Friday, October 7, 2016

इलाहबाद हाई कोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है - नरेन्द्र कुमार पासी ( रतलाम )

नरेन्द्र कुमार पासी - इलाहबाद हाई कोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है | यह किसी की अस्मिता से जुड़ा प्रश्न नही होना चाहिए | क्यों की आज भारत का बहुत बड़ा वर्ग किसान है या गरीब है या दलित समुदाय से आता है | ऐसे में जब उनके बच्चो को शिक्षा न मिले तो उनके दिलो पर क्या बीतती होगी | यह सहज अहसास कर पाना बड़ा ही कठिन सवाल ?आज जहाँ सरकार द्वारा शिक्षा के अनेको प्रावधान कियेगए फिर भी हम आज शिक्षा के अधिकार से ही वंचित है | संविधान के अनुच्छेद 41 A के तहत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत मान्यता दी गई थी जिसके अनुसार, "राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर, शिक्षा और बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और विकलांगता के मामले में सार्वजनिक सहायता करने के लिए काम करते हैं, सही हासिल करने के लिए प्रभावीव्यवस्था करे “ /हालांकि संविधान निर्माणी सभा के अनेको सदस्य और स्वतः बाबा साहब अम्बेडकर यह चाहते थे कि समान शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार में शामिल हो और न्यायिक आदेश से लागू होने की व्यवस्था हो। परन्तु उस समय केन्द्र सरकार के मुखिया और निंयत्रको का यह तर्क था कि सरकार का खर्च और साधन इतने विकसित नही है कि इसे वैधानिक अधिकार या कानून के रुप में लागू कियाजा सके। अतः कुछ समय ढांचे के विकास को चाहिये और इसलिये अन्य मुद्दों की तरह इसे भी नीति निर्देशक मुद्दों के खण्ड में शामिल किया जाये जो कि सरकारों के लिये आदर्श हो और कुछ समय पश्चात जब आधार रुप ढांचे का विकास हो जाये तब अन्य मुद्देां के साथ समानशिक्षा के मुद्दे को भी मूल अधिकार के रुप में शामिल किया जा सकता है। पर अफ़सोस व दुखद यहाँ रहा की इसका कोई ठोस नियम या आदेश न बन सका | इसके पीछे तर्क था की भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत नही की इस खर्च को झेल चुके |एक यह भी अनुमान लगाया गया की आने वाली सरकारे 10-20-30 वर्षो में इसका नियम व आदेश बना लेंगे पर आज आजादी के 68 वर्ष बीत चुके है फिर भी हम लोगो को शिक्षा का समान अधिकार नही दे पाये | निजी स्कूलो के नाम पर आर्य समाज ईसाई मिशनरी संस्थायें, इस्लामिक मदरसा, गुरुद्वारा प्रंबधक सभायें जैसी अन्य धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से शिक्षा के प्रसार के लिये स्कूल कालेज आदि खोले गये थे परन्तु यह सामाजिक हित में और गरीब लोगो को भी शिक्षा देने के लिये न्यूनतम फीस आदि के आधार पर शुरुकिये गये थे।इनमें व्यापार या मुनाफा नही था और न ही निजी मालकियत थी बल्कि इनके पीछे समाज सेवा शिक्षा का विकास और परोपकार की भावना थी। परन्तु कुछ वर्षो के पश्चात समाज के ताकतवर सपन्न और प्रभावी लोगो ने अपने बच्चों के लिये पृथक और मंहगे स्कूल शुरु कराये जैसे दून स्कूल डेली कालेज और ऐसी ही अन्य शिक्षण संस्थाओं को राजा महाराजा या उद्योगपतियों के पैसे से खड़ा करना आंरम्भ हुआ तथा शिक्षा को अमीर और गरीब-बड़े और छोटे ताकतवर और कमजोर राजा और रंक के बीच बांट दिया गया। पुराने राजाओं, धनपतियों और राज सत्ता पर बैठे नेताओं तथा अफसर शाहो के बच्चे इन बड़ेस्कूलों में पढ़ाये जाने लगे जहां पढ़ाई का माध्यम सत्ता प्रतिष्ठान की भाषा अंग्रेजी हो गई और उच्चवर्गीय और उच्च वर्णीय ढ़ाचे को स्थाई तौर पर बरकरार रखने के लिये शिक्षण संस्थाओं में भाषा महत्वपूर्ण माध्यम बन गई।डा.राममनोहर लोहिया ने नारा दिया था ’’राष्ट्रपति हो या चपरासी की संतान सबकी शिक्षा एक समान’’ लोहिया इस बात को जानते थे कि अगर अफसर और चपरासी का बेटा, सम्पन्न और गरीब का बेटा , उद्योगपति और किसान का बेटा, बड़ी जात और दलित का बेटा जब एक ही स्कूल में साथ-साथ पढ़ेगे तो भेद-भाव मिटेगा |राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी तथा सबको समान अवसर प्राप्त होगे,जिससे योग्यता और क्षमता का विकास भी उसी के अनुसार होगा। यह बड़ा विचित्र है कि हमारे देश के कुछ नौजवान और कुछ लेाग जो आरक्षण को समानता का विरोधी मानते है आरक्षण तो मिटाना चाहते है| आरक्षण मुक्त भारत का नारा लगाते है परन्तु समान शिक्षा की बात नही करते। वे यह तो कहते है कि 68 साल आरक्षण को हो गये इसे खत्म करना चाहिये परन्तु वो यह नही कहते कि 68 साल हो गये कि अब नीति निर्देशक मुद्दों को संवैधानिक प्रावधान बनना चाहिये तथा सबको समान शिक्षा का अवसर मिलना चाहिये।असमान शिक्षा भी एक प्रकार का आरक्षण है जिसमें सम्पन्न और ताकतवर के बच्चो को पद और पैसे के आधार पर शिक्षा के विशेष अवसर है। इसका आधार योग्यता नही है बल्कि मात्र आर्थिक या सत्ता प्रतिष्ठान की ताकत ही योग्यता है। यह नौजवान मित्र बड़े-बड़े डोनेशन वाली (जो वस्तुतः भ्रष्ट व काला धन होता है) उस शिक्षा प्रणाली का भी विरोध नही करते जिसमें लाखो करोड़ रुपये देकर अयोग्य छात्र डाक्टर, इंजीनियर आदि बन जाते है और इसीलिये समाज के एक बड़े हिस्से में उनकी मांग और नीयत संदिग्ध रहती है। अब देश में सरकारी शिक्षण संस्थाये और विशेषतः प्राथमिक शिक्षा मैदान के बाहर नजर आती है। नये सरकारी स्कूल खुलने के बजाय बंद हो रहे है। परोपकार के नाम पर शुरु किये जाने वाली धार्मिक और सामाजिक संगठनों के द्वारा चलाये जाने वाले स्कूल बंद हो रहे है| कहने को तो सरकार ने शिक्षा का कानून RTE 2009 में पारित कर दिया है , निजी शिक्षक संस्थाओ को 25 प्रतिशत स्थान गरीबो के बच्चो को आरक्षित रखने का प्रावधान कर दिया है। पर यहतो कानून की किताबो में ही सिकुड़ कर रह गया है | स्कूलो में प्रवेश भी मिल जाये पर विद्यालय में लगने वाली वर्दी (यूनिफार्म) महँगी किताबे ,कापियां ,स्कूलकी दुरी की वजह से साधन याने स्कूल प्रबंधन की चलने वाली महँगी किराये वाली बस (BUS) ,एवं विद्यालय में लगने वाली शिक्षण शुल्क के अलावा अन्य लगने वाली शुल्क की भरपाई कौन करेगा ,,कोर्स में अनेक प्रकार के प्रोजेक्ट बनाने के लिए सहायक सामग्री स्टेशनरी कम्प्यूटर ,प्रिंटर आदि कहाँ से लाये जाये ,यह सारी बाते या समस्याए एक गरीब परिवार नही झेल सकता |भारत की 15 वी जनगणना(वर्ष 2015) के अनुसार देश में साक्षरता 74.04 फीसदी है| जिसमे पुरुष साक्षरता 82.14 फीसदी और महिला साक्षरता 65.46 फीसदी हो गई | परइस बात का ध्यान रहे की शिक्षित होना और साक्षर होना दोनों में भिन्नता है | अब समय आ गया है जब”” शिक्षा कीही नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात होनी चाहिये”” |यही कारण है कि””सबको शिक्षा-अच्छी शिक्षा”” हमारा नारा है।जब सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर ,लिपिक,चपरासी,किसान ,दलित आदि जब सभी के बच्चे एक ही स्कूल में एक ही छत के नीचे एक ही अध्यापक से शिक्षा ग्रहण करेंगे |तभी हम सभी समान शिक्षा का अधिकार दे पाएंगे |आज मध्यप्रदेश में शिक्षा की हालत बहुत ही दयनीय है जिसके कारण आज शिक्षा का व्यापारीकरण हो गया है| सरकारी स्कुलो का रुख खासकर प्रायमरी स्तर पर केवल गरीब के बच्चे मध्यान भोजन के लिए या छात्रवृत्ति के लिए नाम मात्र को स्कूल पहुँच रहे है | वही शिक्षको में अनेक कटेगिरी का निर्माण शासन ने कर रखा है /अतिथि , गुरूजी, संविदा शिक्षक ,शिक्षाकर्मी ,नियमित शिक्षक ,पद एक ,कक्षाए भी पढ़ाने को एक ,पर दुर्भाग्य कीइनका वेतन अलग-अलग है |ऐसे में मानसिक तनाव झेल रहा मध्यप्रदेश का शिक्षक अपने नियमतीकरण के लिए कही स्कूल बंद ,कही हड़ताल ,कही ज्ञापन ,कही जेल में बंद रहकर सरकार की नीतियों व वादा खिलाफी के प्रति अपनी जंग जारी रखे हुए है ,,,ऐसे में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा,विद्यालयों का सही सञ्चालन हो पाना आज “”दूर की कौड़ी साबित”” हो रहा है |

सरकारी विद्यालयों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की कमी के कारण :---------------------------------------------------
01. विद्यालयों को सही संचालित करने में सरकार की इच्छाशक्ति की कमी |
02. नेताओ के द्वारा आपने वोटर्स तैयार करने के लिए शैक्षणिक घोषणाए |
03. गुणवत्तापूर्ण शिक्षक/ शिक्षिका की कमी
04. शिक्षक/शिक्षिका को अन्य शैक्षणिक कार्यो में उलझाये हुए रखना |
05. शिक्षको को पुरे वर्ष स्कूल के बाहर जनगणना, मतदाता सूचि का संधारण,ग्राम सर्वे ,BPL सूचि तैयार करना ,पशु गणना ,मध्यान भोजन कीजानकारिया जुटानाआदि अनेक ऐसी ही योजनाओ को राष्ट्रिय कार्य का नामदेकर शिक्षक/शिक्षिका से करवाया जाता है |
06. गुणवत्तापूर्ण व नियमानुसार एवं सर्व सुविधायुक्त विद्यालय ईमारतका न होना |
07 .विद्यालयों में पानी ,साफ-सफाई,रौशनी,साफसुथरे लैट्रिन-बाथरूमोका न होना |
08. विद्यालय का सही प्रबंधन न होना |
09. विद्यालयों में होने वाली मानिटरिंग को सही अन्जाम न देना ,,यह केवल खानापूर्ति तक सीमित रहा गया है |
10. अधिकारियों का अपनी जेब गरम करने से फुर्सत नही जिसकारण विद्यालयों की सुविधा एवं पढाई लिखाई पर ध्यान देनेका ढुलमुल रवैया |

यदि सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर,लिपिक,चपरासी, किसान ,दलित आदि जब सभी के बच्चे एक ही स्कूल में एक ही छत के नीचे एक ही अध्यापक से शिक्षा ग्रहण करेंगे तो इसके परिणाम भी बेहद रोचक होंगे |साथही भारत देश का जो एक बड़ा तबका जो की शिक्षा से अछूता या कहे शिक्षा के नाम पर साक्षर तो है पर शिक्षित नही है |ऐसे बदलाव से समाज पर भी गहरा और भविष्य में सामाजिक भेदभाव मिटाने में कभी सहायक सिद्ध होगा |

समाज पर प्रभाव :---------------------
01. सभी छात्र एक जैसी वर्दी (यूनिफार्म) पहनेगें तो न कोई आमिर दिखेगा न ही कोई गरीब दिखेगा
02. सभी छात्र एक जैसी किताबो का अध्ययन करेंगे जिससेसभी का ज्ञान बुद्धि-लब्धि के हिसाब से एक जैसा होगा|
03. सरकार के द्वारा स्कुलो में उपलब्ध करवाए गए पढाई–लिखाई के साधन भी एक जैसे होंगे |
04. सबसे अहम बात की गरीब बच्चो को पढाई करने में हीन भावना का शिकार भी नही होना पढ़ेगा |
05. कक्षा में एक अध्यापक सभी छात्रो को एक जैसा ही पढ़ेगा ,यह नही होगा की ये गरीब छात्र है की यह अमीर छात्र है |किसी एक पक्ष को इंगित नही करेगा |
06. अमीर छात्रो को अलग से कोई अन्य भाषा नही पढ़ाई जाएगी ,जैसा की बड़े निजी विद्यालयों में होता है |सभी को एक ही पाठ्यक्रम से पढाया जायेगा |
07. एक साथ स्कूलो में बैठक व्यवस्था होगी | क्यों की अमीर गरीब का भेदभाव अभी भी समाज में व्याप्त है |
08. जब सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर , व्यापारीके पुत्र/पुत्री जब सरकारी स्कूलो में पढेंगे तो आपने आप ही सभी स्कुलो पर विशेष ध्यान देना शुरूकर देंगे और स्कुलो की खस्ता हालत या लचर व्यवस्था में सुधार आना शुरू हो जायेगा |
09. शिक्षको को सही वेतनमान और सही समय पर पगार(पेमेंट) मिलना शुरू हो जाएगी |
10. वर्तमान में जो हम भारत की साक्षरता 74 प्रतिशत बताते है यही शिक्षा में परिवर्तित हो जाएगी ,फिर हर वर्ग का छात्र देश के प्रति देशप्रेम और देश के संसाधनों कोगुणवत्तापूर्ण उपयोग के बारे में सोचेगायह इलाहबाद हाई कोर्ट का बहुत ही सराहनीय कदम है|
इससे समाज ही नही देश में भी शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव आएंगे | 

लेखक सवयं अध्यापक है और यह इनके निजी विचार है -यह लेख बुधवार और गुरूवार को शिक्षा विमर्श में चर्चा के विषय 
'  माननीय ईलाहबाद उच्च न्यायालय का आदेश जिसमे प्रत्येक लोकसेवक "अफसर ,कर्मचारी ,विधायक और सांसद " को अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने का आदेश  ' में प्रथम स्थान पर चुना गया है . 

Wednesday, October 5, 2016

RTE रूपी कमान से निकला एक तीर 25% फ्री....निशाने दो शिक्षक और समुदाय-श्रीराम राठौर (खातेगांव)

श्रीराम राठौर  -साथियों सादर वंदे.......RTE (शिक्षा का अधिकार अधिनियम) के प्रावधान अनुसार वंचित और कमजोर वर्ग के बच्चों का अशासकीय शालाओं की न्यूनतम कक्षा में 25% (न्यूनतम) प्रवेश के संबंध में बात करने से पहले यह सोचना आवश्यक हो जाता है कि हर सिक्के के 2 पहलू होते हैं इस विषय पर यदि दोनों पहलुओं को साथ लेकर चला जाए तभी हम सही निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं।
मेरे विचार से सर्वप्रथम इसकी बिंदुवार पक्ष विपक्ष के साथ समीक्षा कर ली जाये.....
25% निःशुल्क प्रवेशित बच्चों का शासकीय विद्यालयों पर पड़ने वाले प्रभावों तथा उनके कारणों के संबंध में यदि विस्तृत रूप से चिंतन किया जाये तो निम्न तथ्य सामने आते है......
1)  शासकीय शालाओं में प्रवेश की कमी :- अशासकीय शालाओं में न्यूनतम कक्षाओं में 25% निःशुल्क प्रवेश के कारण हमारे शास.विद्यालयो में साल-दर-साल नव प्रवेशी बच्चों का अकाल सा पड़ गया है, इस प्रवेश रूपी अकाल को हम समुदाय से अपना जीवित संपर्क कर अपनी शाला की विशेषता बता कर और हमारे कार्यो से दूर कर सकते है 25% फ्री का शासकीय विद्यालयों पर पड़ने वाला यह मुख्य प्रभाव है।
2) यह योजना शासकीय शालाओं का निजीकरण की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है,शासकीय शाला की न्यूनतम कक्षा से साल दर साल बच्चो की संख्या उसी अनुपात में अगली कक्षाओ में आगे भी बढती चली जाती है विगत तीन चार वर्षो में 25% न्यूनतम तथा इससे भी अधिक बच्चों का प्रवेश निजी विद्यालयों में प्रवेश दिया जाकर शासन द्वारा इसकी फीस प्रतिपूर्ति भी की गई परन्तु इस वर्ष शासन द्वारा  निजी विद्यालयों हेतु इस प्रक्रिया को ऑनलाइन के माध्यम से किया जाकर विभिन्न कठिन प्रावधान भी इसमें जोड़े गए जो की शास.शालाओ और हमारे पक्ष में रहा है यह हमारे लिए एक अच्छा संकेत भी है।
3) एक प्रश्न यह भी उठता है की 25% फ्री बच्चों पर खर्च की जाने वाली राशि का उपयोग निश्चित रुप से शासकीय विद्यालयों में होना चाहिए था जिससे शासकीय विद्यालयों की अपूर्ण व्यवस्थाओं को पूर्ण किया जा सकता था वैसे शासन हमेशा पूर्ण व्यवस्था के झूठे दावे करता रहता है इस सम्बन्ध में भी हमें शासन का ध्यान आकृष्ट करना चाहिए।
समुदाय पर 25% फ्री भर्ती के पड़ने वाले प्रभाव के बारे में भी हमें चिंतन और मनन करना होगा...
1) आज वर्तमान में अशासकीय विद्यालयों की चकाचौध के कारण कमजोर वंचित समूह के लोग भी अपने बच्चो का प्रवेश अशासकीय शालाओ में कराना चाहते है RTE में 25% का प्रावधान भी समुदाय की भावना को ध्यान में रखकर किया गया है, कही न कही हम भी इसके लिए जबाबदार है हमें समुदाय को हमारी और हमारी शालाओ का प्रचार प्रसार कर स्वयं की योग्यता को साबित करना ही पडेगा।
2) वंचित वर्ग के लोग जो अपने बच्चो को अच्छे सर्वसुविधा युक्त अशासकीय  शाला में 25% के माध्यम से प्रवेश दिलाते है वो शाला के अन्य खर्च जैसे गणवेश पुस्तकें टिफिन और आवागमन के साधन आदि वहन नहीं कर पाते कही न कही ये बात समाज में कुंठा की भावना एवं बच्चो एवं पालको में हीन भावना पैदा करती है यह 25% फ्री योजना का एक कमजोर बिंदु है।
3) बड़े और सर्वसुविधायुक्त अशासकीय विधालय 25% भर्ती के संबंध में सहयोग की भावना नहीं रखते तथा छोटे ऐसे विद्यालय जिनकी फीस RTE वाले फ्री बच्चो से कम है वे विद्यालय इस योजना में अधिक रुचि लेते है, अशासकीय शालाओ के इस प्रकार के रवैये से भी कही न कही समुदाय भ्रम में पड़ रहा है।
निष्कर्ष:- साथियों सारे बिन्दुओ पर विचार करने के पश्चात यह कहना उचित होगा समाज को इस योजना में लाभ के साथ साथ अप्रत्यक्ष रूप से हानि भी हो रही है, साथ ही कहीं ना कहीं इस मामले में कमजोर पक्ष के रूप में हम लोग भी नजर आते हैं निश्चित रूप से समुदाय को हम हमारी विशेषताएँ नहीं समझा पा रहे है, और नहीं समुदाय से आपसी सामंजस्य भी बैठा  पा रहे है और न ही वर्तमान में पालको से हमारा जीवित संपर्क ही रहा है।
एक बात और भी सामने आती है साथियो, हमारे द्वारा होने वाले आंदोलनों में भी 25% फ्री बच्चो का मुद्दा तथा शास.विद्यालयों का निजीकरण का मुद्दा भी हमें सम्मिलित करना चाहिए तथा हम शिक्षकों को समुदाय से अशासकीय विद्यालयों के प्रति समुदाय की भावना को भी हमारे उत्कृष्ट कार्यो के द्वारा बदलना ही पड़ेगा। साथियों यह तो निश्चित है कि यदि हम अपने कर्तव्य पर 100%खरे उतरे तो शासन 25% फ्री भर्ती के साथ ही ऐसे और भी सैकड़ों प्रयोग हमारे विद्यालय और हमारे समाज पर कर ले तो भी इस तरह के कपटता पूर्वक रवैये में कभी भी सफल नहीं हो सकती क्योंकि हम राष्ट्रनिर्माता  और युगद्रष्टा की भूमिका में है,आज भी समाज हमारा अनुसरण करता है। हमारे  अस्तित्व को बचाने और हमारी शक्ति को पहचानने की आवश्यकता और जरूरत मात्र है, सरकार का यह जो RTE की कमान से निकला हुआ 25% का तीर है निश्चित रुप से हम इस तीर को मोड़ सकते हैं इतना सामर्थ और शक्ति तो हमारे अन्दर मौजूद है।।
(लेखक स्वयं  अध्यापक और यह उनके निजी विचार है ।)RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव )
संयुक्त रूप से प्रथम स्थान  पर पर यह लेख चयनित किया गया।

25% नही 100% छात्रों को निजी स्कूलों में भेजने की साजिश है ये नियम - सचिन गुप्ता (खितौली)


RTE के तहत 25% छात्रों को निजी स्कूलों में भेजने की सरकार की मंशा चाहे जो भी हो लेकिन इस निर्णय से सरकारी विधालय ,वंचित वर्ग ,और समाज इन सभी पर परोक्ष अपरोक्ष रूप से गहरा असर हो रहा है।
हम सभी और सरकार भी यह जानती है कि सरकारी स्कूलों में कमजोर,वंचित और सामाजिक रूप से पिछडे गरीब लोगों के छात्र ही बहुतायत संख्या में दर्ज होते हैं जिनकी निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था सरकार खुद करती है।
यह सब जानते हुए भी 25% छात्रों को सरकारी स्कूल से छीनने का सफलतम प्रयोग सरकार ने कर लिया जिसका सीधा असर सरकारी स्कूल की दर्ज संख्या पर हुआ। इस निर्णय ने यह दिखाने की कोशिश कि सरकारी स्कूल में छात्र नहीं पढना चाहता अगर हम 100% कर दे तो सरकारी स्कूल बंद हो जाँएगे शायद इनकी मंशा भी यही है क्योंकि समय समय पर सरकारी स्कूलों के निजीकरण की बातें अखबारों व बयानों के माध्यम से सुनने को मिलती रहती हैं
यह निर्णय हर सरकारी स्कूल पर हमला है, हर अध्यापक ,हर शिक्षक पर हमला है ये हमारी योग्यता पर हमला है ।
मैं जानना चाहता हूँ कि निजी स्कूलों ने उन 25% छात्रों के शैक्षणिक स्तर पर कितना सुधार किया ।
जहाँ एक ओर सरकार को इनकी निशुल्क शिक्षा के लिए अतिरिक्त वित्तीय भार सहना पड रहा है वही सरकारी स्कूलों में तमाम सुविधाएँ उपलब्ध कराने के बावजूद उसे कमतर आँका जा रहा है।
अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन यह सीमा 50% होगी फिर 100% और हमें सौप दिया जाएगा किसी अन्य विभाग व संस्था के अधीन नये सिरे से शोषण करने के लिए ।
वही ये 25% छात्र भी निजी स्कूलों की चकाचौंध में अपने से मजबूत आर्थिक परिस्तिथि के छात्रों के रहन सहन, हाव भाव, तौर तरीके में सामंजस्य बिठाने के चक्कर में अपने अभिभावकों पालको से उनके समतुल्य वस्तुओं की चाहत की हठ करने लगता है जो उसके पालको की सीमा से बाहर होता है ऐसे में छात्र पर क्या असर होता होगा ये हर अभिभावक महसूस कर सकता है
वंचित वर्ग ,सरकारी स्कूल और निजी स्कूल की खाई में फँसता जा रहा है  क्योंकि इस वर्ग ने जिस परिणाम की लालसा में इस नियम का लाभ उठाकर अपने छात्रों का दाखिला निजी विधालयों में कराया था उसे अपनी उम्मीद के मुताबिक परिणाम नही मिल पा रहें हैं जिसकी लालसा में वे सरकारी स्कूलों से अलग हुए थे।
मैं कहना चाहता हूँ कि सरकारी स्कूलों का निजीकरण करने की साजिश को बेनकाब करने का जिम्मा तो हमारा है ही वही हर रोज खुल रहे निजी स्कूलों के छात्रों का सरकारी स्कूल में नामांकन कराकर इन स्कूलों को बंद करवाने का एक प्रयास करना बहुत जरूरी है ।( लेखक स्वयं अध्यापक है और यह उनके निजी विचार है ) RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव )
द्वितीय  स्थान पर पर यह लेख चयनित किया गया।

न रहेगा शिक्षा विभाग... न रहेगी वेतनमान की माँग और समस्या...विवेक मिश्रा ( नरसिंहपुर )

 विवेक मिश्रा   - सभी बुद्धिजीवी भाई बहनों द्वारा अनेक पहलुओं पर अनेक प्रकार के तर्क दिए गए हैं, जो किसी न किसी दृष्टिकोण से तर्कसंगत व उचित ठहराये जा सकते हैं, परंतु इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है - शासन की २५ प्रतिशत बच्चों को निजी शालाओं में स्वयं शासकीय शालाओं के शिक्षकों /अध्यापकों द्वारा प्रवेश दिलाने की नीति- इस संबंध में मेरा कहना है कि क्या यह नीति जब प्रस्तावित की गई थी तो तत्कालीन समय में शिक्षक समाज के विभिन्न संगठन चाहे वो अधिकारी /लिपिकीय/शिक्षक/अध्यापक /चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संवर्ग के हों, क्या इनमें से किसी भी संगठन ने इस नीति का विरोध किया था, यदि हां तो कब और किसने और किस स्तर पर (प्रमाण सहित) और नहीं तो क्यों नहीं. क्या वो इस नीति के दूरगामी परिणाम के बारे में दूरदर्शिता नहीं रखते थे, कि इस नीति के तहत जिस "शिक्षा विभाग रूपी मातृ विभाग" से उनका और उनके परिवार का पालन-पोषण हो रहा है, उसे सुनियोजित तरीके से समाप्त करने की यह योजना बनाई गई है, साथ ही शासन स्वयं इन २५ प्रतिशत बच्चों की राशि भी निजी शालाओं में जमा करके उन्हें बढ़ावा देकर फलने फूलने के पर्याप्त अवसर दे रही है, कारण साफ है कि ज्यादातर पूँजीवादी निजी स्कूल उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, राजनेता और अधिकारियों के हैं, जिनमें मनचाही फीस और नियम कानून अपनाए जाते हैं,कुछ तथ्यों पर आप भी सोचकर देखें तो आप भी सहजता से स्वीकार करेंगे कि शासकीय शालाओं में ज्यादातर गरीब तबके के बच्चे अध्ययनरत रहते हैं, यदि इनको बढ़ावा देने के लिए यदि इन्हें पूँजीवादी निजी स्कूलों में दाखिल करा भी दिया जाता है तो वहां पर इनके साथ पढ़ने वाले अमीर परिवार के बच्चों के जैसा बराबरी का बर्ताव या सलीका नहीं अपनाया जाता, जब ये गरीब बच्चे जो कि शासन की नीति के तहत इन निजी स्कूलों द्वारा मजबूरी में दाखिल कराये जाते हैं तो इन पूँजीवादी निजी स्कूलों के स्टाफ, अमीर बच्चों द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाता है, साथ ही जब ये गरीब बच्चे इन निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अमीर बच्चों के आने जाने के लिए लगे निजी वाहनों, उनके पहनने के कपड़ों की क्वालिटी, उनके भोजन की क्वालिटी, उनके माता-पिता के द्वारा इन निजी स्कूलों को दिए जाने वाले डोनेशन इत्यादि के बारे में सोचते हैं तो इन गरीब बच्चों के मन में हीन भावना घर कर जाती है. साथ ही निजीकरण के माध्यम से शासन अनुत्पादक समझे जाने वाले इस मौलिक अधिकार से अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति भी पाना चाहती है, परंतु किसी भी राजनीतिक दल के लिए हर चुनाव में शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रमुख मुद्दे होते हैं, जिन्हें चाहकर भी ये समाप्त नहीं कर सकते, नहीं तो कल से जनता भी इनसे कहने को तत्पर रहेगी कि अब आपकी (सरकार को चुनने की ) भी कोई आवश्यकता नहीं है और आपका भी निजीकरण कर दिया जाए, परन्तु इन सबके बीच में हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि शासन की नीति अनुरूप अलग अलग समय पर अलग अलग संवर्गो में भर्ती किए गए अहं और महत्वाकांक्षाओं में घिरकर हम और हमारे संगठन, विरोध करने पर बैकफुट पर दिखाई देने को विवश हैं,उनकी इस विवशता का भी एक नहीं बल्कि अनेक वाजिब कारण हैं, पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि इस संवर्ग के स्वयं के परिवार के बच्चे निजी शालाओं में अध्ययनरत रहते हैं, दूसरा इस संवर्ग के स्वयं के या इनके रिश्ते नातेदारों के निजी स्कूल हैं,          आज के विषय के संदर्भ में ,यह भी आशंका व्यक्त की जा सकती है कि २५ % नीति के तहत जिन शासकीय शालाओं को बँद कर समीपस्थ शालाओं में मर्ज किया जाना है, तो बँद करने के बाद उन बंद हुई शासकीय शालाओं की बहुमूल्य जमीनों(शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों  की) पर स्थानीय निकायों जैसे नगरपालिका/नगर निगम/नगर पंचायत अथवा जनपद/जिला पंचायत का नियंत्रण होना तय माना जा सकता है, तदुपरांत कालांतर में इन बेशकीमती जमीनों और उन पर बने भवनों का उपयोग व्यावसायिक दृष्टि से लाभ कमाने के लिए लिये किया जा सकता है. यह भी समझा जा सकता है कि इनमें से शहरी क्षेत्रों की शास शालाओं की बेशकीमती भूमियों पर निकट भविष्य में शापिंग माॅल या काम्पलेक्स जैसी इमारतों का निर्माण कर उन्हें नीलाम कर करोड़ों अरबों का लाभ कमाया जा सकता है. साथ ही स्थानीय निकाय के कर्मचारी कहलाने के कारण निकट भविष्य में कभी भी हमें घर पर बिठा दिया जा सकता है... यह भी एक कटु सत्य है जिसे झुठलाना अपने आपको धोखे में रखने जैसा होगा.    स्थानीय निकायों की नियोक्ता संस्थाओं के नियंत्रण में ही ये बंद हुए शाला भवन जायेंगे अन्य किसी निकाय के द्वारा इन पर अपना हक नहीं ठहराया जा सकता है, जैसे कि स्कूल शिक्षा विभाग, क्योंकि हमारे संवर्ग की नियुक्ति तत्समय इन्हीं स्थानीय निकायों द्वारा की गई थी.. ईवन ट्राईबल की शालाओं और आश्रम शालाओं के साथ ही भविष्य में आँगनवाड़ी केन्द्रों में भी इसी तरह के नियमों का पालन किया जा सकता है....        अगर सारांश रूप में कहा जाए तो इस प्रकार की नीति केवल हमारे अकेले विभाग पर ही लागू की जा रही है, एेसा कहना गलत होगा.. इस प्रकार की नीतियों की शुरुआत तो 1990 के दशक से ही देश भर में प्रारंभ कर दी गई थी... हमें इस तथ्य को भली भांति समझ लेना होगा कि देश व्यापी स्तर पर आज का दौर उदारीकरण, निजीकरण और विश्वव्यापीकरण का है और इन सबके कारण किसी भी प्रकार की अप्रत्याशित नीतियों का प्रकटीकरण असंभव प्रतीत नहीं हो सकता...(लेखक स्वय अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार है )RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव ) प्रथम स्थान पर पर यह लेख चयनित किया गया।

निजी विद्यालय है भेदभाव की जगह - विष्णु पाटीदार

विष्णु पाटीदार -RTE  अंतर्गत निजी विद्यालय में कमजोर वर्ग के 25 प्रतिशत भर्ती के कारण शासकीय शालाओं में दर्ज संख्या में काफी कमी आ गई क्योंकि वैसे भी शासकीय शालाओं में इन कमजोर वर्ग के बच्चों का हीं अधिक प्रवेश होता था उच्च वर्ग के बच्चे तो वैसे भी कम ही आते थे इससे सरकारी विद्यालय के साथ साथ समाज पर भी बहूत असर हुआ, कमजोर वर्ग के बच्चे उच्च वर्ग के बच्चों के साथ पढ़ने लगे जिससे कमजोर वर्ग अपने आप को गौरवान्वित महसूस करने लगा तथा उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलने लगी । नीजी स्कूलों ने भी इसका भरपूर फायदा उठाया क्योंकि बच्चों की फीस तो सरकार वहन कर हीं देती है लेकिन निजी स्कूल वाले इन बच्चो के साथ भेदभाव कर अलग से कक्ष में बैठाकर मुख्य धारा से अलग रखते हैं नियमों का पालन करते हुए इन बच्चों को उच्च वर्ग के बच्चों के साथ बैठाकर नहीं पढ़ाते साथ हीं टारगेट पूरा करने के लिए निर्धारित आयु से कम आयु या अधिक आयु के बच्चों को भी भर्ती कर लेते हैं । सरकार की कमजोर तबके को मुख्य धारा में जोड़ने की पहल अच्छी थी लेकिन कतिपय निजी विद्यालयों ने इसका नाजायज फायदा उठाया और इसी के कारण सरकारी विद्यालयों में दर्ज संख्या में कमी आने का एक कारण यह भी हो सकता है ।(लेखक स्वयं अध्यापक है और यह उनके निजी विचार है ।)



( RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25  प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव )

तृतीय  स्थान पर पर यह लेख चयनित किया गया। 

Saturday, October 1, 2016

शिक्षक,शिक्षा और नैनिहाल के हाल बेहाल जबाबदार कौन......? - श्रीराम राठौर ( खातेगांव जिला देवास )

 श्रीराम राठौर  - 1995 के बाद से ही शिक्षकों की भर्ती पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को सौंपी दी गई थी, 1998 के बाद से पंचायतो ने सरकारी नियमानुसार शिक्षाकर्मी गुरूजी तथा संविदा शिक्षको की भर्तियाँ की गयी, जिनमे शिक्षको की विभिन्न श्रेणीयो वाले शिक्षाकर्मी संविदा शिक्षक वर्ग 1,2,3 एवं गुरूजी आदि शिक्षक के रूप में थे। बाद में सरकार ने पंचायती नियमो एवं अर्थव्यवस्था का हवाला देकर नियमित शिक्षकों के वेतन की अपेक्षा अति न्यूनतम वेतन देकर शिक्षाकर्मीयों एवं अन्य प्रकार के शिक्षको का भरपूर शोषण किया ।बिडम्बना यह थी की हमारे साथियो का वेतन चपरासी से भी अत्यधिक कम था। शिक्षाकर्मीयों संविदा शिक्षको व गुरुजियो का मानदेय उस समय वेतन न होकर मानदेय था, जबकि नियमित शिक्षको को चौथा,पांचवाँ और छटवां वेतनमान दिया जा रहा था।मुझे अच्छे से याद है एक समय था जब हमारे वर्ग 03 वाले शिक्षाकर्मी  साथियो की तो 2256 के नाम से समुदाय में पहचान ही बन गई थी। और हमारा साथी न्यूनतम मानदेय की इस स्तिथि के कारण जीवन यापन के अन्य स्त्रोत भी तलाशने में लगा था। हमारे साथियो की ख़राब स्थिति यही नहीं रुकी सरकारों की दमनकारी और शोषण की निति के खिलाफ आख़िरकार हमारे साथियो ने आन्दोलन की राह पकड़ी काफ़ी संघर्ष और आन्दोलन के बाद 2007 में म.प्र. सरकार ने फिर राष्ट्रनिर्माताओ को एकबार फिर छलते हुए अध्यापक संवर्ग का गठन किया जिसमे हमारी जायज मांगों के फलस्वरूप हमें सिर्फ नाम ही मिला हमारी मेहनत का दाम नहीं।
         आज तक भी आम अध्यापक छटवे वेतनमान की लड़ाई लड़ रहा है  और अन्य शिक्षकों को सातवां वेतनमान मिलने वाला है । 1995 के बाद से ही सरकारों के शोषण का प्रतिफल यह हुआ की  शिक्षा के स्तर और गुणवत्ता में कमी आती गई तथा न्यूनतम वेतन तथा विभाग में छोटे बड़े,कम ज्यादा,स्थायी अस्थायी और विभिन्न नामो श्रेणियों में बंटने के कारण कही न कही इन सब बातों का प्रभाव शिक्षक की मानसिकता पर भी पड़ा। उसके बाद शिक्षा के स्तर में थोड़ी बहुत गिरावट तो आना स्वभाभिक ही थी, स्तर की इस गिरावट को और ज्यादा बड़ी खाई बनाने का काम किया सरकारों के विभाग पर,शिक्षको पर विभिन्न नित नए प्रयोगों और लाल फीताशाही ने, जिनके कारण आम अध्यापक आज तक ठगा जा रहा है तथा अपने अधिकारों को पाने के लिए संघर्षरत है।
        अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत अध्यापक तो आज भी शिक्षातंत्र की भलाई के लिए सोंचते हुये शिक्षा का बेड़ा पार लगाते हुये नन्हे-मुन्हो का भविष्य संवारना चाहता है और अपने मूल कर्तव्य राष्ट्र निर्माता की भूमिका को बखूबी निभाना चाहता है...
         पर सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग यह समझ ले की आम अध्यापको के बेड़ापार से ही शिक्षातंत्र का बेड़ापार होगा अन्यथा नैनिहालो के भविष्य के लिए यदि कोई जबाबदार होगा तो सिर्फ और सिर्फ सरकार ही होगी.....
जय हिन्द साथियो......
( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में प्रथम   स्थान पर इस रचना को रखा गया )

1998 के बाद शिक्षा के मायने बदल गये - सचिन गुप्ता

 सचिन गुप्ता -यही वह समय है जब शिक्षक को आम जनता 500-1000 हजार रूपये का मास्टर कहकर पुकारने लगी और पहली बार शिक्षक को उसकी योग्यता से न नवाजकर उसकी तनख्वाह से उसकी सामाजिक और शैक्षणिक क्षमता का आँकलन किया जाने लगा 
         परिणाम हुआ शिक्षक और शिक्षा दोनो का स्तर गिरना ,जहाँ एक ओर शिक्षक अपनी समस्याओ को लेकर धरना प्रदर्शन आंदोलन करने लगा वही दूसरी ओर शिक्षा प्रभावित होने लगी और ऊपर से समय समय पर शासन प्रशासन की दमनकारी जवाबी कार्यवाही ने आग मे घी डालने का काम किया जबकि सरकार को उनकी माँगे पूरी करके शिक्षा की बाधाओ को दूर करने मे अध्यापको का साथ लेना चाहिए था
        वही दूसरी ओर शिक्षक शिक्षक मे क ई मतभेद सामने आने लगे शिक्षक मानसिक रूप से शासन प्रशासन अधिकारी अपने वरिष्ठ नियमित शासकीय शिक्षको के द्वारा उनके व्यंगो का सामना करने के लिए तैयार हो गया
        इतनी समस्याओ के बावजूद भी शैक्षणिक कार्य मे लगा रहा लेकिन समयानुसार उसका शोषण सरकारे करती रही जिसका असर शिक्षा व शिक्षक की पारिवारिक स्थिति पर भी हुआ
लेकिन उम्मीद यही है कि शिक्षक और शिक्षा दोनो की स्थितियाँ जल्द सुधरेगी

( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से दुसरे  स्थान पर इस रचना को रखा गया )

कम सुविधाओ एवं शोषण के बीच हमारे शिक्षक साथियो के कठिन परिश्रम से शिक्षा के स्तर को ऊँचा किया - रकीब खान

रकीब खान - वाजपयी सरकार ने 2003-04 मे  संविधान मे शंषोधन करके देश मे पेंशन बंद करवाने के साथ स्थाई पदो के .साथ कई विभागो मे अस्थाई पदो पर भर्ती के लिए कानून बनाया जिससे  मध्य प्रदेश मे स्थाई शिक्षको की भर्ती को खत्म कर अस्थाई शिक्षा कर्मी , एवं संविदा शिक्षको की भर्ती शुरू की जिनको BED, DED, धारी कुशल कर्मचारी होने के बावजूद भी एक अकुशल मज्दूर के बराबर अल्प वेतन पर रखा जाता  हे  साथ मे स्थाई कर्मचारियो के समान भत्ते (आवास , यात्रा आदि ) , पेंशंन (2004 से पहले )  तथा वेतन मान आदि से भी महरूम रखा जाता है जिस कारण इनका अधिकाश समय अपने हक़ को पाने की लड़ाई मे रैली ,धरना,  सभा आदि मे चला जाता है , साथ ही एक ही शाला मै एक ही कार्य को करने वाले LDT का वेतन जहाँ 40हज़ार के पार है वही उसी कार्य को ईमान दारी से करने वाले सहायक अध्यापक का वेतन मात्र 15 हज़ार ही है साथ ही ग्रेड पेय मे भी ज़मींन आसमान का अंतर है यही हाल अन्य वर्गो (1 व 2) का भी है इस कारण  अस्थाई पदो पर नियुक्त अध्यापक साथियो मे हीन भावना के साथ  सरकार एवं व्यवस्था  के प्रति रोष भी उत्पन्न होता है जिसका प्राभाव कक्षा मे भी पड़ता है साथ ही अल्प वेतन पर नियुक्त कर इनसे अन्य गैर शैक्षणिक कार्य (बी.एल.ओ. ,  SDM. कार्यालय मे अन्य निर्वाचन कार्य , मध्यान भोजन जानकारी , छात्रव्रत्ति, सायकिल आदि ) लिए जाते है , लगातार एसे कार्यो मे नियुक्ति से एक शिक्षक की अपने विषय पर एवं छात्रो पर पकड़ कमज़ोर हो जाती है साथ ही शिक्षक अधिकारियो का भी दबाव भी इनही पर होता है , जिससे इनमे मानसिक परेशानी के साथ ही अवसाद की स्तथि भी आ जाती है एसे मामले मे कई अध्यापक साथी आत्महत्या जेसे कठोर कदम भी उठा चुके  है !
जिससे अध्यापक एवं शिक्षा जगत पर एक विक्राल दुषप्रभाव पड़ता है , साथ यदि शिक्षक अपने हक़ के लिए धरना रैली जागरूकता लाता है तो मीडिया उसे कवरेज नही देता और यदि  एक शिक्षक शाला मे किसी उत्पाती छात्र को मार दे तो न्यूज पेपर मे ये खबर बड़ी बड़ी हेड लाईन मे छपती है जग हसाई होती है ,  जिससे समाज मे अध्यापको के प्रति गलत संदेश जाता है साथ ही शिक्षक छात्रो पर पड़ाई के लिए दबाव भी नही बना सकता है  इनही सभी कारणो से छात्र शासकीय शालाओ मे पड़ाई मे विशेष रुची नही ले पाते एवं दिनो दिन पड़ाई का स्तर समाज मे गिरता जा रहा है ,
लेकिन फिर भी कम सुविधाओ एवं शोषण के बीच हमारे शिक्षक साथियो के कठिन परिश्रम से बलीदान से ईमान दारी से किए गऐ शिक्षणीय कार्य से सत्र 2015-16 का कक्षा 10वी एवं 12 वी का बोर्ड परीक्षा परीणाम निजी शालाओ से अच्छा रहा है जिसके लिए समस्त अध्यापक बधाई के पात्र है धन्य वाद | 
( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से  दुसरे स्थान पर इस रचना को रखा गया )
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आज शिक्षक समुदाय की सबसे बड़ी समस्या अस्तित्व ,गरिमा एवं स्वाभिमान को बचाने की है - सीमा चावल

सीमा चावल - आज शिक्षक  डरा सहमा व भयग्रस्त  है । समुदाय की सबसे बड़ी समस्या अस्तित्व ,गरिमा एवं स्वाभिमान को बचाने की है ।  प्रशासन ने शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर अनाप शनाप धन खर्च करने के लिए ऐसी नीतियों को निर्माण करवाया है जिससे निजी स्कूल फले फुले व् सरकारी स्कूल व् शिक्षक की बदनामी हो । समाज व्  सरकार इन स्कूलो से घृणा करे ताकि सम्पन्न लोगो के बच्चे निजी स्कूलो में पढ़े । गरीबो की पहुँच  में शिक्षा  रहे ही नही । यह अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने का प्रयास भी है । आज समाज को भी इस समस्या की सच्चाई को समझना होगा । मुझे यह बताने में शर्म आती है कि हमारे अधिकारियो ने शैक्षणिक गुणवत्ता बढ़ाने के लिए हर सप्ताह प्रति माह संकूल स्तर पर विषयवार प्रशिक्षण आयोजित करने का कार्यक्रम तय किया है आप जानकर हैरान हो जाएंगे कि प्राथमिक विद्यालय में दो शिक्षक में से 5वीं पढ़ाने वाले को प्रतिमाह 8 दिन प्रशिक्षण लेने जाना है । जिनकी गुणवत्ता के लिए उसे महीने में 10 से 12 दिन पढ़ाने का समय मिलता है । प्रशिक्षण उन्ही शिक्षको में एक को देना है कुछ नही होता केवल बैठने के ।  क्या इससे गुणवत्ता बढ़ेगी ? 
       इससे भी बड़ी बात तो यह है कि इन प्रशासनिक विशेषकर IAS ने शिक्षको को  डाकू लुटेरे चोर समझकर स्कूलो में निरीक्षण अवलोकन व् सरकूलर जारी किए है । नीतियों को बनवाया है ।  छात्रवृति सायकल mdm पाठ्यपुस्तक वितरण गणवेश आदि योजनाओ में हमारे साथ अविश्वास किया जाता है । इसी कारण हर साल ,आए दिन बदलाव कर, निरीक्षण में शंकाए व्यक्त होती है ।जबकि बहुत सी बातो के लिए हमसे अविश्वास कर योजना सञ्चालन किसी ओर से कराया जाता है व् जिम्मेदार शिक्षक को बनाया जाता है ।
आज बड़वानी की घटना से हमे सोचना चाहिए कि जब mdm समूह बनाता है । उससे सम्बन्ध जनपद का है । तो मात्र जनशिक्षक को दोषी मानना क्या शिक्षक के प्रति प्रशासन की दुर्भावनाए नही तो क्या है ? क्या केवल आत्महत्या हमारे अस्तित्व स्वाभिमान व् गरिमा को बचाने का हल है ?क्या यह सबसे बड़ी समस्या नही है ? हम स्व प्रकाशजी चौहान बड़वानी को इस रूप में अपनी श्रद्धांजलि दे कि किसी ओर शिक्षक को ऐसा कदम उठाने कि अवश्यकता नही महूसस हो ।
   मित्रो अब समय आ गया है कि हम इनकी कुत्सित चालो को समझकर सारे थोपे गए गैर शैक्षणिक कार्य छोड़े और मात्र हमारा मूल कार्य पढ़ाई के लिए संघर्ष करे । सङ्कल्प करे कि हम बच्चों के आलावा किसी से नही डरेंगे । पढ़ाने के आलावा कोई  गैर शैक्षिक कार्य नही करेंगे । सरकार से पढ़ाने के लिए लडेंगे ।
( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर इस रचना को रखा गया )

कविता @ शिक्षाकर्मी बना दिया -अर्जुन पटेल


जीवन उधार जैसा बेशर्मी बना दिया।
वर्षों की साधना ने शिक्षाकर्मी बना दिया।
सन्98में एक ऐसी नीति आई।
पढे लिखे युवकों की जवानी शरमाई।
मजबूरी बस शेरों ने घास खाना स्वीकारा था।
500 के वेतन में महीने किया गुजारा था।
फिर भी जोश नहीँ था कम पूरे दम से काम किया।
तनिक दया न आई शाशन ने सौतेली सन्तान किया ।
फिर से काबिज होने सत्ता पर एक निवाला फेका था ।
लाचार शिक्षाकर्मी ने उसे आशा की नजर से देखा था।
फिर उम्मीदे टूट गयी।
किस्मत ही जैसे रूठ गई।
फिर इनकी अगवाई में कई बार बजाई है ताली।
पर पूरा भोजन भरकर कभी न दी इनने थाली।
उतने पर भी सभाजीत नीति लाते हैं जाली।
कल भी हाथ ख़ाली थे
आज भी हाथ हैं खाली।
बार बार मझधार में आपने ला छोड़ा है।
पर हमने अब भी उम्मीद को नहीं तोडा है।
जो आप बने हैं धर्मपिता।
तो अपना धर्म निभाना।
अपने वादे को पूरा कर
शिक्षक हमें बनाना।
वेतन भी दो गर पूरा
तो हम वो कर दिखलायेंगे।
मध्यप्रदेश को शिक्षा में
नम्बर एक पर लाएंगे।।

( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर इस रचना को रखा गया )

Thursday, September 29, 2016

केवल सरकारी विद्यालयों की ही दुर्दशा क्यों ? राहुल रूसिया

      जब से शिक्षा का अधिकार लागू हुआ है तब से हमने देखा है की शिक्षा की दुर्दशा केवल सरकारी स्कूलों के छात्रों के लिए ही हुई है और उनका पढ़ाई में स्तर वास्तव में गिरा है यह सोचने वाली बात है की शिक्षा के अधिकार अधिनियम के सभी प्रावधान प्राइवेट स्कूलों में भी लागू होते हैं परंतु उधर पर इतनी बुरी स्थिति नहीं है बल्कि इस अधिनियम का फायदा उधर पर छात्रों एवं स्कूलों को हुआ है तो फिर सरकारी स्कूल शिक्षा के अधिकार को अभिशाप क्यों मानते हैं यहां पर सबसे गंभीर प्रश्न यही है की जो चीज निजी क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर रही है वही शासकीय क्षेत्र में प्रभावहीन क्यों है.      जहां तक मेरा मानना है तो शासकीय क्षेत्र में शिक्षा का स्तर गिरने की सबसे बड़ी वजह शिक्षा का अधिकार अधिनियम का पालन सरकार के द्वारा अभी तक स्वयं नहीं किया जाना है ना तो सरकारों ने अधिनियम के अनुसार विद्यालयों का सेटअप बनाया नाही शिक्षकों को उचित प्रशिक्षण दिया और ना ही विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक भेजें बल्कि इसके उलट जो विद्यालय पहले अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे उधर पर भी शिक्षकों को जाति प्रमाण पत्र आधार कार्ड मैपिंग रजिस्ट्रेशन स्वच्छता अभियान led वितरण मध्यान भोजन आदि में उलझा दिया और विचारा शिक्षक चाह कर भी विद्यार्थियों को शिक्षित नहीं कर सका इसके अतिरिक्त नाम न काटने की बाधा एक ऐसी समस्या है जिससे पलायन करने वाले छात्र जबरदस्ती उसी विद्यालय में दर्ज रह जाते हैं और विचारा शिक्षक उनका नाम जबरदस्ती क्लास दर क्लास आगे बढ़ाता रहता है मेरे हिसाब से इस अधिनियम में एक दो चीजों को छोड़कर कोई भी बंधन शिक्षा की राह में और विद्यालय के स्तर में रुकावट नहीं डालता बल्कि बाधाओं को दूर करता है परंतु सरकारी संसाधन सीमित है और गैर शिक्षकीय कार्य भरमार है यदि संसाधन बढ़ा दिए जाएं और गैर शिक्षकीय कार्य शिक्षकों से ना कराए जाएं तो यह अधिनियम निश्चित रूप से शासकीय क्षेत्र में भी शिक्षा का स्तर सुधार देगा  


( लेखक स्वयं अध्यापक हैं  और यह उनके निजी विचार हैं ,१९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में इस  लेख को  तृतीय स्थान प्रदान  किया गया है  )

सरकारी शालाएं ही क्यों निशाना बनी ? - कुलदीप श्रीवास्तव डबरा

कुलदीप श्रीवास्तव -यहाँ एक बात मेरे मन में आती है कि सरकारी शालाएं ही क्यों निशाना बनी ..सरकार के लिए,दरअसल एक ऐसा समय भी था जब शिक्षा प्राप्त करना एक विशेष वर्ग के लिए ही सुनिश्चित था सेवा कार्य करने वाले लोगो के लिए शिक्षा प्राप्त करना टेडी खीर थी ...तब तक यह भी था सरकारी शालाओ में इतनी व्यवस्था ख़राब नही रही शिक्षको को भी उचित सम्मान और सुविधाये मिलती रही समस्या तब से शुरू हुई है जब शिक्षा को मौलिक अधिकारो में शामिल कर लिया गया अब हर वर्ग को शिक्षित करना राज्य और संघ की जिम्मेदारी हो गई यहाँ से आप देखते है नीतिओ में बदलाव कैसा है
        स्कूलो में मध्यान्ह भोजन निशुल्क पुस्तके और अन्य सुविधाये विशेष वर्ग को छात्रवृतिया और सरकारी नुमाइंदे प्रयोग पर प्रयोग करने लगे यहाँ तक कि शिक्षक अब शिक्षक नही रहा उसके कई नाम कर दिए और सुविधाये समय दर समय कम होती गई अब सरकार ने यह पूरी तरह से मान ही लिया कि सरकारी विद्यालय में केवल निर्धन मजदूर किसान आदि के बच्चे पढ़ते है योजनाये भी वैसे ही अपना आकार लेने लगी है और तब ख़ास वर्ग के बच्चों की शिक्षा हेतु निजी विद्यालयो की आवश्यकता महसूस हुई और धड़ल्ले से मान्यताये मिलने लगी और खुल गई दुकाने शिक्षा की पर यहाँ हो सकता है कुछ अध्यापक अपवाद हो सकते है पर अध्यापक आज भी पढ़ाना ही चाहता है पर सच्चाई तो यही है कि ये सरकारें नही चाहती है कि विद्यालयो में ऐसा कुछ हो उन्हें अपने वोट बैंक पर खतरा नजर आता होगा शिक्षा और निर्धन के बीच दूरी बनी रहे यही सोच के साथ काम कर रही है सरकारें और तभी तो अल्प वेतन विना सुविधाओ वाले अध्यापको को सरकारी काम से लाद कर घोड़े की तरह दौड़ाने का प्रयास कर रही है सरकार
   परिणाम अपेक्षित कभी नही आयेगे . इसी सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश कोर्ट ने शिव भाई की याचिका पर निर्णय दिया था कि अधिकारियो के बच्चों को सरकारी विद्यालयो में पढ़ाना चाहिए ...सब सरकार चुप्पी साध के बैठ गई

( लेखक स्वयं अध्यापक हैं  और यह उनके निजी विचार हैं ,१९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में इस  लेख को  तृतीय स्थान प्रदान  किया गया है  )

कविता @ शिक्षा का निजीकरण -विवेक मिश्र नरसिंहपुर

शिक्षा के निजीकरण- व्यवसायीकरण की हो चुकी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, राजनेताओं, अधिकारियों के बोर्डिंग स्कूल चलाने की यह कूटनीतिक तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षण, परिवहन और उच्च शिक्षा हेतु लोन व्यवस्था कर बच्चों के पालकों को लूटने की फिर से तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
कापी-किताबें, पेंट-शर्ट, टाई-बैच, बस्ता-बेल्ट, जूते - मोजे,महंगे और चिन्हित दुकान से ही खरीदवाने की तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
स्वयं के, परिजनों के और खासम-खासों के बच्चों को. स्वयं के स्कूलों में पढ़ाकर आगे बढ़ाने की कूटनीतिक तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
बोर्डिंग स्कूल, हाॅस्टल सुविधा, समर कैंप, एक्स्ट्रा क्लासेस, पिकनिक विजिट की महिमा न्यारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
दूध, एमडीएम, साइकिल, गणवेश, छात्रवृत्ति, लेपटाप देने के बाद भी छात्रसंख्या में कमी जारी है....
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
२५ प्रतिशत वंचित समूह के बच्चों को निजी शालाओं में भर्ती कराकर सरकारी स्कूल बंद कराने की कूटनीतिक तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
यही नहीं, इन २५ प्रतिशत बच्चों पर व्यय होने वाली सरकारी राशि भी ठिकाने लगाने की पूरी कूटनीतिक तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजी स्कूलों में अमीर- गरीब बच्चों के लिए भेदभावपूर्ण दोहरी शिक्षाव्यवस्था और मापदंड अपनाने की पूरी हुई तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
हजारों शिक्षकों और उनपर आश्रित परिवारों को बेरोजगार कर भूखा मारने की हो चुकी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
लाखों पढ़े - लिखे सुशिक्षित नौजवान पीढ़ी की रोजगार की उम्मीद पर पानी फेरने की ये तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजीकरण से गुलामी वाली मानसिकता और तानाशाही रवैया अपनाने की हो चुकी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजीकरण से शिक्षा को संविधान के मौलिक अधिकारों से पृथक करने की सुनियोजित षड्यंत्रकारी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
विवादित नीतियां और लालफीताशाही की पेंचीदियाॅं हो रहीं निःशुल्क शिक्षा पर भारी हैं...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
धर्म, सम्प्रदाय, जाति, समुदाय, आरक्षण के आधार पर उच्च शिक्षा के शिक्षण पर पाबंदी की कुटिल नीति जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजीकरण से शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार, काला धन निवेश, विदेशी पूंजी निवेश कर मुनाफाखोरी करने की तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षक, शिक्षाकर्मी, संविदा, गुरुजी, अतिथि आदि संवर्गो के माध्यम से "divide & rule" जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
राजीव गांधी शिक्षा मिशन, सर्व शिक्षा अभियान के बाद राज्य शिक्षा सेवा से वर्ल्ड बैंक की राशि ठिकाने लगाने की तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
१ली से ८वीं तक पास कराने की नीति द्वारा केवल साक्षर कर पंगु बनाने की नीति जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
"प्रतिशत सिस्टम" हटाकर "ग्रेडिंग सिस्टम"  के द्वारा मेहनती बच्चों के वास्तविक मूल्यांकन से खिलवाड़ जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षकों को शिक्षा के अतिरिक्त अन्यान्य कार्यों में लगाकर परिणाम प्रभावित होने पर बदनाम करने की तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षा के निजीकरण द्वारा इसे संविधान के मौलिक अधिकार में उल्लेखित अपनी महती जिम्मेदारी से मुक्ति पाने की तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षकों के वेतन को छोड़ RTE के सभी नियमों का कागजी आंकड़ों पर पालन कराने की लीला न्यारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षक पद की गरिमा, स्वाभिमान, मान-सम्मान को कलंकित करने की सिस्टेमेटिक तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है..
शिक्षा बेचारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
नालंदा, तक्षशिला की बर्बादी जैसी साजिश हुए, स्कूल सरकारी हैं.
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
गली, मुहल्ले, कूचों में 2 कमरों में स्कूल! मान्यता नीति न्यारी है.
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...

( लेखक स्वयं अध्यापक हैं यह कविता १९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में द्वितीय स्थान पर रही है )

पंचायती राज व्यवस्था के नाम पर नए शिक्षको का शोषण क्यो ? - महेश देवड़ा कुक्षी जिला-धार


 महेश देवड़ा - 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1993 ने राज्य सरकारो को पंचायतों को ऐसे अधिकार प्रदान करने का अवसर दिया जो उन्हे स्वायत्त शासन की संस्थाओ के रूप मे कार्य करने मे अधिक समर्थ बना सके । इसके तहत आर्थिक विकास ओर सामाजिक न्याय सबके लिए सुलभ करने के उद्देश्य से संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची मे वर्णित विषयों के संबंध मे पंचायतों को जरूरी शक्तियाँ ओर प्राधिकार प्रदान किए गए । 11 वीं अनुसूची मे “शिक्षा , जिसके अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक विध्यालय भी है” का विषय भी सम्मिलित है । भारत के संविधान के 73 वें संविधान संशोधन के अनुरूप प्रदेश मे भी मध्यप्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम 1993 , दिनांक 25 जनवरी 1994 से लागू किया गया । परिणामतः शिक्षा संबंधी कार्य एवं उत्तरदायित्व भी पंचायतों ओर स्थानीय निकायों को सोंपने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई । इस प्रक्रिया से सबसे अधिक प्रभावित हुआ प्रदेश का शिक्षक समुदाय । 1995 मे एक आदेश से राज्य सरकार ने मध्यप्रदेश के विध्यालयों मे कार्यरत नियमित शिक्षक संवर्गों को मृत संवर्ग (डाईंग केडर) घोषीत कर दिया । इसके बाद से ही प्रदेश के उच्च शिक्षित बेरोजगार युवाओ के शोषण का सिलसिला शुरू हुआ । शिक्षको के रिक्त पदो पर अल्पतम वेतन या मानदेय आधारित शिक्षाकर्मी , गुरुजी ओर संविदा शिक्षक के रूप मे भर्ती प्रारम्भ हुई । पंचायत राज अधिनियम के अनुपालन मे प्रदेश के शिक्षा विभाग ओर आदिम जाती कल्याण विभाग के समस्त स्कूलों का हस्तांतरण भी जनपद एवं जिला पंचायतों को कर दिया गया ।  साथ ही नियमित शिक्षको के रिक्त पदों के विरुद्ध जनपद एवं जिला पंचायतों के द्वारा शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति की जाने लगी । ये अलग बात है की इन शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति, पदोन्नति, नियमितिकरण एवं वेतनमान संबंधी समस्त नियम राज्य शासन द्वारा ही बनाए गए । नियमितीकरण के बाद भी इन शिक्षाकर्मियों को राज्य शासन के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों से भी कम वेतनमान दिया गया । इस प्रकार पंचायत अथवा स्थानीय निकायों के कर्मचारी होने के नाम पर इन शिक्षाकर्मियों को न केवल अपमानजनक वेतन दिया गया अपितु शासकीय कर्मचारियो को मिलने वाली अन्य सुविधाओ जैसे बीमा, पेंशन, स्थानांतरण, गृह भाड़ा भत्ता जैसी मौलिक सुविधाओ से भी वंचित कर दिया गया । एक ही विध्यालय मे अनेक तरह के शिक्षको की नियुक्ति कर एक वर्ग विषमता का वातावरण निर्मित कर दिया गया । जिसका स्वाभाविक दुष्प्रभाव प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था ओर शेक्षणिक गुणवत्ता पर भी पड़ा । इस विरोधाभास ओर भेदभाव के विरुद्ध शिक्षाकर्मी निरंतर संघर्ष ओर आंदोलन करते रहे । 2007 मे राज्य सरकार ने अध्यापक संवर्ग का गठन किया ओर कर्मिकल्चर को समाप्त करने का दावा किया । पूर्व शिक्षाकर्मियों ओर संविदा शिक्षको का अध्यापक संवर्ग मे संविलियन कर नवीन वेतनमान दिया गया । परंतु सिर्फ नाम परिवर्तन से इन अध्यापको की व्यावहारिक स्थिति मे कोई बदलाव नहीं आया । नवीन वेतनमान देने से वेतन तो बढ़ा परंतु तुलनात्मक रूप से नियमित शिक्षक संवर्ग के वेतनमान से अध्यापक संवर्ग अब भी बहुत पीछे था क्योकि तब तक प्रदेश के समस्त कर्मचारियों को 2006 से छठवाँ वेतनमान मिल चुका था । जबकि अध्यापक आज भी पंचायतों एवं स्थानीय निकायों के कर्मचारी होने के कारण छठवें वेतनमान से वंचित है । 2013 मे एक बड़े आंदोलन के बाद सरकार ने किश्तों मे छठवें वेतन के समतुल्य वेतन अध्यापको को देने का आदेश जारी किया । इसके बाद सितंबर 2015 मे फिर एक बार अध्यापकों ने जोरदार आंदोलन किया फलतः सरकार ने 1 जनवरी 2016 से ही अध्यापकों को छठवें वेतनमान का लाभ देने की घोषणा की । परंतु लगभग एक वर्ष होने के बाद भी मुख्यमंत्री महोदय की घोषणा पर अमल नहीं किया जा सका है । जिससे आक्रोशित अध्यापको ने पुनः एक बार संघर्ष प्रारम्भ करते हुए 25 सितंबर 2016 को प्रदेश के सभी जिलो मे विशाल तिरंगा रैलियों का आयोजन किया ओर एक बार फिर बड़े आंदोलन के संकेत भी दिये । वर्तमान अध्यापक आंदोलन का मुख्य कारण शिक्षा विभाग मे संविलियन ओर समान कार्य समान वेतन प्राप्त करना है । अध्यापको को ये आशंका है की अगर उनकी उक्त मांगे पूरी नहीं हुई तो जनवरी 2016 से देश एवं प्रदेश के सभी कर्मचारियो को मिलने वाले सातवें वेतनमान से भी वे वंचित हो जाएंगे । इन परिस्थितियों मे अध्यापको का आंदोलित होना स्वाभाविक है । 
अध्यापकों की शिक्षा विभाग मे संविलियन की मांग इस लिए है की शिक्षा विभाग मे शामिल होते ही उन्हे प्रदेश के अन्य शासकीय कर्मचारियों ओर नियमित शिक्षक संवर्गों को मिलने वाले वेतनमान ओर अन्य सुविधाएं स्वतः मिल जाएगी ओर उनकी सभी समस्याओं का स्थायी निराकरण हो जाएगा। परंतु शासन द्वारा हमेशा से इस मांग को 73 वें संविधान संशोधन द्वारा शिक्षा ओर इससे संबन्धित समस्त व्यवस्थाओं का पंचायतों एवं स्थानीय निकायों को हस्तांतरण हो जाने की बात कह कर खारिज कर दिया जाता है । ऐसे मे एक स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है की सरकार के तमाम दावो के बीच क्या प्रदेश के शिक्षा विभाग ओर आदिम जाती कल्याण विभाग के समस्त स्कूल पंचायतों ओर स्थानीय निकायों को वास्तव मे हस्तांतरित कर दिये गए है ? व्यवहार मे यह देखा गया है की इन विभागो के स्कूलों मे अध्यापकों की पदस्थापना के अलावा समस्त वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार आज भी हस्तांतरित नहीं किए गए है । पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम की भावना के अनुरूप स्कूल शिक्षा विभाग ने भी ग्रामीण क्षेत्र मे समस्त शालाओं के संचालन ओर प्रबंधन जिला पंचायतों को सोंपने का आदेश जारी किया साथ ही समस्त शालाओं के भवन , उपकरण एवं चल अचल संपत्ति तक पंचायतों को हस्तांतरित किए जाने के आदेश भी हुए है । परंतु ईनका व्यवहार मे कितना पालन हुआ है ये विचारणीय है । अब तो शालाओं मे रिक्त पदो पर नियुक्ति भी संविदा शाला शिक्षक भर्ती परीक्षा के माध्यम से ऑनलाइन केंद्रीकृत व्यवस्था से शिक्षा विभाग के ही निर्देशों से होती है  । ऐसे मे जिला एवं जनपद पंचायतों का काम महज ओपचारिक आदेश जारी करने तक रबर स्टांप के रूप मे ही है । व्यवहार मे सभी संविदा शिक्षकों एवं अध्यापको की सेवाओ पर वास्तविक नियंत्रण शिक्षा विभाग एवं आदिम जाती कल्याण विभाग का ही है । अध्यापकों के भर्ती नियम से लेकर नियुक्ति , पदोन्नति , वेतन नियमन, प्रशासकीय एवं वित्तीय नियंत्रण तक सब वास्तव मे शिक्षा विभाग ही करता है । ऐसे मे अध्यापको से नियमित शिक्षकों के समान समस्त कार्य लिया जाकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियो सा वेतन दिया जाना न्याय संगत नहीं है । 73 वें संविधान संशोधन ओर पंचायत राज अधिनियम की आड़ मे अध्यापको का ये शोषण 18 वर्षों से जारी है । उक्त संशोधन के द्वारा पंचायतों को शिक्षा संबंधी अधिकार ओर उत्तरदायित्वों का वास्तविक हस्तांतरण किया जाना था ना की प्रदेश के बेरोजगार युवको के शोषण का अंतहीन सिलसिला शुरू किया जाना था । अधिनियम के तहत शिक्षको की नियुक्ति का अधिकार भले पंचायतों को दिया गया हो पर ना तो 73वां संशोधन ओर ना मध्यप्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम अध्यापको को समान वेतन देने से रोकता है । पंचायत विभाग के कर्मचारी मानते हुए भी शासन अध्यापकों को शासकीय कर्मचारियों के समान वेतनमान ओर सुविधाएं दे सकता है । शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के बाद शिक्षा के अधिकार पर तो बहुत चर्चा हुई पर अब यह भी जरूरी है की शिक्षकों के अधिकारों पर भी चर्चा हो । निःशुल्क ओर अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अनुक्रम मे बने नियम-2010 के भाग 6 नियम 20(3) मे भी स्पष्ट उल्लेखित है की  “सभी अध्यापको के वेतनमान ओर भत्ते, चिकीत्सकीय सुविधाएं, पेंशन, उपदान, भविष्य निधि ओर अन्य विहित फायदे, वेसी ही अर्हता ,कार्य ओर अनुभव के लिए बराबर होंगे”। अब समय आ गया है की मध्यप्रदेश सरकार इस भेदभावपूर्ण ओर शोषणकारी व्यवस्था को जड़मूल से समाप्त करे ओर संविधान के समानता के मौलिक अधिकार ओर अनुच्छेद 39 की समान कार्य के लिए समान वेतन की भावना के अनुरूप कार्य करे ना की पंचायती राज व्यवस्था के नाम पर अध्यापकों का शोषण  करे ।  (लेखक स्वय अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार हैं 
१९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में इस लेख को  प्रथम स्थान प्रदान  किया गया है)

Saturday, September 24, 2016

अध्यापक अब संविलियन से कम पर राजी नहीं होगा -सुरेश यादव (रतलाम)

सुरेश यादव रतलाम -18 सितम्बर को  जिस दिन से अध्यापको के सभी संघ एक जाजम पर आये है,अध्यपको के अंदर  सकारात्मक  ऊर्जा का संचार हुआ है । मंगलवार से शुक्रवार के मध्य 4 दिनों में  प्रदेश के  सभी जिलो में अध्यापक संघर्ष समिति का  गठन हो गया है ।

एक बात  जो मैंने समझी है या मेरा आकलन है 18 के बाद से हमारे अध्यापक साथी रात्री 11 बजे के बाद सोश्यल मिडिया पर सक्रिय नहीं रहते  साथ ही अब तो दिन में भी बहस से दूर है । मेरा मानना है की एकता के कारण सभी  साथी बड़े आराम से नींद ले पा रहे है ,जो कंही खो ,सी गयी थी ।
कोई किसी पर गलत टिका टिप्पणी नहीं कर रहा न कोई  किसी की आलोचना कर रहा है ।सब एक दूसरे को सम्मान दे रहे हैं  सभी का एक ही लक्ष्य है कि 25 के अंदोलन को सफल बनायें । हाँ अध्यापक के निशाने पर यदि कोई है तो वह मध्य प्रदेश के मुखिया और सरकार  है ।
अध्यापक संघर्ष के ऐतेहासिक 18 वर्षो में पहली बार ज्ञापन में शिक्षा विभाग को बचाने के मुद्दे भी सम्मिलित किये गए है ।पहले ये मुद्दे अध्यापक अंदोलन के मुख्य नारे हुआ करते थे ।यह ज्ञापन सोश्यल मिडिया में बड़े विचार विमर्श के साथ बनाया गया है।इसे आम अध्यापक का ज्ञापन भी कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी  । इस 21 सूत्रीय ज्ञापन में वह सभी मुद्दे है जो आम अध्यापक के अधिकारों की पूर्ति करते है ,साथ ही इसमें गाँव गरीब की शिक्षा को बचाने ,युवाओ के रोजगार संरक्षण और निजीकरण पर रोक की मांग भी सम्मिलित है । इस ज्ञापन में व्यवस्था सुधार के जो मुद्दे है उन एक एक मुद्दे पर बड़ी कार्यशाला आयोजित की जा सकती है । आम अध्यापक संमझ गया है कि विभाग सुरक्षित रहा तो ही उसकी आजीविका चलती रहेगी ।
यह क्रांतिकारी ज्ञापन जब सरकार के नुमाइंदों तक जाएगा तो वे बगले झांकने को मजबूर हो जाएंगे ,निश्चित रुप से यह ज्ञापन अखबारों में छपेगा तो आम जन में  स्वतः हमारे प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनेगा ।यह मुद्दे बुद्दिजीवियों और शिक्षाविदो के विचार विमर्श के केंद्र बिंदु होंगे ।
सभी संगठनो के एक जाजम पर आने से आम अध्यापक इस वक्त स्वय को विजेता मान रहा है यही उसकी चैन की नीद की एक वजह है, वह मनाता है कि एक होने से ही वह  आधी जंग जित गया है ।और कल अखबारों व समाचार चैनलों में  प्रसारित समाचार से उसका उत्साह दोगुना कर दिया है ,लेकिन प्रदेश का अध्यापक इन खबरों को सच्चाई अच्छी तरह से जान चुका है वह अब सरकार के बहकावे में आने  वाला नहीं है ,वह सिर्फ आदेश पर विश्वास करेगा । आम अध्यापक की तरफ से स्पष्ट संकेत है कि बात सरकार के किसी नुमाइंदे से कोई बात नहीं अब सिर्फ आदेश हो ।यही नहीं आम अध्यापक अपने 2013 ,2015 और 2016 के अनुभव को दृषिटगत रखते हुए ।अब स्वय को संविलियन तक एक रखने का मन बना चुका है । इस  बीच यदि कोई भी एकता में बाधक बना तो अध्यापक उसे कंही का नहीं छोड़ेगा और अपनी नजरो से सदा के लिये गिरा देगा ।

सोशल मीडिया पर सक्रिय होकर अध्यापकों ने तैयार किया 21 सूत्रीय मांगपत्र - वासुदेव शर्मा


वासुदेव शर्मा - 25 सितंबर को तिरंगा रैलियों के जरिए मुख्यमंत्री तक पहुंचने वाला ज्ञापन अध्यापकों के बीच तीन-चार दिन तक चले विचार-विमर्श के बाद तैयार हो गया है। अध्यापक संघर्ष समिति की ओर से उक्त मांगपत्र को फेशबुक और वाट्स-एप पर लोड कर दिया गया है। अध्यापक संघर्ष समिति का गठन, 25 सितंबर की तिरंगा रैली का निर्णय एवं दिए जाने वाले ज्ञापन के लिए जिस तरह अध्यापकों के बीच सामूहिक विचार-विमर्श की प्रक्रिया को अपनाया गया है, इससे एक बात स्पष्ट है कि सरकारों की 15-20 साल की उपेक्षा ने हर अध्यापक को इतना सक्षम बना दिया है कि वह निर्णय लेने की प्रक्रिया में न केवल भागीदारी करता है बल्कि उसे अमल में लाने के लिए जी-जान से जुट भी जाता है। 25 सितंबर की तिरंगा रैली के प्रति अध्यापकों के बीच जो उत्साह है, वह बताता है कि आम अध्यापक मुश्किलों एवं परेशानियों से जूझते-जूझते इतना मजबूत हो चुका है कि उसे अब तोडऩा सरकार के बस की बात नहीं रही, इसीलिए आज जब अध्यापकों को भ्रमित करने वाला समाचार अखबारो में आया, तो आम अध्यापक की ओर से उसे खारिज करते हुए कहा गया कि यह साजिश है जो 25 सितंबर की तिरंगा रैली को असफल करने के लिए रची गई है। उक्त समाचार पर अध्यापकों की प्रतिक्रिया बताती है कि वह सही और गलत का निर्णय करने में सक्षम हो चुका है, यही वो कारण है जिसने अध्यापक संघर्ष समिति के गठन के बाद साढ़े तीन लाख अध्यापकों को एक साथ उत्साहित कर दिया है।

इसी मांगपत्र से आएंगे अच्छे दिन


21 सूत्रीय मांगपत्र की हर मांग महत्वपूर्ण है। गहन विचार-विमर्श के बाद जो मांगपत्र सामने आया है, कर्मचारी वर्ग के हर तबके के बीच व्याप्त वेतन विसंगति को समाप्त करने की मांग तो करता ही है, घर-घर में बैठे बेरोजगार युवाओं के लिए रोजगार के रास्ते बनाने के लिए भी सरकार से कहता है। मांगपत्र में अध्यापकों को शिक्षा विभाग में संविलियन की मांग को प्रमुखता से उठाया गया है, वहीं अतिथि शिक्षकों को गुरूजियों की तरह संविदा शिक्षक बनाने की मांग भी सरकार से करता है। इससे भी आगे जाकर मांगपत्र ने संविदा भर्ती बंद कर सीधे अध्यापक की भर्ती शुरू करने की मांग पूरी ताकत से उठाई है, इस मांग का मतलब है कि सरकार जिस संविदाकरण की नीति पर चल रही है, उसे पूरी तरह बदला जाए, जिससे संविदा की नौकरी पाने वाले बेरोजगार युवाओं के जीवन में निश्चिंतता आए। उक्त मांगपत्र की एक-एक मांग अध्यापकों के जीवन से जुड़ी मांग है, जिसमें 15-20 साल के शोषण से मुक्ति चाही गई है। जनवरी 2013 से छठवां एवं जनवरी-2016 से सातवें वेतनमान की मांग का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि इनके पूरा होने के बाद अध्यापकों को एरियर के रूप में जो राशि मिलेगी, उससे आम अध्यापक को कुछ समय के लिए आर्थिक तंगी से निजात मिलेगी।


सरकारी स्कूल ही गरीबों का सहारा


21 सूत्रीय मांगपत्र में ही सरकार से यह मांग की गई है कि वह गरीबों से उसका सहारा नहीं छीने। सरकारी स्कूल ही हैं जो दूर दराज के ग्रामीण क्षेत्रों एवं शहरों की गरीब बस्तियों के बच्चों को पढ़ा लिखाकर समाज में बराबरी से जीने के लायक बनाते हैं। सरकार ने जिस तरह निजी स्कूल के लिए आने वाले हर आवेदन पर मान्यता देने की नीति बनाई है, उसका दुष्प्रभाव यह हुआ है कि किराने की दुकान की तरह निजी स्कूल खुल गए हैं, जिनमें न योग्य शिक्षक होते हैं और न ही अच्छी पढ़ाई होती है। चूंकि सरकार खुद निजी स्कूलों को बढ़ावा दे रही है और उनकी आर्थिक मदद कर रही है, इस कारण यह स्थिति बनी है। 25 सितंबर के मांगपत्र में 5000 की आबादी वाले गांव एवं कस्बों में निजी स्कूल को मान्यता न देने तथा जहां दे दी गई है, उसे निरस्त करने की मांग की गई है। ध्यान रहे यह ऐसी मांग है, जो सरकारी स्कूलों को बंद होने से बचाएगी तथा बड़ी संख्या में सरकार को नए सरकारी स्कूल खोलने के लिए मजबूर करेगी, जिससे शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा। वैसे भी शिक्षा विभाग ही एक ऐसा विभाग है, जहां सबसे अधिक रोजगार पैदा होते हैं, जिन्हें खत्म करने पर सरकार तुली हुई है, इसीलिए वह निजी स्कूलों को मान्यता देती जा रही है।


लक्ष्य बड़ा है तो लड़ाई भी बड़ी ही होगी

18 सितंबर को भोपाल में अध्यापक संघर्ष समिति बनाकर सभी पांचों अध्यापक संगठनों के नेताओं ने संघर्ष का जो लक्ष्य तय किया है, वह बड़ा लक्ष्य है, इसीलिए उसी दिन इस बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए बड़ी लड़ाई की तैयारी की घोषणा भी की गई। 25 सितंबर की तिरंगा रैली इसकी शुरूआत है। इसके आगे अध्यापकों का यह आंदोलन गांव, गली, मोहल्लों, कस्बों, शहरों, कालोनियों से गुजरते हुए जब अपनी मंजिल की तरफ बढ़ेगा, तब हर वह व्यक्ति हैरान रह जाएगा जो चौड़ी सडक़ों और आलीशान बिल्डिगों को ही विकास मानकर संतुष्ट हो चुका है। 25 साल के उदारीकरण ने मानवीय विकास को ठप्प कर व्यक्तियों को मुनाफाखोरों के लिए नोट उगलने की मशीन में तब्दील कर दिया है। प्रदेश का साढ़े तीन लाख अध्यापक इस सच्चाई को समझ चुका है, इसीलिए वह मानव की बेहतर के लिए रास्ता बनाने के लिए आंदोलित हुआ है, 21 सूत्रीय मांगपत्र इसका स्पष्ट संकेत देता है। शिवराज सिंह पढ़ सकते हो तो पढ़ लेना, 25 को 4 बजे तक प्रदेश के हर कौने से ज्ञापन पहुंचने वाले हैं। ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और यह इनके निजी विचार है )

Friday, September 23, 2016

अध्यापक अब नहीं रुकने वाले - महेश देवड़ा (कुक्षी)


महेश  देवड़ा  (कुक्षी) -ये आश्वासन ये समाचार पत्रों की खबरेे अब अध्यापक इनसे नहीं बहलता साहेब । आदेश कीजिये और अपनी बातों का मान रखिये । और 7440 दे भी रहे तो कोई अहसान नहीं कर रहे वो तो हमारा हक़ है और लेके रहेंगे । पर ख्याल ये हो की इससे तिरंगा रैली रुक जाएगी तो ग़लतफ़हमी दूर कीजिये । लाल घाटी का दमन कोई अध्यापक भुला नहीं साहब हाथ में तिरंगा लिए हमारी बहनों पर लाठियों के वार और सड़कों पर घसीटा जाना , अपने ही प्रदेश की राजधानी जाते अध्यापको को आतंकवादियों की तरह घरों से रास्तो से गिरफ़्तारी का वो मंजर आज भी खून में उबाल ले आता है । उस एक लाल घाटी का मंजर 51 जिलों में दिखाई देगा । गणना पत्रक तो छोटी बात है साहब आप तो सांतवें और संविलियन का हिसाब लगाइये । अब तो लड़ाई संविलियन पर ही रुकेगी ।
जिस तेजी से समाचार पत्रों में खबर लगवाते है माननीय उतनी संजीदगी अगर अपनी घोषणा के आदेश में दिखाते तो अब तक तो आदेश जारी हो जाता । और ये अध्यापक प्रेम हमेशा किसी आंदोलन के पहले ही क्यों उमड़ता है सोचने वाली बात है ।साथियो किसी समाचार से भ्रमित न हो अगर अपना हक चाहिए तो 25 को अध्यापक एकता का वो नजारा हो हर जिले में की सियासतदानों को वास्तव में चाणक्य की याद आ जाये । हमारा भविष्य का आंदोलन , सांतवां वेतन और शिक्षा विभाग में संविलियन सब कुछ 25 की सफलता पर निर्भर है।  अपनी पूरी ताकत लगा दो । वेतन भत्तों के लिए बहुत लड़ लिए साथियों , अबके चोट स्वाभिमान पर हुई है तो अब अध्यापक आत्मसम्मान के लिए मैदान में है । और ये आत्मसम्मान असमानता, भेदभाव और शोषण से मुक्ति पाकर ही बना रहेगा । दिखा दो सरकार को कि हम आपस में कितना भी लड़ ले पर जरुरत पड़ने पर हम पहले भी एक थे आज भी एक है और आगे भी एक होंगे ।
अध्यापक संयुक्त संघर्ष समिति ,जय अध्यापक एक
(लेखक स्वय अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार हैं )

अध्यापकों की तिरंगा रैली को मिल रहा व्यापक समर्थन- वासुदेव शर्मा छिंदवाड़ा


वासुदेव शर्मा-25 सितंबर को जिला मुख्यालयों में होने वाली तिरंगा रैली में हिस्सेदारी की होड़ अध्यापकों के बीच शुरू हो गई है। मिल रही जानकारियों के आधार पर कहें तो यह आंदोलन 100 प्रतिशत भागीदारी के साथ ऐतिहासिक होने वाला है यानि अपने-अपने जिलों में साढ़े तीन लाख अध्यापक तिरंगा रैली का हिस्सा बनेंगे। तीन दिन के अल्पसमय में प्रदेश के ज्यादातर जिलों में बैठकें कर अध्यापक संघर्ष समिति का गठन कर लिया गया है, जो यह बताता है कि इस बार अध्यापक शिक्षा विभाग में संविलियन की लड़ाई को जीतने के लिए लडऩे वाला है और इसके लिए वह किसी भी सीमा तक जा भी सकता है। अध्यापकों की एकजुटता का संदेश दूसरे अल्पवेतन भोगी कर्मचारियों एवं उनके संगठनों के बीच भी जा चुका है, इन संगठनों के नेता भी चाहते हैं कि प्रदेश में सरकार द्वारा सताए जा रहे कर्मचारियों का निर्णायक आंदोलन हो और उसके साथ एकजुटता व्यक्त की जानी चाहिए।

तिरंगा रैली को संविदा कर्मचारी संघ का समर्थन
संविदा कर्मचारी संघ के प्रांतीय अध्यक्ष रमेश राठौर ने अध्यापक संगठनों की हाल ही में बनी एकजुटता को सराहते हुए कहा कि इनकी मांगेें जायज हैं और उन्हें सरकार को तत्काल पूरा करना चाहिए। 25 सितंबर को जिला मुख्यालयों पर होने वाली तिरंगा रैली के प्रति एकजुटता व्यक्त करते हुए राठौर ने कहा कि हमारा संगठन अध्यापकों के साथ है और उनकी तिरंगा रैली को समर्थन करता है। उन्होंने हमें भरोसा दिलाया कि उनके संगठन के जिला पदाधिकारी 25 सितंबर को अध्यापकों की तिरंगा रैली का हिस्सा बनकर समर्थन करेंगे। गौरतलब है कि सरकार ने कुछ ही महीनों में 4 हजार से अधिक संविदा कर्मचारियों की छटंनी कर दी है, जिन विभागों में छंटनी की गई है उनमें स्वास्थ्य विभाग, कौशल विकास विभाग शामिल हैं। इस छंटनी के बाद प्रदेश के संविदा कर्मचारी डरे हुए है। वे अपनी नियमितीकरण की मांग को लेकर निर्णायक लड़ाई लडऩा चाहते हैं, इसके लिए 4 अक्टूबर को भोपाल में रैली भी करने वाले हैं।

अतिथि शिक्षक संघ भी तिरंगा रैली के साथ

अतिथि शिक्षक संघ के प्रांताध्यक्ष जगदीश शास्त्री ने भी अध्यापकों की तिरंगा रैली के साथ एकजुटता प्रदर्शित करते हुए समर्थन देने की बात कही है। शास्त्री उन शिक्षकों के नेता हैं, जो उन्हीं स्कूलों में पढ़ाते हैं, जहां अध्यापक पढ़ाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने स्कूलों में शिक्षाकर्मी भर्ती किए थे और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अतिथि शिक्षक। दोनों ही मुख्यमंत्रियों की व्यवस्थाओं ने शिक्षकों के शोषण का रास्ता तैयार किया है, इसके बाद भी दोनों की व्यवस्था में अंतर है। दिग्विजय सिंह ने   शिक्षाकर्मियों को नियमित होने का अधिकार दिया था, लेकिन शिवराज सिंह ने अतिथि शिक्षकों को 40 मिनट के पीरियड के बाद नौकरी से बाहर कर देने और फिर 40 मिनट के लिए रख लेने की व्यवस्था बनाई है, ऐसी व्यवस्था दुनिया के किसी भी देश के किसी भी स्कूल में नहीं है। अतिथि शिक्षकों के लिए बनाई गई इस व्यवस्था से दुखी जगदीश शास्त्री कहते हैं कि जीतने का रास्ता अध्यापकों के आंदोलनों से निकलता है, तब हमें भी जीतने की राह मिल जाएगी, इसीलिए हम पूरी तरह अध्यापकों के साथ है और उनकी तिरंगा रैली का समर्थन करते हैं। ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और यह उनके निजी विचार है )

Thursday, September 22, 2016

हिंन्दी ( प्रथम भाषा ) की उपेक्षा व पद समाप्त कर माध्यमिक विद्यालयों को दो शिक्षकीय करने की तैयारी-सुरेश यादव (रतलाम)

सुरेश यादव -एक मित्र ने अपनी समस्या बताई की उन्होंने अपने विद्यालय का नाम  "शासकीय हाई स्कूल" के स्थान पर  "शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय " लिखा  जो हमारे अधिकारियो को नागवार गुजरा ,प्रतिप्रश्न करने पर इन्हें संतोषजनक जवाब भी नहीं मिला आप भी अच्छे से जानते है  "हाई स्कूल" हिंन्दी शब्द नहीं है , विडम्बना  देखिये हम तीन अन्य विद्यालयों को  तो हिन्दी में ही पुकारते है "प्राथमिक,माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक ", लेकिन हमारे पास हाई स्कूल का कोई हिन्दी  शब्द नहीं है। हमारे विभाग के अधिकारियों की मज़बूरी कह लें की वे सरकार द्वारा खिची लक्ष्मण रेखा तक जा सकते हैं ,कभी उल्लंघन नहीं करते । आप कल्पना कीजिये क्या कभी किसी अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इस "हाई स्कूल "के प्रयोग पर आपत्ति जताई होगी या कोई शासकीय या अर्ध शासकीय पत्र लिख कर मांग की होगी की " हाई स्कूल " के स्थान पर हिन्दी शब्द का प्रयोग किया जाए ,शायद नहीं । लेकिन हमें प्रशंसा करनी चाहिये  हमारे  अध्यापक जैसे छोटे कर्मचारी साथी की ,जिन्होंने ने विभागीय परंपराओं को तोड़ कर " हाई स्कुल " का नाम " उच्च माध्यमिक विद्यालय " लिखने का साहस किया । हिन्दी के सम्मान के लिए लड़ाई लड़ने का  एक उदाहरण था ।
अब में विभाग  में हिन्दी की घोर उपेक्षा पर भी एक नजर डालते है ,हाल ही में विद्यालयों में स्वीकृत पदों के अनुसार शिक्षकों की व्यवस्था सुनिश्चित करने के विषय में आदेश आया है । माध्यमिक विद्यालयों में प्रथम तीन पदों में  गणित (पीसीएम) एवं विज्ञान ,सामाजिक विज्ञान और अंग्रेजी  के पद स्वीकृत किये गए है । साथियो यह राष्ट्र भाषा की घोर उपेक्षा ही तो है कि जिस विद्यालय में उसे प्रथम भाषा के रूप में पढ़ाया जा रहा है वँहा उसका शिक्षक उपलब्ध नही हो पायेगा  हिन्दी भाषा  शिक्षक का पद छटवा पद होगा जो विद्यालय में  175 विद्यार्थियो के बाद ही मिल पायेगा । आप इस का जवाब  अपने स्तर पर भी खोजिये  हमारे आपके  विकासखंड में कुल कितने विद्यालय है जंहा 175 से अधिक विद्यार्थी दर्ज है ।शायद 10 या 15 प्रतिशत विद्यालय मिलेंगे अर्थात केवल 10 -15 प्रतिशत विद्यालयो में हिन्दी भाषा शिक्षक उपलब्ध रहेंगे ।
अब हम, शिक्षकों की उपलब्धता पर विमर्श करते है ,आप स्वयं अपने विकासखण्ड और जिले की स्थिति का आकलन करें की अंग्रेजी के कुल कितने शिक्षक जिले  में उपलब्ध हैं ,मैं रतलाम जिले का उदाहरण देता हूँ रातलाम में 650 से अधिक मध्यमिक  विद्यालय है और  अंग्रेजी के  कुल 15 शिक्षक ( शिक्षक और अध्यापक) पदस्थ है । कारण मात्र यह है कि अंग्रेजी भाषा शिक्षक के लिए जो योग्यता ( स्नातक में अंग्रेजी साहित्य विषय की अनिवार्यता ) निर्धारित की गयी है उस मापदंड के शिक्षक उपलब्ध ही नहीं है । में अपने विद्यार्थी जीवन की बात बताऊँ तो स्नातक  कक्षा में 450 विद्यार्थियो में से हम 4 साथी थे  अंग्रजी साहित्य विषय के बाकी सब हिन्दी या संस्कृत साहित्य ही चुनते थे । में तो मध्य प्रदेश सरकार को चुनोती देता हूँ की  संपूर्ण प्रदेश में पिछले 20 वर्षो से अंग्रेजी साहित्य विषय के साथ स्नातक करने वाले विद्यार्थियो की कुल संख्या को भी भर्ती कर ले तब भी केवल 5 -7 प्रतिशत माध्यमिक विद्यालयो में अंग्रेजी शिक्षक उपलब्ध हो पाएंगे । सरकार अपने इस   निंर्णय पर गंभीरता से  समीक्षा करें ।

सरकार समीक्षा करे की आप हिंदी विश्व विद्यालय प्रारंभ कर रहे है तकनिकी और व्यवसायिक शिक्षा हिंदी में करने की तैयारी कर रहे है ,दूसरी तरफ हिन्दी शिक्षक के पद समाप्त कर रहे हैं ।
साथियो एक लाइन में कह दू तो इस सब के पीछे सरकार का उद्देश्य यह है कि वह पुनः माध्यमिक विद्यालयों को 2 शिक्षकीय शाला करना चाहती है ,जो न सिर्फ गरीब और ग्रामीण अंचल के  विद्यार्थियों  के साथ अन्याय है वरन  काम कर रहे शिक्षकों की आजीविका पर भी संकट के समान है ।
विचार करे और यह विषय समाज के समक्ष ले जाये ।
(लेखक स्वय अध्यापक है और यह उनके निज विचार है )

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Friday, October 7, 2016

इलाहबाद हाई कोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है - नरेन्द्र कुमार पासी ( रतलाम )

नरेन्द्र कुमार पासी - इलाहबाद हाई कोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है | यह किसी की अस्मिता से जुड़ा प्रश्न नही होना चाहिए | क्यों की आज भारत का बहुत बड़ा वर्ग किसान है या गरीब है या दलित समुदाय से आता है | ऐसे में जब उनके बच्चो को शिक्षा न मिले तो उनके दिलो पर क्या बीतती होगी | यह सहज अहसास कर पाना बड़ा ही कठिन सवाल ?आज जहाँ सरकार द्वारा शिक्षा के अनेको प्रावधान कियेगए फिर भी हम आज शिक्षा के अधिकार से ही वंचित है | संविधान के अनुच्छेद 41 A के तहत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत मान्यता दी गई थी जिसके अनुसार, "राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर, शिक्षा और बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और विकलांगता के मामले में सार्वजनिक सहायता करने के लिए काम करते हैं, सही हासिल करने के लिए प्रभावीव्यवस्था करे “ /हालांकि संविधान निर्माणी सभा के अनेको सदस्य और स्वतः बाबा साहब अम्बेडकर यह चाहते थे कि समान शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार में शामिल हो और न्यायिक आदेश से लागू होने की व्यवस्था हो। परन्तु उस समय केन्द्र सरकार के मुखिया और निंयत्रको का यह तर्क था कि सरकार का खर्च और साधन इतने विकसित नही है कि इसे वैधानिक अधिकार या कानून के रुप में लागू कियाजा सके। अतः कुछ समय ढांचे के विकास को चाहिये और इसलिये अन्य मुद्दों की तरह इसे भी नीति निर्देशक मुद्दों के खण्ड में शामिल किया जाये जो कि सरकारों के लिये आदर्श हो और कुछ समय पश्चात जब आधार रुप ढांचे का विकास हो जाये तब अन्य मुद्देां के साथ समानशिक्षा के मुद्दे को भी मूल अधिकार के रुप में शामिल किया जा सकता है। पर अफ़सोस व दुखद यहाँ रहा की इसका कोई ठोस नियम या आदेश न बन सका | इसके पीछे तर्क था की भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत नही की इस खर्च को झेल चुके |एक यह भी अनुमान लगाया गया की आने वाली सरकारे 10-20-30 वर्षो में इसका नियम व आदेश बना लेंगे पर आज आजादी के 68 वर्ष बीत चुके है फिर भी हम लोगो को शिक्षा का समान अधिकार नही दे पाये | निजी स्कूलो के नाम पर आर्य समाज ईसाई मिशनरी संस्थायें, इस्लामिक मदरसा, गुरुद्वारा प्रंबधक सभायें जैसी अन्य धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से शिक्षा के प्रसार के लिये स्कूल कालेज आदि खोले गये थे परन्तु यह सामाजिक हित में और गरीब लोगो को भी शिक्षा देने के लिये न्यूनतम फीस आदि के आधार पर शुरुकिये गये थे।इनमें व्यापार या मुनाफा नही था और न ही निजी मालकियत थी बल्कि इनके पीछे समाज सेवा शिक्षा का विकास और परोपकार की भावना थी। परन्तु कुछ वर्षो के पश्चात समाज के ताकतवर सपन्न और प्रभावी लोगो ने अपने बच्चों के लिये पृथक और मंहगे स्कूल शुरु कराये जैसे दून स्कूल डेली कालेज और ऐसी ही अन्य शिक्षण संस्थाओं को राजा महाराजा या उद्योगपतियों के पैसे से खड़ा करना आंरम्भ हुआ तथा शिक्षा को अमीर और गरीब-बड़े और छोटे ताकतवर और कमजोर राजा और रंक के बीच बांट दिया गया। पुराने राजाओं, धनपतियों और राज सत्ता पर बैठे नेताओं तथा अफसर शाहो के बच्चे इन बड़ेस्कूलों में पढ़ाये जाने लगे जहां पढ़ाई का माध्यम सत्ता प्रतिष्ठान की भाषा अंग्रेजी हो गई और उच्चवर्गीय और उच्च वर्णीय ढ़ाचे को स्थाई तौर पर बरकरार रखने के लिये शिक्षण संस्थाओं में भाषा महत्वपूर्ण माध्यम बन गई।डा.राममनोहर लोहिया ने नारा दिया था ’’राष्ट्रपति हो या चपरासी की संतान सबकी शिक्षा एक समान’’ लोहिया इस बात को जानते थे कि अगर अफसर और चपरासी का बेटा, सम्पन्न और गरीब का बेटा , उद्योगपति और किसान का बेटा, बड़ी जात और दलित का बेटा जब एक ही स्कूल में साथ-साथ पढ़ेगे तो भेद-भाव मिटेगा |राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी तथा सबको समान अवसर प्राप्त होगे,जिससे योग्यता और क्षमता का विकास भी उसी के अनुसार होगा। यह बड़ा विचित्र है कि हमारे देश के कुछ नौजवान और कुछ लेाग जो आरक्षण को समानता का विरोधी मानते है आरक्षण तो मिटाना चाहते है| आरक्षण मुक्त भारत का नारा लगाते है परन्तु समान शिक्षा की बात नही करते। वे यह तो कहते है कि 68 साल आरक्षण को हो गये इसे खत्म करना चाहिये परन्तु वो यह नही कहते कि 68 साल हो गये कि अब नीति निर्देशक मुद्दों को संवैधानिक प्रावधान बनना चाहिये तथा सबको समान शिक्षा का अवसर मिलना चाहिये।असमान शिक्षा भी एक प्रकार का आरक्षण है जिसमें सम्पन्न और ताकतवर के बच्चो को पद और पैसे के आधार पर शिक्षा के विशेष अवसर है। इसका आधार योग्यता नही है बल्कि मात्र आर्थिक या सत्ता प्रतिष्ठान की ताकत ही योग्यता है। यह नौजवान मित्र बड़े-बड़े डोनेशन वाली (जो वस्तुतः भ्रष्ट व काला धन होता है) उस शिक्षा प्रणाली का भी विरोध नही करते जिसमें लाखो करोड़ रुपये देकर अयोग्य छात्र डाक्टर, इंजीनियर आदि बन जाते है और इसीलिये समाज के एक बड़े हिस्से में उनकी मांग और नीयत संदिग्ध रहती है। अब देश में सरकारी शिक्षण संस्थाये और विशेषतः प्राथमिक शिक्षा मैदान के बाहर नजर आती है। नये सरकारी स्कूल खुलने के बजाय बंद हो रहे है। परोपकार के नाम पर शुरु किये जाने वाली धार्मिक और सामाजिक संगठनों के द्वारा चलाये जाने वाले स्कूल बंद हो रहे है| कहने को तो सरकार ने शिक्षा का कानून RTE 2009 में पारित कर दिया है , निजी शिक्षक संस्थाओ को 25 प्रतिशत स्थान गरीबो के बच्चो को आरक्षित रखने का प्रावधान कर दिया है। पर यहतो कानून की किताबो में ही सिकुड़ कर रह गया है | स्कूलो में प्रवेश भी मिल जाये पर विद्यालय में लगने वाली वर्दी (यूनिफार्म) महँगी किताबे ,कापियां ,स्कूलकी दुरी की वजह से साधन याने स्कूल प्रबंधन की चलने वाली महँगी किराये वाली बस (BUS) ,एवं विद्यालय में लगने वाली शिक्षण शुल्क के अलावा अन्य लगने वाली शुल्क की भरपाई कौन करेगा ,,कोर्स में अनेक प्रकार के प्रोजेक्ट बनाने के लिए सहायक सामग्री स्टेशनरी कम्प्यूटर ,प्रिंटर आदि कहाँ से लाये जाये ,यह सारी बाते या समस्याए एक गरीब परिवार नही झेल सकता |भारत की 15 वी जनगणना(वर्ष 2015) के अनुसार देश में साक्षरता 74.04 फीसदी है| जिसमे पुरुष साक्षरता 82.14 फीसदी और महिला साक्षरता 65.46 फीसदी हो गई | परइस बात का ध्यान रहे की शिक्षित होना और साक्षर होना दोनों में भिन्नता है | अब समय आ गया है जब”” शिक्षा कीही नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात होनी चाहिये”” |यही कारण है कि””सबको शिक्षा-अच्छी शिक्षा”” हमारा नारा है।जब सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर ,लिपिक,चपरासी,किसान ,दलित आदि जब सभी के बच्चे एक ही स्कूल में एक ही छत के नीचे एक ही अध्यापक से शिक्षा ग्रहण करेंगे |तभी हम सभी समान शिक्षा का अधिकार दे पाएंगे |आज मध्यप्रदेश में शिक्षा की हालत बहुत ही दयनीय है जिसके कारण आज शिक्षा का व्यापारीकरण हो गया है| सरकारी स्कुलो का रुख खासकर प्रायमरी स्तर पर केवल गरीब के बच्चे मध्यान भोजन के लिए या छात्रवृत्ति के लिए नाम मात्र को स्कूल पहुँच रहे है | वही शिक्षको में अनेक कटेगिरी का निर्माण शासन ने कर रखा है /अतिथि , गुरूजी, संविदा शिक्षक ,शिक्षाकर्मी ,नियमित शिक्षक ,पद एक ,कक्षाए भी पढ़ाने को एक ,पर दुर्भाग्य कीइनका वेतन अलग-अलग है |ऐसे में मानसिक तनाव झेल रहा मध्यप्रदेश का शिक्षक अपने नियमतीकरण के लिए कही स्कूल बंद ,कही हड़ताल ,कही ज्ञापन ,कही जेल में बंद रहकर सरकार की नीतियों व वादा खिलाफी के प्रति अपनी जंग जारी रखे हुए है ,,,ऐसे में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा,विद्यालयों का सही सञ्चालन हो पाना आज “”दूर की कौड़ी साबित”” हो रहा है |

सरकारी विद्यालयों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की कमी के कारण :---------------------------------------------------
01. विद्यालयों को सही संचालित करने में सरकार की इच्छाशक्ति की कमी |
02. नेताओ के द्वारा आपने वोटर्स तैयार करने के लिए शैक्षणिक घोषणाए |
03. गुणवत्तापूर्ण शिक्षक/ शिक्षिका की कमी
04. शिक्षक/शिक्षिका को अन्य शैक्षणिक कार्यो में उलझाये हुए रखना |
05. शिक्षको को पुरे वर्ष स्कूल के बाहर जनगणना, मतदाता सूचि का संधारण,ग्राम सर्वे ,BPL सूचि तैयार करना ,पशु गणना ,मध्यान भोजन कीजानकारिया जुटानाआदि अनेक ऐसी ही योजनाओ को राष्ट्रिय कार्य का नामदेकर शिक्षक/शिक्षिका से करवाया जाता है |
06. गुणवत्तापूर्ण व नियमानुसार एवं सर्व सुविधायुक्त विद्यालय ईमारतका न होना |
07 .विद्यालयों में पानी ,साफ-सफाई,रौशनी,साफसुथरे लैट्रिन-बाथरूमोका न होना |
08. विद्यालय का सही प्रबंधन न होना |
09. विद्यालयों में होने वाली मानिटरिंग को सही अन्जाम न देना ,,यह केवल खानापूर्ति तक सीमित रहा गया है |
10. अधिकारियों का अपनी जेब गरम करने से फुर्सत नही जिसकारण विद्यालयों की सुविधा एवं पढाई लिखाई पर ध्यान देनेका ढुलमुल रवैया |

यदि सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर,लिपिक,चपरासी, किसान ,दलित आदि जब सभी के बच्चे एक ही स्कूल में एक ही छत के नीचे एक ही अध्यापक से शिक्षा ग्रहण करेंगे तो इसके परिणाम भी बेहद रोचक होंगे |साथही भारत देश का जो एक बड़ा तबका जो की शिक्षा से अछूता या कहे शिक्षा के नाम पर साक्षर तो है पर शिक्षित नही है |ऐसे बदलाव से समाज पर भी गहरा और भविष्य में सामाजिक भेदभाव मिटाने में कभी सहायक सिद्ध होगा |

समाज पर प्रभाव :---------------------
01. सभी छात्र एक जैसी वर्दी (यूनिफार्म) पहनेगें तो न कोई आमिर दिखेगा न ही कोई गरीब दिखेगा
02. सभी छात्र एक जैसी किताबो का अध्ययन करेंगे जिससेसभी का ज्ञान बुद्धि-लब्धि के हिसाब से एक जैसा होगा|
03. सरकार के द्वारा स्कुलो में उपलब्ध करवाए गए पढाई–लिखाई के साधन भी एक जैसे होंगे |
04. सबसे अहम बात की गरीब बच्चो को पढाई करने में हीन भावना का शिकार भी नही होना पढ़ेगा |
05. कक्षा में एक अध्यापक सभी छात्रो को एक जैसा ही पढ़ेगा ,यह नही होगा की ये गरीब छात्र है की यह अमीर छात्र है |किसी एक पक्ष को इंगित नही करेगा |
06. अमीर छात्रो को अलग से कोई अन्य भाषा नही पढ़ाई जाएगी ,जैसा की बड़े निजी विद्यालयों में होता है |सभी को एक ही पाठ्यक्रम से पढाया जायेगा |
07. एक साथ स्कूलो में बैठक व्यवस्था होगी | क्यों की अमीर गरीब का भेदभाव अभी भी समाज में व्याप्त है |
08. जब सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर , व्यापारीके पुत्र/पुत्री जब सरकारी स्कूलो में पढेंगे तो आपने आप ही सभी स्कुलो पर विशेष ध्यान देना शुरूकर देंगे और स्कुलो की खस्ता हालत या लचर व्यवस्था में सुधार आना शुरू हो जायेगा |
09. शिक्षको को सही वेतनमान और सही समय पर पगार(पेमेंट) मिलना शुरू हो जाएगी |
10. वर्तमान में जो हम भारत की साक्षरता 74 प्रतिशत बताते है यही शिक्षा में परिवर्तित हो जाएगी ,फिर हर वर्ग का छात्र देश के प्रति देशप्रेम और देश के संसाधनों कोगुणवत्तापूर्ण उपयोग के बारे में सोचेगायह इलाहबाद हाई कोर्ट का बहुत ही सराहनीय कदम है|
इससे समाज ही नही देश में भी शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव आएंगे | 

लेखक सवयं अध्यापक है और यह इनके निजी विचार है -यह लेख बुधवार और गुरूवार को शिक्षा विमर्श में चर्चा के विषय 
'  माननीय ईलाहबाद उच्च न्यायालय का आदेश जिसमे प्रत्येक लोकसेवक "अफसर ,कर्मचारी ,विधायक और सांसद " को अपने बच्चों को शासकीय विद्यालयों में पढ़ाने का आदेश  ' में प्रथम स्थान पर चुना गया है . 

Wednesday, October 5, 2016

RTE रूपी कमान से निकला एक तीर 25% फ्री....निशाने दो शिक्षक और समुदाय-श्रीराम राठौर (खातेगांव)

श्रीराम राठौर  -साथियों सादर वंदे.......RTE (शिक्षा का अधिकार अधिनियम) के प्रावधान अनुसार वंचित और कमजोर वर्ग के बच्चों का अशासकीय शालाओं की न्यूनतम कक्षा में 25% (न्यूनतम) प्रवेश के संबंध में बात करने से पहले यह सोचना आवश्यक हो जाता है कि हर सिक्के के 2 पहलू होते हैं इस विषय पर यदि दोनों पहलुओं को साथ लेकर चला जाए तभी हम सही निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं।
मेरे विचार से सर्वप्रथम इसकी बिंदुवार पक्ष विपक्ष के साथ समीक्षा कर ली जाये.....
25% निःशुल्क प्रवेशित बच्चों का शासकीय विद्यालयों पर पड़ने वाले प्रभावों तथा उनके कारणों के संबंध में यदि विस्तृत रूप से चिंतन किया जाये तो निम्न तथ्य सामने आते है......
1)  शासकीय शालाओं में प्रवेश की कमी :- अशासकीय शालाओं में न्यूनतम कक्षाओं में 25% निःशुल्क प्रवेश के कारण हमारे शास.विद्यालयो में साल-दर-साल नव प्रवेशी बच्चों का अकाल सा पड़ गया है, इस प्रवेश रूपी अकाल को हम समुदाय से अपना जीवित संपर्क कर अपनी शाला की विशेषता बता कर और हमारे कार्यो से दूर कर सकते है 25% फ्री का शासकीय विद्यालयों पर पड़ने वाला यह मुख्य प्रभाव है।
2) यह योजना शासकीय शालाओं का निजीकरण की ओर भी ध्यान आकर्षित करती है,शासकीय शाला की न्यूनतम कक्षा से साल दर साल बच्चो की संख्या उसी अनुपात में अगली कक्षाओ में आगे भी बढती चली जाती है विगत तीन चार वर्षो में 25% न्यूनतम तथा इससे भी अधिक बच्चों का प्रवेश निजी विद्यालयों में प्रवेश दिया जाकर शासन द्वारा इसकी फीस प्रतिपूर्ति भी की गई परन्तु इस वर्ष शासन द्वारा  निजी विद्यालयों हेतु इस प्रक्रिया को ऑनलाइन के माध्यम से किया जाकर विभिन्न कठिन प्रावधान भी इसमें जोड़े गए जो की शास.शालाओ और हमारे पक्ष में रहा है यह हमारे लिए एक अच्छा संकेत भी है।
3) एक प्रश्न यह भी उठता है की 25% फ्री बच्चों पर खर्च की जाने वाली राशि का उपयोग निश्चित रुप से शासकीय विद्यालयों में होना चाहिए था जिससे शासकीय विद्यालयों की अपूर्ण व्यवस्थाओं को पूर्ण किया जा सकता था वैसे शासन हमेशा पूर्ण व्यवस्था के झूठे दावे करता रहता है इस सम्बन्ध में भी हमें शासन का ध्यान आकृष्ट करना चाहिए।
समुदाय पर 25% फ्री भर्ती के पड़ने वाले प्रभाव के बारे में भी हमें चिंतन और मनन करना होगा...
1) आज वर्तमान में अशासकीय विद्यालयों की चकाचौध के कारण कमजोर वंचित समूह के लोग भी अपने बच्चो का प्रवेश अशासकीय शालाओ में कराना चाहते है RTE में 25% का प्रावधान भी समुदाय की भावना को ध्यान में रखकर किया गया है, कही न कही हम भी इसके लिए जबाबदार है हमें समुदाय को हमारी और हमारी शालाओ का प्रचार प्रसार कर स्वयं की योग्यता को साबित करना ही पडेगा।
2) वंचित वर्ग के लोग जो अपने बच्चो को अच्छे सर्वसुविधा युक्त अशासकीय  शाला में 25% के माध्यम से प्रवेश दिलाते है वो शाला के अन्य खर्च जैसे गणवेश पुस्तकें टिफिन और आवागमन के साधन आदि वहन नहीं कर पाते कही न कही ये बात समाज में कुंठा की भावना एवं बच्चो एवं पालको में हीन भावना पैदा करती है यह 25% फ्री योजना का एक कमजोर बिंदु है।
3) बड़े और सर्वसुविधायुक्त अशासकीय विधालय 25% भर्ती के संबंध में सहयोग की भावना नहीं रखते तथा छोटे ऐसे विद्यालय जिनकी फीस RTE वाले फ्री बच्चो से कम है वे विद्यालय इस योजना में अधिक रुचि लेते है, अशासकीय शालाओ के इस प्रकार के रवैये से भी कही न कही समुदाय भ्रम में पड़ रहा है।
निष्कर्ष:- साथियों सारे बिन्दुओ पर विचार करने के पश्चात यह कहना उचित होगा समाज को इस योजना में लाभ के साथ साथ अप्रत्यक्ष रूप से हानि भी हो रही है, साथ ही कहीं ना कहीं इस मामले में कमजोर पक्ष के रूप में हम लोग भी नजर आते हैं निश्चित रूप से समुदाय को हम हमारी विशेषताएँ नहीं समझा पा रहे है, और नहीं समुदाय से आपसी सामंजस्य भी बैठा  पा रहे है और न ही वर्तमान में पालको से हमारा जीवित संपर्क ही रहा है।
एक बात और भी सामने आती है साथियो, हमारे द्वारा होने वाले आंदोलनों में भी 25% फ्री बच्चो का मुद्दा तथा शास.विद्यालयों का निजीकरण का मुद्दा भी हमें सम्मिलित करना चाहिए तथा हम शिक्षकों को समुदाय से अशासकीय विद्यालयों के प्रति समुदाय की भावना को भी हमारे उत्कृष्ट कार्यो के द्वारा बदलना ही पड़ेगा। साथियों यह तो निश्चित है कि यदि हम अपने कर्तव्य पर 100%खरे उतरे तो शासन 25% फ्री भर्ती के साथ ही ऐसे और भी सैकड़ों प्रयोग हमारे विद्यालय और हमारे समाज पर कर ले तो भी इस तरह के कपटता पूर्वक रवैये में कभी भी सफल नहीं हो सकती क्योंकि हम राष्ट्रनिर्माता  और युगद्रष्टा की भूमिका में है,आज भी समाज हमारा अनुसरण करता है। हमारे  अस्तित्व को बचाने और हमारी शक्ति को पहचानने की आवश्यकता और जरूरत मात्र है, सरकार का यह जो RTE की कमान से निकला हुआ 25% का तीर है निश्चित रुप से हम इस तीर को मोड़ सकते हैं इतना सामर्थ और शक्ति तो हमारे अन्दर मौजूद है।।
(लेखक स्वयं  अध्यापक और यह उनके निजी विचार है ।)RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव )
संयुक्त रूप से प्रथम स्थान  पर पर यह लेख चयनित किया गया।

25% नही 100% छात्रों को निजी स्कूलों में भेजने की साजिश है ये नियम - सचिन गुप्ता (खितौली)


RTE के तहत 25% छात्रों को निजी स्कूलों में भेजने की सरकार की मंशा चाहे जो भी हो लेकिन इस निर्णय से सरकारी विधालय ,वंचित वर्ग ,और समाज इन सभी पर परोक्ष अपरोक्ष रूप से गहरा असर हो रहा है।
हम सभी और सरकार भी यह जानती है कि सरकारी स्कूलों में कमजोर,वंचित और सामाजिक रूप से पिछडे गरीब लोगों के छात्र ही बहुतायत संख्या में दर्ज होते हैं जिनकी निशुल्क शिक्षा की व्यवस्था सरकार खुद करती है।
यह सब जानते हुए भी 25% छात्रों को सरकारी स्कूल से छीनने का सफलतम प्रयोग सरकार ने कर लिया जिसका सीधा असर सरकारी स्कूल की दर्ज संख्या पर हुआ। इस निर्णय ने यह दिखाने की कोशिश कि सरकारी स्कूल में छात्र नहीं पढना चाहता अगर हम 100% कर दे तो सरकारी स्कूल बंद हो जाँएगे शायद इनकी मंशा भी यही है क्योंकि समय समय पर सरकारी स्कूलों के निजीकरण की बातें अखबारों व बयानों के माध्यम से सुनने को मिलती रहती हैं
यह निर्णय हर सरकारी स्कूल पर हमला है, हर अध्यापक ,हर शिक्षक पर हमला है ये हमारी योग्यता पर हमला है ।
मैं जानना चाहता हूँ कि निजी स्कूलों ने उन 25% छात्रों के शैक्षणिक स्तर पर कितना सुधार किया ।
जहाँ एक ओर सरकार को इनकी निशुल्क शिक्षा के लिए अतिरिक्त वित्तीय भार सहना पड रहा है वही सरकारी स्कूलों में तमाम सुविधाएँ उपलब्ध कराने के बावजूद उसे कमतर आँका जा रहा है।
अगर ऐसा ही रहा तो एक दिन यह सीमा 50% होगी फिर 100% और हमें सौप दिया जाएगा किसी अन्य विभाग व संस्था के अधीन नये सिरे से शोषण करने के लिए ।
वही ये 25% छात्र भी निजी स्कूलों की चकाचौंध में अपने से मजबूत आर्थिक परिस्तिथि के छात्रों के रहन सहन, हाव भाव, तौर तरीके में सामंजस्य बिठाने के चक्कर में अपने अभिभावकों पालको से उनके समतुल्य वस्तुओं की चाहत की हठ करने लगता है जो उसके पालको की सीमा से बाहर होता है ऐसे में छात्र पर क्या असर होता होगा ये हर अभिभावक महसूस कर सकता है
वंचित वर्ग ,सरकारी स्कूल और निजी स्कूल की खाई में फँसता जा रहा है  क्योंकि इस वर्ग ने जिस परिणाम की लालसा में इस नियम का लाभ उठाकर अपने छात्रों का दाखिला निजी विधालयों में कराया था उसे अपनी उम्मीद के मुताबिक परिणाम नही मिल पा रहें हैं जिसकी लालसा में वे सरकारी स्कूलों से अलग हुए थे।
मैं कहना चाहता हूँ कि सरकारी स्कूलों का निजीकरण करने की साजिश को बेनकाब करने का जिम्मा तो हमारा है ही वही हर रोज खुल रहे निजी स्कूलों के छात्रों का सरकारी स्कूल में नामांकन कराकर इन स्कूलों को बंद करवाने का एक प्रयास करना बहुत जरूरी है ।( लेखक स्वयं अध्यापक है और यह उनके निजी विचार है ) RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव )
द्वितीय  स्थान पर पर यह लेख चयनित किया गया।

न रहेगा शिक्षा विभाग... न रहेगी वेतनमान की माँग और समस्या...विवेक मिश्रा ( नरसिंहपुर )

 विवेक मिश्रा   - सभी बुद्धिजीवी भाई बहनों द्वारा अनेक पहलुओं पर अनेक प्रकार के तर्क दिए गए हैं, जो किसी न किसी दृष्टिकोण से तर्कसंगत व उचित ठहराये जा सकते हैं, परंतु इन सबमें सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है - शासन की २५ प्रतिशत बच्चों को निजी शालाओं में स्वयं शासकीय शालाओं के शिक्षकों /अध्यापकों द्वारा प्रवेश दिलाने की नीति- इस संबंध में मेरा कहना है कि क्या यह नीति जब प्रस्तावित की गई थी तो तत्कालीन समय में शिक्षक समाज के विभिन्न संगठन चाहे वो अधिकारी /लिपिकीय/शिक्षक/अध्यापक /चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी संवर्ग के हों, क्या इनमें से किसी भी संगठन ने इस नीति का विरोध किया था, यदि हां तो कब और किसने और किस स्तर पर (प्रमाण सहित) और नहीं तो क्यों नहीं. क्या वो इस नीति के दूरगामी परिणाम के बारे में दूरदर्शिता नहीं रखते थे, कि इस नीति के तहत जिस "शिक्षा विभाग रूपी मातृ विभाग" से उनका और उनके परिवार का पालन-पोषण हो रहा है, उसे सुनियोजित तरीके से समाप्त करने की यह योजना बनाई गई है, साथ ही शासन स्वयं इन २५ प्रतिशत बच्चों की राशि भी निजी शालाओं में जमा करके उन्हें बढ़ावा देकर फलने फूलने के पर्याप्त अवसर दे रही है, कारण साफ है कि ज्यादातर पूँजीवादी निजी स्कूल उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, राजनेता और अधिकारियों के हैं, जिनमें मनचाही फीस और नियम कानून अपनाए जाते हैं,कुछ तथ्यों पर आप भी सोचकर देखें तो आप भी सहजता से स्वीकार करेंगे कि शासकीय शालाओं में ज्यादातर गरीब तबके के बच्चे अध्ययनरत रहते हैं, यदि इनको बढ़ावा देने के लिए यदि इन्हें पूँजीवादी निजी स्कूलों में दाखिल करा भी दिया जाता है तो वहां पर इनके साथ पढ़ने वाले अमीर परिवार के बच्चों के जैसा बराबरी का बर्ताव या सलीका नहीं अपनाया जाता, जब ये गरीब बच्चे जो कि शासन की नीति के तहत इन निजी स्कूलों द्वारा मजबूरी में दाखिल कराये जाते हैं तो इन पूँजीवादी निजी स्कूलों के स्टाफ, अमीर बच्चों द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाता है, साथ ही जब ये गरीब बच्चे इन निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अमीर बच्चों के आने जाने के लिए लगे निजी वाहनों, उनके पहनने के कपड़ों की क्वालिटी, उनके भोजन की क्वालिटी, उनके माता-पिता के द्वारा इन निजी स्कूलों को दिए जाने वाले डोनेशन इत्यादि के बारे में सोचते हैं तो इन गरीब बच्चों के मन में हीन भावना घर कर जाती है. साथ ही निजीकरण के माध्यम से शासन अनुत्पादक समझे जाने वाले इस मौलिक अधिकार से अपनी जिम्मेदारी से मुक्ति भी पाना चाहती है, परंतु किसी भी राजनीतिक दल के लिए हर चुनाव में शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा प्रमुख मुद्दे होते हैं, जिन्हें चाहकर भी ये समाप्त नहीं कर सकते, नहीं तो कल से जनता भी इनसे कहने को तत्पर रहेगी कि अब आपकी (सरकार को चुनने की ) भी कोई आवश्यकता नहीं है और आपका भी निजीकरण कर दिया जाए, परन्तु इन सबके बीच में हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि शासन की नीति अनुरूप अलग अलग समय पर अलग अलग संवर्गो में भर्ती किए गए अहं और महत्वाकांक्षाओं में घिरकर हम और हमारे संगठन, विरोध करने पर बैकफुट पर दिखाई देने को विवश हैं,उनकी इस विवशता का भी एक नहीं बल्कि अनेक वाजिब कारण हैं, पहला और सबसे महत्वपूर्ण कारण है कि इस संवर्ग के स्वयं के परिवार के बच्चे निजी शालाओं में अध्ययनरत रहते हैं, दूसरा इस संवर्ग के स्वयं के या इनके रिश्ते नातेदारों के निजी स्कूल हैं,          आज के विषय के संदर्भ में ,यह भी आशंका व्यक्त की जा सकती है कि २५ % नीति के तहत जिन शासकीय शालाओं को बँद कर समीपस्थ शालाओं में मर्ज किया जाना है, तो बँद करने के बाद उन बंद हुई शासकीय शालाओं की बहुमूल्य जमीनों(शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों  की) पर स्थानीय निकायों जैसे नगरपालिका/नगर निगम/नगर पंचायत अथवा जनपद/जिला पंचायत का नियंत्रण होना तय माना जा सकता है, तदुपरांत कालांतर में इन बेशकीमती जमीनों और उन पर बने भवनों का उपयोग व्यावसायिक दृष्टि से लाभ कमाने के लिए लिये किया जा सकता है. यह भी समझा जा सकता है कि इनमें से शहरी क्षेत्रों की शास शालाओं की बेशकीमती भूमियों पर निकट भविष्य में शापिंग माॅल या काम्पलेक्स जैसी इमारतों का निर्माण कर उन्हें नीलाम कर करोड़ों अरबों का लाभ कमाया जा सकता है. साथ ही स्थानीय निकाय के कर्मचारी कहलाने के कारण निकट भविष्य में कभी भी हमें घर पर बिठा दिया जा सकता है... यह भी एक कटु सत्य है जिसे झुठलाना अपने आपको धोखे में रखने जैसा होगा.    स्थानीय निकायों की नियोक्ता संस्थाओं के नियंत्रण में ही ये बंद हुए शाला भवन जायेंगे अन्य किसी निकाय के द्वारा इन पर अपना हक नहीं ठहराया जा सकता है, जैसे कि स्कूल शिक्षा विभाग, क्योंकि हमारे संवर्ग की नियुक्ति तत्समय इन्हीं स्थानीय निकायों द्वारा की गई थी.. ईवन ट्राईबल की शालाओं और आश्रम शालाओं के साथ ही भविष्य में आँगनवाड़ी केन्द्रों में भी इसी तरह के नियमों का पालन किया जा सकता है....        अगर सारांश रूप में कहा जाए तो इस प्रकार की नीति केवल हमारे अकेले विभाग पर ही लागू की जा रही है, एेसा कहना गलत होगा.. इस प्रकार की नीतियों की शुरुआत तो 1990 के दशक से ही देश भर में प्रारंभ कर दी गई थी... हमें इस तथ्य को भली भांति समझ लेना होगा कि देश व्यापी स्तर पर आज का दौर उदारीकरण, निजीकरण और विश्वव्यापीकरण का है और इन सबके कारण किसी भी प्रकार की अप्रत्याशित नीतियों का प्रकटीकरण असंभव प्रतीत नहीं हो सकता...(लेखक स्वय अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार है )RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25 प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव ) प्रथम स्थान पर पर यह लेख चयनित किया गया।

निजी विद्यालय है भेदभाव की जगह - विष्णु पाटीदार

विष्णु पाटीदार -RTE  अंतर्गत निजी विद्यालय में कमजोर वर्ग के 25 प्रतिशत भर्ती के कारण शासकीय शालाओं में दर्ज संख्या में काफी कमी आ गई क्योंकि वैसे भी शासकीय शालाओं में इन कमजोर वर्ग के बच्चों का हीं अधिक प्रवेश होता था उच्च वर्ग के बच्चे तो वैसे भी कम ही आते थे इससे सरकारी विद्यालय के साथ साथ समाज पर भी बहूत असर हुआ, कमजोर वर्ग के बच्चे उच्च वर्ग के बच्चों के साथ पढ़ने लगे जिससे कमजोर वर्ग अपने आप को गौरवान्वित महसूस करने लगा तथा उनके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिलने लगी । नीजी स्कूलों ने भी इसका भरपूर फायदा उठाया क्योंकि बच्चों की फीस तो सरकार वहन कर हीं देती है लेकिन निजी स्कूल वाले इन बच्चो के साथ भेदभाव कर अलग से कक्ष में बैठाकर मुख्य धारा से अलग रखते हैं नियमों का पालन करते हुए इन बच्चों को उच्च वर्ग के बच्चों के साथ बैठाकर नहीं पढ़ाते साथ हीं टारगेट पूरा करने के लिए निर्धारित आयु से कम आयु या अधिक आयु के बच्चों को भी भर्ती कर लेते हैं । सरकार की कमजोर तबके को मुख्य धारा में जोड़ने की पहल अच्छी थी लेकिन कतिपय निजी विद्यालयों ने इसका नाजायज फायदा उठाया और इसी के कारण सरकारी विद्यालयों में दर्ज संख्या में कमी आने का एक कारण यह भी हो सकता है ।(लेखक स्वयं अध्यापक है और यह उनके निजी विचार है ।)



( RTE अन्तर्गत वंचित तबके के बच्चों को निजी विद्यालयों में 25  प्रतिशत स्थान पर प्रवेश का सरकारी विद्यालयो और समाज पर प्रभाव )

तृतीय  स्थान पर पर यह लेख चयनित किया गया। 

Saturday, October 1, 2016

शिक्षक,शिक्षा और नैनिहाल के हाल बेहाल जबाबदार कौन......? - श्रीराम राठौर ( खातेगांव जिला देवास )

 श्रीराम राठौर  - 1995 के बाद से ही शिक्षकों की भर्ती पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग को सौंपी दी गई थी, 1998 के बाद से पंचायतो ने सरकारी नियमानुसार शिक्षाकर्मी गुरूजी तथा संविदा शिक्षको की भर्तियाँ की गयी, जिनमे शिक्षको की विभिन्न श्रेणीयो वाले शिक्षाकर्मी संविदा शिक्षक वर्ग 1,2,3 एवं गुरूजी आदि शिक्षक के रूप में थे। बाद में सरकार ने पंचायती नियमो एवं अर्थव्यवस्था का हवाला देकर नियमित शिक्षकों के वेतन की अपेक्षा अति न्यूनतम वेतन देकर शिक्षाकर्मीयों एवं अन्य प्रकार के शिक्षको का भरपूर शोषण किया ।बिडम्बना यह थी की हमारे साथियो का वेतन चपरासी से भी अत्यधिक कम था। शिक्षाकर्मीयों संविदा शिक्षको व गुरुजियो का मानदेय उस समय वेतन न होकर मानदेय था, जबकि नियमित शिक्षको को चौथा,पांचवाँ और छटवां वेतनमान दिया जा रहा था।मुझे अच्छे से याद है एक समय था जब हमारे वर्ग 03 वाले शिक्षाकर्मी  साथियो की तो 2256 के नाम से समुदाय में पहचान ही बन गई थी। और हमारा साथी न्यूनतम मानदेय की इस स्तिथि के कारण जीवन यापन के अन्य स्त्रोत भी तलाशने में लगा था। हमारे साथियो की ख़राब स्थिति यही नहीं रुकी सरकारों की दमनकारी और शोषण की निति के खिलाफ आख़िरकार हमारे साथियो ने आन्दोलन की राह पकड़ी काफ़ी संघर्ष और आन्दोलन के बाद 2007 में म.प्र. सरकार ने फिर राष्ट्रनिर्माताओ को एकबार फिर छलते हुए अध्यापक संवर्ग का गठन किया जिसमे हमारी जायज मांगों के फलस्वरूप हमें सिर्फ नाम ही मिला हमारी मेहनत का दाम नहीं।
         आज तक भी आम अध्यापक छटवे वेतनमान की लड़ाई लड़ रहा है  और अन्य शिक्षकों को सातवां वेतनमान मिलने वाला है । 1995 के बाद से ही सरकारों के शोषण का प्रतिफल यह हुआ की  शिक्षा के स्तर और गुणवत्ता में कमी आती गई तथा न्यूनतम वेतन तथा विभाग में छोटे बड़े,कम ज्यादा,स्थायी अस्थायी और विभिन्न नामो श्रेणियों में बंटने के कारण कही न कही इन सब बातों का प्रभाव शिक्षक की मानसिकता पर भी पड़ा। उसके बाद शिक्षा के स्तर में थोड़ी बहुत गिरावट तो आना स्वभाभिक ही थी, स्तर की इस गिरावट को और ज्यादा बड़ी खाई बनाने का काम किया सरकारों के विभाग पर,शिक्षको पर विभिन्न नित नए प्रयोगों और लाल फीताशाही ने, जिनके कारण आम अध्यापक आज तक ठगा जा रहा है तथा अपने अधिकारों को पाने के लिए संघर्षरत है।
        अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत अध्यापक तो आज भी शिक्षातंत्र की भलाई के लिए सोंचते हुये शिक्षा का बेड़ा पार लगाते हुये नन्हे-मुन्हो का भविष्य संवारना चाहता है और अपने मूल कर्तव्य राष्ट्र निर्माता की भूमिका को बखूबी निभाना चाहता है...
         पर सरकार में बैठे जिम्मेदार लोग यह समझ ले की आम अध्यापको के बेड़ापार से ही शिक्षातंत्र का बेड़ापार होगा अन्यथा नैनिहालो के भविष्य के लिए यदि कोई जबाबदार होगा तो सिर्फ और सिर्फ सरकार ही होगी.....
जय हिन्द साथियो......
( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में प्रथम   स्थान पर इस रचना को रखा गया )

1998 के बाद शिक्षा के मायने बदल गये - सचिन गुप्ता

 सचिन गुप्ता -यही वह समय है जब शिक्षक को आम जनता 500-1000 हजार रूपये का मास्टर कहकर पुकारने लगी और पहली बार शिक्षक को उसकी योग्यता से न नवाजकर उसकी तनख्वाह से उसकी सामाजिक और शैक्षणिक क्षमता का आँकलन किया जाने लगा 
         परिणाम हुआ शिक्षक और शिक्षा दोनो का स्तर गिरना ,जहाँ एक ओर शिक्षक अपनी समस्याओ को लेकर धरना प्रदर्शन आंदोलन करने लगा वही दूसरी ओर शिक्षा प्रभावित होने लगी और ऊपर से समय समय पर शासन प्रशासन की दमनकारी जवाबी कार्यवाही ने आग मे घी डालने का काम किया जबकि सरकार को उनकी माँगे पूरी करके शिक्षा की बाधाओ को दूर करने मे अध्यापको का साथ लेना चाहिए था
        वही दूसरी ओर शिक्षक शिक्षक मे क ई मतभेद सामने आने लगे शिक्षक मानसिक रूप से शासन प्रशासन अधिकारी अपने वरिष्ठ नियमित शासकीय शिक्षको के द्वारा उनके व्यंगो का सामना करने के लिए तैयार हो गया
        इतनी समस्याओ के बावजूद भी शैक्षणिक कार्य मे लगा रहा लेकिन समयानुसार उसका शोषण सरकारे करती रही जिसका असर शिक्षा व शिक्षक की पारिवारिक स्थिति पर भी हुआ
लेकिन उम्मीद यही है कि शिक्षक और शिक्षा दोनो की स्थितियाँ जल्द सुधरेगी

( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से दुसरे  स्थान पर इस रचना को रखा गया )

कम सुविधाओ एवं शोषण के बीच हमारे शिक्षक साथियो के कठिन परिश्रम से शिक्षा के स्तर को ऊँचा किया - रकीब खान

रकीब खान - वाजपयी सरकार ने 2003-04 मे  संविधान मे शंषोधन करके देश मे पेंशन बंद करवाने के साथ स्थाई पदो के .साथ कई विभागो मे अस्थाई पदो पर भर्ती के लिए कानून बनाया जिससे  मध्य प्रदेश मे स्थाई शिक्षको की भर्ती को खत्म कर अस्थाई शिक्षा कर्मी , एवं संविदा शिक्षको की भर्ती शुरू की जिनको BED, DED, धारी कुशल कर्मचारी होने के बावजूद भी एक अकुशल मज्दूर के बराबर अल्प वेतन पर रखा जाता  हे  साथ मे स्थाई कर्मचारियो के समान भत्ते (आवास , यात्रा आदि ) , पेंशंन (2004 से पहले )  तथा वेतन मान आदि से भी महरूम रखा जाता है जिस कारण इनका अधिकाश समय अपने हक़ को पाने की लड़ाई मे रैली ,धरना,  सभा आदि मे चला जाता है , साथ ही एक ही शाला मै एक ही कार्य को करने वाले LDT का वेतन जहाँ 40हज़ार के पार है वही उसी कार्य को ईमान दारी से करने वाले सहायक अध्यापक का वेतन मात्र 15 हज़ार ही है साथ ही ग्रेड पेय मे भी ज़मींन आसमान का अंतर है यही हाल अन्य वर्गो (1 व 2) का भी है इस कारण  अस्थाई पदो पर नियुक्त अध्यापक साथियो मे हीन भावना के साथ  सरकार एवं व्यवस्था  के प्रति रोष भी उत्पन्न होता है जिसका प्राभाव कक्षा मे भी पड़ता है साथ ही अल्प वेतन पर नियुक्त कर इनसे अन्य गैर शैक्षणिक कार्य (बी.एल.ओ. ,  SDM. कार्यालय मे अन्य निर्वाचन कार्य , मध्यान भोजन जानकारी , छात्रव्रत्ति, सायकिल आदि ) लिए जाते है , लगातार एसे कार्यो मे नियुक्ति से एक शिक्षक की अपने विषय पर एवं छात्रो पर पकड़ कमज़ोर हो जाती है साथ ही शिक्षक अधिकारियो का भी दबाव भी इनही पर होता है , जिससे इनमे मानसिक परेशानी के साथ ही अवसाद की स्तथि भी आ जाती है एसे मामले मे कई अध्यापक साथी आत्महत्या जेसे कठोर कदम भी उठा चुके  है !
जिससे अध्यापक एवं शिक्षा जगत पर एक विक्राल दुषप्रभाव पड़ता है , साथ यदि शिक्षक अपने हक़ के लिए धरना रैली जागरूकता लाता है तो मीडिया उसे कवरेज नही देता और यदि  एक शिक्षक शाला मे किसी उत्पाती छात्र को मार दे तो न्यूज पेपर मे ये खबर बड़ी बड़ी हेड लाईन मे छपती है जग हसाई होती है ,  जिससे समाज मे अध्यापको के प्रति गलत संदेश जाता है साथ ही शिक्षक छात्रो पर पड़ाई के लिए दबाव भी नही बना सकता है  इनही सभी कारणो से छात्र शासकीय शालाओ मे पड़ाई मे विशेष रुची नही ले पाते एवं दिनो दिन पड़ाई का स्तर समाज मे गिरता जा रहा है ,
लेकिन फिर भी कम सुविधाओ एवं शोषण के बीच हमारे शिक्षक साथियो के कठिन परिश्रम से बलीदान से ईमान दारी से किए गऐ शिक्षणीय कार्य से सत्र 2015-16 का कक्षा 10वी एवं 12 वी का बोर्ड परीक्षा परीणाम निजी शालाओ से अच्छा रहा है जिसके लिए समस्त अध्यापक बधाई के पात्र है धन्य वाद | 
( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से  दुसरे स्थान पर इस रचना को रखा गया )
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आज शिक्षक समुदाय की सबसे बड़ी समस्या अस्तित्व ,गरिमा एवं स्वाभिमान को बचाने की है - सीमा चावल

सीमा चावल - आज शिक्षक  डरा सहमा व भयग्रस्त  है । समुदाय की सबसे बड़ी समस्या अस्तित्व ,गरिमा एवं स्वाभिमान को बचाने की है ।  प्रशासन ने शिक्षा में गुणवत्ता के नाम पर अनाप शनाप धन खर्च करने के लिए ऐसी नीतियों को निर्माण करवाया है जिससे निजी स्कूल फले फुले व् सरकारी स्कूल व् शिक्षक की बदनामी हो । समाज व्  सरकार इन स्कूलो से घृणा करे ताकि सम्पन्न लोगो के बच्चे निजी स्कूलो में पढ़े । गरीबो की पहुँच  में शिक्षा  रहे ही नही । यह अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने का प्रयास भी है । आज समाज को भी इस समस्या की सच्चाई को समझना होगा । मुझे यह बताने में शर्म आती है कि हमारे अधिकारियो ने शैक्षणिक गुणवत्ता बढ़ाने के लिए हर सप्ताह प्रति माह संकूल स्तर पर विषयवार प्रशिक्षण आयोजित करने का कार्यक्रम तय किया है आप जानकर हैरान हो जाएंगे कि प्राथमिक विद्यालय में दो शिक्षक में से 5वीं पढ़ाने वाले को प्रतिमाह 8 दिन प्रशिक्षण लेने जाना है । जिनकी गुणवत्ता के लिए उसे महीने में 10 से 12 दिन पढ़ाने का समय मिलता है । प्रशिक्षण उन्ही शिक्षको में एक को देना है कुछ नही होता केवल बैठने के ।  क्या इससे गुणवत्ता बढ़ेगी ? 
       इससे भी बड़ी बात तो यह है कि इन प्रशासनिक विशेषकर IAS ने शिक्षको को  डाकू लुटेरे चोर समझकर स्कूलो में निरीक्षण अवलोकन व् सरकूलर जारी किए है । नीतियों को बनवाया है ।  छात्रवृति सायकल mdm पाठ्यपुस्तक वितरण गणवेश आदि योजनाओ में हमारे साथ अविश्वास किया जाता है । इसी कारण हर साल ,आए दिन बदलाव कर, निरीक्षण में शंकाए व्यक्त होती है ।जबकि बहुत सी बातो के लिए हमसे अविश्वास कर योजना सञ्चालन किसी ओर से कराया जाता है व् जिम्मेदार शिक्षक को बनाया जाता है ।
आज बड़वानी की घटना से हमे सोचना चाहिए कि जब mdm समूह बनाता है । उससे सम्बन्ध जनपद का है । तो मात्र जनशिक्षक को दोषी मानना क्या शिक्षक के प्रति प्रशासन की दुर्भावनाए नही तो क्या है ? क्या केवल आत्महत्या हमारे अस्तित्व स्वाभिमान व् गरिमा को बचाने का हल है ?क्या यह सबसे बड़ी समस्या नही है ? हम स्व प्रकाशजी चौहान बड़वानी को इस रूप में अपनी श्रद्धांजलि दे कि किसी ओर शिक्षक को ऐसा कदम उठाने कि अवश्यकता नही महूसस हो ।
   मित्रो अब समय आ गया है कि हम इनकी कुत्सित चालो को समझकर सारे थोपे गए गैर शैक्षणिक कार्य छोड़े और मात्र हमारा मूल कार्य पढ़ाई के लिए संघर्ष करे । सङ्कल्प करे कि हम बच्चों के आलावा किसी से नही डरेंगे । पढ़ाने के आलावा कोई  गैर शैक्षिक कार्य नही करेंगे । सरकार से पढ़ाने के लिए लडेंगे ।
( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर इस रचना को रखा गया )

कविता @ शिक्षाकर्मी बना दिया -अर्जुन पटेल


जीवन उधार जैसा बेशर्मी बना दिया।
वर्षों की साधना ने शिक्षाकर्मी बना दिया।
सन्98में एक ऐसी नीति आई।
पढे लिखे युवकों की जवानी शरमाई।
मजबूरी बस शेरों ने घास खाना स्वीकारा था।
500 के वेतन में महीने किया गुजारा था।
फिर भी जोश नहीँ था कम पूरे दम से काम किया।
तनिक दया न आई शाशन ने सौतेली सन्तान किया ।
फिर से काबिज होने सत्ता पर एक निवाला फेका था ।
लाचार शिक्षाकर्मी ने उसे आशा की नजर से देखा था।
फिर उम्मीदे टूट गयी।
किस्मत ही जैसे रूठ गई।
फिर इनकी अगवाई में कई बार बजाई है ताली।
पर पूरा भोजन भरकर कभी न दी इनने थाली।
उतने पर भी सभाजीत नीति लाते हैं जाली।
कल भी हाथ ख़ाली थे
आज भी हाथ हैं खाली।
बार बार मझधार में आपने ला छोड़ा है।
पर हमने अब भी उम्मीद को नहीं तोडा है।
जो आप बने हैं धर्मपिता।
तो अपना धर्म निभाना।
अपने वादे को पूरा कर
शिक्षक हमें बनाना।
वेतन भी दो गर पूरा
तो हम वो कर दिखलायेंगे।
मध्यप्रदेश को शिक्षा में
नम्बर एक पर लाएंगे।।

( लेखक स्वय अध्यापक  है और यह उनके निजी  विचार हैं " १९९८ के बाद नियुक्त शिक्षको का शिक्षा पर और स्वय उनके जिवन  पर प्रभाव " विषय पर  2 दिवसीय  विमर्श  में सयुक्त रूप से तीसरे स्थान पर इस रचना को रखा गया )

Thursday, September 29, 2016

केवल सरकारी विद्यालयों की ही दुर्दशा क्यों ? राहुल रूसिया

      जब से शिक्षा का अधिकार लागू हुआ है तब से हमने देखा है की शिक्षा की दुर्दशा केवल सरकारी स्कूलों के छात्रों के लिए ही हुई है और उनका पढ़ाई में स्तर वास्तव में गिरा है यह सोचने वाली बात है की शिक्षा के अधिकार अधिनियम के सभी प्रावधान प्राइवेट स्कूलों में भी लागू होते हैं परंतु उधर पर इतनी बुरी स्थिति नहीं है बल्कि इस अधिनियम का फायदा उधर पर छात्रों एवं स्कूलों को हुआ है तो फिर सरकारी स्कूल शिक्षा के अधिकार को अभिशाप क्यों मानते हैं यहां पर सबसे गंभीर प्रश्न यही है की जो चीज निजी क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर रही है वही शासकीय क्षेत्र में प्रभावहीन क्यों है.      जहां तक मेरा मानना है तो शासकीय क्षेत्र में शिक्षा का स्तर गिरने की सबसे बड़ी वजह शिक्षा का अधिकार अधिनियम का पालन सरकार के द्वारा अभी तक स्वयं नहीं किया जाना है ना तो सरकारों ने अधिनियम के अनुसार विद्यालयों का सेटअप बनाया नाही शिक्षकों को उचित प्रशिक्षण दिया और ना ही विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक भेजें बल्कि इसके उलट जो विद्यालय पहले अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे उधर पर भी शिक्षकों को जाति प्रमाण पत्र आधार कार्ड मैपिंग रजिस्ट्रेशन स्वच्छता अभियान led वितरण मध्यान भोजन आदि में उलझा दिया और विचारा शिक्षक चाह कर भी विद्यार्थियों को शिक्षित नहीं कर सका इसके अतिरिक्त नाम न काटने की बाधा एक ऐसी समस्या है जिससे पलायन करने वाले छात्र जबरदस्ती उसी विद्यालय में दर्ज रह जाते हैं और विचारा शिक्षक उनका नाम जबरदस्ती क्लास दर क्लास आगे बढ़ाता रहता है मेरे हिसाब से इस अधिनियम में एक दो चीजों को छोड़कर कोई भी बंधन शिक्षा की राह में और विद्यालय के स्तर में रुकावट नहीं डालता बल्कि बाधाओं को दूर करता है परंतु सरकारी संसाधन सीमित है और गैर शिक्षकीय कार्य भरमार है यदि संसाधन बढ़ा दिए जाएं और गैर शिक्षकीय कार्य शिक्षकों से ना कराए जाएं तो यह अधिनियम निश्चित रूप से शासकीय क्षेत्र में भी शिक्षा का स्तर सुधार देगा  


( लेखक स्वयं अध्यापक हैं  और यह उनके निजी विचार हैं ,१९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में इस  लेख को  तृतीय स्थान प्रदान  किया गया है  )

सरकारी शालाएं ही क्यों निशाना बनी ? - कुलदीप श्रीवास्तव डबरा

कुलदीप श्रीवास्तव -यहाँ एक बात मेरे मन में आती है कि सरकारी शालाएं ही क्यों निशाना बनी ..सरकार के लिए,दरअसल एक ऐसा समय भी था जब शिक्षा प्राप्त करना एक विशेष वर्ग के लिए ही सुनिश्चित था सेवा कार्य करने वाले लोगो के लिए शिक्षा प्राप्त करना टेडी खीर थी ...तब तक यह भी था सरकारी शालाओ में इतनी व्यवस्था ख़राब नही रही शिक्षको को भी उचित सम्मान और सुविधाये मिलती रही समस्या तब से शुरू हुई है जब शिक्षा को मौलिक अधिकारो में शामिल कर लिया गया अब हर वर्ग को शिक्षित करना राज्य और संघ की जिम्मेदारी हो गई यहाँ से आप देखते है नीतिओ में बदलाव कैसा है
        स्कूलो में मध्यान्ह भोजन निशुल्क पुस्तके और अन्य सुविधाये विशेष वर्ग को छात्रवृतिया और सरकारी नुमाइंदे प्रयोग पर प्रयोग करने लगे यहाँ तक कि शिक्षक अब शिक्षक नही रहा उसके कई नाम कर दिए और सुविधाये समय दर समय कम होती गई अब सरकार ने यह पूरी तरह से मान ही लिया कि सरकारी विद्यालय में केवल निर्धन मजदूर किसान आदि के बच्चे पढ़ते है योजनाये भी वैसे ही अपना आकार लेने लगी है और तब ख़ास वर्ग के बच्चों की शिक्षा हेतु निजी विद्यालयो की आवश्यकता महसूस हुई और धड़ल्ले से मान्यताये मिलने लगी और खुल गई दुकाने शिक्षा की पर यहाँ हो सकता है कुछ अध्यापक अपवाद हो सकते है पर अध्यापक आज भी पढ़ाना ही चाहता है पर सच्चाई तो यही है कि ये सरकारें नही चाहती है कि विद्यालयो में ऐसा कुछ हो उन्हें अपने वोट बैंक पर खतरा नजर आता होगा शिक्षा और निर्धन के बीच दूरी बनी रहे यही सोच के साथ काम कर रही है सरकारें और तभी तो अल्प वेतन विना सुविधाओ वाले अध्यापको को सरकारी काम से लाद कर घोड़े की तरह दौड़ाने का प्रयास कर रही है सरकार
   परिणाम अपेक्षित कभी नही आयेगे . इसी सन्दर्भ में उत्तर प्रदेश कोर्ट ने शिव भाई की याचिका पर निर्णय दिया था कि अधिकारियो के बच्चों को सरकारी विद्यालयो में पढ़ाना चाहिए ...सब सरकार चुप्पी साध के बैठ गई

( लेखक स्वयं अध्यापक हैं  और यह उनके निजी विचार हैं ,१९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में इस  लेख को  तृतीय स्थान प्रदान  किया गया है  )

कविता @ शिक्षा का निजीकरण -विवेक मिश्र नरसिंहपुर

शिक्षा के निजीकरण- व्यवसायीकरण की हो चुकी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
उद्योगपतियों, पूंजीपतियों, राजनेताओं, अधिकारियों के बोर्डिंग स्कूल चलाने की यह कूटनीतिक तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षण, परिवहन और उच्च शिक्षा हेतु लोन व्यवस्था कर बच्चों के पालकों को लूटने की फिर से तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
कापी-किताबें, पेंट-शर्ट, टाई-बैच, बस्ता-बेल्ट, जूते - मोजे,महंगे और चिन्हित दुकान से ही खरीदवाने की तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
स्वयं के, परिजनों के और खासम-खासों के बच्चों को. स्वयं के स्कूलों में पढ़ाकर आगे बढ़ाने की कूटनीतिक तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
बोर्डिंग स्कूल, हाॅस्टल सुविधा, समर कैंप, एक्स्ट्रा क्लासेस, पिकनिक विजिट की महिमा न्यारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
दूध, एमडीएम, साइकिल, गणवेश, छात्रवृत्ति, लेपटाप देने के बाद भी छात्रसंख्या में कमी जारी है....
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
२५ प्रतिशत वंचित समूह के बच्चों को निजी शालाओं में भर्ती कराकर सरकारी स्कूल बंद कराने की कूटनीतिक तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
यही नहीं, इन २५ प्रतिशत बच्चों पर व्यय होने वाली सरकारी राशि भी ठिकाने लगाने की पूरी कूटनीतिक तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजी स्कूलों में अमीर- गरीब बच्चों के लिए भेदभावपूर्ण दोहरी शिक्षाव्यवस्था और मापदंड अपनाने की पूरी हुई तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
हजारों शिक्षकों और उनपर आश्रित परिवारों को बेरोजगार कर भूखा मारने की हो चुकी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
लाखों पढ़े - लिखे सुशिक्षित नौजवान पीढ़ी की रोजगार की उम्मीद पर पानी फेरने की ये तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजीकरण से गुलामी वाली मानसिकता और तानाशाही रवैया अपनाने की हो चुकी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजीकरण से शिक्षा को संविधान के मौलिक अधिकारों से पृथक करने की सुनियोजित षड्यंत्रकारी तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
विवादित नीतियां और लालफीताशाही की पेंचीदियाॅं हो रहीं निःशुल्क शिक्षा पर भारी हैं...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
धर्म, सम्प्रदाय, जाति, समुदाय, आरक्षण के आधार पर उच्च शिक्षा के शिक्षण पर पाबंदी की कुटिल नीति जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
निजीकरण से शिक्षा के क्षेत्र में भ्रष्टाचार, काला धन निवेश, विदेशी पूंजी निवेश कर मुनाफाखोरी करने की तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षक, शिक्षाकर्मी, संविदा, गुरुजी, अतिथि आदि संवर्गो के माध्यम से "divide & rule" जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
राजीव गांधी शिक्षा मिशन, सर्व शिक्षा अभियान के बाद राज्य शिक्षा सेवा से वर्ल्ड बैंक की राशि ठिकाने लगाने की तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
१ली से ८वीं तक पास कराने की नीति द्वारा केवल साक्षर कर पंगु बनाने की नीति जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
"प्रतिशत सिस्टम" हटाकर "ग्रेडिंग सिस्टम"  के द्वारा मेहनती बच्चों के वास्तविक मूल्यांकन से खिलवाड़ जारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षकों को शिक्षा के अतिरिक्त अन्यान्य कार्यों में लगाकर परिणाम प्रभावित होने पर बदनाम करने की तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षा के निजीकरण द्वारा इसे संविधान के मौलिक अधिकार में उल्लेखित अपनी महती जिम्मेदारी से मुक्ति पाने की तैयारी है..
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षकों के वेतन को छोड़ RTE के सभी नियमों का कागजी आंकड़ों पर पालन कराने की लीला न्यारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
शिक्षक पद की गरिमा, स्वाभिमान, मान-सम्मान को कलंकित करने की सिस्टेमेटिक तैयारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है..
शिक्षा बेचारी है...
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
नालंदा, तक्षशिला की बर्बादी जैसी साजिश हुए, स्कूल सरकारी हैं.
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...
गली, मुहल्ले, कूचों में 2 कमरों में स्कूल! मान्यता नीति न्यारी है.
चिंता न करें... आज हमारी तो कल सबकी बारी है...

( लेखक स्वयं अध्यापक हैं यह कविता १९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में द्वितीय स्थान पर रही है )

पंचायती राज व्यवस्था के नाम पर नए शिक्षको का शोषण क्यो ? - महेश देवड़ा कुक्षी जिला-धार


 महेश देवड़ा - 73 वें संविधान संशोधन अधिनियम 1993 ने राज्य सरकारो को पंचायतों को ऐसे अधिकार प्रदान करने का अवसर दिया जो उन्हे स्वायत्त शासन की संस्थाओ के रूप मे कार्य करने मे अधिक समर्थ बना सके । इसके तहत आर्थिक विकास ओर सामाजिक न्याय सबके लिए सुलभ करने के उद्देश्य से संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची मे वर्णित विषयों के संबंध मे पंचायतों को जरूरी शक्तियाँ ओर प्राधिकार प्रदान किए गए । 11 वीं अनुसूची मे “शिक्षा , जिसके अंतर्गत प्राथमिक एवं माध्यमिक विध्यालय भी है” का विषय भी सम्मिलित है । भारत के संविधान के 73 वें संविधान संशोधन के अनुरूप प्रदेश मे भी मध्यप्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम 1993 , दिनांक 25 जनवरी 1994 से लागू किया गया । परिणामतः शिक्षा संबंधी कार्य एवं उत्तरदायित्व भी पंचायतों ओर स्थानीय निकायों को सोंपने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई । इस प्रक्रिया से सबसे अधिक प्रभावित हुआ प्रदेश का शिक्षक समुदाय । 1995 मे एक आदेश से राज्य सरकार ने मध्यप्रदेश के विध्यालयों मे कार्यरत नियमित शिक्षक संवर्गों को मृत संवर्ग (डाईंग केडर) घोषीत कर दिया । इसके बाद से ही प्रदेश के उच्च शिक्षित बेरोजगार युवाओ के शोषण का सिलसिला शुरू हुआ । शिक्षको के रिक्त पदो पर अल्पतम वेतन या मानदेय आधारित शिक्षाकर्मी , गुरुजी ओर संविदा शिक्षक के रूप मे भर्ती प्रारम्भ हुई । पंचायत राज अधिनियम के अनुपालन मे प्रदेश के शिक्षा विभाग ओर आदिम जाती कल्याण विभाग के समस्त स्कूलों का हस्तांतरण भी जनपद एवं जिला पंचायतों को कर दिया गया ।  साथ ही नियमित शिक्षको के रिक्त पदों के विरुद्ध जनपद एवं जिला पंचायतों के द्वारा शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति की जाने लगी । ये अलग बात है की इन शिक्षाकर्मियों की नियुक्ति, पदोन्नति, नियमितिकरण एवं वेतनमान संबंधी समस्त नियम राज्य शासन द्वारा ही बनाए गए । नियमितीकरण के बाद भी इन शिक्षाकर्मियों को राज्य शासन के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों से भी कम वेतनमान दिया गया । इस प्रकार पंचायत अथवा स्थानीय निकायों के कर्मचारी होने के नाम पर इन शिक्षाकर्मियों को न केवल अपमानजनक वेतन दिया गया अपितु शासकीय कर्मचारियो को मिलने वाली अन्य सुविधाओ जैसे बीमा, पेंशन, स्थानांतरण, गृह भाड़ा भत्ता जैसी मौलिक सुविधाओ से भी वंचित कर दिया गया । एक ही विध्यालय मे अनेक तरह के शिक्षको की नियुक्ति कर एक वर्ग विषमता का वातावरण निर्मित कर दिया गया । जिसका स्वाभाविक दुष्प्रभाव प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था ओर शेक्षणिक गुणवत्ता पर भी पड़ा । इस विरोधाभास ओर भेदभाव के विरुद्ध शिक्षाकर्मी निरंतर संघर्ष ओर आंदोलन करते रहे । 2007 मे राज्य सरकार ने अध्यापक संवर्ग का गठन किया ओर कर्मिकल्चर को समाप्त करने का दावा किया । पूर्व शिक्षाकर्मियों ओर संविदा शिक्षको का अध्यापक संवर्ग मे संविलियन कर नवीन वेतनमान दिया गया । परंतु सिर्फ नाम परिवर्तन से इन अध्यापको की व्यावहारिक स्थिति मे कोई बदलाव नहीं आया । नवीन वेतनमान देने से वेतन तो बढ़ा परंतु तुलनात्मक रूप से नियमित शिक्षक संवर्ग के वेतनमान से अध्यापक संवर्ग अब भी बहुत पीछे था क्योकि तब तक प्रदेश के समस्त कर्मचारियों को 2006 से छठवाँ वेतनमान मिल चुका था । जबकि अध्यापक आज भी पंचायतों एवं स्थानीय निकायों के कर्मचारी होने के कारण छठवें वेतनमान से वंचित है । 2013 मे एक बड़े आंदोलन के बाद सरकार ने किश्तों मे छठवें वेतन के समतुल्य वेतन अध्यापको को देने का आदेश जारी किया । इसके बाद सितंबर 2015 मे फिर एक बार अध्यापकों ने जोरदार आंदोलन किया फलतः सरकार ने 1 जनवरी 2016 से ही अध्यापकों को छठवें वेतनमान का लाभ देने की घोषणा की । परंतु लगभग एक वर्ष होने के बाद भी मुख्यमंत्री महोदय की घोषणा पर अमल नहीं किया जा सका है । जिससे आक्रोशित अध्यापको ने पुनः एक बार संघर्ष प्रारम्भ करते हुए 25 सितंबर 2016 को प्रदेश के सभी जिलो मे विशाल तिरंगा रैलियों का आयोजन किया ओर एक बार फिर बड़े आंदोलन के संकेत भी दिये । वर्तमान अध्यापक आंदोलन का मुख्य कारण शिक्षा विभाग मे संविलियन ओर समान कार्य समान वेतन प्राप्त करना है । अध्यापको को ये आशंका है की अगर उनकी उक्त मांगे पूरी नहीं हुई तो जनवरी 2016 से देश एवं प्रदेश के सभी कर्मचारियो को मिलने वाले सातवें वेतनमान से भी वे वंचित हो जाएंगे । इन परिस्थितियों मे अध्यापको का आंदोलित होना स्वाभाविक है । 
अध्यापकों की शिक्षा विभाग मे संविलियन की मांग इस लिए है की शिक्षा विभाग मे शामिल होते ही उन्हे प्रदेश के अन्य शासकीय कर्मचारियों ओर नियमित शिक्षक संवर्गों को मिलने वाले वेतनमान ओर अन्य सुविधाएं स्वतः मिल जाएगी ओर उनकी सभी समस्याओं का स्थायी निराकरण हो जाएगा। परंतु शासन द्वारा हमेशा से इस मांग को 73 वें संविधान संशोधन द्वारा शिक्षा ओर इससे संबन्धित समस्त व्यवस्थाओं का पंचायतों एवं स्थानीय निकायों को हस्तांतरण हो जाने की बात कह कर खारिज कर दिया जाता है । ऐसे मे एक स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है की सरकार के तमाम दावो के बीच क्या प्रदेश के शिक्षा विभाग ओर आदिम जाती कल्याण विभाग के समस्त स्कूल पंचायतों ओर स्थानीय निकायों को वास्तव मे हस्तांतरित कर दिये गए है ? व्यवहार मे यह देखा गया है की इन विभागो के स्कूलों मे अध्यापकों की पदस्थापना के अलावा समस्त वित्तीय एवं प्रशासनिक अधिकार आज भी हस्तांतरित नहीं किए गए है । पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम की भावना के अनुरूप स्कूल शिक्षा विभाग ने भी ग्रामीण क्षेत्र मे समस्त शालाओं के संचालन ओर प्रबंधन जिला पंचायतों को सोंपने का आदेश जारी किया साथ ही समस्त शालाओं के भवन , उपकरण एवं चल अचल संपत्ति तक पंचायतों को हस्तांतरित किए जाने के आदेश भी हुए है । परंतु ईनका व्यवहार मे कितना पालन हुआ है ये विचारणीय है । अब तो शालाओं मे रिक्त पदो पर नियुक्ति भी संविदा शाला शिक्षक भर्ती परीक्षा के माध्यम से ऑनलाइन केंद्रीकृत व्यवस्था से शिक्षा विभाग के ही निर्देशों से होती है  । ऐसे मे जिला एवं जनपद पंचायतों का काम महज ओपचारिक आदेश जारी करने तक रबर स्टांप के रूप मे ही है । व्यवहार मे सभी संविदा शिक्षकों एवं अध्यापको की सेवाओ पर वास्तविक नियंत्रण शिक्षा विभाग एवं आदिम जाती कल्याण विभाग का ही है । अध्यापकों के भर्ती नियम से लेकर नियुक्ति , पदोन्नति , वेतन नियमन, प्रशासकीय एवं वित्तीय नियंत्रण तक सब वास्तव मे शिक्षा विभाग ही करता है । ऐसे मे अध्यापको से नियमित शिक्षकों के समान समस्त कार्य लिया जाकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियो सा वेतन दिया जाना न्याय संगत नहीं है । 73 वें संविधान संशोधन ओर पंचायत राज अधिनियम की आड़ मे अध्यापको का ये शोषण 18 वर्षों से जारी है । उक्त संशोधन के द्वारा पंचायतों को शिक्षा संबंधी अधिकार ओर उत्तरदायित्वों का वास्तविक हस्तांतरण किया जाना था ना की प्रदेश के बेरोजगार युवको के शोषण का अंतहीन सिलसिला शुरू किया जाना था । अधिनियम के तहत शिक्षको की नियुक्ति का अधिकार भले पंचायतों को दिया गया हो पर ना तो 73वां संशोधन ओर ना मध्यप्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम अध्यापको को समान वेतन देने से रोकता है । पंचायत विभाग के कर्मचारी मानते हुए भी शासन अध्यापकों को शासकीय कर्मचारियों के समान वेतनमान ओर सुविधाएं दे सकता है । शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 के बाद शिक्षा के अधिकार पर तो बहुत चर्चा हुई पर अब यह भी जरूरी है की शिक्षकों के अधिकारों पर भी चर्चा हो । निःशुल्क ओर अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के अनुक्रम मे बने नियम-2010 के भाग 6 नियम 20(3) मे भी स्पष्ट उल्लेखित है की  “सभी अध्यापको के वेतनमान ओर भत्ते, चिकीत्सकीय सुविधाएं, पेंशन, उपदान, भविष्य निधि ओर अन्य विहित फायदे, वेसी ही अर्हता ,कार्य ओर अनुभव के लिए बराबर होंगे”। अब समय आ गया है की मध्यप्रदेश सरकार इस भेदभावपूर्ण ओर शोषणकारी व्यवस्था को जड़मूल से समाप्त करे ओर संविधान के समानता के मौलिक अधिकार ओर अनुच्छेद 39 की समान कार्य के लिए समान वेतन की भावना के अनुरूप कार्य करे ना की पंचायती राज व्यवस्था के नाम पर अध्यापकों का शोषण  करे ।  (लेखक स्वय अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार हैं 
१९८५ के बाद शिक्षा में बदलाव विषय पर आयोजित परिचर्चा में इस लेख को  प्रथम स्थान प्रदान  किया गया है)

Saturday, September 24, 2016

अध्यापक अब संविलियन से कम पर राजी नहीं होगा -सुरेश यादव (रतलाम)

सुरेश यादव रतलाम -18 सितम्बर को  जिस दिन से अध्यापको के सभी संघ एक जाजम पर आये है,अध्यपको के अंदर  सकारात्मक  ऊर्जा का संचार हुआ है । मंगलवार से शुक्रवार के मध्य 4 दिनों में  प्रदेश के  सभी जिलो में अध्यापक संघर्ष समिति का  गठन हो गया है ।

एक बात  जो मैंने समझी है या मेरा आकलन है 18 के बाद से हमारे अध्यापक साथी रात्री 11 बजे के बाद सोश्यल मिडिया पर सक्रिय नहीं रहते  साथ ही अब तो दिन में भी बहस से दूर है । मेरा मानना है की एकता के कारण सभी  साथी बड़े आराम से नींद ले पा रहे है ,जो कंही खो ,सी गयी थी ।
कोई किसी पर गलत टिका टिप्पणी नहीं कर रहा न कोई  किसी की आलोचना कर रहा है ।सब एक दूसरे को सम्मान दे रहे हैं  सभी का एक ही लक्ष्य है कि 25 के अंदोलन को सफल बनायें । हाँ अध्यापक के निशाने पर यदि कोई है तो वह मध्य प्रदेश के मुखिया और सरकार  है ।
अध्यापक संघर्ष के ऐतेहासिक 18 वर्षो में पहली बार ज्ञापन में शिक्षा विभाग को बचाने के मुद्दे भी सम्मिलित किये गए है ।पहले ये मुद्दे अध्यापक अंदोलन के मुख्य नारे हुआ करते थे ।यह ज्ञापन सोश्यल मिडिया में बड़े विचार विमर्श के साथ बनाया गया है।इसे आम अध्यापक का ज्ञापन भी कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी  । इस 21 सूत्रीय ज्ञापन में वह सभी मुद्दे है जो आम अध्यापक के अधिकारों की पूर्ति करते है ,साथ ही इसमें गाँव गरीब की शिक्षा को बचाने ,युवाओ के रोजगार संरक्षण और निजीकरण पर रोक की मांग भी सम्मिलित है । इस ज्ञापन में व्यवस्था सुधार के जो मुद्दे है उन एक एक मुद्दे पर बड़ी कार्यशाला आयोजित की जा सकती है । आम अध्यापक संमझ गया है कि विभाग सुरक्षित रहा तो ही उसकी आजीविका चलती रहेगी ।
यह क्रांतिकारी ज्ञापन जब सरकार के नुमाइंदों तक जाएगा तो वे बगले झांकने को मजबूर हो जाएंगे ,निश्चित रुप से यह ज्ञापन अखबारों में छपेगा तो आम जन में  स्वतः हमारे प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बनेगा ।यह मुद्दे बुद्दिजीवियों और शिक्षाविदो के विचार विमर्श के केंद्र बिंदु होंगे ।
सभी संगठनो के एक जाजम पर आने से आम अध्यापक इस वक्त स्वय को विजेता मान रहा है यही उसकी चैन की नीद की एक वजह है, वह मनाता है कि एक होने से ही वह  आधी जंग जित गया है ।और कल अखबारों व समाचार चैनलों में  प्रसारित समाचार से उसका उत्साह दोगुना कर दिया है ,लेकिन प्रदेश का अध्यापक इन खबरों को सच्चाई अच्छी तरह से जान चुका है वह अब सरकार के बहकावे में आने  वाला नहीं है ,वह सिर्फ आदेश पर विश्वास करेगा । आम अध्यापक की तरफ से स्पष्ट संकेत है कि बात सरकार के किसी नुमाइंदे से कोई बात नहीं अब सिर्फ आदेश हो ।यही नहीं आम अध्यापक अपने 2013 ,2015 और 2016 के अनुभव को दृषिटगत रखते हुए ।अब स्वय को संविलियन तक एक रखने का मन बना चुका है । इस  बीच यदि कोई भी एकता में बाधक बना तो अध्यापक उसे कंही का नहीं छोड़ेगा और अपनी नजरो से सदा के लिये गिरा देगा ।

सोशल मीडिया पर सक्रिय होकर अध्यापकों ने तैयार किया 21 सूत्रीय मांगपत्र - वासुदेव शर्मा


वासुदेव शर्मा - 25 सितंबर को तिरंगा रैलियों के जरिए मुख्यमंत्री तक पहुंचने वाला ज्ञापन अध्यापकों के बीच तीन-चार दिन तक चले विचार-विमर्श के बाद तैयार हो गया है। अध्यापक संघर्ष समिति की ओर से उक्त मांगपत्र को फेशबुक और वाट्स-एप पर लोड कर दिया गया है। अध्यापक संघर्ष समिति का गठन, 25 सितंबर की तिरंगा रैली का निर्णय एवं दिए जाने वाले ज्ञापन के लिए जिस तरह अध्यापकों के बीच सामूहिक विचार-विमर्श की प्रक्रिया को अपनाया गया है, इससे एक बात स्पष्ट है कि सरकारों की 15-20 साल की उपेक्षा ने हर अध्यापक को इतना सक्षम बना दिया है कि वह निर्णय लेने की प्रक्रिया में न केवल भागीदारी करता है बल्कि उसे अमल में लाने के लिए जी-जान से जुट भी जाता है। 25 सितंबर की तिरंगा रैली के प्रति अध्यापकों के बीच जो उत्साह है, वह बताता है कि आम अध्यापक मुश्किलों एवं परेशानियों से जूझते-जूझते इतना मजबूत हो चुका है कि उसे अब तोडऩा सरकार के बस की बात नहीं रही, इसीलिए आज जब अध्यापकों को भ्रमित करने वाला समाचार अखबारो में आया, तो आम अध्यापक की ओर से उसे खारिज करते हुए कहा गया कि यह साजिश है जो 25 सितंबर की तिरंगा रैली को असफल करने के लिए रची गई है। उक्त समाचार पर अध्यापकों की प्रतिक्रिया बताती है कि वह सही और गलत का निर्णय करने में सक्षम हो चुका है, यही वो कारण है जिसने अध्यापक संघर्ष समिति के गठन के बाद साढ़े तीन लाख अध्यापकों को एक साथ उत्साहित कर दिया है।

इसी मांगपत्र से आएंगे अच्छे दिन


21 सूत्रीय मांगपत्र की हर मांग महत्वपूर्ण है। गहन विचार-विमर्श के बाद जो मांगपत्र सामने आया है, कर्मचारी वर्ग के हर तबके के बीच व्याप्त वेतन विसंगति को समाप्त करने की मांग तो करता ही है, घर-घर में बैठे बेरोजगार युवाओं के लिए रोजगार के रास्ते बनाने के लिए भी सरकार से कहता है। मांगपत्र में अध्यापकों को शिक्षा विभाग में संविलियन की मांग को प्रमुखता से उठाया गया है, वहीं अतिथि शिक्षकों को गुरूजियों की तरह संविदा शिक्षक बनाने की मांग भी सरकार से करता है। इससे भी आगे जाकर मांगपत्र ने संविदा भर्ती बंद कर सीधे अध्यापक की भर्ती शुरू करने की मांग पूरी ताकत से उठाई है, इस मांग का मतलब है कि सरकार जिस संविदाकरण की नीति पर चल रही है, उसे पूरी तरह बदला जाए, जिससे संविदा की नौकरी पाने वाले बेरोजगार युवाओं के जीवन में निश्चिंतता आए। उक्त मांगपत्र की एक-एक मांग अध्यापकों के जीवन से जुड़ी मांग है, जिसमें 15-20 साल के शोषण से मुक्ति चाही गई है। जनवरी 2013 से छठवां एवं जनवरी-2016 से सातवें वेतनमान की मांग का महत्व इसलिए बढ़ जाता है कि इनके पूरा होने के बाद अध्यापकों को एरियर के रूप में जो राशि मिलेगी, उससे आम अध्यापक को कुछ समय के लिए आर्थिक तंगी से निजात मिलेगी।


सरकारी स्कूल ही गरीबों का सहारा


21 सूत्रीय मांगपत्र में ही सरकार से यह मांग की गई है कि वह गरीबों से उसका सहारा नहीं छीने। सरकारी स्कूल ही हैं जो दूर दराज के ग्रामीण क्षेत्रों एवं शहरों की गरीब बस्तियों के बच्चों को पढ़ा लिखाकर समाज में बराबरी से जीने के लायक बनाते हैं। सरकार ने जिस तरह निजी स्कूल के लिए आने वाले हर आवेदन पर मान्यता देने की नीति बनाई है, उसका दुष्प्रभाव यह हुआ है कि किराने की दुकान की तरह निजी स्कूल खुल गए हैं, जिनमें न योग्य शिक्षक होते हैं और न ही अच्छी पढ़ाई होती है। चूंकि सरकार खुद निजी स्कूलों को बढ़ावा दे रही है और उनकी आर्थिक मदद कर रही है, इस कारण यह स्थिति बनी है। 25 सितंबर के मांगपत्र में 5000 की आबादी वाले गांव एवं कस्बों में निजी स्कूल को मान्यता न देने तथा जहां दे दी गई है, उसे निरस्त करने की मांग की गई है। ध्यान रहे यह ऐसी मांग है, जो सरकारी स्कूलों को बंद होने से बचाएगी तथा बड़ी संख्या में सरकार को नए सरकारी स्कूल खोलने के लिए मजबूर करेगी, जिससे शिक्षित बेरोजगारों को रोजगार मिलेगा। वैसे भी शिक्षा विभाग ही एक ऐसा विभाग है, जहां सबसे अधिक रोजगार पैदा होते हैं, जिन्हें खत्म करने पर सरकार तुली हुई है, इसीलिए वह निजी स्कूलों को मान्यता देती जा रही है।


लक्ष्य बड़ा है तो लड़ाई भी बड़ी ही होगी

18 सितंबर को भोपाल में अध्यापक संघर्ष समिति बनाकर सभी पांचों अध्यापक संगठनों के नेताओं ने संघर्ष का जो लक्ष्य तय किया है, वह बड़ा लक्ष्य है, इसीलिए उसी दिन इस बड़े लक्ष्य को हासिल करने के लिए बड़ी लड़ाई की तैयारी की घोषणा भी की गई। 25 सितंबर की तिरंगा रैली इसकी शुरूआत है। इसके आगे अध्यापकों का यह आंदोलन गांव, गली, मोहल्लों, कस्बों, शहरों, कालोनियों से गुजरते हुए जब अपनी मंजिल की तरफ बढ़ेगा, तब हर वह व्यक्ति हैरान रह जाएगा जो चौड़ी सडक़ों और आलीशान बिल्डिगों को ही विकास मानकर संतुष्ट हो चुका है। 25 साल के उदारीकरण ने मानवीय विकास को ठप्प कर व्यक्तियों को मुनाफाखोरों के लिए नोट उगलने की मशीन में तब्दील कर दिया है। प्रदेश का साढ़े तीन लाख अध्यापक इस सच्चाई को समझ चुका है, इसीलिए वह मानव की बेहतर के लिए रास्ता बनाने के लिए आंदोलित हुआ है, 21 सूत्रीय मांगपत्र इसका स्पष्ट संकेत देता है। शिवराज सिंह पढ़ सकते हो तो पढ़ लेना, 25 को 4 बजे तक प्रदेश के हर कौने से ज्ञापन पहुंचने वाले हैं। ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और यह इनके निजी विचार है )

Friday, September 23, 2016

अध्यापक अब नहीं रुकने वाले - महेश देवड़ा (कुक्षी)


महेश  देवड़ा  (कुक्षी) -ये आश्वासन ये समाचार पत्रों की खबरेे अब अध्यापक इनसे नहीं बहलता साहेब । आदेश कीजिये और अपनी बातों का मान रखिये । और 7440 दे भी रहे तो कोई अहसान नहीं कर रहे वो तो हमारा हक़ है और लेके रहेंगे । पर ख्याल ये हो की इससे तिरंगा रैली रुक जाएगी तो ग़लतफ़हमी दूर कीजिये । लाल घाटी का दमन कोई अध्यापक भुला नहीं साहब हाथ में तिरंगा लिए हमारी बहनों पर लाठियों के वार और सड़कों पर घसीटा जाना , अपने ही प्रदेश की राजधानी जाते अध्यापको को आतंकवादियों की तरह घरों से रास्तो से गिरफ़्तारी का वो मंजर आज भी खून में उबाल ले आता है । उस एक लाल घाटी का मंजर 51 जिलों में दिखाई देगा । गणना पत्रक तो छोटी बात है साहब आप तो सांतवें और संविलियन का हिसाब लगाइये । अब तो लड़ाई संविलियन पर ही रुकेगी ।
जिस तेजी से समाचार पत्रों में खबर लगवाते है माननीय उतनी संजीदगी अगर अपनी घोषणा के आदेश में दिखाते तो अब तक तो आदेश जारी हो जाता । और ये अध्यापक प्रेम हमेशा किसी आंदोलन के पहले ही क्यों उमड़ता है सोचने वाली बात है ।साथियो किसी समाचार से भ्रमित न हो अगर अपना हक चाहिए तो 25 को अध्यापक एकता का वो नजारा हो हर जिले में की सियासतदानों को वास्तव में चाणक्य की याद आ जाये । हमारा भविष्य का आंदोलन , सांतवां वेतन और शिक्षा विभाग में संविलियन सब कुछ 25 की सफलता पर निर्भर है।  अपनी पूरी ताकत लगा दो । वेतन भत्तों के लिए बहुत लड़ लिए साथियों , अबके चोट स्वाभिमान पर हुई है तो अब अध्यापक आत्मसम्मान के लिए मैदान में है । और ये आत्मसम्मान असमानता, भेदभाव और शोषण से मुक्ति पाकर ही बना रहेगा । दिखा दो सरकार को कि हम आपस में कितना भी लड़ ले पर जरुरत पड़ने पर हम पहले भी एक थे आज भी एक है और आगे भी एक होंगे ।
अध्यापक संयुक्त संघर्ष समिति ,जय अध्यापक एक
(लेखक स्वय अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार हैं )

अध्यापकों की तिरंगा रैली को मिल रहा व्यापक समर्थन- वासुदेव शर्मा छिंदवाड़ा


वासुदेव शर्मा-25 सितंबर को जिला मुख्यालयों में होने वाली तिरंगा रैली में हिस्सेदारी की होड़ अध्यापकों के बीच शुरू हो गई है। मिल रही जानकारियों के आधार पर कहें तो यह आंदोलन 100 प्रतिशत भागीदारी के साथ ऐतिहासिक होने वाला है यानि अपने-अपने जिलों में साढ़े तीन लाख अध्यापक तिरंगा रैली का हिस्सा बनेंगे। तीन दिन के अल्पसमय में प्रदेश के ज्यादातर जिलों में बैठकें कर अध्यापक संघर्ष समिति का गठन कर लिया गया है, जो यह बताता है कि इस बार अध्यापक शिक्षा विभाग में संविलियन की लड़ाई को जीतने के लिए लडऩे वाला है और इसके लिए वह किसी भी सीमा तक जा भी सकता है। अध्यापकों की एकजुटता का संदेश दूसरे अल्पवेतन भोगी कर्मचारियों एवं उनके संगठनों के बीच भी जा चुका है, इन संगठनों के नेता भी चाहते हैं कि प्रदेश में सरकार द्वारा सताए जा रहे कर्मचारियों का निर्णायक आंदोलन हो और उसके साथ एकजुटता व्यक्त की जानी चाहिए।

तिरंगा रैली को संविदा कर्मचारी संघ का समर्थन
संविदा कर्मचारी संघ के प्रांतीय अध्यक्ष रमेश राठौर ने अध्यापक संगठनों की हाल ही में बनी एकजुटता को सराहते हुए कहा कि इनकी मांगेें जायज हैं और उन्हें सरकार को तत्काल पूरा करना चाहिए। 25 सितंबर को जिला मुख्यालयों पर होने वाली तिरंगा रैली के प्रति एकजुटता व्यक्त करते हुए राठौर ने कहा कि हमारा संगठन अध्यापकों के साथ है और उनकी तिरंगा रैली को समर्थन करता है। उन्होंने हमें भरोसा दिलाया कि उनके संगठन के जिला पदाधिकारी 25 सितंबर को अध्यापकों की तिरंगा रैली का हिस्सा बनकर समर्थन करेंगे। गौरतलब है कि सरकार ने कुछ ही महीनों में 4 हजार से अधिक संविदा कर्मचारियों की छटंनी कर दी है, जिन विभागों में छंटनी की गई है उनमें स्वास्थ्य विभाग, कौशल विकास विभाग शामिल हैं। इस छंटनी के बाद प्रदेश के संविदा कर्मचारी डरे हुए है। वे अपनी नियमितीकरण की मांग को लेकर निर्णायक लड़ाई लडऩा चाहते हैं, इसके लिए 4 अक्टूबर को भोपाल में रैली भी करने वाले हैं।

अतिथि शिक्षक संघ भी तिरंगा रैली के साथ

अतिथि शिक्षक संघ के प्रांताध्यक्ष जगदीश शास्त्री ने भी अध्यापकों की तिरंगा रैली के साथ एकजुटता प्रदर्शित करते हुए समर्थन देने की बात कही है। शास्त्री उन शिक्षकों के नेता हैं, जो उन्हीं स्कूलों में पढ़ाते हैं, जहां अध्यापक पढ़ाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने स्कूलों में शिक्षाकर्मी भर्ती किए थे और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने अतिथि शिक्षक। दोनों ही मुख्यमंत्रियों की व्यवस्थाओं ने शिक्षकों के शोषण का रास्ता तैयार किया है, इसके बाद भी दोनों की व्यवस्था में अंतर है। दिग्विजय सिंह ने   शिक्षाकर्मियों को नियमित होने का अधिकार दिया था, लेकिन शिवराज सिंह ने अतिथि शिक्षकों को 40 मिनट के पीरियड के बाद नौकरी से बाहर कर देने और फिर 40 मिनट के लिए रख लेने की व्यवस्था बनाई है, ऐसी व्यवस्था दुनिया के किसी भी देश के किसी भी स्कूल में नहीं है। अतिथि शिक्षकों के लिए बनाई गई इस व्यवस्था से दुखी जगदीश शास्त्री कहते हैं कि जीतने का रास्ता अध्यापकों के आंदोलनों से निकलता है, तब हमें भी जीतने की राह मिल जाएगी, इसीलिए हम पूरी तरह अध्यापकों के साथ है और उनकी तिरंगा रैली का समर्थन करते हैं। ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और यह उनके निजी विचार है )

Thursday, September 22, 2016

हिंन्दी ( प्रथम भाषा ) की उपेक्षा व पद समाप्त कर माध्यमिक विद्यालयों को दो शिक्षकीय करने की तैयारी-सुरेश यादव (रतलाम)

सुरेश यादव -एक मित्र ने अपनी समस्या बताई की उन्होंने अपने विद्यालय का नाम  "शासकीय हाई स्कूल" के स्थान पर  "शासकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय " लिखा  जो हमारे अधिकारियो को नागवार गुजरा ,प्रतिप्रश्न करने पर इन्हें संतोषजनक जवाब भी नहीं मिला आप भी अच्छे से जानते है  "हाई स्कूल" हिंन्दी शब्द नहीं है , विडम्बना  देखिये हम तीन अन्य विद्यालयों को  तो हिन्दी में ही पुकारते है "प्राथमिक,माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक ", लेकिन हमारे पास हाई स्कूल का कोई हिन्दी  शब्द नहीं है। हमारे विभाग के अधिकारियों की मज़बूरी कह लें की वे सरकार द्वारा खिची लक्ष्मण रेखा तक जा सकते हैं ,कभी उल्लंघन नहीं करते । आप कल्पना कीजिये क्या कभी किसी अधिकारी ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इस "हाई स्कूल "के प्रयोग पर आपत्ति जताई होगी या कोई शासकीय या अर्ध शासकीय पत्र लिख कर मांग की होगी की " हाई स्कूल " के स्थान पर हिन्दी शब्द का प्रयोग किया जाए ,शायद नहीं । लेकिन हमें प्रशंसा करनी चाहिये  हमारे  अध्यापक जैसे छोटे कर्मचारी साथी की ,जिन्होंने ने विभागीय परंपराओं को तोड़ कर " हाई स्कुल " का नाम " उच्च माध्यमिक विद्यालय " लिखने का साहस किया । हिन्दी के सम्मान के लिए लड़ाई लड़ने का  एक उदाहरण था ।
अब में विभाग  में हिन्दी की घोर उपेक्षा पर भी एक नजर डालते है ,हाल ही में विद्यालयों में स्वीकृत पदों के अनुसार शिक्षकों की व्यवस्था सुनिश्चित करने के विषय में आदेश आया है । माध्यमिक विद्यालयों में प्रथम तीन पदों में  गणित (पीसीएम) एवं विज्ञान ,सामाजिक विज्ञान और अंग्रेजी  के पद स्वीकृत किये गए है । साथियो यह राष्ट्र भाषा की घोर उपेक्षा ही तो है कि जिस विद्यालय में उसे प्रथम भाषा के रूप में पढ़ाया जा रहा है वँहा उसका शिक्षक उपलब्ध नही हो पायेगा  हिन्दी भाषा  शिक्षक का पद छटवा पद होगा जो विद्यालय में  175 विद्यार्थियो के बाद ही मिल पायेगा । आप इस का जवाब  अपने स्तर पर भी खोजिये  हमारे आपके  विकासखंड में कुल कितने विद्यालय है जंहा 175 से अधिक विद्यार्थी दर्ज है ।शायद 10 या 15 प्रतिशत विद्यालय मिलेंगे अर्थात केवल 10 -15 प्रतिशत विद्यालयो में हिन्दी भाषा शिक्षक उपलब्ध रहेंगे ।
अब हम, शिक्षकों की उपलब्धता पर विमर्श करते है ,आप स्वयं अपने विकासखण्ड और जिले की स्थिति का आकलन करें की अंग्रेजी के कुल कितने शिक्षक जिले  में उपलब्ध हैं ,मैं रतलाम जिले का उदाहरण देता हूँ रातलाम में 650 से अधिक मध्यमिक  विद्यालय है और  अंग्रेजी के  कुल 15 शिक्षक ( शिक्षक और अध्यापक) पदस्थ है । कारण मात्र यह है कि अंग्रेजी भाषा शिक्षक के लिए जो योग्यता ( स्नातक में अंग्रेजी साहित्य विषय की अनिवार्यता ) निर्धारित की गयी है उस मापदंड के शिक्षक उपलब्ध ही नहीं है । में अपने विद्यार्थी जीवन की बात बताऊँ तो स्नातक  कक्षा में 450 विद्यार्थियो में से हम 4 साथी थे  अंग्रजी साहित्य विषय के बाकी सब हिन्दी या संस्कृत साहित्य ही चुनते थे । में तो मध्य प्रदेश सरकार को चुनोती देता हूँ की  संपूर्ण प्रदेश में पिछले 20 वर्षो से अंग्रेजी साहित्य विषय के साथ स्नातक करने वाले विद्यार्थियो की कुल संख्या को भी भर्ती कर ले तब भी केवल 5 -7 प्रतिशत माध्यमिक विद्यालयो में अंग्रेजी शिक्षक उपलब्ध हो पाएंगे । सरकार अपने इस   निंर्णय पर गंभीरता से  समीक्षा करें ।

सरकार समीक्षा करे की आप हिंदी विश्व विद्यालय प्रारंभ कर रहे है तकनिकी और व्यवसायिक शिक्षा हिंदी में करने की तैयारी कर रहे है ,दूसरी तरफ हिन्दी शिक्षक के पद समाप्त कर रहे हैं ।
साथियो एक लाइन में कह दू तो इस सब के पीछे सरकार का उद्देश्य यह है कि वह पुनः माध्यमिक विद्यालयों को 2 शिक्षकीय शाला करना चाहती है ,जो न सिर्फ गरीब और ग्रामीण अंचल के  विद्यार्थियों  के साथ अन्याय है वरन  काम कर रहे शिक्षकों की आजीविका पर भी संकट के समान है ।
विचार करे और यह विषय समाज के समक्ष ले जाये ।
(लेखक स्वय अध्यापक है और यह उनके निज विचार है )