो सके।  अभी नहीं जागे तो भविष्य में आपके सामने ये चार  ऑप्शन होंगे।
         पहला  बच्चे की पढाई दूसरा अपना घर तीसरा बच्चों की शादी और चौथा बुढ़ापे के लिए जमा पूंजी। मर्ज़ी आपकी सोच आपकी ये देश भी हमारा है और बच्चे भी। इनमे से आप किसे चुनना पसन्द करेंगे । चारो या कोई एक ।
        अभी नहीं जागे तो भविष्य में किसी को दोष देने लायक भी नहीं रहेंगे हम। जागिए और अपने साथ ही देश के हीत में सोचिये।(सैयद शाहिद मीर )

संघर्षों के साये में असली आजादी पलती है : - सियाराम पटेल नरसिंहपुर

 

।। संघर्षों के  साये में असली आजादी पलती है  ।।           

प्रिय अध्यापक भाईयो और  बहिनों, 
सादर वंदे।                                  

      सरकार द्वारा हमेशा फूट डालो   और शासन करो की नीति अपनायी जा रही है। शासन द्वारा विभिन्न वर्गों में बांटा गया है यथा -  अध्यापक, संविदा शिक्षक, गुरूजी और अतिथि शिक्षक। सभी की  योग्यता समान  होने पर विभिन्न वर्ग भेदो में बांटा जाना और सेवा  शर्तों में भी असमानता रखा जाना इसी लक्ष्य व उदेश्य की पूर्ती करता   है। इन वर्गभेदों में इतनी असमानता रखी गयी है कि हम चाहकर भी एक नही हो सकते क्योंकि हर वर्ग को अपने हितों की  चिंता होना स्वभाविक है और इसी वर्ग भेद से शासन फुट डालने में    सफल होती है। जब भी हम संघर्ष और आंदोलन के माध्यम से अपने अधिकारों की पूर्ती हेतु एकजुट  होते हैं तो शासन इसी वर्गभेद का फायदा उठाते हुए किसी एक वर्ग   की मांग को विसंगति सहित आंशिक रूप से हल करती है,  जिससे अन्य वर्ग के साथियों का आक्रोश शासन के विरुद्ध न होकर अपने ही साथियों के विरुद्ध मुखर होता है। कुछ समय हम इसी आपसी विरोधाभास, अविस्वास व सेवाशर्तों  की असमानता के चलते विभिन्न संघो में विभाजित हो जाते हैं जिसका फायदा शासन वखूबी उठाता है और हम हाथ मलते और सिर धुनते रह जाते हैं।                                      
      इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी को अपने अधिकारों व हितों को  लेकर अपना पक्ष शासन के समक्ष   रखने हेतु अधिकार प्राप्त हैं, किन्तु कुछ समय से शासन ने अपने हितों की रक्षार्थ आवाज उठाने पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए कर्मचारियों के आंदोलनों को अवैधानिक घोषित करना, एक से अधिक संघठन होने पर किसी भी एक संघ को अपने पक्ष में करते हुए दवाब खत्म किया जाने हेतु  फुट डालने का सबसे कारगर शस्त्र बना लिया है। अतएव सभी साथियों से अनुरोध है कि शासन की इस नीति को मुहतोड़ जवाब देने हेतु अपने आपसी मतभेद व मनभेद को दरकिनार करते हुए राज्य  अध्यापक संघ द्वारा म.प्र.शासन के विरुद्ध अध्यापक हित में आगाज किये गए आंदोलन में अपना अमूल्य सहयोग प्रदान करेंगे। राज्य अध्यापक संघ अल्पवेतन भोगी कर्मचारियों का मातृसंघ है जिसने कर्मचारी जगत में नए कीर्तिमान स्थापित कर सफलताएं प्राप्त की हैं। राज्य अध्यापक संघ किसी अन्य संघ के विरुद्ध टीका टिप्पणी किये वगैर सदैव अध्यापक हित में कार्य करने वाला संघ है। राज्य अध्यापक संघद् वारा 1 जून को छटे वेतन की गणना शीट की होली जलाते हुए   शासन को आगाह किया गया है कि यदि गणना शीट में व्याप्त।        
       विसंगतियां यथाशीघ्र दूर नही की गयी तो 15 जून 2016 से नवीन शैक्षणिक सत्र की शुरुवात के साथ ही तालाबंदी की जायेगी। यथाशीघ्र  आप सभी को आंदोलन की चरणबद्ध रणनीति से अवगत कराया जाएगा।।        
                    
"संघर्षों  के साये में असली आजादी पलती है "    
                                                              
सियाराम पटेल                                                                                                                  
आई टी सेल,  राज्य अध्यापक संघ  मध्यप्रदेश।।             
                   

चिन्तन करे कि शासन प्रशासन से कैसे निपटे जोश में होश न खोये - नगेन्द्र त्रिपाठी -नरसिंहपुर

          मित्रों चाहे कोई भी संगठन रहा हो सबने अपने अपने सामर्थ अनुसार गणना पत्रक सही हो को लेकर   शासन, प्रशासन तक अपनी बात पहुचायी है इसमें कोई दो राय नहीं पर शासन और प्रशासन में बैठै नहीं चाहते की अपनी समस्या का समाधान हो ।
        इतिहास गवाह है जब से हमारे वर्ग की उत्पत्ति हुयी है आदेशों के लिये लडना पडा है चाहे सरकार किसी की भी रही हो पर यह भी सत्य है कि एनकेन प्रकारेण हमने आदेशों को भी बदलवाया है । अब भी जो बिसंगति है वह भी हम सब ही अपने बल से सुधरवायेगे और सुधर के ही रहेगी बस अपने ऊपर विश्वास करना होगा इसमें अधीरता की जरूरत नहीं है । शांत चित्त से चिन्तन करे कि शासन प्रशासन से कैसे निपटे जोश में होश न खोये ,नहीं तो फिर नर्मदा जल और कसमें कि यह शरीर आदेश के साथ ही घर वापिस आयेगा और क्या हुआ यह हम सब जानते हैं ।
        अत:सभी से आग्रह  कि धैर्य के साथ सभी आपस में चर्चा करें बिना एक दूसरे की बुराई और केवल अपने को ही श्रेष्ठ मानते हुये ।
सादर ।
नगेन्द्र त्रिपाठी -नरसिंहपुर

राज्य अध्यापक संघ ने 31 मई को होली जलवाकर आंदोलन का बिगुल भी बजा दिया ,15 जून से प्रदेश के समस्त सरकारी स्कुलो में प्रवेशोत्सव का बहिष्कार करके तालाबन्दी -जगदीश यादव


                                         

मेरे स्नेह अध्यापक साथियो,        
सादर वन्दे ।
सादर वन्दे ।
अध्यापको के छटे वेतनमान के गणना पत्रक के आदेश में सरकार ने अध्यापको को उनकी मूल मांग शिक्षा विभाग में भटकाने के उद्देश्य से ही विसंगति डाली हे। इस विसंगति के पीछे सरकार की मूल मंशा यह लगती हे की प्रदेश का अध्यापक और उनके संघ अपनी प्रमुख मांग शिक्षा विभाग में सविलियन को भूलकर छटे वेतनमान की विसंगति को दूर करवाने में ही छ आठ महीने उलझते रहेगे ।साथियो राज्य अध्यापक संघ ने 31 मई को ही आदेश विसंगति पूर्ण जारी होने पर सरकार के सम्मुख अपना विरोध दर्ज करवा दिया था। और पुरे प्रदेश में गणना पत्रक की होली जलवाकर आंदोलन का बिगुल भी बजा दिया हे। राज्य अध्यापक संघ 15 जून से स्कुल खुलने के साथ ही अपनी व्यापक रणनीति की तहत सम्पूर्ण प्रदेश में स्कुलो में तालाबन्दी करके छटे वेतनमान की विसंगति दूर करवाने के साथ ही अपनी प्रमुख मांग शिक्षा विभाग में अध्यापको का सविलियन होने तक अब अपनी यह लड़ाई जारी रखेगा।अध्यापक हित में जो भी अध्यापक हितेषी संघ या हमारे भाई निस्वार्थ भाव से अध्यापको की इस लड़ाई में शामिल होना चाहते हे राज्य अध्यापक संघ उन सभी संघठनो और  साथियो का स्वागत करता हे। और उनके साथ अंतिम मांग पूरी होंने तक यह लड़ाई जारी रखने का वादा भी करता हे । राज्य अध्यापक संघ अध्यापको का सबसे पुराना और वटवृक्ष रूपी संघ हे। आज अध्यापको के जितने भी संघ हे अमूमन सभी की जड़े राज्य अध्यापक संघ से ही कही न कही जुडी हुई हे। पूर्व में जो भी साथी अध्यापक हित में बेहतर कार्य करने के उद्देश्य से राज्य अध्यापक संघ से  अलग हुए हे वह भी सरकार की तुगलती नीतियों के आगे ही छलै गए हे। अध्यापक हित में मै अध्यापको के सभी संग़ठन प्रमुखों और साथियो से हम आग्रह करते हे की अध्यापक हित में सारे पूर्वाग्रहों को त्यागकर अध्यापको की इस लड़ाई में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाये और हम सभी मिलकर एकजुट होकर शिक्षा विभाग में सविलियन होने तक अपनी लड़ाई जारी रखे।अध्यापक हित में राज्य अध्यापक संघ सभी संघठनो और साथियो के विचारो और सुझावो को मानकर एकजुटता से ईमानदारी पूर्वक अब भी लड़ाई लड़ने को तैयार हे।

प्रदेश के अध्यापक हित में राज्य अध्यापक संघ अध्यापको की प्रमुख मांगों के निराकरण होने तक अब अपनी आर पार की लड़ाई जारी रखेगा। हम प्रदेश के सभी अध्यापको से आव्हान करते हे कि अपने बेहतर भविष्य की खातिर आगामी 15 जून से प्रदेश के समस्त सरकारी स्कुलो में प्रवेशोत्सव का बहिष्कार करके तालाबन्दी करके अध्यापक हित की इस लड़ाई में अपना योगदान दे। प्रदेश के सभी अध्यापको की मदद से हम यह लड़ाई जीतेगे यही विश्वास भी हे।
आपका
जगदीश यादव प्रांताध्यक्ष
राज्य अध्यापक संघ म.प्र.

Friday, June 3, 2016

शासन ने अध्यापको को मज़ाक का विषय बना रखा हे - अरविन्द रावल

   अध्यापको के छटे वेतनमान के गणना पत्रक की विसंगति की चर्चा मंत्रालय में जरूर सुनाई दे रही हे किन्तु अधिकारी की कार्य प्रणाली के चलते अभी एक दो महीने इस विसंगति के  सुधरने के आसार नज़र नही आते हे। या यू कहे की बिना मुख्यमंत्रीजी की फटकार से अधिकारी अध्यापको की विसंगति दूर करने वाले नही हे।
    क्योंकि सरकार में बेठे बड़े अधिकारी इस आदेश के बाद चाशनी देखना चाहती हे कि अध्यापको की सरकार प्रति क्या राय बनती हे। शासन को यह तो अच्छी तरह से पता हे की प्रदेश के करीब तीन लाख अध्यापक तेरह से ज्यादा संघो में अलग थलग होकर बिखरे पड़े हे और इस समय कोई भी संघ इस स्थिति में नही हे कि वह अध्यापक हित को लेकर कोई बड़ी और निर्णायक लड़ाई सीधे तोर पर सरकार से लड़ सकता हे। और सरकार के कुछ नुमाइंदे इस समय यह बात भी बड़े वजनदार तरीके से करते हे की ऐसी बिखराव की और एकजुटता के अभाव की स्थिति में यदि कोई एक दो संघ अपने बीस तीस हजार अध्यापको के साथ आंदोलन वगेरह भी करता हे तो उससे सरकार के कान में जू भी रेंगने वाली नही हे। और न ही प्रदेश के अन्य अध्यापक नेता यह चाहेंगे की अध्यापक हित में किसी प्रकार के आंदोलन का हिस्सा बनकर अपनी छवि प्रदेश के  मुखिया के सामने ख़राब की जाये।
    सन्देश साफ हे की टुकड़ो में बिखर कर अध्यापको की स्थिति कमजोर और खण्डित हो चुकी हे। ऐसे में कोई भी अध्यापक संघ का नेता सीधे तोर अध्यापक हित में मुख्यमंत्रीजी की आखो की किरकिरी नही बनना चाहेगा। अध्यापको के सभी प्रमुख भी दिली तोर पर यही चाहते हे कि प्रदेश के मुखिया के वे प्रिय पात्र बने रहे और सीधे संवाद की स्थिति बनी रहे।
   अब यदि छटे वेतनमान की विसंगतियो को वास्तव में दूर करना अध्यापक संघ प्रमुखों का ध्येय हे तो उन्हें व्यक्तिगत श्रेय लेने की होड़ छोड़कर सयुक्त रूप से एकजुट होकर मुख्यमंत्रीजी से शीघ्र मुलाकात करके इस विसंगति को शासन से दूर करवाने का ही एकमात्र विकल्प बचा हे। मुख्यमंत्रीजी से यदि एकजुट होकर अध्यापक नेता बात करते हे तो एक दो महीने में विसंगति दूर हो सकती हे। अन्यथा अलग अलग मुलाकात करके अध्यापको के नेता महीनो इस विसंगति को दूर नही कर सकते हे।
     अध्यापको के सभी संघ प्रमुखों से मेरा विनम्र आग्रह हे की टुकड़ो में बिखरने की ही यही परिणीति हे की आज शासन ने  अध्यापको को मज़ाक का विषय बना रखा हे। हर आंदोलन हर आदेश के बाद हमारे अपने ही लोगो को टुकड़े में बाटना शासन में बेठे लोगो की मंशा हे। यदि सभी अध्यापक संघ प्रमुख अब और  टुकड़े नही चाहते हे और निस्वार्थ भाव से अध्यापक हित चाहते हे तो सभी एकजुट होने ऐलान करे। मुझे उम्मीद हे अब भी एक हो जायेगे तो हम गढ़ जीत जायेगे।
- अरविन्द रावल

वेतन निर्धारण हेतु जारी आदेश की विसंगतियां मेरी नजर में ( एक समीक्षा ) :- सुरेश यादव

      जिस गणना पत्रक का हमें 5 माह से इंतज़ार था वह  आक्रोश के माध्यम से आग के हवाले कर दिया गया । आखिर आक्रोश क्यों है अध्यापको में ? क्या जारी करने वाले किसी अधीकारी ने यह नहीं देखा होगा की इस ,आदेश के गणना पत्रक ( रेडी रेकनर ) परिशिष्ठ 1 और 2 के आधार पर प्रदेश का कोई अध्यापक अपना वेतन निर्धारण करना चाहे तो ,यह सम्भव ही नहीं है । कहने का मतलब यह है की, उक्त पत्रक  सिर्फ आदेश का वजन बढ़ाने के लिए है इसके अतिरिक्त इनका कोई काम नहीं है ।
   साथियो सच्चाई यह है की सरकार हमारी प्राथमिकताएं बदलना चाहती  हैं , याद कीजिए 2013 से 2015 तक चुनावो में निकल गया, मई 15 में ऐसी स्थांतरण निति बनायीं गयी की महिला और निशक्त अध्यापको के स्थान्तरण भी नहीं हो पाये और हमारा ध्यान विसंगतियों पर रहा । आप को स्मरण होगा , सितम्बर 15 में हमारी क्या माँग थी , " एक मुश्त 6 टा वेतन मान दिसंबर 15 तक  दिया जाए ,2013 से विसंगतियों का एरियर दिया जाए और शिक्षा विभाग में  संविलियन  किया जाये ।"  फिर मुख्य्मंत्री महोदय  की मुम्बई में घोषणा, उसके बाद 6 महीनो में हमारी आदेश को लेकर प्रतीक्षा और जब जारी हुआ तो होली  दहन ।

   आप विचार कीजिये ,अब हम इस विचार में लगे है की कम से कम जो मिल रहा है वह तो कम न हो ,साथ ही अब भले 1 जनवरी 2016 से ही सही सब व्यवस्थित हो जाए ।  समझें अब  हम इस बात को  भूल गए की हमारा वेतन निर्धारण 2013 से सेवा पुस्तिका में किया जाए ,और 1 सितम्बर 13 से  सहायक अध्यापक और वरिष्ठ अध्यापक  को अंतरिम राहत में कमी का एरियर प्रदान किया जाए ।
     साथियो जैसा हम सोच रहे है यदि इस प्रकार वेतन कम हुआ तो सरकार का तो एक पैसा भी खर्च नहीं होगा फिर 1125 करोड़ कैसे खर्च होंगे ?  ध्यान रहे  मुलभुत नियमो के अनुसार नविन वेतन निर्धारण होने पर यदि किसी का सकल वेतन कम होता है तो  वेतन निर्धारण उसी स्टेप पर निर्धारित किया जाता है  किसी 
का सकल  वेतन कम नही किया जा सकता है । अब अगर सभी को वही वेतन मिलता रहा तो भी सरकार का एक पैसा  खर्च नहीं होगा ,तो भी 1125 करोड़ की बात बेमानी हुई।

फिर आखिर विसंगतियां  हैं  क्या  इस आदेश में ?  साथियो मैनें जितना अध्ययन किया है और जँहा तक मेरी समझ है ।  उसके आधार पर कुछ कमियाँ मुझे नजर आई है वह इस प्रकार है ,
(1)  वेतन निर्धारण पत्रक में विद्यमान वेतन  1 अप्रैल  13 की स्थिति  में नविन वेतन निर्धारण के आधार पर बनाया गया  है । इस प्रत्रक  में अध्यापक संवर्ग का जो विद्यमान  वेतन बताया  गया है वह वर्तमान में , हम में से किसी को भी नहीं मिल रहा है ,तो छठे  वेतन मान में  निर्धारण किया ही नहीं  जा सकता है ?

(2)  इस आदेश में अंतरिम राहत के आदेश 2013 की कंडिका 2 के बिंदु  (द) ii की तरह अंतरिम राहत के समायोजन का कोई उल्लेख नहीं है कंडिका के अनुसार " अंतरिम राहत सबसे पहले ग्रेड पे में और उसके बाद मूल वेतन में जोड़ी जातीं ।"  अभी स्थिति सपष्ट नहीं है। 

(3)  2007 से सेवा की गणना करने  पर  स्थिति सपष्ट नहीं है , 2013 में अंतरिम राहत प्रदान करने के लिए 1 अगस्त 13 तक को  8 वर्ष मान कर  अंतरिम राहत ज्ञात की गई  थी , जबकी 1 अप्रैल 07 से 1 अगस्त  13 तक सिर्फ 6 वर्ष हुए थे । साथियो मेरे द्वारा RTI के  माध्यम से अंतरिम राहत की  नस्ति प्राप्त  की गयी थी , जिसमे 8 वर्ष के आधार पर अंतर ज्ञात किया गया था  अर्थात 1 अप्रैल 07 को दो-दो वेतन वृद्धि लगा कर 1 अगस्त 13 तक 8 वर्ष हुए। वर्तमान में जारी आदेश में  यह  स्थिति सपष्ट नहीं है । 
(4)  वेतन निर्धारण 1 जनवरी 16 को किया जाएगा ,जबकि आज तक का इतिहास रहा है वेतन निर्धारण सेवा पुस्तिका में उसी दिनांक  से  किया जाता है जिस दिनांक से अंतरिम राहत प्रदान की जाती है । लेकिन इस बार सभी सिद्धांतों और नियमों को ताक पर रख दिया गया है ।  1 जनवरी 16 को वेतन निर्धारण होने पर और सब ठीक  हो जाने पर भी 7 वें  वेतन मान के लागू होने पर काफी अंतर हो सकता है।  

(5) क्रमोन्नति और पदोन्नति का गणना पत्रक ( रेडी रेकनर ) वेतन  निर्धारण के समय न तो आज तक कभी जारी हुआ है न भविष्य में कभी होंगे। 


इसके अतिरिक्त मुझे कोई विसंगतियां नजर  नहीं आरही है । क्योंकि सबसे बड़ी विसंगति तो यही है की हमे इस आदेश के आधार वेतन मिलना ही नहीं है ,बाकी 2009 के नियम और मूल भुत नियम से सब ठीक हो जाएगा। 
 
         माननीय मुख्य मंत्री जी आप और आप की  सरकार की नियत सच में अध्यापकों का  भला करने की है ,तो इस आदेश तो तत्काल  निरस्त कर के  सिर्फ 2 लाइन का यह आदेश जारी कर  दें की , " अध्यापक संवर्ग को शिक्षक संवर्ग के समान 6 टे  वेतनमान  की गणना 1 अप्रैल 2007 से की जाए और सेवा  पुस्तिका  में 1 सितंबर 2013 में दर्ज कर के ,1 जनवरी 2016 से नगद लाभ प्रदान किया जाए । एवं  वेतन निर्धारण  वेतन पुनरीक्षण नियम 2009 के अनुसार कीया जाएगा । "  आदरणीय मुख्य मंत्री जी आप और आप की सरकार विगत  13 वर्षो से प्रदेश में है ,में अन्य की तरह आप के अधिकारियों को दोष नहीं दूंगा ,जिम्मेदार आप है क्योकि इस सरकार और प्रदेश के मुखिया आप  है  तो जिम्मेदार भी आप ही हैं ।  आप ने हमारी सुविधाओं को बढ़ाया नहीं हमेशा कम किया है। जैसे अनुकम्पा नियम ,  उदाहरण कई हैं उन पर बाद में बात होगी ।  
यह समीक्षा मेरे निजी विचार हैं सुरेश यादव ( रतलाम ) 

ऐसे तो महीनों इस विसंगति को दूर नही कर सकते हैं : - अरविन्द रावल

अरविन्द रावल। अध्यापकों के छठे वेतनमान के गणना पत्रक की विसंगति की चर्चा मंत्रालय में जरूर सुनाई दे रही है किन्तु अधिकारी की कार्य प्रणाली के चलते अभी एक दो महीने इस विसंगति के सुधरने के आसार नज़र नही आते हैं। या यूं कहे की बिना मुख्यमंत्रीजी की फटकार से अधिकारी अध्यापकों की विसंगति दूर करने वाले नही है।
क्योंकि सरकार में बेठे बड़े अधिकारी इस आदेश के बाद देखना चाहते है कि अध्यापकों की सरकार प्रति क्या राय बनती है। शासन को यह तो अच्छी तरह से पता है की प्रदेश के करीब तीन लाख अध्यापक तेरह से ज्यादा संघो में अलग थलग होकर बिखरे पड़े हैं और इस समय कोई भी संघ इस स्थिति में नही है कि वह अध्यापक हित को लेकर कोई बड़ी और निर्णायक लड़ाई सीधे तोर पर सरकार से लड़ सकता है और सरकार के कुछ नुमाइंदे इस समय यह बात भी बड़े वजनदार तरीके से करते हैं कि ऐसी बिखराव की और एकजुटता के अभाव की स्थिति में यदि कोई एक दो संघ अपने बीस तीस हजार अध्यापकों के साथ आंदोलन वगेरह भी करता हैं तो उससे सरकार के कान में जू भी रेंगने वाली नही है और न ही प्रदेश के अन्य अध्यापक नेता यह चाहेंगे की अध्यापक हित में किसी प्रकार के आंदोलन का हिस्सा बनकर अपनी छवि प्रदेश के  मुखिया के सामने ख़राब की जाये।
सन्देश साफ है कि टुकड़ों में बिखर कर अध्यापकों की स्थिति कमजोर और खण्डित हो चुकी है। ऐसे में कोई भी अध्यापक संघ का नेता सीधे तौर अध्यापक हित में मुख्यमंत्रीजी की आखों की किरकिरी नही बनना चाहेगा। अध्यापकों के सभी प्रमुख भी दिली तोर पर यही चाहते हैं कि प्रदेश के मुखिया के वे प्रिय पात्र बने रहे और सीधे संवाद की स्थिति बनी रहे।
अब यदि छटे वेतनमान की विसंगतियो को वास्तव में दूर करना अध्यापक संघ प्रमुखों का ध्येय है तो उन्हें व्यक्तिगत श्रेय लेने की होड़ छोड़कर संयुक्त रूप से एकजुट होकर मुख्यमंत्रीजी से शीघ्र मुलाकात करके इस विसंगति को शासन से दूर करवाने का ही एकमात्र विकल्प बचा है।  मुख्यमंत्रीजी से यदि एकजुट होकर अध्यापक नेता बात करते है तो एक दो महीने में विसंगति दूर हो सकती है अन्यथा अलग अलग मुलाकात करके अध्यापकों के नेता महीनों इस विसंगति को दूर नही कर सकते हैं।
अध्यापको के सभी संघ प्रमुखों से मेरा विनम्र आग्रह है कि टुकड़ों में बिखरने की ही यही परिणीति है की आज शासन ने  अध्यापको को मज़ाक का विषय बना रखा हे। हर आंदोलन हर आदेश के बाद हमारे अपने ही लोगो को टुकड़े में बाटना शासन में बेठे लोगो की मंशा है। यदि सभी अध्यापक संघ प्रमुख अब और टुकड़े नही चाहते है और निस्वार्थ भाव से अध्यापक हित चाहते हैं तो सभी एकजुट होने ऐलान करे। मुझे उम्मीद है अब भी एक हो जायेगे तो हम गढ़ जीत जायेगे।
( लेखक स्वयं अध्यपक है और यह उनके निजी विचार हैं ) 

प्रमोशन में आरक्षण मामले में हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर अब सरकार खुद ही उलझ गई है

      प्रमोशन में आरक्षण मामले में हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देकर अब सरकार खुद ही उलझ गई है। इस प्रक्रिया के बाद अब पूरे प्रदेश में प्रमोशन रोक दिए गए हैं। प्रमोशन के लिए फिलहाल मप्र में कोई नियम ही नहीं शेष रह गया है। मंत्रालय का कोई भी अफसर इस मामले में हाथ डालने से डर रहा है। सवाल यह है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता, तब तक क्या करें। सरकार ने महाधिवक्ता से इस मामले में सलाह मांगी थी, परंतु उन्होंने भी कोई सलाह नहीं दी। अब सरकार अटार्नी जनरल से सलाह मांगेगी। पदोन्न्ति में आरक्षण मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई 23 सितंबर को होनी है।

   मंत्रालय सूत्रों के मुताबिक पदोन्न्ति में आरक्षण नियम रद्द होने के कारण मंत्रालय सहित सभी विभागों में पदोन्न्तियों पर ब्रेक लग गया है। ज्यादातर विभाग डीपीसी करने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग से मार्गदर्शन मांग रहे हैं, पर वो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं है। इस परिस्थिति से निपटने के लिए मुख्य सचिव अंटोनी डिसा के निर्देश पर सामान्य प्रशासन विभाग ने महाधिवक्ता से सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए यथास्थिति के निर्देश पर कानूनी स्थिति साफ करने के साथ अनारक्षित पदों पर पदोन्न्ति करने को लेकर सलाह मांगी थी।

     बताया जा रहा है कि महाधिवक्ता कार्यालय ने मंगलवार को शासन को अपना ओपिनियन भेज दिया। इसमें सिर्फ इतना कहा गया कि मामला सुप्रीम कोर्ट में होने के कारण इस पर अटार्नी जनरल से मार्गदर्शन ले लिया जाए।

    सूत्रों का कहना है कि अब इस मामले में मुख्य सचिव से बात करके सामान्य प्रशासन विभाग अटार्नी जनरल से सलाह मांगेगा। दरअसल, पदोन्न्ति में आरक्षण नियम को असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद प्रदेश में पदोन्न्ति का कोई नियम ही नहीं रह गया है। ऐसे में अनारक्षित या एकल पदों की पदोन्न्तियां भी अटक गई हैं। अतिरिक्त महाधिवक्ता पुरुषेंद्र कौरव ने सरकार को सलाह दिए जाने की पुष्टि की है। 


Wednesday, June 1, 2016

नरसिंहपुर में राज्य अध्यापक संघ द्वारा दिवंगत अध्यापक के परिजनों को सहायता प्रदान की गई

राज्य अध्यापक संघ नरसिंहपुर द्वारा आज दिनांक 01 जून 2016 को अध्यापक साथी स्वर्गीय श्री विश्वनाथ विश्वकर्मा के परिवार की सहायतार्थ एकत्रित राशि सौपने हेतु उनके गृहग्राम बिल्हरा विकासखंड चावरपाठा, जिला नरसिंहपुर पहुचकर जिलाध्यक्ष अजीत जाट, प्रांतीय प्रवक्ता नागेन्द्र त्रिपाठी, प्रदेश प्रतिनिधि कोमल सिंह पटेल, जिला उपाध्यक्ष विजय शर्मा, योगेन्द्र झारिया, ब्लाक अध्यक्ष चावरपाठा गोविन्द बुन्देला, ब्लाक चीचली अध्यक्ष दौलत सिंह पटेल, ब्लाक सांईखेड़ा अध्यक्ष मलखान सिंह मेहरा, लक्ष्मीकांत कौरव, देवराज पटेल,सियाराम पटेल , कमलेश शर्मा, महेंद्र प्रजापति, रघुबीर साहू करेली, सचिन गुप्ता, राकेश पटेल, ताराचंद चौधरी, नीतेश जैन, दुर्गेश तिवारी, श्रीमती मंजुला शर्मा, शिक्षक संघ से श्री वृन्दावन पटेल प्रधानपाठक, श्री पी.ए. खान प्रधानपाठक, श्री पूरनलाल पटेल प्रधानपाठक ने 40000 अंकन चालीस हजार की 9 वर्षीय जीवन बीमा पालिसी एवं 25000 अंकन पच्चीस हजार नगद कुल 65000 अंकन पेंसठ हजार की आर्थिक सहायता प्रदाय की गयी....