Thursday, September 15, 2016

युक्तियुक्त करन करने के लिए समय सारणी जारी की गयी

शालाओं में स्‍वीकृत शैक्षणिक पदों के अनुरूप पदस्‍थापना सुनिश्चित करने के लिए नयी समय सारणी जारी की गयी है शालाओं में स्‍वीकृत शैक्षणिक पदों के अनुरूप पदस्‍थापना सुनिश्चित करने के लिए नयी समय सारणी जारी की गयी है
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अध्‍यापक संवर्ग में कार्यरत सेवकों के ऑनलाईन अंतर्निकाय संविलियन हेतु एज्‍यूकेशन पोर्टल अपडेट कराये जाने के संबंध

वर्ष 2016 में अध्‍यापक संवर्ग में कार्यरत सेवकों के ऑनलाईन अंतर्निकाय संविलियन हेतु एज्‍यूकेशन पोर्टल अपडेट कराये जाने के संबंध में आदेश जारी किया  गया है इसे अपडेट करने के पश्चात् आज पालन प्रतिवेदन माँगा गया है। ग्रामीण क्षेत्र के सहायक अध्यापक के नियुक्ति अधिकार अब  जिला पंचायत  को देने से ,उनका निकाय जिला पंचायत हो गया है।

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Sunday, September 11, 2016

'इस देश के शिक्षकों को पांच सितंबर को सम्मान करवाने से इंकार कर देना चाहिए' - बी बी सी हिंदी

5 सितंबर को शिक्षक दिवस के मौके पर देश भर में गुरुजनों और शिक्षकों को याद किया जा रहा है।  दिल्ली समेत कई जगहों पर शिक्षकों को सम्मानित किया जा रहा है, सोशल मीडिया पर अपने स्कूल और कॉलेज के शिक्षकों को याद करते हुए पोस्ट लिखी जा रही हैं, कइयों में अपने शिक्षक की तस्वीर को साझा भी किया जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच कई लोग ऐसे भी हैं जो इस विशेष दिन का इस्तेमाल शिक्षकों की बदहाली पर ध्यान खींचने के लिए कर रहे हैं।

हिंदी अखबार दैनिक जागरण में छपी खबर के अनुसार उत्तराखंड के अल्मोड़ा में त्रिस्तरीय व्यवस्था लागू नहीं होने की मांग को लेकर वहां के शिक्षकों ने शिक्षक दिवस का बहिष्कार किया है।  वहीं बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक पटना में करीब चार लाख नियोजित शिक्षक महीनों-महीनों से वेतन न मिलने की शिकायत को लेकर शिक्षक दिवस के दिन 'शिक्षक अपमान दिवस' मना रहे हैं. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने अपने संपादकीय में एक संविदा शिक्षक का राष्ट्रपति के नाम पत्र छापा है जिसमें लेखक ने उन हालात का जिक्र किया है जिसके तहत एक शिक्षक बनने का सपना लेकर चला व्यक्ति महज़ 'एड हॉक' बनकर रह जाता है।



शिक्षक दिवस के उत्सवी माहौल में इस तरह की बातें यकीनन स्वाद बिगाड़ सकती हैं लेकिन एक दिन के लिए शिक्षकों और गुरुओं की मौजूदा हालात से मुंह फेर लेने से भी।  वैसे इसी दिन के लिए हिंदी के दिग्गज व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने एक निबंध लिखा था जिसका शीर्षक था 'शिक्षक सम्मान से इंकार करें..' इस लेख में परसाई लिखते हैं कि किस तरह 5 सितंबर के मौके पर अलग अलग संस्थाएं और क्लब आदि रिटायर्ड शिक्षकों को ढूंढ ढूंढकर सम्मानित करते हैं.

इस निबंध के एक संपादित हिस्से में वह लिखते हैं 'देश में पांच सितंबर को शिक्षकों को सम्मानित करने का फैशन चल पड़ा है. राष्ट्रपति शिक्षकों को सम्मानित करते हैं तो यह भी सोचते हैं कि यह कार्यक्रम अच्छा रहेगा।  अखबारों में छपेगा. लोग जानेंगे कि हम गुरु की महिमा जानते हैं और उसका सम्मान भी करते हैं. आप समझ लीजिए कि अगर डाकुओं का इसी तरह शान से आत्मसमर्पण होता रहा और ऐसी ही गरिमापूर्ण फिल्में बनती रहीं तो आगे चलकर डाकू सम्राट मानसिंह का जन्मदिवस दस्यु दिवस के रूप में मनाया जाएगा।  मानसिंह अपने क्षेत्र में राधाकृष्णन से कम योग्य और सम्मानित नहीं था. फिर एक 'मिलावटी दिवस' होगा, 'कालाबाजारी दिवस', 'तस्करी दिवस', 'घूसखोर दिवस' होगा. शिक्षक दिवस तो इसलिए जबरदस्ती चल रहा है क्योंकि डॉ राधाकृष्णन राष्ट्रपति रहे. अगर वह सिर्फ महान अध्यापक मात्र रहे होते तो शिक्षक दिवस नहीं मनाया जाता.'



शिक्षकों की समस्याओं पर मानो हाथ रखते हुए इसी निबंध के एक और हिस्से में परसाई लिखते हैं 'पांच सितंबर शिक्षकों का अपमान दिवस है. झूठ है, पाखंड है. गरीब अध्यापक का उपहास है. प्रहसन है।  वेतन ठीक नहीं देंगे. सुभीते नहीं देंगे. सम्मान करके उल्लू बनाएंगे. इस देश के शिक्षकों को पांच सितंबर को सम्मान करवाने से इंकार कर देना चाहिए।  लोग बुलाएं तो शिक्षक कह दें हमें अपना सम्मान नहीं करवाना. आप जबरदस्ती करेंगे तो हम पुलिस में रिपोर्ट कर देंगे.'

दिलचस्प बात यह है कि परसाई द्वारा काफी पहले लिखा जा चुका यह लेख वर्तमान दौर में काफी प्रासंगिक है. देश के विकास में शिक्षकों से जुड़ी कई समस्याएं ज्यों की त्यों हैं. आगे उम्मीद ही की जा सकती है कि अाने वाले समय में परसाई का लिखा यह निबंध अप्रासंगिक होता चला जाए, तब तक झूठा ही सही 'हैप्पी टीचर्स डे'। ( स्त्रोत  बी बी सी  हिंदी ) 

स्कर्ट की लंबाई के भी मायने... नजरिया और नजरे बदलें - सुरेश यादव रतलाम

सदी उनको अपना महानायक मानती है. मेरे लिए महानायक से बढ़कर रहे हैं.  अभिनय की संस्था हैं. वन मैन इंडस्ट्री हैं. बॉलीवुड में नंबर-1 से नंबर-10 अमिताभ ही हैं. उनके बाद ही किसी का नंबर आता है.

"आई कैन टॉक इंग्लिश. आई कैन वॉक इंग्लिश..." के साथ हंसा.
"जब तक बैठने को नहीं कहा जाए तब तक खड़े रहो...." के साथ गुस्सा आया.
"मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं लेता...." के साथ एटीट्यूड आया.
"हम जहां खड़े होते हैं लाइन वहीं से शुरू होती है....." के साथ दादागिरी आई.
"तुम लोग मुझे ढूंढ रहे हो और मैं तुम्हारा यहां इंतज़ार कर रहा हूं." से व्यवस्था से लड़ना सीखा.

जीवन के हर रंग को जितनी संजीदगी और सजीवता से अमिताभ ने ने पर्दे पर जिया है वह किसी और के वश की बात नहीं. आज 73 साल की उम्र में उनका जोश नौजवानों को मात दे रहा है.

 अमिताभ बच्चन ने अपनी पोती अराध्या और नातिन नव्या नवेली को सीख देती एक सार्वजनिक चिट्ठी लिखी है  

आप का पत्र  सार्वजानिक था तो सोचा अपनी बात भी माफ़ी के साथ कर ही दूँ 


इस बात से सहमत हूं कि स्कर्ट की लंबाई किसी का चरित्र मापने का पैमाना नहीं हो सकता. "पैमाना" भले ही न हो लेकिन स्कर्ट की लंबाई हमारे देश में "मायने" रखता है.... ज्यादा बहुत ज्यादा, "बच्चन", "नंदा", "गांधी", "अंबानी", या "बिरला" सरनेम के लिए स्कर्ट की लंबाई शायद मायने नहीं रखती हो क्योंकि यह समाज का प्रभावशाली वर्ग है. चौबीसों घंटे सुरक्षा घेरे में रहते हैं. लंबाई मापना तो दूर, गुस्ताख भी नहीं मिलेंगे जो आंख उठाकर इधर ताकें।  सही कहा है कि अराध्या और नव्या को "बच्चन" और "नंदा" सरनेम की विरासत को आगे ले जाने की जरूरत है।  क्योंकि यह उनके लिए सुरक्षा कवच का काम करेंगे। 

देश का मध्य वर्ग भी स्कर्ट की लंबाई को कम करना चाहता है. वह भी अपने लिए "आदर्शलोक" या "यूटोपिया" की कल्पना करता है. लेकिन वह डरता है. यहां आठ महीने की बेटियों के दरिंदे भी हैं और 60 साल की मांओं के भी, जो स्कर्ट तो छोड़िए निगाहों से कपड़ों से ढके तन में भी नग्नता ढूंढते हैं. देश की राजधानी से चंद किलोमीटर दूर कस्बों में "लोग क्या कहेंगे" का भय समाज और खासकर महिलाओं पर इतना भारी है कि "अपनी सोच और अपना फैसला" दिल में ही दम तोड़ देता है। 

नजरिए और निगाह में जब तक बदलाव नहीं आता तब तक...

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता.
यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला क्रिया.

वेद में ही सीमित रह जाएगा. 


हालांकि साक्षी मलिक, गीता फोगट, दीपा कर्मकार, मैरी कॉम जैसी लड़कियां व्यवस्था की जंजीरों को तोड़कर आगे निकली हैं. समाज में सिर्फ सुरक्षित माहौल देकर देखिए, कैसे देश की तस्वीर बदल जाती है। 

ना नो मन तेल होगा न राधा नाचेगी (अध्यापक स्थानतरण नीति)-कृष्णा परमार रतलाम

  कृष्णा परमार रतलाम- सरकार द्वारा अध्यापकों के लिए नई स्थानांतरण नीति बनाई जा रही है लेकिन क्या यह भी पुरानी नीतियों की तरह ही दूर के ढोल साबित तो नहीं हो जाएगी, तबादले के लिए एक सॉफ्टवेयर तैयार किया गया है जिसमें एक निश्चित समय तय किया गया है ,अध्यापकों से अॉनलाईन आवेदन लिया जावेगा एवं एक निश्चित समय पर स्थानांतरण कर दिया जाएगा इसमें भी एक पेंच फंसा दिया गया है कि जिले के अधिकारी एक माह के भीतर एनओसी देंगे और अगर नहीं दी गई तो यह मान लिया जाएगा कि इस बारे में जिले के अधिकारियों को कुछ नहीं कहना एक माह में एनओसी ना देने पर अधिकारियों से केवल जवाब तलब किया जावेगा ,जी हां केवल जवाब तलब किया जावेगा जबकि इसके विपरीत अध्यापक यदि पदस्थापना पर ज्वाईन नहीं होता है तो उसके विरुद्ध कार्यवाही का प्रावधान है तो क्या यह समझा जाए कि दोषी केवल अध्यापक ही है अधिकारी नहीं ?
          चलो छोड़ो अब यह तो हुई उन अध्यापकों के दिल को तसल्ली देने वाली बात जो कई वर्षों से स्थानांतरण नीति का इंतजार कर रहे हैं अपने घर जाने के लिए क्योंकि कुछ नहीं तो उन लोगों को कम से कम यह खबर कुछ तो राहत दिलाएगी कि शायद अबकि बार हम घर जा सकेंगे ।
         अब सिक्के के दूसरे पहलू पर आते हैं एक खबर और भी है स्कूल में अच्छे नंबर लाओ मनचाही जगह ट्रांसफर पाओ इस अब इसके अंतर्गत अध्यापकों को 10 प्रश्नों के सही जवाब देना होंगे अगर आपने एक भी सवाल का जवाब गलत दिया तो आप का स्थानांतरण अधर में लटका माना जाएगा और फिर एक बात और भी है आपके प्रश्नों की जांच वही अधिकारी करेंगे जिन्होंने यह स्थानांतरण निति बनाई है मतलब सब कुछ उन्हीं के हाथ में इसका सीधा साधा मतलब आप यह निकाल सकते हैं कि " ना तो नो मन तेल होगा ना राधा नाचेगी " जब की स्थानांतरण नीति में सर्वप्रथम होना यह चाहिए कि सभी अध्यापक जो वर्षों से अपने घर से दूर हैं उन्हें सबसे पहले अपने गृह जिले में स्थानांतरण का अवसर प्रदान किया जावे चाहे वह महिला हो विकलांग हो या सामान्य पुरुष हो कोई भी हो उसके बाद सरकार जैसा भी खेल स्थानांतरण नीति के अंतर्गत खेलना चाहे खेल सकती है। (लेखक स्वयं अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार है ।)

Saturday, September 10, 2016

संघर्ष के सही रास्ते की तलाश में अध्यापक - वासुदेव शर्मा (छिंदवाड़ा)


वासुदेव शर्मा-बीते दिनों अस्तित्व में आई अध्यापक संघर्ष समिति भले ही अध्यापकों में उत्साह पैदा करने में कामयाब नहीं हुई हो, लेकिन इसके बाद अध्यापकों ने सोशल मीडिया के जरिए संघर्ष के सही रास्ते की तलाश जरूर शुरू कर दी है। अध्यापक संगठनों के बीच एकता कायम करने के लिए हुई बैठक जब एकता तक नहीं पहुंची, तब अध्यापकों में नाराजगी सामने आई। इस बार उनके निशाने पर सीधे सरकार और उनके समर्थक रहे।  एकता में बाधक कौन है? इस पर सोशल मीडिया में चले मंथन के बाद यह निष्कर्ष निकला कि इसके लिए सरकार और उसके समर्थक संगठन तथा उनसे जुड़े लोग जिम्मेदार हैं, इसीलिए पहला निर्णय यह हुआ कि संघर्ष शुरू करने से पहले सरकार के आस-पास दिखने वालों से दूरी बनाई जाए। दूसरे, राज्य कर्मचारी संघ, बीएमएस जैसे सरकार समर्थक संगठनों की छत्रछाया से अध्यापकों की एकता बचाया जाए। यानि अध्यापक उन सबसे सतर्क रहना चाहते हैं जो संघर्ष की धार को भोथरा कर सकते हैं।  इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि वे संघर्ष के सही रास्ते की तलाश में हैं, जो उन्हें संघर्ष करने वाली ताकतों के आस-पास पहुंचकर ही मिल सकता है। अध्यापकों के बीच जिलों में काम कर रहे नेता मानते हैं कि पहले भी तभी जीते थे, जब संघर्ष करने वाले लोग साथ थे और आगे भी तभी जीतेंगे, जब वे लोग साथ होंगे।
सोशल मीडिया पर ही आगामी रणनीति के तौर पर जो सहमति बनती नजर आ रही है, उसमें अध्यापकों की ओर से ही दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर करने की बात सामने आ रही है, जिसमें प्रदेश भर से चुनिंदा 400 अध्यापक नेताओं को बुलाया जाए। प्रशिक्षण शिविर के लिए अध्यापक नेताओं का चयन संगठनों से ऊपर उठकर सभी संगठनों के बीच से हो। प्रशिक्षण शिविर में देश के ख्याति प्राप्त शिक्षाविदों एवं ट्रेड यूनियन
जानकारों को बुलाया जाए, कुछ नाम भी चर्चा में आए हैं, जिनका जिक्र अगली पोस्ट में। सोशल मीडिया पर सुनाई दे रही इस तरह की चर्चा, सरकार को यह बताने के लिए काफी है कि इस बार अध्यापक संघर्ष के मैदान में निहत्था नहीं उतरेगा। सोशल मीडिया पर अध्यापकों के बीच पनपी रही यह एकता कहां तक पहुंचती, यह तो आने वाले दिनों में तय हो पाएगा, फिलहाल इतना ही पर्याप्त है कि 20 साल का अन्याय सहते-सहते अध्यापक ने हर तरफ सोचना शुरू कर दिया है यानि वह अपना रास्ता खुद बनाने के लिए तैयार हो रहा है।लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और यह उनके निजी विचार हैं।

"शासकीय शालाओ को एक ईमानदार और समर्पित अध्यापक टीम की दरकार है "- राशी राठोर देवास


राशी राठोर देवास -हाल ही मै कई विद्यालय बन्द कर उनका सिंविलियन समीपस्थ शाला मै कर दिया गया है व बहुत सी शाला बंद होने की कगार पर है। इस अति संवेदनशील मामले पर हर अध्यापक को अब जागने की आवश्यकता है। कही ना कही हमे अपने अन्तर्मन मै झाकने की आवश्यकता है।
      संसाधन और अध्यापक या अतिथिशिक्षक की व्यवस्था होने के बाद भी टाप करना तो दूर शासकीय शाला गुणवत्ता के मामले मै पासिंग नम्बर भी नही ला पा रही। जबकि सभी शासकीय शाला मै पदस्थ अध्यापक प्रतिस्पर्धा परीक्षा मै टाप करके ही आते है। आम के पेड मै आम ही लगते है, फिर कैसे इन प्रतिस्पर्धा प्रतियोगीताओ के विजेताओं से नयी प्रतिभाओ का सृजन नही हो पा रहा ? क्यों चले गये मेरी शाला छोडकर छात्र?? इस प्रश्न पर हर अध्यापक विचार करे ।सतत व्यापक मुल्यांकन, दक्षता संवर्धन, बेसलाइन, प्रतिभा पर्व सब मिलकर भी शाला मै प्रतिभाओं का सृजन नही कर पा रहे है। इसी तारतम्य मै अब शाला सिद्धी योजना जोड दी गयी है। निश्चित हि शाला सिद्धी योजना मै एक ईमानदार अध्यापक की आत्मा बसती है। लाखो अध्यापक-प्रशिक्षण , हजारो कार्यशाला, अनगिनत बैठक और अनाप-शनाप आर्थिक नुकसान सिर्फ इस प्रश्न का हल खोजने मै लगा है की शासकीय शाला मै ऐसा क्या -क्या करे हो की यहाँ के छात्र अन्य विद्यालय मै  ना जाये ?? सरकार इस समस्या के हल से भी अनभिज्ञ नही है, पर हल करना ही नही चाहती है। शाला सिद्धी योजना का प्रशिक्षण लेते समय एक विडियो दिखाया गया । इस विडियो मै बताया गया की एक शासकीर शाला मै ,मात्र एक अध्यापक, किराये के भवन मै कुल 5 कक्षाओ को एक साथ बहुत ही सुनियोजित तरीके से सभी संसाधनो के आभाव मै पढा रहे थे। प्रशिक्षण मै बताया गया की ऐसे ही टीएलएम से हम भी अपनी शाला मै पढाये, किन्तु वास्तव मै तो इस विडियो ने कुछ और ही संदेश दिया।वह यह कीइस विडियो की तरह एक ईमानदार अध्यापक हर शाला मै पदस्थ कर दिजिये, तो शासकीय शाला फिर से बच्चों से खचाखच भर जायेगी। इस बार गैरशैक्षणिक कार्य मै लिप्त रहने की विवशता भी नही है क्योकि हर शाला मै छात्र अनुपात मै अतीथी शिक्षक उपलब्ध है।कार्यशाला ,प्रशिक्षण,गोष्ठी, सब कुछ अध्यापकों को मानसिक रूप तैयार व प्रेरित करने हेतु आयोजित किये जाये। एक प्रेरित अध्यापक खुद अपनी अध्यापन विधी बना के वो सब कुछ कर दिखायेगा जो की अब तक  दिवास्वप्न मै था। जब शैतान इन्सान का माइन्ड वाश करके उसे आतंकवादी तक बना सकता है तो सरकार आम अध्यापक को बेहतर प्रबन्धन और शिक्षण हेतु प्रेरित तक नही कर सकती ?? करोडो रूपये प्रशिक्षण के नाम पर फूंकने की जगह हर शाला मै एक ईमानदार और समर्पित अध्यापको की टीम तैनात कर दी जाये तो शासकीय शाला के उजडते चमन मै फिर से बहार आ जायेगीं।
"आओ शाला और खुद के
को बचाने की बात करे
इस बार सफलता मिलने तक
प्रयास करे "

लेखिका स्वय अध्यापक है और यह  उनके निजी विचार हैं .

आदिवासी जिलों के 323 विद्याथी जे.ई.ई. और नीट परीक्षा में हुए कामयाब मण्डला जिले के 3 बैगा विद्यार्थी का नीट में चयन

यह आश्चयर्जनक परन्तु सत्य है कि मध्यप्रदेश में सरकारी स्कूलों में पढ़ते हुए, आर्थिक अभाव से जूझते हुए प्रदेश के 20 आदिवासी बहुल जिलों के 323 विद्यार्थियों ने इस वर्ष जे.ई.ई. और एम्स, ए.आई.पी.एम.टी. और ए.आई.पी.एम.टी. (नीट) में सफलता हासिल की है। इसका उल्लेखनीय पक्ष यह है कि मण्डला, झाबुआ, धार और छिन्दवाड़ा जिले के 155 आदिवासी बच्चे इन परीक्षाओं में सफल हुए। मण्डला जिले के विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा के 3 छात्र-छात्रा ने ए.आई.पी.एम.टी. (नीट) की परीक्षा उत्तीर्ण की। इन तीनों बच्चों के परिवार मजदूर वर्ग से हैं।
सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाकर और आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों के लिये की गयी विशेष शिक्षण व्यवस्था से यह परिणाम हासिल हुए हैं। वर्ष 2016-17 में जे.ई.ई. की परीक्षा में 250 छात्र-छात्राएँ सफल हुए और एआइपीएमटी (नीट) 73 विद्यार्थी ने सफलता हासिल की। इनमें 21 अनुसूचित-जनजाति के विद्यार्थी का आई.आई.टी. के लिये तथा शेष का एन.आई.टी. और अन्य प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में चयन हुआ। ए.आई.पी.एम.टी. (नीट) में सफल 73 में से 55 विद्यार्थी अनुसूचित जनजाति वर्ग के हैं। इसके पहले वर्ष 2015-16 में आरक्षित वर्ग के 153 छात्र-छात्रा इन परीक्षाओं में सफल हुए थे।
आदिवासी वर्ग के इन विद्यार्थियों की सफलता ने साबित कर दिया है कि मध्यप्रदेश के पिछड़े, आदिवासी और अंदरूनी क्षेत्रों में भी शिक्षा का प्रकाश फैल रहा है। वहाँ बच्चे शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। इसी के अनुरूप सरकार भी उन्हें आवश्यक सुविधाएँ और मदद उपलब्ध करवा रही है, जिसके चलते उनकी प्रतिभा परवान चढ़ रही है और राज्य सरकार के शिक्षा व्यवस्था सुधार के प्रयासों को पंख मिल रहे हैं।
मध्यप्रदेश सरकार ने
आईआईटी/जेईई (मेन्स) प्रवेश परीक्षा के चयन में आदिवासी विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिये विभिन्न स्तर पर कई नवाचार और प्रयोग किये हैं। इन बच्चों को पढ़ाने के लिये अतिथि शिक्षकों के चयन में कड़े मापदंड निर्धारित किये गये हैं। उनके अध्यापन और परफार्मेंस का नियमित मूल्यांकन किया जाता है। विद्यार्थियों की विज्ञान विषय मे अभिरूचि पैदा हो और उन्हें विज्ञान के सिद्धांतों को समझने में आसानी हो, इसके लिये सभी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में भौतिक विज्ञान, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान के लिये प्रयोगशालाएँ स्थापित की गई हैं।
इसके अलावा बोर्ड परीक्षाओं की किताबों के साथ-साथ अन्य उच्च कोटि की संदर्भ पुस्तकों तथा प्रेक्टिस की व्यवस्था की गई। उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में पुस्तकालयों को अधिक सुदृढ़ बनाया गया। विद्यार्थियों को लायब्रेरी कार्ड जारी किये गये, जिससे वे लायब्रेरी की पुस्तकों का लाभ ले सकें। उन्हें विशेष रीडिंग मटेरियल भी उपलब्ध करवाया गया। राष्ट्रीय कोचिंग संस्थान FITJE, Fortune की अन्य परीक्षाओं में विद्यार्थियों को शामिल होने के अवसर उपलब्ध करवाकर नियमित अभ्यास करवाया गया। जिलों में किये गये प्रयासों की राज्य-स्तर पर निरंतर समीक्षा की गई। जिलों में अनेक नवाचार को प्रोत्साहित किया गया। इनमें मंडला जिले में 'नवरत्न' एवं 'ज्ञानार्जन' प्रोजेक्ट, डिंडोरी में 'आकांक्षा' प्रोजेक्ट, अनूपपुर जिले में 'प्रयास' तथा झाबुआ जिले में 'स्टेप' प्रोजेक्ट शामिल हैं। कलेक्टरों द्वारा चिन्हित विद्यार्थियों को प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थानों में कोचिंग की सुविधा उपलब्ध करवायी गई।
मण्डला जिले में ज्ञानार्जन प्रोजेक्ट में पिछले दो वर्ष में 85 विद्यार्थी का जे.ई.ई. और नीट में चयन हुआ है। पिछले वर्ष यहाँ के एक विद्यार्थी का चयन आई.आई.टी. खड़गपुर के लिये हुआ। जिले के बैगा जनजाति के छात्र रामेश्वर ग्राम सिंगारपुर, योगेन्द्र कुमार धुर्वे और कु. रश्मि धुर्वे ग्राम घुघरी का नीट में सिलेक्शन हुआ है। इनके माता-पिता मजदूरी के सहारे अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। मण्डला जिले में शिक्षण व्यवस्था में गुणवत्ता सुधार के लिये विशेष प्रयास किये गये हैं। नौ विद्यालय का चयन कर उन्हें सेंटर फॉर एक्सीलेंस बनाकर और प्रोजेक्ट नवरत्न शुरू किया गया। इसके अंतर्गत समाज को जोड़ने के लिये शाला-मित्र बनाये गये, जिनके जरिये उत्कृष्ट विद्यालयों का जीर्णोद्धार कर वहाँ बेहतर से बेहतर शिक्षण व्यवस्था की गयी।
शाला मित्र में जिले के सांसद, विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष, सदस्य, नगरपालिका के अध्यक्ष एवं विकासखण्ड स्तर के अधिकारी-कर्मचारी और शिक्षकों ने एक-एक दिन का वेतन दिया। साथ ही जिले के नागरिक, व्यवसायी और कान्ट्रेक्टर भी शाला-मित्र बनकर शिक्षा में उत्कृष्टता लाने में सहयोग दे रहे हैं।

Monday, September 5, 2016

रतलाम में अध्यापको ने शिक्षक दिवस पर डॉ राधाकृष्णन की प्रतिमा को ज्ञापन सौंपा और पूर्ण शिक्षक बनने का संकल्प लिया

राज्य अध्यापक संघ रतलाम द्वारा  शिक्षक दिवस की शाम को  डॉ राधाकृष्णन की प्रतिमा को ज्ञापन सौंपा और पूर्ण शिक्षक बनने का संकल्प  लिया । संघ द्वारा ज्ञापन में  प्रदेश  सरकार की नीतियों के द्वारा  शिक्षको की दुर्दशा उल्लेख किया गया था। इस अवसर पर जिलाध्यक्ष  डॉ मुनिद्र  दुबे ,प्रकाश शुक्ला ,रजनीश चौहान ,नरेंद्र सिंह पंवार ,मुकेश मालवीय ,निर्मल सिंह चौहान ,विजय पाण्डेय ,श्री शर्मा ,राजिव लवानिया और सुरेश यादव उपस्थित थे .। 

सरकार से एक लाख की सहायता लेने से इनकार करने वाली अध्यापक की बेवा को राज्य अध्यापक संघ ने एक लाख की सहायता प्रदान की

जगह जगह मनाये  जा  रहे  शिक्षक  दिवस  कार्यक्रमों के बीच  आज  मंडला में  अनुकम्पा नियुक्ति  के  बदले 1 लाख लेने  से  इंकार  करने वाली दिवंगत  अध्यापक श्री सुरेश दास सोनवानी की धर्मपत्नी श्रीमंती अमिरा सोनवानी  को  राज्य अध्यापक संघ  मंडला ने 1 लाख  रूपये  की  सहायता  राशि प्रदान की |
  श्रीमती सोनवानी को विभागीय अधिकारियों द्वारा  नियमो का हवाला देकर अनुकम्पा नियुक्ती देनें से  स्पष्ट मना  कर दिया गया था। विदित रहे श्रीमती सोनवानी ने रोते बिलखते वरिष्ठअधिकारियों से  कहा था की एक लाख में उनका गुजारा नही चल सकता ।
इस से क्षुब्ध होकर राज्य अध्यापक संघ ने अपने साथियों के माध्यम से 1लाख रूपये एकत्र कर के श्रीमति सोनवानी  को आज जिलाधीश मंडला कार्यालय के समक्ष श्रीमंती सोनवानी को सहायता प्रदान की गयी । .

शिवराज सिंह यह तो अन्याय की इंतिहा है ? - वासुदेव शर्मा (छिंदवाड़ा)


वासुदेव शर्मा (छिंदवाड़ा)-स्कूलों में पढ़ाने वाली इन बेटियों का गुनाह क्या है शिवराज सिंह, जो इनसे बंधुआ श्रमिकों जैसा सलूक किया जा रहा है। यह बेटियां आपसे ज्यादा पढ़ी लिखी हैं। इनकी आवाज में आपसे ज्यादा मिठास है। यह बेटियां अपनी-अपनी बस्तियों, स्कूलों में आपसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। इनके चेहरों की मुस्कराहट बताती है कि यह खुशियां बांटने के लिए ही आई हैं।  यह बेटियां हर दिन 40, 50 या 100 किलोमीटर की मुश्किल यात्रा तय कर स्कूल पहुंचती हैं, तो आप समझ सकते हैं कि यह आपसे भी ज्यादा मेहनती और परिश्रमी हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह केे गोद लिए जिला विदिशा की इन बेटियों की इस तस्वीर  के जरिए आपको यह बताना चाहते हैं कि प्रदेश में ऐसी बीसियों हजार बेटियां हैं, जिनसे  आप स्कूलों में काम लेे रहे हैं, लेकिन बदले में उतना भी नहीं दे रहे, जितना वे खर्च करके अपने-अपने स्कूल पहुंचती हैं। यह बेटियां आपके ही प्रदेश की अतिथि शिक्षक हैं। स्कूलों में यह व्यवस्था आपने ही शुरू की है। इसीलिए आपसे ही यह सवाल है कि आपको अपने ही प्रदेश के युवा मासूम बेटे-बेटियों को गुलाम या बंधुआ बनाने का अधिकार किसने दिया। आपको अतिथि शिक्षक की व्यवस्था बनानी ही थी, तो कम से कम उसमें यह प्रावधान तो किया ही जा सकता था कि इन्हें मप्र सरकार का घोषित न्यूनतम वेतन मिले तथा यह तब तक स्कूलों में पढ़ाएं जब तक स्कूल रहें। लेकिन आपने ऐसा कुछ नहीं किया?
     आपको याद दिला दें। आपसे से पहले दिग्विजय सिंह ने भी शिक्षाकर्मी के रूप में ऐसी ही व्यवस्था की थी। हालांकि तब की अटल बिहारी सरकार के स्पष्ट निर्देश थे कि सरकारी खर्चे कम करें, भले ही कर्मचारियों को नौकरी से निकालना पड़े। दिग्विजय सिंह ने ऐसा किया भी, लेकिन फिर भी उन्होंने शिक्षाकर्मी को निश्चित वेतन और काम की निरंतरता का अधिकार देकर ही नौकरी पर रखा। आपने तो अतिथि शिक्षकों के साथ ऐसा कुछ नहीं किया। अपने तो अपने ही प्रदेश के बेटे-बेटियों को ऐसे लालची अधिकारियों के हवाले कर दिया जो 50 से 70 हजार वेतन लेने के बाद भी मध्यान्ह भोजन के धनिया तक में कमीशन ले लेते थे। स्कूलों में बैठे यह अधिकारी अतिथि शिक्षकों को पीरियड के हिसाब से तय पारिश्रमिक का भुगतान ईमानदारी से करेंगे, ऐसा आपने कैसे सोच लिया था, जो इन्हें उनके रहमो करम पर छोड़़ दिया।    मुख्यमंत्रीजी आपकी सरकार अतिथि शिक्षकों के साथ जो सलूक कर रही है, वैसा सलूक कभी राजा-माराजे अपनी प्रजा गुलाम, बंधुआ बनाकर किया करते थे। यही बेटियां स्कूलों में बच्चों को पढ़ाती है कि इंसान को गुलाम और बंधुआ बनाने वाली व्यवस्था इतिहास के गर्त में जा चुकी है, इन्हें बच्चों को यह समझा दिया कि आप उस व्यवस्था को जिंदा कर रहे हैं, तब क्या होगा, कभी सोचा? यह बेटे-बेटियां, जिन्हें आप 5-7 हजार रुपए महीना नियमित नहीं दे सकते, उन्होंने स्कूलों में बच्चों को आपके बारे में पढ़ाने शुरू कर दिया, तब क्या होगा, जरा विचार कीजिए। इन्होंने बच्चों को बता दिया कि गांव के गरीब किसान का बेटा शिवराज जो कभी पैदल चला करता था, आज उनके पास नोट गिनने की मशीनें हैं, तब स्कूलों के बच्चे भी आपसे नफरत करने लगेंगे। इस स्थिति से बचना है, तो कम से कम अतिथि शिक्षकों के साथ न्याय कीजिए। वे सालों से   संघर्ष कर रहे हैं, साल में दो-चार बार भोपाल आते हैं, लेकिन आप इनसे मिलते तक नहीं है, यह भी तो ठीक नहीं।
जिस तरह शिक्षाकर्मी रखने वाले दिग्विजय सिंह राजनीति में हाशिए पर हैं, कहीं अतिथि शिक्षक रखकर आप भी राजनीतिक हाशिए पर न पहुंच जाएं, इससे बचने के लिए ही सही अतिथि शिक्षकों की सुनिए और उनसे बात कीजिए।आज उन्होंने शिक्षक दिवस का बहिष्कार किया है, कल कहीं आपका बहिष्कार कर दिया, तब क्या होगा? जरा सोचिए?(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं ।)


Saturday, September 3, 2016

विभिन्‍न माडल स्‍कूलों में शिक्षकों के रिक्‍त पदों पर स्‍थानीय स्‍तर से व्‍यवस्‍था के संबंध में

विभिन्‍न माडल स्‍कूलों में शिक्षकों के रिक्‍त पदों पर स्‍थानीय स्‍तर से व्‍यवस्‍था के संबंध में ,सभी जिलाधीश  से अनुरोध किया गया है ,पत्र  में कहा गया है की ,शिक्षकों की नियुक्तियां प्रक्रियाधीन हैं ,इस लिए मुख्यालय स्तर  पर निकटस्थ शालाओ में  कार्यरत ऐसे  शिक्षको को जिनके पास अपर्याप्त काम  है उन्हें मॉडल स्कुल में अध्यापन के लिए निर्देशित किया जाए । शिक्षको - अध्यापको को स्थानीय निधि से यात्रा व्यव भी प्रदान किया जा सकता है।
आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें



जिला एवं विकासखण्‍ड स्‍तर के 313 उ.मा.वि. में एन.एस.क्‍यू. एफ. योजना अंतर्गत व्‍यवसायिक शिक्षा पाठयक्रम के संबंध में शासन आदेश

  जिला एवं विकासखण्‍ड स्‍तर के 313 उ.मा.वि. में एन.एस.क्‍यू. एफ. योजना अंतर्गत व्‍यवसायिक शिक्षा पाठयक्रम प्रारम्भ करने के संबंध में शासन ने आदेश जारी किया  है।  इसमें कक्षा 9 और 10 में तृतीय  भाषा के स्थान पर व कक्षा 11 और 12 में द्वितीय भाषा के स्थान पर एक व्यवसायिक पाठ्यक्रम चयनित किया जा सकेगा ,कुल 9 व्यवसायिक पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये जा रहे है इसमें प्रत्येक विद्यालय में केवल 2 पाठ्यक्रम  संचालित किये जाएंगे। पाठ्यक्रम इस प्रकार हैं  बैंकिंग एवं फायनेनशियल सर्विस ,ब्यूटी और  वेलनेस ,इलेक्ट्रिक टेक्नोलॉजी ,हेल्थ केयर ,आईटी-आइटिस ,फिजिकल एजुकेशन और स्पोर्ट्स ,रिटेल ,ट्रेवल और टूरिज्म ,सुरक्षा ।
     उक्त पाठ्यक्रम में 9 वि  में सफल होने पर नेशनल सर्टिफिकेट फॉर वर्क प्रिप्रियेशन लेवल 1 का प्रमाण पत्र ,10  वि  में सफल होने पर नेशनल सर्टिफिकेट फॉर वर्क प्रिप्रियेशन लेवल 2 का प्रमाण पत्र ,11 वि  में सफल होने पर नेशनल सर्टिफिकेट फॉर वर्क प्रिप्रियेशन लेवल 3  का प्रमाण पत्र ,
12 वि  में सफल होने पर नेशनल सर्टिफिकेट फॉर वर्क प्रिप्रियेशन लेवल 4  का प्रमाण पत्र ,प्रदान किया जाएगा आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें

                       





सहायक अध्यापक होंगे जिला पंचायत के कर्मचारी ,मध्यप्रदेश पंचायत अध्यापक संवर्ग (नियोजन एवं सेवा की शर्तें) नियम, 2008 में संशोधन 9 अगस्त 2016 से किया गया

मध्यप्रदेश पंचायत अध्यापक संवर्ग (नियोजन एवं सेवा की शर्तें) नियम, 2008 में संशोधन 9 अगस्त 2016 से किया गया ,इसके बाद सहायक  अध्यापक होंगे जिला  पंचायत के कर्मचारी  ।  प्रारूप का प्रकाशन 6 जनवरी 2016 को किया गया था , संशोधन 9 अगस्त 2016 को किया गया । इसके दूरगामी परिणाम सामने आएंगे ,सहायक अध्यापक का निकाय अब जिला पंचायत हो गया है अंतर निकाय संविलियन ( स्थांतरण )  होने से जिले के अंदर स्थान्तरण सम्भव नहीं होगा ,अन्य नियुक्तिकर्ता अधिकारी सत्र के कार्य भी जिला पंचायत से होंगे । राजपत्र की पीडीऍफ़ कॉपी प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें।

    

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर 2016-2017


 कलेंडर पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए निचे दी गयी लिंक को ओपन करें 


शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह जून 2016

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह जुलाई 2016

 शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह अगस्त 2016

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह सितम्बर 2016

 शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह अक्टूबर 2016

 शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह नवम्बर 2016

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह दिसम्बर 2016

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह जनवरी 2017

 शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह फरवरी 2017

 शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह मार्च 2017

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह अप्रैल 2017

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह मई 2017




Friday, September 2, 2016

संवि‍दा शाला शि‍क्षकों की अध्‍यापक संवर्ग में नि‍युक्‍ति में विलम्ब को लेकर की जाने वाली समीक्षा


संवि‍दा शाला शि‍क्षकों की अध्‍यापक संवर्ग में नि‍युक्‍ति में विलम्ब  को लेकर की जाने वाली समीक्षा के आदेश 2010 में जारी किये गए थे हर माह की 5 और 25 तारीख को समीक्षा होनी है। यह आदेश आज भी प्रासंगिक है और लागु है।
आदेश की प्रति पीडीऍफ़ मे प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें

Thursday, September 1, 2016

2016 में अध्‍यापक संवर्ग में कार्यरत सेवकों के ऑनलाईन अंतर्निकाय संविलियन हेतु एजूकेशन पोर्टल अपडेट कराये जाने के संबंध में

वर्ष 2016 में अध्‍यापक संवर्ग में कार्यरत सेवकों के ऑनलाईन अंतर्निकाय संविलियन हेतु एजूकेशन पोर्टल अपडेट कराये जाने के संबंध में सभी जिलाधीश  को 30 जून 2016  को मेल किया गया था आदेश अब 1 सितम्बर 2016  को एजुकेशन पोर्टल पर सार्वजानिक किया गया है ।
आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें



Monday, August 15, 2016

आजादी का अहसास कराते हैं जनांदोलन-वासुदेव शर्मा छिन्दवाड़ा ( 70वें स्वतंत्रता दिवस पर ) गैर राजनीतिक ताकतों के आन्दोलन के संदर्भ में


आजादी का अहसास कराते हैं जनांदोलन
वासुदेव शर्मा छिन्दवाड़ा-जनता को गैरराजनीतिक ताकतों के इर्द-गिर्द संगठित करने की हो रही कोशिशें राजनीतिक ताकतों के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं। गैरराजनीतिक ताकतें समाज में राजनीतिक वातावरण को समाप्त करती हैं तथा जनांदोलनों को उभरने से रोकती हैं। इससे आगे जाकर यह ताकतें जनता के सवालों एवं आजादी के महत्व पर भी भ्रम फैलाने का काम करती हैं। यह ताकतें जनता के जरूरी सवालों को भी अपने अपने तरीके से परिभाषित कर कुतर्कों के जरिए यह बताने की कोशिश करती हैं कि जनता जिन परेशानियों का सामना कर रही है, उसके लिए वही जिम्मेदार है। यह ऐसा कुतर्क है, जो सरकार के जनविरोधी रवैए से ध्यान हटाने के लिए दिया जाता है। यह तर्क वे ताकतें अधिक देती हैं, जो खुद को गैरराजनीतिक कहती हैं। यह ताकतें ऐसा क्यों करती हैं? स्वतंत्रता दिवस के मौके पर हर किसी को इसे समझने की जरूरत है?

समाज में बढ़ रही असमानता, बेरोजगारी, गरीबी, दरिद्रता, ऊंच-नीच जैसी समस्याओं को राजनीतिक नजरिए से ही समझकर उनके समाधान तक पहुंचा जा सकता है। आजादी के बाद देश ने जो प्रगति की है, उसका श्रेय भारत की राजनीति को ही जाता है, फिर वह राजनीति भले ही विभिन्न विचारों से क्यों न संचालित होती रही हो। समाज में राजनीतिक वातावरण मौजूद रहता है, तब विभिन्न विचारधाराओं की राजनीति को उभरने के अवसर मिलते हैं। यह ऐसी स्थिति होती है, जो समाज के हर तबके को उसकी पसंद की राजनीति के चयन का अधिकार देती है। समाज में राजनीतिक वातावरण होता है, तब जनसंघर्षों, जनांदोलन की परिस्थितियां भी मौजूद रहती हैं और लोग खुद की बात को हुकूमतों तक पहुंचाने के लिए इसी रास्ते का सहारा लेते हैं। जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों का रास्ता, ऐसा रास्ता होता है, जो समाज को राजनीतिक शिक्षा देता है, विभिन्न विचारधाराओं की राजनीति को समझने का मौका उपलब्ध कराता है तथा जनता को अपनी पसंद की राजनीति के करीब पहुंचाता है।
       आजादी, जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों से ही हासिल हुई है, इसीलिए देश की प्रगति में इसके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। जनता के संगठित संघषों की ही ताकत का परिणाम था कि अंग्रेजों की ताकतवर हुकमतों को भी अंत में यह अहसास हो गया था कि संगठित जनता की आवाज को कुचला नहीं जा सकता, इसीलिए अंग्रेजी हुकूमत दमन के तमाम हथियारों को डालकर जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों के आगे झुकी और देश छोड़कर जाने को मजबूर हुई। जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों ने ही भारत को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी दिए, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया।  जिस देश में  जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों का इतना बड़ा योगदान रहा हो, उस देश में गैरराजनीतिक ताकतों के बढ़ते बर्चस्व को हल्के में नहीं लेना चाहिए। गैरराजनीतिक ताकतें समाज का पहला नुकसान यही कर रही हैं कि वे जनांदोलनों के महत्व को समाप्त कर जनता को  संघर्ष के रास्ते पर चलने से रोक रही हैं। गैरराजनीतिक ताकतें ऐसा करने में सफल हुई, तब जनता से उसकी जुवान ही छिन जाएगी और वह चंद ताकतवर व्यक्तियों, नेताओं एवं अधिकारियों पर निर्भर हो जाएगी।  यह स्थिति गुलामी जैसी होगी, इसीलिए 69वें स्वतंत्रता दिवस पर जनता को इस स्थिति  से बचाने का संकल्प भी लेना होगा।
       चूंकि गैरराजनीतिक ताकतें समाज में अलग-अलग नामों से काम करती हैं। यह ताकतें समाज सेवा के नाम पर सरकार की तमाम योजनाओं को संचालित करते हुए खुद को स्थापित करने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी को ही समाज में अविश्वसनीय बनाने का काम करती हैं। यह ताकतें इतनी ताकतवर हो चुकी हैं कि वे राजनीतिक गतिविधियों को ठप्प कर देती हैं, अन्ना एवं रामदेव के आंदोलनों के दौरान ऐसा देखने में आया भी। गैरराजनीतिक ताकतें सांस्कृतिक संगठनों का चोला पहनकर भी जनता के बीच पहुंचती हैं, यह ताकतें जनता को उनके बुनियादी सवालों पर होने वाले संघर्षों से दूर कर सांस्कृतिक, धार्मिक आयोजनों की तरफ ले जाने का काम करती हैं, इसका नतीजा यह होता है कि जनता अपने जरूरी सवालों पर सोचने-विचारने की वजाय अपनी माली हालत के लिए अपने पिछले कर्मों का फल मानकर जिस हाल में है उसे अपनी नियत मानकर स्वीकार कर लेती है। जनता जिस हाल में है, उसी में जीती रही और इससे आगे न सोचे, गैर राजनीतिक ताकतें इसीके लिए काम करती हैं। जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों में जनता की कम होती भागीदारी, राजनीतिक कार्यक्रमों के प्रति उसकी बेरुखी बताती है कि गैरराजनीतिक ताकतों ने समाज के बहुमत हिस्से को निराशा में पहुंचा दिया है, जिस कारण जनता लोकतांत्रिक रास्ते से दूर होती जा रही है।
      सामाजिक असमानता, गरीबी, बेकारी, महंगाई ऐसे सवाल हैं, जिन्होंने जनता के बहुमत हिस्से को प्रभावित किया है। किसानों की माली हालत, बढ़ती बेरोजगारी, महंगी होती शिक्षा, महंगा होती स्वास्थ्य सुविधाएं, खाने-पीने की जरूरी चीजों का आए दिन महंगा होना, कर्मचारियों के बीच व्याप्त वेतनविसंगतियों की समस्याओं के लिए सीधे-सीधे सरकारें और उन सरकारों की नीतियां ही जिम्मेदार है, ऐसे में जब इन समस्याओं से दो-चार होते लोग इनके समाधान के रास्ते गैरराजनीतिक नजरिए से खोजेंगे, तब न तो समस्याओं के समाधान तक पहुंचा जा सकता है और न ही इन समस्याएं से मुक्ति मिल सकती हैं। जनता के हर तबके को प्रभावित कर रही इन समस्याओं के समाधान का रास्ता राजनीतिक रास्ते पर चलकर ही निकाला जा सकता है, इसके लिए जरूरी है कि जनता के बीच से जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों का निर्माण हो।  जनसंघर्षों एवं जनांदोलनों में बोले जाने वाली भाषा, लगाए जाने वाले नारे, संघर्षों के संगठनकर्ताओं की राजनीतिक विचारधारा को सामने लाते हैं, इस तरह जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों के जरिए जनता को विभिन्न विचारधाराओं की राजनीति को समझने का मौका मिलता है। कौनसी राजनीति उसके करीब है, यह समझने का  बेहतरीन मौका होते हैं जनांदोलनों। आज जब समाज का हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में सरकारों की नीतियों से असंतुष्ट हो, तब जनता के लिए जनांदोलनों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है क्योंकि इन्हीं जनांदोलनों से भारत की जनता को आजादी मिली और यही जनांदोलन जनता के जीवन को खुशहाल बनाने के रास्ते पर ले जाएंगे।  आईए; स्वतंत्रता दिवसे के मौके पर जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों को विकसित करने का संकल्प लें।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं (यह उनके निजी विचार हैं )

Friday, August 12, 2016

एक अध्यापक की जान की कीमत क्या एक लाख रूपये ही हे ?-अरविन्द रावल झबुआ

अरविन्द रावल-एक अध्यापक की जान की कीमत क्या एक लाख रूपये ही हे ? कुछ हमारे अध्यापक साथियो ने और शासन के लोगो के सहयोग से आज अध्यापक की जान की कीमत एक लाख रूपये तय वाला आदेश जारी हुआ हे। सरकार के इस आदेश के बाद मृत अध्यापक साथी के परिवार के लोगो  की अहर्ता नही होने की स्थिति में अनुकम्पा के नाम पर एक लाख रूपये देकर शासन इतिश्री कर लेगा। हमारे जिन साथियो ने एक लाख रूपये अनुकम्पा के नाम पर मृत अध्यापक के परिवार को देने का सुझाव शासन को दिया हे निश्चित ही उन लोगो को परिवार की पीड़ा क्या होती हे इसका एहसास नही होगा। अगर मेरे यह साथी शासन के लोगो को यह सुझाव देते की मृत अध्यापक के परिवार में यदि अहर्ता योग्य पात्र कोई व्यक्ति नही हे तो उन्हें शासन परिवार के लालन पालन हेतू पहले अनुकम्पा की तहत सविदा 3 के पद पर नोकरी दे और योग्य अहर्ता प्राप्त करने हेतू दो चार साल का टाइम पीरियड देने की बात प्रमुखता से रखना थी। यदि किसी मृत् अध्यापक परिवार में कोई अहर्ता प्राप्त करने में असमर्थ व्यक्ति हे तो सरकार उसे भृत्य के पद पर अनुकम्पा में नोकरी दे। ताकि मृत अध्यापक साथी के परिवार का सदस्य बहेतर ढंग से अपने परिवार का पालन कर सके।साथियो एक लाख रूपये में इस महँगाई के दौर में आज होता क्या हे ? एक लाख रूपये में न तो आज बच्चों की शिक्षा पूरी होती हे और न ही हाथ पीले किये जा सकते हे।  हमारे साथी खुद को अव्वल साबित करने के चक्कर में अपनों का ही बुरा करवा बेठे हे। इस आदेश का सभी साथियो को मिलकर विरोध करना चाहिए । हमें इसे निरस्त करवाकर मृत अध्यापक साथी के परिवार के पालन हेतु अहर्ता होने या न होने की स्थिति में किसी भी पद पर पर नोकरी दी जाये ऐसा आदेश जारी करवाने का प्रयास सामूहिक रूप से अब किया जाना चाहिए।अभी हम अध्यापको को सरकार से बहुत सारी लड़ाई लड़ना बाकी हे । आगामी दस पन्द्रह सालो के अंदर कोई एक लाख से ज्यादा अध्यापक  रिटायर हो जाने वाले हे। इसी तरह से दुक्डो में बिखर कर लड़ते रहेगे तो खाली हाथ घर लौटने के कुछ हासिल नही होगा। शासन से जो भी लड़ाई जितना हे तो हमारे पास दो चार सालो का वक्त ही हे। उसके बाद हम फिर कुछ करने की स्थिति में नही रहेगे। हमने टुकड़ो में बटकर रहने का परिणाम आज देख लिया इस आदेश को पाकर। कितने बड़े दुःख का विषय हे की हमारी ताकत देश की आधी आर्मी के बराबर होने के बाद भी हमे एक एक आदेश को निकलवाने में एक एक साल लग जाते हे और फिर उनकी विसंगतियो को सुधरवाने में इतना समय लगता हे तो हम पेंशन और  अन्य सुविधाओ की लड़ाई लड़ेंगे कब और उनको प्राप्त कब करेगे ?
अभी भी हमारे पास वक्त शेष हे यदि हम सभी अध्यापक नेता एकजुट हो जाये तो हम सरकार से अपनी शक्ति के बल पर सब कुछ पा सकते हे। इस समय अध्यापको को एक सशक्त दूरदर्शी नेतृत्त्व की आवश्यकता हे जो अध्यापक और उसके परिवार के उज्ज्वल भविष्य की सोच को लेकर कार्य करे।लेखक स्वयं  अध्यापक हैं और यह उनकी निजी राय है .           

Thursday, August 11, 2016

अर्जित अवकाश प्रदान कि‍ये जाने के संबंध में ,नियम 2008

ग्रीष्‍मावकाश में शासकीय कार्य कि‍ये जाने के एवज में अर्जित अवकाश प्रदान कि‍ये जाने के संबंध में ,नियम 2008 ,एक दिन काम करने के लिए एक दिन का अर्जित अवकाश अधिकतम  30 दिवस खाते में दर्ज किया जाएगा ,प्राप्त 10 अर्जित अवकाश के नकदीकरण की पात्रता समाप्त कर दी गयी। अर्जित अवकाश के नकदीकरण  की पात्रता अन्य कर्मचारियों के समान  कर दी गयी हैं । आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए आदेश की इस लिंक ओपन करें।






आम अध्यापक और अध्यापको के नेतृत्व से विनम्र अपील ,अब समस्या का समाधान आवश्यक है - सुरेश यदाव रतलाम


सुरेश यादव रतलाम - गत वर्ष सितम्बर माह में आंदोलन हुआ था ,तब से अब तक सिर्फ और सिर्फ सरकार ने अखबारों में अपनी वाह- वाही करवाई है की उसने अध्यापको को सामान वेतन दे दिया जबकि वास्तविकता क्या है आप सभी जानते हैं हम वँही के वँही हैं । अध्यापक निराश है उसके हाथ तो रीते ही हैं,कभी संवाद और कभी असंवाद धड़कनो को और बड़ा देता है । संपूर्ण अध्यापक  समाज भी वर्तमान में वेतन निर्धारण के लिए गणना पत्रक को लेकर आशंकित और चिंतित हैं।
      

  श्री भरत पटेल के नेतृत्व में 25 जुलाई 2016 को डीपीआई में अधिकारियों से चर्चा की गयी । तब भरत भाई की तरफ से कहा गया कि , वार्ता सफल रही है और हमारी मांग अनुसार ही प्रस्ताव बनाकर विभाग ,शासन को भेज देगा।  इसके बाद भरत पटेल जी के नेतृत्व में शिक्षा मंत्री से 3 अगस्त को वार्ता हुई उस दिन यह प्रचारित-प्रसारित  किया गया कि वार्ता असफल रही। सरकार ने तीन प्रस्ताव दिए लेकिन हमें मंजूर नहीं है ।      

 भारत भाई ,लेकिन सरकार के तीन प्रस्ताव हैं क्या ? अध्यापक हित में आवश्यक है की  आप तो कम से कम अपना प्रस्ताव  सार्वजनिक करें ,साथ ही सरकार के 3 प्रस्ताव भी सार्वजनिक करें । जिस से अध्यापक उन प्रस्तावों को देख सके , समझ सकें और प्रदेश के अध्यापको में आम राय बन सके। क्योकि अध्यापक की समस्या  सिर्फ 7440 +2400,9300+3200,10230+3600 मिल जाने भर  से हल नही  हो जायेगी ।       

 साथियो सरकार ने 1125.10 करोड़ रूपये का अतिरिक्त भार बताया है । उसमे 141.85 करोड़ रूपये वित्त वर्ष 15 -16 के लिए ,वित्त वर्ष 16-17 के लिए 704.40 करोड़ और वित्त वर्ष 17-18 के लिए 278.85 करोड़  स्वीकृत किये है ।सरकार ने 2016-17 और,2017-18 तक का आंकलन कर लिया है ।       

 2016 में 32500 संविदा शिक्षक अध्यापक बनेगे ,वंही 2017 में 12000 संविदा शिक्षक अध्यापक बनेगे ,(अनुत्तीर्ण गुरूजी सहित)। सरकार ने सम्भवतः 2017 तक सभी पर आने वाले व्यय का आंकलन कर लिया है 2017  में प्रदेश में 228500 अध्यापक होगे ।           

 ्तअब 3 अगस्त  के  बाद संवाद समाप्त हो गया लगता है । कोई रास्ता भी नजर नहीं आ रहा है ।लेकिन  इस परिदृश्य  में  साफ़ साफ़  नजर आ रहा है कि  ,अध्यापक अब  निराश हो चला है,उसका कटा वेतन भी प्राप्त नहीं हुआ है और इस कारण  सरकार से लंबी लड़ाई लड़ने की क्षमता भी कम हो गयी  है । 

      

 सरकार भी मुख्य समस्या को लंबा खिंच कर अन्य समस्याओं को हल करने से बच रही है और संतान देखभाल अवकाश की तरह मनगढ़ंत विवाद भी उत्पन्न कर रही है ,जिसमें  सरकार अपनी गलत जिद को सही साबित करने के लिए और गलतियां करती जा रही है ।    


  अब सर्व श्री जगदीश यादव  ,ब्रजेश शर्मा  ,मनोहर दुबे और राकेश नायक जी से आग्रह  है कि वे ,सरकार से वार्ता कर कुछ हल निकालें । और सर्व प्रथम 2015 की हड़ताल का वेतन भुगतान करवायें का प्रयास प्रारंभ करें  । आप के पास अनुभव है ,सभी जानते है  हर वक्त  जोश से काम नहीं चलता होश अत्यन्त आवश्यक  है ।
      

 वार्ता कर हल निकालने की बात इस लिए ,क्योकी हम  पडोसी दुश्मन मुल्क से लड़ाई नहीं लड़ रहे  हैं  ,कर्मचारी हैं ,और कर्मचारी अंदोलन की विशेषता ही यह है कि जिस से हमें जंग लड़नी  है बात भी उसी सरकार से करनी है।  और जिस से हम लड़ रहे हैं, उसी सरकार के अधीन काम भी करना है । और कोई भी अंदोलन तभी सफल माना जाता है जब उस से जुड़े  कर्मचारियों का लाभ हो सके।     

 आज समाचारो में यह  भी है ,की " राज्य सभा में प्रस्ताव पारित हुआ की कश्मीर की जनता से सरकार और राजनीतिक दलों को  बात करनी चाहिए "  क्योंकि संवाद से ही समस्या का हल होगा । और हम तो राम और कृष्ण को मानने वाले हैं  ,जिन्होंने धर्मयुद्ध के पहले भी संवाद पर बल दिया ।भले ही उन्हें जानकारी थी की संवाद का कोई हल नहीं निकलेगा।     

 मेरा आप सभी वरिष्ठजनो से आग्रह है कि , सरकार से संवाद स्थापित कर पहले तो यह जानकारी लेवें की सरकार की कुल कितनी राशी खर्च करने की क्षमता है । उसके बाद  यह तय करें की उतनी राशी में प्रदेश के अध्यापक को  अधिकतम क्या आर्थिक लाभ हो सकता है । 

  आप सभी वरिष्ठ जनो को मेरी तरफ से यह भी प्रस्ताव है कि , इन संभावनाओं पर भी विचार करें की ,"अंतरिम राहत में सुधार कर के 2013 के आदेश अनुसार लाभ प्रदान किया जाए ,उस से तत्काल  मिल रहे वेतन पर सहायक अध्यापक को 4700,4800,5000 अध्यापक को 2050,2250,2600 और वरिष्ठ अध्यापक को 3350,3550,3750 का लाभ होगा।  और भविष्य में इसका लाभ यह होगा की , हमारा वेतन निर्धारण 2007 से व्यवस्थित तरीके से हो पायेगा ,इस प्रकार 7 वां वेतन मान जो की राज्य में 2018 में मिलने की सम्भवना है भी हमें सही तरीके से मिल पायेगा  ।        

 साथियो हमारे बुजुर्गों ने भी कहा है की  , " पास के लाभ की अपेक्षा दूर की हानि पर भी विचार करना चाहिए ।" इस लिए आम अध्यापको से अपील है की ,परिस्थियों को समझें कोई भी आंदोलन तभी सफल माना जायेगा जब  तत्काल कुछ आर्थिक लाभ  हो और उसके दूरगामी  परिणाम निकले । यूँ जय जय कार  से कुछ नहीं होगा,हाँ हम अपने और दूसरों के कान को खुश कर सकतें हैं। 

 लेखक स्वयं अध्यापक है  और यह उनकी निजी राय  हैं। 

Wednesday, August 10, 2016

शिक्षक ,अध्यापको की बी .एड. एवं एम एड की प्रवेश प्रक्रिया प्रारंभ


शासकीय प्रगत शैक्षिक अध्ययन संस्थान,शिक्षक-शिक्षा महाविद्यालय तथा राज्य विज्ञान शिक्षा में संचलित बी .एड. एवं बी . एड. (विज्ञान) एम्.एड. एवं एम्. एड. (विज्ञान) द्विवर्षीय पाठ्यक्रम 2016 हेतु प्रवेश के संबंध में ,प्रक्रिया जारी कर दी गयी है। 



NSDL( नवीन पेंशन योजना ) सम्बन्ध में राज्य अध्यापक संघ और शिक्षा विभाग के मध्य आज DPI में बैठक सम्पन्न

                  NSDL( नवीन पेंशन योजना ) सम्बन्ध में  राज्य अध्यापक संघ और शिक्षा विभाग के मध्य आज DPI  में बैठक सम्पन्न 

 NSDL  मुम्बई से आए अधिकारियों श्री  हेगड़े ,लोक शिक्षण संचालनालय आयुक्त नीरज दुबे   लोक शिक्षण संचालनालय के वित्त अधिकारी श्री  मनोज श्रीवास्तव, उप संचालक श्री  सी बी  धोटे , अध्यापक सेल के श्री  रिजवी ,राज्य अध्यापक संघ की तरफ से  डीके सिंगौर जिलाध्यक्ष मंडला और नरेंद्र त्रिपाठी जिलाध्यक्ष  जबलपुर ,शामिल रहे।   राज्य अध्यापक संघ के प्रयास को बड़ी सफलता  मिली है ,

अध्यापक संवर्ग का कटोत्रा कोषालय से करने पर सैद्धान्तिक  सहमती बन गयी है।  अध्यापक संवर्ग के निधन पर  जिले से ही आवेदन  ऑनलाइन होंगे ,10 दिन में मिलेंगी राशि  
। मृत्यु या अन्य मामलो के  लगभग 185 मामलो को प्रमुखता से जल्द निपटाया जाएगा ।  शिक्षा विभाग के अध्यापको का 668 करोड़ NSDL  में फरवरी 16 तक का जल्द ही जमा किया जा  रहा है।   PRAN खाता  जारी होने के 10 साल बाद 25% -राशि निकालने पर सैद्धान्तिक सहमति ( प्रक्रिया में बदलाव किया जाएगा ) बनी।  अध्यापक बनने मे देरी तथा बीच माहों मे कटौती न होने पर पुनः जमा करने की प्रक्रिया को ट्रायबल जैसे एजुकेशन मे भी किया जाएगा। जमा में विलम्ब के ब्याज के लिये शासन को लिखा जायेगा। NSDL के हेगड़े जी ने बताया कि 15600 अध्यापकों जिनके प्रान नंबर जारी है कि अनेक जानकारियां जैसे मोब नं, आधार कार्ड आदि नहीं है उन्हें deactivate किया जाएगा जिसपर आयुक्त नीरज दुबे ने आपत्ति की,तब ये निर्णय बना कि ऐसे लोगो की सूची प्रकाशित करते हुए समय दिया जाएगा कि वे आवश्यक दस्तावेज जमा कर दे।नियमित कर्मचारियो के समान ,प्रत्येक कार्य की समय सिमा और जिमेदारी तय की जायेगी। इस सहित अन्य विषयो पर चर्चा हुई 

      राज्य अध्यापक संघ ने 26 जुलाई को इस संबंध का ज्ञापन सौपा और उन्होंने उसी दिन मीटिंग करने का आश्वासन दिया और  आज उन्होंने मीटिंग  बुला कर अध्यापको की  समस्याओं को न केवल सुना बल्कि तुरंत निर्णय भी लिया।

विदित रहे  राज्य अध्यापक संघ के जिलाध्यक्ष श्री  डी के सिंगौर  ने इस मामले मे माननीय  जबलपुर हाई कोर्ट मे WP 8339/2016 दायर कर अधिकारियों को ऐसा निर्णय लेने पर मजबूर कर दिया।


Monday, August 8, 2016

माँ तो माँ होती है पगले - प्रगति पटेल नरसिंहपुर


प्रगति पटेल "अंशु" -आज  सबेरे सबेरे हमारे बगल में रहने वाले कक्का जी जो सभी समाचारों पर पैनी नजर रखते हैं अचानक आ गये और पूछने लगे कि ये संतान पालन अवकाश का क्या चक्कर है बड़ी खबरें आ रही हैं ।
हमने बताया- कि ये ऐसा अवकाश है जो महिला अध्यापकों को छोड़ कर सभी विभाग की महिला कर्मचारियों को दिया गया है जिसमें  वह अपने 18 साल की आयु के बच्चों की देखभाल के लिए 2 वर्ष के लिए ले सकती हैं ।
कक्का जी कुछ सोचते हुए बोले-क्यों क्या अध्यापक महिलाओं के बच्चे अन्य से अलग है या शासन अध्यापक महिलाओं के बच्चों के लिए स्कूलों  में  कोई नयी केयरिग व्यवस्था शुरू करने जा रही है।
हमने कहा- ऐसा नहीं है ।
कक्का जी बोले-ऐसा नहीं है तो क्यों यह भेदभाव वैसे भी अध्यापकों को वेतन भी इतना नहीं मिलता कि वह बच्चों की देखभाल के लिए किसी को रख सकें ।
हमने कहा -शासन हम लोगों को पात्र नहीं समझती।
कक्का जी बोले-क्यों नहीं है पात्र जब हम अपात्रो को विधायक सांसद और सी एम बना सकते हैं तो इस  अवकाश की पात्रतासभी महिला कर्मचारियों को होनी चाहिए ।
हमने कहा-हां सही है इसलिए तो हम सभी प्रयास रत हैं कि हमें भी यह अवकाश मिले ।
कक्का जी बोले - करते रहो प्रयास मिलेगा जरुर क्योंकि यह आदेश निकालने वालों को भी तो एक माँ ने ही जन्म दिया होगा तो उन्हें समझ में जरुर आयेगा - मां तो माँ होती है पगले।
लेखिका स्वयं अध्यापक है एवं यह  इनके निजी विचार है ।

Thursday, August 4, 2016

"शिक्षक दिवस 2016" के उपलक्ष्य मे विभिन्न कार्यक्रमो का आयोजन करने के सम्बन्ध में निर्देश जारी ,अध्यापक साथी अधिक संख्या में इन कार्यक्रमो में भाग लेवे

"शिक्षक दिवस 5 सितम्बर 2016" के उपलक्ष्य मे विभिन्न कार्यक्रमो का आयोजन करने के सम्बन्ध में निर्देश जारी किये गए है ,शिक्षा विभाग विभिन्न प्रतियोगिताएं करवा रहा है ,सभी अध्यापक साथी अधिक  संख्या में इन कार्यक्रमो में भाग लेवे जिस से ,समाज में यह सन्देश जाए की अध्यापक संवर्ग अपने क्षेत्र  में  पारंगत है और उत्कृष्ट सेवा प्रदान कर अच्छे समाज  का निर्माण कर  रहा है।
पीडीएफ में आदेश प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें






Wednesday, August 3, 2016

माँ होकर भी, ममता से क्यो वंचित ? - '' कविता '' सुनिल भारी (कन्नौद)


मप्र शासन मे " चाइल्ड केयर लीव " के लाभ से वंचित शिक्षिकाओ (अध्यापक बहनो)की मनोदशा को दर्शाती कन्नौद, जिला देवास के ,अध्यापक कवि सुनिल भारी की  एक रचना....
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शिक्षिका की ममता , खुद की गाथा यूं कहती है,
माँ होकर भी, ममता से क्यो वंचित रहती है,
जो कर्तव्य की प्रतिमा सी,शिक्षक धर्म निभाती है,
नन्हे लाल को पलने मे सुलाकर विद्यालय जाती है
कैसे निष्ठुर बन जाती ,छोड़कर अपने लाल को,
किस हाल मे होगा,सोचा करती अपने गोपाल को,
चिंता करती, कितना जागा कितना सोया होगा,
कब प्यास लगी होगी, कितनी बार वह रोया होगा,
रोते रोते सोया, वह पलना शायद ही सूखा होगा,
मध्याह्न भोजन यहाँ , वह वहां भूखा ही होगा,
वह शिक्षिका है, राष्ट्रनिर्मात्री भी कहलाती है,
बेटे को याद करते, अक्सर आँखे भर जाती है,
ममता से गहरा सागर क्या, ऊँचा आकाश नही,
क्यो शिक्षिका को चाइल्डकेयर अवकाश नही,
पूरा हक दो पालनपोषण का,खुद के लाल का,
जरूर मिले, चाइल्ड केयर लीव दो साल का,
यह एक अनमोल तोहफा दे दो, सुनो जी सरकार,
राखी पर बहिना को दे दो यह सुंदर सा उपहार,
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सुनिल भारी (कन्नौद)
जिला देवास,मप्र

9098004500


Tuesday, August 2, 2016

NSDL (अध्यापक संवर्ग ) के कार्य के लिए नियम एवं समय सीमा तय की जा रही हैं -सूत्र

NSDL .मामले में हाईकौर्ट में लगाये केस  का कुछ असर होता नजर  आ रहा है शिक्षा विभाग में पदस्थ ,सूत्रों  के अनुसार .DDO स्तर से पैसा सीधे NSDL में भेजने की  तैयारी चल रही। लोक शिक्षण संचालनालय  जल्द ही  400  करोड़ NSDL में जमा करने जा रहा है हालाकि 668  करोड़ जमा होना है। मृत्यु के  प्रकरण में अंतिम भुगतान के आवेदन  भी जिला स्तर से ही ऑनलाइन होंगे और आपत्ति  लगने पर सीधे जिला स्तर पर ही जानकारी मिल सकेगी और निराकरण हो सकेगा । जानकारी के लिए बता दे कि इस मामले पर राज्य अध्यापक संघ के जिला शाखा मण्डला अध्यक्ष डीके सिंगौर द्वारा माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर में याचिका दायर की गई थी। याचिका क्र डब्लू.पी. 8339/2016 पर 10 मई को माननीय न्यायाधिपति राजेन्द्र मेनन की कोर्ट में सुनवाई हुईं।

       राज्य अध्यापक संघ की ओर से एडव्होकेट रोहित सोहगोरा ने पैरवी करते हुये कोर्ट को बताया कि अध्यापक सवंर्ग के लिये लागू अंशदायी पेंशन योजना के अंतर्गत प्रतिमाह 10 प्रतिशत राशि अध्यापकों के खाते से काटकर और उतनी ही राशि शासन द्वारा मिलाकर कुल वेतन की 20 प्रतिशत राशि प्रतिमाह नियमित रूप से एनएसडीएल में जमा करने का प्रावधान है लेकिन 15 माह से अध्यापकों का अंशदान एनएसडीएल में जमा नहीं हुआ है।सभी 8 प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुये 6 सप्ताह के अंदर जवाब पेश करने को कहा है। जिला शाखा अध्यक्ष डी.के.सिंगौर ने बताया कि संघ रिज्वाइंडर फाइल कर गुमशुदा कटोत्रा के समायोजन पर भी वित्त विभाग के प्रावधान के अनुसार ब्याज जमा कराने की मांग की थी। याचिका की में इसी सप्ताह सुनवाई हो सकती है।   शिक्षा विभाग इस सम्बन्ध में नियम और समय सिमा निर्धारित कर  रहा है।  विभागीय सूत्रों के अनुसार  कोर्ट में जवाब देने के पहले नियम बना दिए जाएंगे ।
    विदित रहे
 नियम और समय सिमा  नियमित कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए तय की गयी है ऐसे ही नियम अध्यापक संवर्ग के लिए भी बनाये जा सकते हैं। 








प्राधानाध्यापक एवं प्राचार्य द्वारा दो कालखण्ड अध्यापन करवाने विषयक

प्राधानाध्यापक (प्राथमिक/ माध्यमिक शाला ) एवं प्राचार्य ( हाईस्कूल / हायर सेकेण्ड्री स्कूल ) द्वारा दो कालखण्ड अध्यापन करवाने  विषयक ,आदेश पुनः जारी कर दिया गया है
आदेश की पीडीएफ कॉपी प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करे।



2 अगस्त काे फिर मंत्रालय में वार्ता में सम्मिलित होने से पहले अध्यापक हित में अपने प्रस्ताव तो सार्वजनिक करें

जो साथी 25 जुलाई की तारीख से कह रहे हैं कि प्रशासनिक अधिकारियों से उनकी वार्ता सफल हुई है ।और प्रस्ताव उनके मन मुक़ाबिक ही बना कर भेजा गया है ।वे कल 2 अगस्त काे फिर मंत्रालय में वार्ता में सम्मिलित होने से पहले अध्यापक हित में अपने प्रस्ताव तो सार्वजनिक करें।साथ ही कल वार्ता में सम्मिलित होने वाले सभी वार्ताकार इस बात का ध्यान रखें कि यदि 2007 से 2 वेतन वृर्द्धि लगाकर (1998 में नियुक्त साथियो की ) 6टवा वेतन मान की गणना नहीं की गयी और 1 सितम्बर 2013 को सेवा पुस्तिका में दर्ज हो भले ही नगद लाभ 1 जनवरी 2016 से मिले । यह नहीं मिले तो सभी वार्ताकार कल एक का काम करें की अन्य कुछ भी लेकर न आएं। एक काम कर लेवे , अंतरिम राहत में। सुधार करवा लें और 2013 के आदेश अनुसार 2017 में ही वेतन मान स्वीकार कर लें ।में मेरे गणना पत्रक भी सार्वजनिक कर रहा हूँ इसमें 119 प्रतिशत महंगाई भत्ते से गणना कि गयी है । 1 जनवरी 2016 को यह मिलना चाहिए ।अन्यथा कुछ भी हमें स्वीकार्य नहीं ।आप सभी जानते है यदि अंतरिम राहत में सुधार होता है तो सहायक अध्यापक जो 4700,4800,5000 का लाभ ,वरिष्ठ अध्यापक को 3350,3550,3750 का लाभ होगा और अध्यापक को2050, 2250,2600 का लांभ होगा ।सभी साथी समझें तत्काल लांभ की अपेक्षा लंबे समय में मिलने वाला लांभ की तरफ देखना चाहिये ।सुरेश यादव रतलाम एक आम अध्यापक । 9926809650




छात्रवृत्ति के आहरण एवं संवितरण अधिकार विकासखंड शिक्षा अधिकारीयों को स्थानांतरित करने विषयक

समेकित छात्रवृत्ति योजना अंतर्गत आहरण एवं संवितरण अधिकार विकासखंड शिक्षा अधिकारीयों को स्थानांतरित करने विषयक आदेश जारी
आदेश पीडीऍफ़ में देखने के लिए इस लिंक को ओपन करें



राज्य अध्यापक संघ मंडला की मांग ,शिक्षको के नाम बिना जांच के सार्वजानिक न करें

मंडला - शुक्रवार को राज्य अध्यापक संघ के पदाधिकारी जिला शाखा अध्यक्ष डी.के.सिंगौर की अगुवाई में कलेक्टर मण्डला श्रीमति प्रीति मैथिल से मुलाकात की और बताया कि लापरवाह शिक्षकों की शिकायत आम जनता द्वारा आपके दूरभाष में करने के प्रावधान के चलते बिना जांच के और बिना दोष सिद्ध हुये ही शिक्षकों के नाम समाचार पत्र और सोशल मीडिया में प्रकाशित और प्रसारित किये जा रहे हैं जो कि अनुचित है। 
राज्य अध्यापक संघ को प्रशासन के इस निर्णय से आपत्ति नहीं है, लेकिन जब तक जांच न हो और दोष सिद्ध न हो शिक्षक अध्यापक का नाम समाचार पत्रों में प्रकाशित नहीं होना चाहिये क्योंकि कई मामलों में शिक्षक निर्दोष भी रहते हैं। आपसी रंजिश, द्वैषता और अनुचित लाभ नहीं मिलने आदि के कारण भी लोगों के द्वारा शिक्षकों की शिकायत कर दी जाती है। सोशल मीडिया के चलते भी निर्दोष शिक्षक का बहुत ज्यादा दुष्प्रचार हो जाता है। 

कलेक्टर को अवगत कराया गया कि नैझर में पदस्थ अध्यापक चरण लाल झारिया के मामले में ऐसा ही हुआ है अतिथि शिक्षक नहीं रखे जाने पर ग्राम के व्यक्ति द्वारा झूठी शिकायत की गई और उसका नाम समाचार पत्रों और फेसबुक में समाचार प्रसारित किया गया। कलेक्टर ने संघ के तर्क से सहमत होते हुये कहा कि पहले तो समाचार पत्र और सोशल मीडिया में नाम देने का कोई निर्देश नहीं दिया गया है और यदि ऐसा हुआ है तो अब बिना जांच और दोष सिद्व हुये नाम प्रचारित नहीं किया जायेगा। 

संघ ने फ्लेक्स में महिला शिक्षिकाओं के मोबाइल नम्बर न लिखे जाने केे आग्रह को अस्वीकार कर दिया। संघ ने मण्डला में बच्चों को यूनिफार्म वितरण का मुद्दा भी उठाया। कलेक्टर ने वितरित की जाने वाली यूनिफार्म का सेम्पल मंगाया है। कलेक्टर ने अध्यापकों से कई मुद्दो पर चर्चा की और बच्चों की पढ़ाई की ओर जोर देने हेतु निर्देशित किया। प्रतिनिधि मण्डल में डी.के.सिंगौर,राकेश चौरसिया, प्रकाश सिंगौर, सुनील नामदेव,राजकुमार रजक,मंशाराम झारिया, चंद्रशेखर तिवारी लखन शुक्ला,बंसंत मिश्रा,श्याम सिंगरौरे,मोनू विश्वकर्मा,हरिलाल वरकडे़,ओमकार सिंह थे। 

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Thursday, September 15, 2016

युक्तियुक्त करन करने के लिए समय सारणी जारी की गयी

शालाओं में स्‍वीकृत शैक्षणिक पदों के अनुरूप पदस्‍थापना सुनिश्चित करने के लिए नयी समय सारणी जारी की गयी है शालाओं में स्‍वीकृत शैक्षणिक पदों के अनुरूप पदस्‍थापना सुनिश्चित करने के लिए नयी समय सारणी जारी की गयी है
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अध्‍यापक संवर्ग में कार्यरत सेवकों के ऑनलाईन अंतर्निकाय संविलियन हेतु एज्‍यूकेशन पोर्टल अपडेट कराये जाने के संबंध

वर्ष 2016 में अध्‍यापक संवर्ग में कार्यरत सेवकों के ऑनलाईन अंतर्निकाय संविलियन हेतु एज्‍यूकेशन पोर्टल अपडेट कराये जाने के संबंध में आदेश जारी किया  गया है इसे अपडेट करने के पश्चात् आज पालन प्रतिवेदन माँगा गया है। ग्रामीण क्षेत्र के सहायक अध्यापक के नियुक्ति अधिकार अब  जिला पंचायत  को देने से ,उनका निकाय जिला पंचायत हो गया है।

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Sunday, September 11, 2016

'इस देश के शिक्षकों को पांच सितंबर को सम्मान करवाने से इंकार कर देना चाहिए' - बी बी सी हिंदी

5 सितंबर को शिक्षक दिवस के मौके पर देश भर में गुरुजनों और शिक्षकों को याद किया जा रहा है।  दिल्ली समेत कई जगहों पर शिक्षकों को सम्मानित किया जा रहा है, सोशल मीडिया पर अपने स्कूल और कॉलेज के शिक्षकों को याद करते हुए पोस्ट लिखी जा रही हैं, कइयों में अपने शिक्षक की तस्वीर को साझा भी किया जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच कई लोग ऐसे भी हैं जो इस विशेष दिन का इस्तेमाल शिक्षकों की बदहाली पर ध्यान खींचने के लिए कर रहे हैं।

हिंदी अखबार दैनिक जागरण में छपी खबर के अनुसार उत्तराखंड के अल्मोड़ा में त्रिस्तरीय व्यवस्था लागू नहीं होने की मांग को लेकर वहां के शिक्षकों ने शिक्षक दिवस का बहिष्कार किया है।  वहीं बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक पटना में करीब चार लाख नियोजित शिक्षक महीनों-महीनों से वेतन न मिलने की शिकायत को लेकर शिक्षक दिवस के दिन 'शिक्षक अपमान दिवस' मना रहे हैं. अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने अपने संपादकीय में एक संविदा शिक्षक का राष्ट्रपति के नाम पत्र छापा है जिसमें लेखक ने उन हालात का जिक्र किया है जिसके तहत एक शिक्षक बनने का सपना लेकर चला व्यक्ति महज़ 'एड हॉक' बनकर रह जाता है।



शिक्षक दिवस के उत्सवी माहौल में इस तरह की बातें यकीनन स्वाद बिगाड़ सकती हैं लेकिन एक दिन के लिए शिक्षकों और गुरुओं की मौजूदा हालात से मुंह फेर लेने से भी।  वैसे इसी दिन के लिए हिंदी के दिग्गज व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई ने एक निबंध लिखा था जिसका शीर्षक था 'शिक्षक सम्मान से इंकार करें..' इस लेख में परसाई लिखते हैं कि किस तरह 5 सितंबर के मौके पर अलग अलग संस्थाएं और क्लब आदि रिटायर्ड शिक्षकों को ढूंढ ढूंढकर सम्मानित करते हैं.

इस निबंध के एक संपादित हिस्से में वह लिखते हैं 'देश में पांच सितंबर को शिक्षकों को सम्मानित करने का फैशन चल पड़ा है. राष्ट्रपति शिक्षकों को सम्मानित करते हैं तो यह भी सोचते हैं कि यह कार्यक्रम अच्छा रहेगा।  अखबारों में छपेगा. लोग जानेंगे कि हम गुरु की महिमा जानते हैं और उसका सम्मान भी करते हैं. आप समझ लीजिए कि अगर डाकुओं का इसी तरह शान से आत्मसमर्पण होता रहा और ऐसी ही गरिमापूर्ण फिल्में बनती रहीं तो आगे चलकर डाकू सम्राट मानसिंह का जन्मदिवस दस्यु दिवस के रूप में मनाया जाएगा।  मानसिंह अपने क्षेत्र में राधाकृष्णन से कम योग्य और सम्मानित नहीं था. फिर एक 'मिलावटी दिवस' होगा, 'कालाबाजारी दिवस', 'तस्करी दिवस', 'घूसखोर दिवस' होगा. शिक्षक दिवस तो इसलिए जबरदस्ती चल रहा है क्योंकि डॉ राधाकृष्णन राष्ट्रपति रहे. अगर वह सिर्फ महान अध्यापक मात्र रहे होते तो शिक्षक दिवस नहीं मनाया जाता.'



शिक्षकों की समस्याओं पर मानो हाथ रखते हुए इसी निबंध के एक और हिस्से में परसाई लिखते हैं 'पांच सितंबर शिक्षकों का अपमान दिवस है. झूठ है, पाखंड है. गरीब अध्यापक का उपहास है. प्रहसन है।  वेतन ठीक नहीं देंगे. सुभीते नहीं देंगे. सम्मान करके उल्लू बनाएंगे. इस देश के शिक्षकों को पांच सितंबर को सम्मान करवाने से इंकार कर देना चाहिए।  लोग बुलाएं तो शिक्षक कह दें हमें अपना सम्मान नहीं करवाना. आप जबरदस्ती करेंगे तो हम पुलिस में रिपोर्ट कर देंगे.'

दिलचस्प बात यह है कि परसाई द्वारा काफी पहले लिखा जा चुका यह लेख वर्तमान दौर में काफी प्रासंगिक है. देश के विकास में शिक्षकों से जुड़ी कई समस्याएं ज्यों की त्यों हैं. आगे उम्मीद ही की जा सकती है कि अाने वाले समय में परसाई का लिखा यह निबंध अप्रासंगिक होता चला जाए, तब तक झूठा ही सही 'हैप्पी टीचर्स डे'। ( स्त्रोत  बी बी सी  हिंदी ) 

स्कर्ट की लंबाई के भी मायने... नजरिया और नजरे बदलें - सुरेश यादव रतलाम

सदी उनको अपना महानायक मानती है. मेरे लिए महानायक से बढ़कर रहे हैं.  अभिनय की संस्था हैं. वन मैन इंडस्ट्री हैं. बॉलीवुड में नंबर-1 से नंबर-10 अमिताभ ही हैं. उनके बाद ही किसी का नंबर आता है.

"आई कैन टॉक इंग्लिश. आई कैन वॉक इंग्लिश..." के साथ हंसा.
"जब तक बैठने को नहीं कहा जाए तब तक खड़े रहो...." के साथ गुस्सा आया.
"मैं आज भी फेंके हुए पैसे नहीं लेता...." के साथ एटीट्यूड आया.
"हम जहां खड़े होते हैं लाइन वहीं से शुरू होती है....." के साथ दादागिरी आई.
"तुम लोग मुझे ढूंढ रहे हो और मैं तुम्हारा यहां इंतज़ार कर रहा हूं." से व्यवस्था से लड़ना सीखा.

जीवन के हर रंग को जितनी संजीदगी और सजीवता से अमिताभ ने ने पर्दे पर जिया है वह किसी और के वश की बात नहीं. आज 73 साल की उम्र में उनका जोश नौजवानों को मात दे रहा है.

 अमिताभ बच्चन ने अपनी पोती अराध्या और नातिन नव्या नवेली को सीख देती एक सार्वजनिक चिट्ठी लिखी है  

आप का पत्र  सार्वजानिक था तो सोचा अपनी बात भी माफ़ी के साथ कर ही दूँ 


इस बात से सहमत हूं कि स्कर्ट की लंबाई किसी का चरित्र मापने का पैमाना नहीं हो सकता. "पैमाना" भले ही न हो लेकिन स्कर्ट की लंबाई हमारे देश में "मायने" रखता है.... ज्यादा बहुत ज्यादा, "बच्चन", "नंदा", "गांधी", "अंबानी", या "बिरला" सरनेम के लिए स्कर्ट की लंबाई शायद मायने नहीं रखती हो क्योंकि यह समाज का प्रभावशाली वर्ग है. चौबीसों घंटे सुरक्षा घेरे में रहते हैं. लंबाई मापना तो दूर, गुस्ताख भी नहीं मिलेंगे जो आंख उठाकर इधर ताकें।  सही कहा है कि अराध्या और नव्या को "बच्चन" और "नंदा" सरनेम की विरासत को आगे ले जाने की जरूरत है।  क्योंकि यह उनके लिए सुरक्षा कवच का काम करेंगे। 

देश का मध्य वर्ग भी स्कर्ट की लंबाई को कम करना चाहता है. वह भी अपने लिए "आदर्शलोक" या "यूटोपिया" की कल्पना करता है. लेकिन वह डरता है. यहां आठ महीने की बेटियों के दरिंदे भी हैं और 60 साल की मांओं के भी, जो स्कर्ट तो छोड़िए निगाहों से कपड़ों से ढके तन में भी नग्नता ढूंढते हैं. देश की राजधानी से चंद किलोमीटर दूर कस्बों में "लोग क्या कहेंगे" का भय समाज और खासकर महिलाओं पर इतना भारी है कि "अपनी सोच और अपना फैसला" दिल में ही दम तोड़ देता है। 

नजरिए और निगाह में जब तक बदलाव नहीं आता तब तक...

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता.
यत्रेतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला क्रिया.

वेद में ही सीमित रह जाएगा. 


हालांकि साक्षी मलिक, गीता फोगट, दीपा कर्मकार, मैरी कॉम जैसी लड़कियां व्यवस्था की जंजीरों को तोड़कर आगे निकली हैं. समाज में सिर्फ सुरक्षित माहौल देकर देखिए, कैसे देश की तस्वीर बदल जाती है। 

ना नो मन तेल होगा न राधा नाचेगी (अध्यापक स्थानतरण नीति)-कृष्णा परमार रतलाम

  कृष्णा परमार रतलाम- सरकार द्वारा अध्यापकों के लिए नई स्थानांतरण नीति बनाई जा रही है लेकिन क्या यह भी पुरानी नीतियों की तरह ही दूर के ढोल साबित तो नहीं हो जाएगी, तबादले के लिए एक सॉफ्टवेयर तैयार किया गया है जिसमें एक निश्चित समय तय किया गया है ,अध्यापकों से अॉनलाईन आवेदन लिया जावेगा एवं एक निश्चित समय पर स्थानांतरण कर दिया जाएगा इसमें भी एक पेंच फंसा दिया गया है कि जिले के अधिकारी एक माह के भीतर एनओसी देंगे और अगर नहीं दी गई तो यह मान लिया जाएगा कि इस बारे में जिले के अधिकारियों को कुछ नहीं कहना एक माह में एनओसी ना देने पर अधिकारियों से केवल जवाब तलब किया जावेगा ,जी हां केवल जवाब तलब किया जावेगा जबकि इसके विपरीत अध्यापक यदि पदस्थापना पर ज्वाईन नहीं होता है तो उसके विरुद्ध कार्यवाही का प्रावधान है तो क्या यह समझा जाए कि दोषी केवल अध्यापक ही है अधिकारी नहीं ?
          चलो छोड़ो अब यह तो हुई उन अध्यापकों के दिल को तसल्ली देने वाली बात जो कई वर्षों से स्थानांतरण नीति का इंतजार कर रहे हैं अपने घर जाने के लिए क्योंकि कुछ नहीं तो उन लोगों को कम से कम यह खबर कुछ तो राहत दिलाएगी कि शायद अबकि बार हम घर जा सकेंगे ।
         अब सिक्के के दूसरे पहलू पर आते हैं एक खबर और भी है स्कूल में अच्छे नंबर लाओ मनचाही जगह ट्रांसफर पाओ इस अब इसके अंतर्गत अध्यापकों को 10 प्रश्नों के सही जवाब देना होंगे अगर आपने एक भी सवाल का जवाब गलत दिया तो आप का स्थानांतरण अधर में लटका माना जाएगा और फिर एक बात और भी है आपके प्रश्नों की जांच वही अधिकारी करेंगे जिन्होंने यह स्थानांतरण निति बनाई है मतलब सब कुछ उन्हीं के हाथ में इसका सीधा साधा मतलब आप यह निकाल सकते हैं कि " ना तो नो मन तेल होगा ना राधा नाचेगी " जब की स्थानांतरण नीति में सर्वप्रथम होना यह चाहिए कि सभी अध्यापक जो वर्षों से अपने घर से दूर हैं उन्हें सबसे पहले अपने गृह जिले में स्थानांतरण का अवसर प्रदान किया जावे चाहे वह महिला हो विकलांग हो या सामान्य पुरुष हो कोई भी हो उसके बाद सरकार जैसा भी खेल स्थानांतरण नीति के अंतर्गत खेलना चाहे खेल सकती है। (लेखक स्वयं अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार है ।)

Saturday, September 10, 2016

संघर्ष के सही रास्ते की तलाश में अध्यापक - वासुदेव शर्मा (छिंदवाड़ा)


वासुदेव शर्मा-बीते दिनों अस्तित्व में आई अध्यापक संघर्ष समिति भले ही अध्यापकों में उत्साह पैदा करने में कामयाब नहीं हुई हो, लेकिन इसके बाद अध्यापकों ने सोशल मीडिया के जरिए संघर्ष के सही रास्ते की तलाश जरूर शुरू कर दी है। अध्यापक संगठनों के बीच एकता कायम करने के लिए हुई बैठक जब एकता तक नहीं पहुंची, तब अध्यापकों में नाराजगी सामने आई। इस बार उनके निशाने पर सीधे सरकार और उनके समर्थक रहे।  एकता में बाधक कौन है? इस पर सोशल मीडिया में चले मंथन के बाद यह निष्कर्ष निकला कि इसके लिए सरकार और उसके समर्थक संगठन तथा उनसे जुड़े लोग जिम्मेदार हैं, इसीलिए पहला निर्णय यह हुआ कि संघर्ष शुरू करने से पहले सरकार के आस-पास दिखने वालों से दूरी बनाई जाए। दूसरे, राज्य कर्मचारी संघ, बीएमएस जैसे सरकार समर्थक संगठनों की छत्रछाया से अध्यापकों की एकता बचाया जाए। यानि अध्यापक उन सबसे सतर्क रहना चाहते हैं जो संघर्ष की धार को भोथरा कर सकते हैं।  इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि वे संघर्ष के सही रास्ते की तलाश में हैं, जो उन्हें संघर्ष करने वाली ताकतों के आस-पास पहुंचकर ही मिल सकता है। अध्यापकों के बीच जिलों में काम कर रहे नेता मानते हैं कि पहले भी तभी जीते थे, जब संघर्ष करने वाले लोग साथ थे और आगे भी तभी जीतेंगे, जब वे लोग साथ होंगे।
सोशल मीडिया पर ही आगामी रणनीति के तौर पर जो सहमति बनती नजर आ रही है, उसमें अध्यापकों की ओर से ही दो दिवसीय प्रशिक्षण शिविर करने की बात सामने आ रही है, जिसमें प्रदेश भर से चुनिंदा 400 अध्यापक नेताओं को बुलाया जाए। प्रशिक्षण शिविर के लिए अध्यापक नेताओं का चयन संगठनों से ऊपर उठकर सभी संगठनों के बीच से हो। प्रशिक्षण शिविर में देश के ख्याति प्राप्त शिक्षाविदों एवं ट्रेड यूनियन
जानकारों को बुलाया जाए, कुछ नाम भी चर्चा में आए हैं, जिनका जिक्र अगली पोस्ट में। सोशल मीडिया पर सुनाई दे रही इस तरह की चर्चा, सरकार को यह बताने के लिए काफी है कि इस बार अध्यापक संघर्ष के मैदान में निहत्था नहीं उतरेगा। सोशल मीडिया पर अध्यापकों के बीच पनपी रही यह एकता कहां तक पहुंचती, यह तो आने वाले दिनों में तय हो पाएगा, फिलहाल इतना ही पर्याप्त है कि 20 साल का अन्याय सहते-सहते अध्यापक ने हर तरफ सोचना शुरू कर दिया है यानि वह अपना रास्ता खुद बनाने के लिए तैयार हो रहा है।लेखक वरिष्ठ पत्रकार है और यह उनके निजी विचार हैं।

"शासकीय शालाओ को एक ईमानदार और समर्पित अध्यापक टीम की दरकार है "- राशी राठोर देवास


राशी राठोर देवास -हाल ही मै कई विद्यालय बन्द कर उनका सिंविलियन समीपस्थ शाला मै कर दिया गया है व बहुत सी शाला बंद होने की कगार पर है। इस अति संवेदनशील मामले पर हर अध्यापक को अब जागने की आवश्यकता है। कही ना कही हमे अपने अन्तर्मन मै झाकने की आवश्यकता है।
      संसाधन और अध्यापक या अतिथिशिक्षक की व्यवस्था होने के बाद भी टाप करना तो दूर शासकीय शाला गुणवत्ता के मामले मै पासिंग नम्बर भी नही ला पा रही। जबकि सभी शासकीय शाला मै पदस्थ अध्यापक प्रतिस्पर्धा परीक्षा मै टाप करके ही आते है। आम के पेड मै आम ही लगते है, फिर कैसे इन प्रतिस्पर्धा प्रतियोगीताओ के विजेताओं से नयी प्रतिभाओ का सृजन नही हो पा रहा ? क्यों चले गये मेरी शाला छोडकर छात्र?? इस प्रश्न पर हर अध्यापक विचार करे ।सतत व्यापक मुल्यांकन, दक्षता संवर्धन, बेसलाइन, प्रतिभा पर्व सब मिलकर भी शाला मै प्रतिभाओं का सृजन नही कर पा रहे है। इसी तारतम्य मै अब शाला सिद्धी योजना जोड दी गयी है। निश्चित हि शाला सिद्धी योजना मै एक ईमानदार अध्यापक की आत्मा बसती है। लाखो अध्यापक-प्रशिक्षण , हजारो कार्यशाला, अनगिनत बैठक और अनाप-शनाप आर्थिक नुकसान सिर्फ इस प्रश्न का हल खोजने मै लगा है की शासकीय शाला मै ऐसा क्या -क्या करे हो की यहाँ के छात्र अन्य विद्यालय मै  ना जाये ?? सरकार इस समस्या के हल से भी अनभिज्ञ नही है, पर हल करना ही नही चाहती है। शाला सिद्धी योजना का प्रशिक्षण लेते समय एक विडियो दिखाया गया । इस विडियो मै बताया गया की एक शासकीर शाला मै ,मात्र एक अध्यापक, किराये के भवन मै कुल 5 कक्षाओ को एक साथ बहुत ही सुनियोजित तरीके से सभी संसाधनो के आभाव मै पढा रहे थे। प्रशिक्षण मै बताया गया की ऐसे ही टीएलएम से हम भी अपनी शाला मै पढाये, किन्तु वास्तव मै तो इस विडियो ने कुछ और ही संदेश दिया।वह यह कीइस विडियो की तरह एक ईमानदार अध्यापक हर शाला मै पदस्थ कर दिजिये, तो शासकीय शाला फिर से बच्चों से खचाखच भर जायेगी। इस बार गैरशैक्षणिक कार्य मै लिप्त रहने की विवशता भी नही है क्योकि हर शाला मै छात्र अनुपात मै अतीथी शिक्षक उपलब्ध है।कार्यशाला ,प्रशिक्षण,गोष्ठी, सब कुछ अध्यापकों को मानसिक रूप तैयार व प्रेरित करने हेतु आयोजित किये जाये। एक प्रेरित अध्यापक खुद अपनी अध्यापन विधी बना के वो सब कुछ कर दिखायेगा जो की अब तक  दिवास्वप्न मै था। जब शैतान इन्सान का माइन्ड वाश करके उसे आतंकवादी तक बना सकता है तो सरकार आम अध्यापक को बेहतर प्रबन्धन और शिक्षण हेतु प्रेरित तक नही कर सकती ?? करोडो रूपये प्रशिक्षण के नाम पर फूंकने की जगह हर शाला मै एक ईमानदार और समर्पित अध्यापको की टीम तैनात कर दी जाये तो शासकीय शाला के उजडते चमन मै फिर से बहार आ जायेगीं।
"आओ शाला और खुद के
को बचाने की बात करे
इस बार सफलता मिलने तक
प्रयास करे "

लेखिका स्वय अध्यापक है और यह  उनके निजी विचार हैं .

आदिवासी जिलों के 323 विद्याथी जे.ई.ई. और नीट परीक्षा में हुए कामयाब मण्डला जिले के 3 बैगा विद्यार्थी का नीट में चयन

यह आश्चयर्जनक परन्तु सत्य है कि मध्यप्रदेश में सरकारी स्कूलों में पढ़ते हुए, आर्थिक अभाव से जूझते हुए प्रदेश के 20 आदिवासी बहुल जिलों के 323 विद्यार्थियों ने इस वर्ष जे.ई.ई. और एम्स, ए.आई.पी.एम.टी. और ए.आई.पी.एम.टी. (नीट) में सफलता हासिल की है। इसका उल्लेखनीय पक्ष यह है कि मण्डला, झाबुआ, धार और छिन्दवाड़ा जिले के 155 आदिवासी बच्चे इन परीक्षाओं में सफल हुए। मण्डला जिले के विशेष पिछड़ी जनजाति बैगा के 3 छात्र-छात्रा ने ए.आई.पी.एम.टी. (नीट) की परीक्षा उत्तीर्ण की। इन तीनों बच्चों के परिवार मजदूर वर्ग से हैं।
सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाकर और आरक्षित वर्ग के विद्यार्थियों के लिये की गयी विशेष शिक्षण व्यवस्था से यह परिणाम हासिल हुए हैं। वर्ष 2016-17 में जे.ई.ई. की परीक्षा में 250 छात्र-छात्राएँ सफल हुए और एआइपीएमटी (नीट) 73 विद्यार्थी ने सफलता हासिल की। इनमें 21 अनुसूचित-जनजाति के विद्यार्थी का आई.आई.टी. के लिये तथा शेष का एन.आई.टी. और अन्य प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग कॉलेज में चयन हुआ। ए.आई.पी.एम.टी. (नीट) में सफल 73 में से 55 विद्यार्थी अनुसूचित जनजाति वर्ग के हैं। इसके पहले वर्ष 2015-16 में आरक्षित वर्ग के 153 छात्र-छात्रा इन परीक्षाओं में सफल हुए थे।
आदिवासी वर्ग के इन विद्यार्थियों की सफलता ने साबित कर दिया है कि मध्यप्रदेश के पिछड़े, आदिवासी और अंदरूनी क्षेत्रों में भी शिक्षा का प्रकाश फैल रहा है। वहाँ बच्चे शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं। इसी के अनुरूप सरकार भी उन्हें आवश्यक सुविधाएँ और मदद उपलब्ध करवा रही है, जिसके चलते उनकी प्रतिभा परवान चढ़ रही है और राज्य सरकार के शिक्षा व्यवस्था सुधार के प्रयासों को पंख मिल रहे हैं।
मध्यप्रदेश सरकार ने
आईआईटी/जेईई (मेन्स) प्रवेश परीक्षा के चयन में आदिवासी विद्यार्थियों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिये विभिन्न स्तर पर कई नवाचार और प्रयोग किये हैं। इन बच्चों को पढ़ाने के लिये अतिथि शिक्षकों के चयन में कड़े मापदंड निर्धारित किये गये हैं। उनके अध्यापन और परफार्मेंस का नियमित मूल्यांकन किया जाता है। विद्यार्थियों की विज्ञान विषय मे अभिरूचि पैदा हो और उन्हें विज्ञान के सिद्धांतों को समझने में आसानी हो, इसके लिये सभी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में भौतिक विज्ञान, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान के लिये प्रयोगशालाएँ स्थापित की गई हैं।
इसके अलावा बोर्ड परीक्षाओं की किताबों के साथ-साथ अन्य उच्च कोटि की संदर्भ पुस्तकों तथा प्रेक्टिस की व्यवस्था की गई। उच्चतर माध्यमिक विद्यालयों में पुस्तकालयों को अधिक सुदृढ़ बनाया गया। विद्यार्थियों को लायब्रेरी कार्ड जारी किये गये, जिससे वे लायब्रेरी की पुस्तकों का लाभ ले सकें। उन्हें विशेष रीडिंग मटेरियल भी उपलब्ध करवाया गया। राष्ट्रीय कोचिंग संस्थान FITJE, Fortune की अन्य परीक्षाओं में विद्यार्थियों को शामिल होने के अवसर उपलब्ध करवाकर नियमित अभ्यास करवाया गया। जिलों में किये गये प्रयासों की राज्य-स्तर पर निरंतर समीक्षा की गई। जिलों में अनेक नवाचार को प्रोत्साहित किया गया। इनमें मंडला जिले में 'नवरत्न' एवं 'ज्ञानार्जन' प्रोजेक्ट, डिंडोरी में 'आकांक्षा' प्रोजेक्ट, अनूपपुर जिले में 'प्रयास' तथा झाबुआ जिले में 'स्टेप' प्रोजेक्ट शामिल हैं। कलेक्टरों द्वारा चिन्हित विद्यार्थियों को प्रतिष्ठित कोचिंग संस्थानों में कोचिंग की सुविधा उपलब्ध करवायी गई।
मण्डला जिले में ज्ञानार्जन प्रोजेक्ट में पिछले दो वर्ष में 85 विद्यार्थी का जे.ई.ई. और नीट में चयन हुआ है। पिछले वर्ष यहाँ के एक विद्यार्थी का चयन आई.आई.टी. खड़गपुर के लिये हुआ। जिले के बैगा जनजाति के छात्र रामेश्वर ग्राम सिंगारपुर, योगेन्द्र कुमार धुर्वे और कु. रश्मि धुर्वे ग्राम घुघरी का नीट में सिलेक्शन हुआ है। इनके माता-पिता मजदूरी के सहारे अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। मण्डला जिले में शिक्षण व्यवस्था में गुणवत्ता सुधार के लिये विशेष प्रयास किये गये हैं। नौ विद्यालय का चयन कर उन्हें सेंटर फॉर एक्सीलेंस बनाकर और प्रोजेक्ट नवरत्न शुरू किया गया। इसके अंतर्गत समाज को जोड़ने के लिये शाला-मित्र बनाये गये, जिनके जरिये उत्कृष्ट विद्यालयों का जीर्णोद्धार कर वहाँ बेहतर से बेहतर शिक्षण व्यवस्था की गयी।
शाला मित्र में जिले के सांसद, विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष, सदस्य, नगरपालिका के अध्यक्ष एवं विकासखण्ड स्तर के अधिकारी-कर्मचारी और शिक्षकों ने एक-एक दिन का वेतन दिया। साथ ही जिले के नागरिक, व्यवसायी और कान्ट्रेक्टर भी शाला-मित्र बनकर शिक्षा में उत्कृष्टता लाने में सहयोग दे रहे हैं।

Monday, September 5, 2016

रतलाम में अध्यापको ने शिक्षक दिवस पर डॉ राधाकृष्णन की प्रतिमा को ज्ञापन सौंपा और पूर्ण शिक्षक बनने का संकल्प लिया

राज्य अध्यापक संघ रतलाम द्वारा  शिक्षक दिवस की शाम को  डॉ राधाकृष्णन की प्रतिमा को ज्ञापन सौंपा और पूर्ण शिक्षक बनने का संकल्प  लिया । संघ द्वारा ज्ञापन में  प्रदेश  सरकार की नीतियों के द्वारा  शिक्षको की दुर्दशा उल्लेख किया गया था। इस अवसर पर जिलाध्यक्ष  डॉ मुनिद्र  दुबे ,प्रकाश शुक्ला ,रजनीश चौहान ,नरेंद्र सिंह पंवार ,मुकेश मालवीय ,निर्मल सिंह चौहान ,विजय पाण्डेय ,श्री शर्मा ,राजिव लवानिया और सुरेश यादव उपस्थित थे .। 

सरकार से एक लाख की सहायता लेने से इनकार करने वाली अध्यापक की बेवा को राज्य अध्यापक संघ ने एक लाख की सहायता प्रदान की

जगह जगह मनाये  जा  रहे  शिक्षक  दिवस  कार्यक्रमों के बीच  आज  मंडला में  अनुकम्पा नियुक्ति  के  बदले 1 लाख लेने  से  इंकार  करने वाली दिवंगत  अध्यापक श्री सुरेश दास सोनवानी की धर्मपत्नी श्रीमंती अमिरा सोनवानी  को  राज्य अध्यापक संघ  मंडला ने 1 लाख  रूपये  की  सहायता  राशि प्रदान की |
  श्रीमती सोनवानी को विभागीय अधिकारियों द्वारा  नियमो का हवाला देकर अनुकम्पा नियुक्ती देनें से  स्पष्ट मना  कर दिया गया था। विदित रहे श्रीमती सोनवानी ने रोते बिलखते वरिष्ठअधिकारियों से  कहा था की एक लाख में उनका गुजारा नही चल सकता ।
इस से क्षुब्ध होकर राज्य अध्यापक संघ ने अपने साथियों के माध्यम से 1लाख रूपये एकत्र कर के श्रीमति सोनवानी  को आज जिलाधीश मंडला कार्यालय के समक्ष श्रीमंती सोनवानी को सहायता प्रदान की गयी । .

शिवराज सिंह यह तो अन्याय की इंतिहा है ? - वासुदेव शर्मा (छिंदवाड़ा)


वासुदेव शर्मा (छिंदवाड़ा)-स्कूलों में पढ़ाने वाली इन बेटियों का गुनाह क्या है शिवराज सिंह, जो इनसे बंधुआ श्रमिकों जैसा सलूक किया जा रहा है। यह बेटियां आपसे ज्यादा पढ़ी लिखी हैं। इनकी आवाज में आपसे ज्यादा मिठास है। यह बेटियां अपनी-अपनी बस्तियों, स्कूलों में आपसे ज्यादा लोकप्रिय हैं। इनके चेहरों की मुस्कराहट बताती है कि यह खुशियां बांटने के लिए ही आई हैं।  यह बेटियां हर दिन 40, 50 या 100 किलोमीटर की मुश्किल यात्रा तय कर स्कूल पहुंचती हैं, तो आप समझ सकते हैं कि यह आपसे भी ज्यादा मेहनती और परिश्रमी हैं। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह केे गोद लिए जिला विदिशा की इन बेटियों की इस तस्वीर  के जरिए आपको यह बताना चाहते हैं कि प्रदेश में ऐसी बीसियों हजार बेटियां हैं, जिनसे  आप स्कूलों में काम लेे रहे हैं, लेकिन बदले में उतना भी नहीं दे रहे, जितना वे खर्च करके अपने-अपने स्कूल पहुंचती हैं। यह बेटियां आपके ही प्रदेश की अतिथि शिक्षक हैं। स्कूलों में यह व्यवस्था आपने ही शुरू की है। इसीलिए आपसे ही यह सवाल है कि आपको अपने ही प्रदेश के युवा मासूम बेटे-बेटियों को गुलाम या बंधुआ बनाने का अधिकार किसने दिया। आपको अतिथि शिक्षक की व्यवस्था बनानी ही थी, तो कम से कम उसमें यह प्रावधान तो किया ही जा सकता था कि इन्हें मप्र सरकार का घोषित न्यूनतम वेतन मिले तथा यह तब तक स्कूलों में पढ़ाएं जब तक स्कूल रहें। लेकिन आपने ऐसा कुछ नहीं किया?
     आपको याद दिला दें। आपसे से पहले दिग्विजय सिंह ने भी शिक्षाकर्मी के रूप में ऐसी ही व्यवस्था की थी। हालांकि तब की अटल बिहारी सरकार के स्पष्ट निर्देश थे कि सरकारी खर्चे कम करें, भले ही कर्मचारियों को नौकरी से निकालना पड़े। दिग्विजय सिंह ने ऐसा किया भी, लेकिन फिर भी उन्होंने शिक्षाकर्मी को निश्चित वेतन और काम की निरंतरता का अधिकार देकर ही नौकरी पर रखा। आपने तो अतिथि शिक्षकों के साथ ऐसा कुछ नहीं किया। अपने तो अपने ही प्रदेश के बेटे-बेटियों को ऐसे लालची अधिकारियों के हवाले कर दिया जो 50 से 70 हजार वेतन लेने के बाद भी मध्यान्ह भोजन के धनिया तक में कमीशन ले लेते थे। स्कूलों में बैठे यह अधिकारी अतिथि शिक्षकों को पीरियड के हिसाब से तय पारिश्रमिक का भुगतान ईमानदारी से करेंगे, ऐसा आपने कैसे सोच लिया था, जो इन्हें उनके रहमो करम पर छोड़़ दिया।    मुख्यमंत्रीजी आपकी सरकार अतिथि शिक्षकों के साथ जो सलूक कर रही है, वैसा सलूक कभी राजा-माराजे अपनी प्रजा गुलाम, बंधुआ बनाकर किया करते थे। यही बेटियां स्कूलों में बच्चों को पढ़ाती है कि इंसान को गुलाम और बंधुआ बनाने वाली व्यवस्था इतिहास के गर्त में जा चुकी है, इन्हें बच्चों को यह समझा दिया कि आप उस व्यवस्था को जिंदा कर रहे हैं, तब क्या होगा, कभी सोचा? यह बेटे-बेटियां, जिन्हें आप 5-7 हजार रुपए महीना नियमित नहीं दे सकते, उन्होंने स्कूलों में बच्चों को आपके बारे में पढ़ाने शुरू कर दिया, तब क्या होगा, जरा विचार कीजिए। इन्होंने बच्चों को बता दिया कि गांव के गरीब किसान का बेटा शिवराज जो कभी पैदल चला करता था, आज उनके पास नोट गिनने की मशीनें हैं, तब स्कूलों के बच्चे भी आपसे नफरत करने लगेंगे। इस स्थिति से बचना है, तो कम से कम अतिथि शिक्षकों के साथ न्याय कीजिए। वे सालों से   संघर्ष कर रहे हैं, साल में दो-चार बार भोपाल आते हैं, लेकिन आप इनसे मिलते तक नहीं है, यह भी तो ठीक नहीं।
जिस तरह शिक्षाकर्मी रखने वाले दिग्विजय सिंह राजनीति में हाशिए पर हैं, कहीं अतिथि शिक्षक रखकर आप भी राजनीतिक हाशिए पर न पहुंच जाएं, इससे बचने के लिए ही सही अतिथि शिक्षकों की सुनिए और उनसे बात कीजिए।आज उन्होंने शिक्षक दिवस का बहिष्कार किया है, कल कहीं आपका बहिष्कार कर दिया, तब क्या होगा? जरा सोचिए?(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और यह उनके निजी विचार हैं ।)


Saturday, September 3, 2016

विभिन्‍न माडल स्‍कूलों में शिक्षकों के रिक्‍त पदों पर स्‍थानीय स्‍तर से व्‍यवस्‍था के संबंध में

विभिन्‍न माडल स्‍कूलों में शिक्षकों के रिक्‍त पदों पर स्‍थानीय स्‍तर से व्‍यवस्‍था के संबंध में ,सभी जिलाधीश  से अनुरोध किया गया है ,पत्र  में कहा गया है की ,शिक्षकों की नियुक्तियां प्रक्रियाधीन हैं ,इस लिए मुख्यालय स्तर  पर निकटस्थ शालाओ में  कार्यरत ऐसे  शिक्षको को जिनके पास अपर्याप्त काम  है उन्हें मॉडल स्कुल में अध्यापन के लिए निर्देशित किया जाए । शिक्षको - अध्यापको को स्थानीय निधि से यात्रा व्यव भी प्रदान किया जा सकता है।
आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें



जिला एवं विकासखण्‍ड स्‍तर के 313 उ.मा.वि. में एन.एस.क्‍यू. एफ. योजना अंतर्गत व्‍यवसायिक शिक्षा पाठयक्रम के संबंध में शासन आदेश

  जिला एवं विकासखण्‍ड स्‍तर के 313 उ.मा.वि. में एन.एस.क्‍यू. एफ. योजना अंतर्गत व्‍यवसायिक शिक्षा पाठयक्रम प्रारम्भ करने के संबंध में शासन ने आदेश जारी किया  है।  इसमें कक्षा 9 और 10 में तृतीय  भाषा के स्थान पर व कक्षा 11 और 12 में द्वितीय भाषा के स्थान पर एक व्यवसायिक पाठ्यक्रम चयनित किया जा सकेगा ,कुल 9 व्यवसायिक पाठ्यक्रम प्रारम्भ किये जा रहे है इसमें प्रत्येक विद्यालय में केवल 2 पाठ्यक्रम  संचालित किये जाएंगे। पाठ्यक्रम इस प्रकार हैं  बैंकिंग एवं फायनेनशियल सर्विस ,ब्यूटी और  वेलनेस ,इलेक्ट्रिक टेक्नोलॉजी ,हेल्थ केयर ,आईटी-आइटिस ,फिजिकल एजुकेशन और स्पोर्ट्स ,रिटेल ,ट्रेवल और टूरिज्म ,सुरक्षा ।
     उक्त पाठ्यक्रम में 9 वि  में सफल होने पर नेशनल सर्टिफिकेट फॉर वर्क प्रिप्रियेशन लेवल 1 का प्रमाण पत्र ,10  वि  में सफल होने पर नेशनल सर्टिफिकेट फॉर वर्क प्रिप्रियेशन लेवल 2 का प्रमाण पत्र ,11 वि  में सफल होने पर नेशनल सर्टिफिकेट फॉर वर्क प्रिप्रियेशन लेवल 3  का प्रमाण पत्र ,
12 वि  में सफल होने पर नेशनल सर्टिफिकेट फॉर वर्क प्रिप्रियेशन लेवल 4  का प्रमाण पत्र ,प्रदान किया जाएगा आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें

                       





सहायक अध्यापक होंगे जिला पंचायत के कर्मचारी ,मध्यप्रदेश पंचायत अध्यापक संवर्ग (नियोजन एवं सेवा की शर्तें) नियम, 2008 में संशोधन 9 अगस्त 2016 से किया गया

मध्यप्रदेश पंचायत अध्यापक संवर्ग (नियोजन एवं सेवा की शर्तें) नियम, 2008 में संशोधन 9 अगस्त 2016 से किया गया ,इसके बाद सहायक  अध्यापक होंगे जिला  पंचायत के कर्मचारी  ।  प्रारूप का प्रकाशन 6 जनवरी 2016 को किया गया था , संशोधन 9 अगस्त 2016 को किया गया । इसके दूरगामी परिणाम सामने आएंगे ,सहायक अध्यापक का निकाय अब जिला पंचायत हो गया है अंतर निकाय संविलियन ( स्थांतरण )  होने से जिले के अंदर स्थान्तरण सम्भव नहीं होगा ,अन्य नियुक्तिकर्ता अधिकारी सत्र के कार्य भी जिला पंचायत से होंगे । राजपत्र की पीडीऍफ़ कॉपी प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें।

    

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर 2016-2017


 कलेंडर पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए निचे दी गयी लिंक को ओपन करें 


शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह जून 2016

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह जुलाई 2016

 शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह अगस्त 2016

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह सितम्बर 2016

 शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह अक्टूबर 2016

 शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह नवम्बर 2016

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह दिसम्बर 2016

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह जनवरी 2017

 शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह फरवरी 2017

 शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह मार्च 2017

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह अप्रैल 2017

शेक्षणिक सत्र का कैलेण्डर माह मई 2017




Friday, September 2, 2016

संवि‍दा शाला शि‍क्षकों की अध्‍यापक संवर्ग में नि‍युक्‍ति में विलम्ब को लेकर की जाने वाली समीक्षा


संवि‍दा शाला शि‍क्षकों की अध्‍यापक संवर्ग में नि‍युक्‍ति में विलम्ब  को लेकर की जाने वाली समीक्षा के आदेश 2010 में जारी किये गए थे हर माह की 5 और 25 तारीख को समीक्षा होनी है। यह आदेश आज भी प्रासंगिक है और लागु है।
आदेश की प्रति पीडीऍफ़ मे प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें

Thursday, September 1, 2016

2016 में अध्‍यापक संवर्ग में कार्यरत सेवकों के ऑनलाईन अंतर्निकाय संविलियन हेतु एजूकेशन पोर्टल अपडेट कराये जाने के संबंध में

वर्ष 2016 में अध्‍यापक संवर्ग में कार्यरत सेवकों के ऑनलाईन अंतर्निकाय संविलियन हेतु एजूकेशन पोर्टल अपडेट कराये जाने के संबंध में सभी जिलाधीश  को 30 जून 2016  को मेल किया गया था आदेश अब 1 सितम्बर 2016  को एजुकेशन पोर्टल पर सार्वजानिक किया गया है ।
आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें



Monday, August 15, 2016

आजादी का अहसास कराते हैं जनांदोलन-वासुदेव शर्मा छिन्दवाड़ा ( 70वें स्वतंत्रता दिवस पर ) गैर राजनीतिक ताकतों के आन्दोलन के संदर्भ में


आजादी का अहसास कराते हैं जनांदोलन
वासुदेव शर्मा छिन्दवाड़ा-जनता को गैरराजनीतिक ताकतों के इर्द-गिर्द संगठित करने की हो रही कोशिशें राजनीतिक ताकतों के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं। गैरराजनीतिक ताकतें समाज में राजनीतिक वातावरण को समाप्त करती हैं तथा जनांदोलनों को उभरने से रोकती हैं। इससे आगे जाकर यह ताकतें जनता के सवालों एवं आजादी के महत्व पर भी भ्रम फैलाने का काम करती हैं। यह ताकतें जनता के जरूरी सवालों को भी अपने अपने तरीके से परिभाषित कर कुतर्कों के जरिए यह बताने की कोशिश करती हैं कि जनता जिन परेशानियों का सामना कर रही है, उसके लिए वही जिम्मेदार है। यह ऐसा कुतर्क है, जो सरकार के जनविरोधी रवैए से ध्यान हटाने के लिए दिया जाता है। यह तर्क वे ताकतें अधिक देती हैं, जो खुद को गैरराजनीतिक कहती हैं। यह ताकतें ऐसा क्यों करती हैं? स्वतंत्रता दिवस के मौके पर हर किसी को इसे समझने की जरूरत है?

समाज में बढ़ रही असमानता, बेरोजगारी, गरीबी, दरिद्रता, ऊंच-नीच जैसी समस्याओं को राजनीतिक नजरिए से ही समझकर उनके समाधान तक पहुंचा जा सकता है। आजादी के बाद देश ने जो प्रगति की है, उसका श्रेय भारत की राजनीति को ही जाता है, फिर वह राजनीति भले ही विभिन्न विचारों से क्यों न संचालित होती रही हो। समाज में राजनीतिक वातावरण मौजूद रहता है, तब विभिन्न विचारधाराओं की राजनीति को उभरने के अवसर मिलते हैं। यह ऐसी स्थिति होती है, जो समाज के हर तबके को उसकी पसंद की राजनीति के चयन का अधिकार देती है। समाज में राजनीतिक वातावरण होता है, तब जनसंघर्षों, जनांदोलन की परिस्थितियां भी मौजूद रहती हैं और लोग खुद की बात को हुकूमतों तक पहुंचाने के लिए इसी रास्ते का सहारा लेते हैं। जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों का रास्ता, ऐसा रास्ता होता है, जो समाज को राजनीतिक शिक्षा देता है, विभिन्न विचारधाराओं की राजनीति को समझने का मौका उपलब्ध कराता है तथा जनता को अपनी पसंद की राजनीति के करीब पहुंचाता है।
       आजादी, जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों से ही हासिल हुई है, इसीलिए देश की प्रगति में इसके योगदान को नकारा नहीं जा सकता। जनता के संगठित संघषों की ही ताकत का परिणाम था कि अंग्रेजों की ताकतवर हुकमतों को भी अंत में यह अहसास हो गया था कि संगठित जनता की आवाज को कुचला नहीं जा सकता, इसीलिए अंग्रेजी हुकूमत दमन के तमाम हथियारों को डालकर जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों के आगे झुकी और देश छोड़कर जाने को मजबूर हुई। जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों ने ही भारत को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी दिए, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया।  जिस देश में  जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों का इतना बड़ा योगदान रहा हो, उस देश में गैरराजनीतिक ताकतों के बढ़ते बर्चस्व को हल्के में नहीं लेना चाहिए। गैरराजनीतिक ताकतें समाज का पहला नुकसान यही कर रही हैं कि वे जनांदोलनों के महत्व को समाप्त कर जनता को  संघर्ष के रास्ते पर चलने से रोक रही हैं। गैरराजनीतिक ताकतें ऐसा करने में सफल हुई, तब जनता से उसकी जुवान ही छिन जाएगी और वह चंद ताकतवर व्यक्तियों, नेताओं एवं अधिकारियों पर निर्भर हो जाएगी।  यह स्थिति गुलामी जैसी होगी, इसीलिए 69वें स्वतंत्रता दिवस पर जनता को इस स्थिति  से बचाने का संकल्प भी लेना होगा।
       चूंकि गैरराजनीतिक ताकतें समाज में अलग-अलग नामों से काम करती हैं। यह ताकतें समाज सेवा के नाम पर सरकार की तमाम योजनाओं को संचालित करते हुए खुद को स्थापित करने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी को ही समाज में अविश्वसनीय बनाने का काम करती हैं। यह ताकतें इतनी ताकतवर हो चुकी हैं कि वे राजनीतिक गतिविधियों को ठप्प कर देती हैं, अन्ना एवं रामदेव के आंदोलनों के दौरान ऐसा देखने में आया भी। गैरराजनीतिक ताकतें सांस्कृतिक संगठनों का चोला पहनकर भी जनता के बीच पहुंचती हैं, यह ताकतें जनता को उनके बुनियादी सवालों पर होने वाले संघर्षों से दूर कर सांस्कृतिक, धार्मिक आयोजनों की तरफ ले जाने का काम करती हैं, इसका नतीजा यह होता है कि जनता अपने जरूरी सवालों पर सोचने-विचारने की वजाय अपनी माली हालत के लिए अपने पिछले कर्मों का फल मानकर जिस हाल में है उसे अपनी नियत मानकर स्वीकार कर लेती है। जनता जिस हाल में है, उसी में जीती रही और इससे आगे न सोचे, गैर राजनीतिक ताकतें इसीके लिए काम करती हैं। जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों में जनता की कम होती भागीदारी, राजनीतिक कार्यक्रमों के प्रति उसकी बेरुखी बताती है कि गैरराजनीतिक ताकतों ने समाज के बहुमत हिस्से को निराशा में पहुंचा दिया है, जिस कारण जनता लोकतांत्रिक रास्ते से दूर होती जा रही है।
      सामाजिक असमानता, गरीबी, बेकारी, महंगाई ऐसे सवाल हैं, जिन्होंने जनता के बहुमत हिस्से को प्रभावित किया है। किसानों की माली हालत, बढ़ती बेरोजगारी, महंगी होती शिक्षा, महंगा होती स्वास्थ्य सुविधाएं, खाने-पीने की जरूरी चीजों का आए दिन महंगा होना, कर्मचारियों के बीच व्याप्त वेतनविसंगतियों की समस्याओं के लिए सीधे-सीधे सरकारें और उन सरकारों की नीतियां ही जिम्मेदार है, ऐसे में जब इन समस्याओं से दो-चार होते लोग इनके समाधान के रास्ते गैरराजनीतिक नजरिए से खोजेंगे, तब न तो समस्याओं के समाधान तक पहुंचा जा सकता है और न ही इन समस्याएं से मुक्ति मिल सकती हैं। जनता के हर तबके को प्रभावित कर रही इन समस्याओं के समाधान का रास्ता राजनीतिक रास्ते पर चलकर ही निकाला जा सकता है, इसके लिए जरूरी है कि जनता के बीच से जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों का निर्माण हो।  जनसंघर्षों एवं जनांदोलनों में बोले जाने वाली भाषा, लगाए जाने वाले नारे, संघर्षों के संगठनकर्ताओं की राजनीतिक विचारधारा को सामने लाते हैं, इस तरह जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों के जरिए जनता को विभिन्न विचारधाराओं की राजनीति को समझने का मौका मिलता है। कौनसी राजनीति उसके करीब है, यह समझने का  बेहतरीन मौका होते हैं जनांदोलनों। आज जब समाज का हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में सरकारों की नीतियों से असंतुष्ट हो, तब जनता के लिए जनांदोलनों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है क्योंकि इन्हीं जनांदोलनों से भारत की जनता को आजादी मिली और यही जनांदोलन जनता के जीवन को खुशहाल बनाने के रास्ते पर ले जाएंगे।  आईए; स्वतंत्रता दिवसे के मौके पर जनांदोलनों एवं जनसंघर्षों को विकसित करने का संकल्प लें।
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं (यह उनके निजी विचार हैं )

Friday, August 12, 2016

एक अध्यापक की जान की कीमत क्या एक लाख रूपये ही हे ?-अरविन्द रावल झबुआ

अरविन्द रावल-एक अध्यापक की जान की कीमत क्या एक लाख रूपये ही हे ? कुछ हमारे अध्यापक साथियो ने और शासन के लोगो के सहयोग से आज अध्यापक की जान की कीमत एक लाख रूपये तय वाला आदेश जारी हुआ हे। सरकार के इस आदेश के बाद मृत अध्यापक साथी के परिवार के लोगो  की अहर्ता नही होने की स्थिति में अनुकम्पा के नाम पर एक लाख रूपये देकर शासन इतिश्री कर लेगा। हमारे जिन साथियो ने एक लाख रूपये अनुकम्पा के नाम पर मृत अध्यापक के परिवार को देने का सुझाव शासन को दिया हे निश्चित ही उन लोगो को परिवार की पीड़ा क्या होती हे इसका एहसास नही होगा। अगर मेरे यह साथी शासन के लोगो को यह सुझाव देते की मृत अध्यापक के परिवार में यदि अहर्ता योग्य पात्र कोई व्यक्ति नही हे तो उन्हें शासन परिवार के लालन पालन हेतू पहले अनुकम्पा की तहत सविदा 3 के पद पर नोकरी दे और योग्य अहर्ता प्राप्त करने हेतू दो चार साल का टाइम पीरियड देने की बात प्रमुखता से रखना थी। यदि किसी मृत् अध्यापक परिवार में कोई अहर्ता प्राप्त करने में असमर्थ व्यक्ति हे तो सरकार उसे भृत्य के पद पर अनुकम्पा में नोकरी दे। ताकि मृत अध्यापक साथी के परिवार का सदस्य बहेतर ढंग से अपने परिवार का पालन कर सके।साथियो एक लाख रूपये में इस महँगाई के दौर में आज होता क्या हे ? एक लाख रूपये में न तो आज बच्चों की शिक्षा पूरी होती हे और न ही हाथ पीले किये जा सकते हे।  हमारे साथी खुद को अव्वल साबित करने के चक्कर में अपनों का ही बुरा करवा बेठे हे। इस आदेश का सभी साथियो को मिलकर विरोध करना चाहिए । हमें इसे निरस्त करवाकर मृत अध्यापक साथी के परिवार के पालन हेतु अहर्ता होने या न होने की स्थिति में किसी भी पद पर पर नोकरी दी जाये ऐसा आदेश जारी करवाने का प्रयास सामूहिक रूप से अब किया जाना चाहिए।अभी हम अध्यापको को सरकार से बहुत सारी लड़ाई लड़ना बाकी हे । आगामी दस पन्द्रह सालो के अंदर कोई एक लाख से ज्यादा अध्यापक  रिटायर हो जाने वाले हे। इसी तरह से दुक्डो में बिखर कर लड़ते रहेगे तो खाली हाथ घर लौटने के कुछ हासिल नही होगा। शासन से जो भी लड़ाई जितना हे तो हमारे पास दो चार सालो का वक्त ही हे। उसके बाद हम फिर कुछ करने की स्थिति में नही रहेगे। हमने टुकड़ो में बटकर रहने का परिणाम आज देख लिया इस आदेश को पाकर। कितने बड़े दुःख का विषय हे की हमारी ताकत देश की आधी आर्मी के बराबर होने के बाद भी हमे एक एक आदेश को निकलवाने में एक एक साल लग जाते हे और फिर उनकी विसंगतियो को सुधरवाने में इतना समय लगता हे तो हम पेंशन और  अन्य सुविधाओ की लड़ाई लड़ेंगे कब और उनको प्राप्त कब करेगे ?
अभी भी हमारे पास वक्त शेष हे यदि हम सभी अध्यापक नेता एकजुट हो जाये तो हम सरकार से अपनी शक्ति के बल पर सब कुछ पा सकते हे। इस समय अध्यापको को एक सशक्त दूरदर्शी नेतृत्त्व की आवश्यकता हे जो अध्यापक और उसके परिवार के उज्ज्वल भविष्य की सोच को लेकर कार्य करे।लेखक स्वयं  अध्यापक हैं और यह उनकी निजी राय है .           

Thursday, August 11, 2016

अर्जित अवकाश प्रदान कि‍ये जाने के संबंध में ,नियम 2008

ग्रीष्‍मावकाश में शासकीय कार्य कि‍ये जाने के एवज में अर्जित अवकाश प्रदान कि‍ये जाने के संबंध में ,नियम 2008 ,एक दिन काम करने के लिए एक दिन का अर्जित अवकाश अधिकतम  30 दिवस खाते में दर्ज किया जाएगा ,प्राप्त 10 अर्जित अवकाश के नकदीकरण की पात्रता समाप्त कर दी गयी। अर्जित अवकाश के नकदीकरण  की पात्रता अन्य कर्मचारियों के समान  कर दी गयी हैं । आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए आदेश की इस लिंक ओपन करें।






आम अध्यापक और अध्यापको के नेतृत्व से विनम्र अपील ,अब समस्या का समाधान आवश्यक है - सुरेश यदाव रतलाम


सुरेश यादव रतलाम - गत वर्ष सितम्बर माह में आंदोलन हुआ था ,तब से अब तक सिर्फ और सिर्फ सरकार ने अखबारों में अपनी वाह- वाही करवाई है की उसने अध्यापको को सामान वेतन दे दिया जबकि वास्तविकता क्या है आप सभी जानते हैं हम वँही के वँही हैं । अध्यापक निराश है उसके हाथ तो रीते ही हैं,कभी संवाद और कभी असंवाद धड़कनो को और बड़ा देता है । संपूर्ण अध्यापक  समाज भी वर्तमान में वेतन निर्धारण के लिए गणना पत्रक को लेकर आशंकित और चिंतित हैं।
      

  श्री भरत पटेल के नेतृत्व में 25 जुलाई 2016 को डीपीआई में अधिकारियों से चर्चा की गयी । तब भरत भाई की तरफ से कहा गया कि , वार्ता सफल रही है और हमारी मांग अनुसार ही प्रस्ताव बनाकर विभाग ,शासन को भेज देगा।  इसके बाद भरत पटेल जी के नेतृत्व में शिक्षा मंत्री से 3 अगस्त को वार्ता हुई उस दिन यह प्रचारित-प्रसारित  किया गया कि वार्ता असफल रही। सरकार ने तीन प्रस्ताव दिए लेकिन हमें मंजूर नहीं है ।      

 भारत भाई ,लेकिन सरकार के तीन प्रस्ताव हैं क्या ? अध्यापक हित में आवश्यक है की  आप तो कम से कम अपना प्रस्ताव  सार्वजनिक करें ,साथ ही सरकार के 3 प्रस्ताव भी सार्वजनिक करें । जिस से अध्यापक उन प्रस्तावों को देख सके , समझ सकें और प्रदेश के अध्यापको में आम राय बन सके। क्योकि अध्यापक की समस्या  सिर्फ 7440 +2400,9300+3200,10230+3600 मिल जाने भर  से हल नही  हो जायेगी ।       

 साथियो सरकार ने 1125.10 करोड़ रूपये का अतिरिक्त भार बताया है । उसमे 141.85 करोड़ रूपये वित्त वर्ष 15 -16 के लिए ,वित्त वर्ष 16-17 के लिए 704.40 करोड़ और वित्त वर्ष 17-18 के लिए 278.85 करोड़  स्वीकृत किये है ।सरकार ने 2016-17 और,2017-18 तक का आंकलन कर लिया है ।       

 2016 में 32500 संविदा शिक्षक अध्यापक बनेगे ,वंही 2017 में 12000 संविदा शिक्षक अध्यापक बनेगे ,(अनुत्तीर्ण गुरूजी सहित)। सरकार ने सम्भवतः 2017 तक सभी पर आने वाले व्यय का आंकलन कर लिया है 2017  में प्रदेश में 228500 अध्यापक होगे ।           

 ्तअब 3 अगस्त  के  बाद संवाद समाप्त हो गया लगता है । कोई रास्ता भी नजर नहीं आ रहा है ।लेकिन  इस परिदृश्य  में  साफ़ साफ़  नजर आ रहा है कि  ,अध्यापक अब  निराश हो चला है,उसका कटा वेतन भी प्राप्त नहीं हुआ है और इस कारण  सरकार से लंबी लड़ाई लड़ने की क्षमता भी कम हो गयी  है । 

      

 सरकार भी मुख्य समस्या को लंबा खिंच कर अन्य समस्याओं को हल करने से बच रही है और संतान देखभाल अवकाश की तरह मनगढ़ंत विवाद भी उत्पन्न कर रही है ,जिसमें  सरकार अपनी गलत जिद को सही साबित करने के लिए और गलतियां करती जा रही है ।    


  अब सर्व श्री जगदीश यादव  ,ब्रजेश शर्मा  ,मनोहर दुबे और राकेश नायक जी से आग्रह  है कि वे ,सरकार से वार्ता कर कुछ हल निकालें । और सर्व प्रथम 2015 की हड़ताल का वेतन भुगतान करवायें का प्रयास प्रारंभ करें  । आप के पास अनुभव है ,सभी जानते है  हर वक्त  जोश से काम नहीं चलता होश अत्यन्त आवश्यक  है ।
      

 वार्ता कर हल निकालने की बात इस लिए ,क्योकी हम  पडोसी दुश्मन मुल्क से लड़ाई नहीं लड़ रहे  हैं  ,कर्मचारी हैं ,और कर्मचारी अंदोलन की विशेषता ही यह है कि जिस से हमें जंग लड़नी  है बात भी उसी सरकार से करनी है।  और जिस से हम लड़ रहे हैं, उसी सरकार के अधीन काम भी करना है । और कोई भी अंदोलन तभी सफल माना जाता है जब उस से जुड़े  कर्मचारियों का लाभ हो सके।     

 आज समाचारो में यह  भी है ,की " राज्य सभा में प्रस्ताव पारित हुआ की कश्मीर की जनता से सरकार और राजनीतिक दलों को  बात करनी चाहिए "  क्योंकि संवाद से ही समस्या का हल होगा । और हम तो राम और कृष्ण को मानने वाले हैं  ,जिन्होंने धर्मयुद्ध के पहले भी संवाद पर बल दिया ।भले ही उन्हें जानकारी थी की संवाद का कोई हल नहीं निकलेगा।     

 मेरा आप सभी वरिष्ठजनो से आग्रह है कि , सरकार से संवाद स्थापित कर पहले तो यह जानकारी लेवें की सरकार की कुल कितनी राशी खर्च करने की क्षमता है । उसके बाद  यह तय करें की उतनी राशी में प्रदेश के अध्यापक को  अधिकतम क्या आर्थिक लाभ हो सकता है । 

  आप सभी वरिष्ठ जनो को मेरी तरफ से यह भी प्रस्ताव है कि , इन संभावनाओं पर भी विचार करें की ,"अंतरिम राहत में सुधार कर के 2013 के आदेश अनुसार लाभ प्रदान किया जाए ,उस से तत्काल  मिल रहे वेतन पर सहायक अध्यापक को 4700,4800,5000 अध्यापक को 2050,2250,2600 और वरिष्ठ अध्यापक को 3350,3550,3750 का लाभ होगा।  और भविष्य में इसका लाभ यह होगा की , हमारा वेतन निर्धारण 2007 से व्यवस्थित तरीके से हो पायेगा ,इस प्रकार 7 वां वेतन मान जो की राज्य में 2018 में मिलने की सम्भवना है भी हमें सही तरीके से मिल पायेगा  ।        

 साथियो हमारे बुजुर्गों ने भी कहा है की  , " पास के लाभ की अपेक्षा दूर की हानि पर भी विचार करना चाहिए ।" इस लिए आम अध्यापको से अपील है की ,परिस्थियों को समझें कोई भी आंदोलन तभी सफल माना जायेगा जब  तत्काल कुछ आर्थिक लाभ  हो और उसके दूरगामी  परिणाम निकले । यूँ जय जय कार  से कुछ नहीं होगा,हाँ हम अपने और दूसरों के कान को खुश कर सकतें हैं। 

 लेखक स्वयं अध्यापक है  और यह उनकी निजी राय  हैं। 

Wednesday, August 10, 2016

शिक्षक ,अध्यापको की बी .एड. एवं एम एड की प्रवेश प्रक्रिया प्रारंभ


शासकीय प्रगत शैक्षिक अध्ययन संस्थान,शिक्षक-शिक्षा महाविद्यालय तथा राज्य विज्ञान शिक्षा में संचलित बी .एड. एवं बी . एड. (विज्ञान) एम्.एड. एवं एम्. एड. (विज्ञान) द्विवर्षीय पाठ्यक्रम 2016 हेतु प्रवेश के संबंध में ,प्रक्रिया जारी कर दी गयी है। 



NSDL( नवीन पेंशन योजना ) सम्बन्ध में राज्य अध्यापक संघ और शिक्षा विभाग के मध्य आज DPI में बैठक सम्पन्न

                  NSDL( नवीन पेंशन योजना ) सम्बन्ध में  राज्य अध्यापक संघ और शिक्षा विभाग के मध्य आज DPI  में बैठक सम्पन्न 

 NSDL  मुम्बई से आए अधिकारियों श्री  हेगड़े ,लोक शिक्षण संचालनालय आयुक्त नीरज दुबे   लोक शिक्षण संचालनालय के वित्त अधिकारी श्री  मनोज श्रीवास्तव, उप संचालक श्री  सी बी  धोटे , अध्यापक सेल के श्री  रिजवी ,राज्य अध्यापक संघ की तरफ से  डीके सिंगौर जिलाध्यक्ष मंडला और नरेंद्र त्रिपाठी जिलाध्यक्ष  जबलपुर ,शामिल रहे।   राज्य अध्यापक संघ के प्रयास को बड़ी सफलता  मिली है ,

अध्यापक संवर्ग का कटोत्रा कोषालय से करने पर सैद्धान्तिक  सहमती बन गयी है।  अध्यापक संवर्ग के निधन पर  जिले से ही आवेदन  ऑनलाइन होंगे ,10 दिन में मिलेंगी राशि  
। मृत्यु या अन्य मामलो के  लगभग 185 मामलो को प्रमुखता से जल्द निपटाया जाएगा ।  शिक्षा विभाग के अध्यापको का 668 करोड़ NSDL  में फरवरी 16 तक का जल्द ही जमा किया जा  रहा है।   PRAN खाता  जारी होने के 10 साल बाद 25% -राशि निकालने पर सैद्धान्तिक सहमति ( प्रक्रिया में बदलाव किया जाएगा ) बनी।  अध्यापक बनने मे देरी तथा बीच माहों मे कटौती न होने पर पुनः जमा करने की प्रक्रिया को ट्रायबल जैसे एजुकेशन मे भी किया जाएगा। जमा में विलम्ब के ब्याज के लिये शासन को लिखा जायेगा। NSDL के हेगड़े जी ने बताया कि 15600 अध्यापकों जिनके प्रान नंबर जारी है कि अनेक जानकारियां जैसे मोब नं, आधार कार्ड आदि नहीं है उन्हें deactivate किया जाएगा जिसपर आयुक्त नीरज दुबे ने आपत्ति की,तब ये निर्णय बना कि ऐसे लोगो की सूची प्रकाशित करते हुए समय दिया जाएगा कि वे आवश्यक दस्तावेज जमा कर दे।नियमित कर्मचारियो के समान ,प्रत्येक कार्य की समय सिमा और जिमेदारी तय की जायेगी। इस सहित अन्य विषयो पर चर्चा हुई 

      राज्य अध्यापक संघ ने 26 जुलाई को इस संबंध का ज्ञापन सौपा और उन्होंने उसी दिन मीटिंग करने का आश्वासन दिया और  आज उन्होंने मीटिंग  बुला कर अध्यापको की  समस्याओं को न केवल सुना बल्कि तुरंत निर्णय भी लिया।

विदित रहे  राज्य अध्यापक संघ के जिलाध्यक्ष श्री  डी के सिंगौर  ने इस मामले मे माननीय  जबलपुर हाई कोर्ट मे WP 8339/2016 दायर कर अधिकारियों को ऐसा निर्णय लेने पर मजबूर कर दिया।


Monday, August 8, 2016

माँ तो माँ होती है पगले - प्रगति पटेल नरसिंहपुर


प्रगति पटेल "अंशु" -आज  सबेरे सबेरे हमारे बगल में रहने वाले कक्का जी जो सभी समाचारों पर पैनी नजर रखते हैं अचानक आ गये और पूछने लगे कि ये संतान पालन अवकाश का क्या चक्कर है बड़ी खबरें आ रही हैं ।
हमने बताया- कि ये ऐसा अवकाश है जो महिला अध्यापकों को छोड़ कर सभी विभाग की महिला कर्मचारियों को दिया गया है जिसमें  वह अपने 18 साल की आयु के बच्चों की देखभाल के लिए 2 वर्ष के लिए ले सकती हैं ।
कक्का जी कुछ सोचते हुए बोले-क्यों क्या अध्यापक महिलाओं के बच्चे अन्य से अलग है या शासन अध्यापक महिलाओं के बच्चों के लिए स्कूलों  में  कोई नयी केयरिग व्यवस्था शुरू करने जा रही है।
हमने कहा- ऐसा नहीं है ।
कक्का जी बोले-ऐसा नहीं है तो क्यों यह भेदभाव वैसे भी अध्यापकों को वेतन भी इतना नहीं मिलता कि वह बच्चों की देखभाल के लिए किसी को रख सकें ।
हमने कहा -शासन हम लोगों को पात्र नहीं समझती।
कक्का जी बोले-क्यों नहीं है पात्र जब हम अपात्रो को विधायक सांसद और सी एम बना सकते हैं तो इस  अवकाश की पात्रतासभी महिला कर्मचारियों को होनी चाहिए ।
हमने कहा-हां सही है इसलिए तो हम सभी प्रयास रत हैं कि हमें भी यह अवकाश मिले ।
कक्का जी बोले - करते रहो प्रयास मिलेगा जरुर क्योंकि यह आदेश निकालने वालों को भी तो एक माँ ने ही जन्म दिया होगा तो उन्हें समझ में जरुर आयेगा - मां तो माँ होती है पगले।
लेखिका स्वयं अध्यापक है एवं यह  इनके निजी विचार है ।

Thursday, August 4, 2016

"शिक्षक दिवस 2016" के उपलक्ष्य मे विभिन्न कार्यक्रमो का आयोजन करने के सम्बन्ध में निर्देश जारी ,अध्यापक साथी अधिक संख्या में इन कार्यक्रमो में भाग लेवे

"शिक्षक दिवस 5 सितम्बर 2016" के उपलक्ष्य मे विभिन्न कार्यक्रमो का आयोजन करने के सम्बन्ध में निर्देश जारी किये गए है ,शिक्षा विभाग विभिन्न प्रतियोगिताएं करवा रहा है ,सभी अध्यापक साथी अधिक  संख्या में इन कार्यक्रमो में भाग लेवे जिस से ,समाज में यह सन्देश जाए की अध्यापक संवर्ग अपने क्षेत्र  में  पारंगत है और उत्कृष्ट सेवा प्रदान कर अच्छे समाज  का निर्माण कर  रहा है।
पीडीएफ में आदेश प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें






Wednesday, August 3, 2016

माँ होकर भी, ममता से क्यो वंचित ? - '' कविता '' सुनिल भारी (कन्नौद)


मप्र शासन मे " चाइल्ड केयर लीव " के लाभ से वंचित शिक्षिकाओ (अध्यापक बहनो)की मनोदशा को दर्शाती कन्नौद, जिला देवास के ,अध्यापक कवि सुनिल भारी की  एक रचना....
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शिक्षिका की ममता , खुद की गाथा यूं कहती है,
माँ होकर भी, ममता से क्यो वंचित रहती है,
जो कर्तव्य की प्रतिमा सी,शिक्षक धर्म निभाती है,
नन्हे लाल को पलने मे सुलाकर विद्यालय जाती है
कैसे निष्ठुर बन जाती ,छोड़कर अपने लाल को,
किस हाल मे होगा,सोचा करती अपने गोपाल को,
चिंता करती, कितना जागा कितना सोया होगा,
कब प्यास लगी होगी, कितनी बार वह रोया होगा,
रोते रोते सोया, वह पलना शायद ही सूखा होगा,
मध्याह्न भोजन यहाँ , वह वहां भूखा ही होगा,
वह शिक्षिका है, राष्ट्रनिर्मात्री भी कहलाती है,
बेटे को याद करते, अक्सर आँखे भर जाती है,
ममता से गहरा सागर क्या, ऊँचा आकाश नही,
क्यो शिक्षिका को चाइल्डकेयर अवकाश नही,
पूरा हक दो पालनपोषण का,खुद के लाल का,
जरूर मिले, चाइल्ड केयर लीव दो साल का,
यह एक अनमोल तोहफा दे दो, सुनो जी सरकार,
राखी पर बहिना को दे दो यह सुंदर सा उपहार,
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सुनिल भारी (कन्नौद)
जिला देवास,मप्र

9098004500


Tuesday, August 2, 2016

NSDL (अध्यापक संवर्ग ) के कार्य के लिए नियम एवं समय सीमा तय की जा रही हैं -सूत्र

NSDL .मामले में हाईकौर्ट में लगाये केस  का कुछ असर होता नजर  आ रहा है शिक्षा विभाग में पदस्थ ,सूत्रों  के अनुसार .DDO स्तर से पैसा सीधे NSDL में भेजने की  तैयारी चल रही। लोक शिक्षण संचालनालय  जल्द ही  400  करोड़ NSDL में जमा करने जा रहा है हालाकि 668  करोड़ जमा होना है। मृत्यु के  प्रकरण में अंतिम भुगतान के आवेदन  भी जिला स्तर से ही ऑनलाइन होंगे और आपत्ति  लगने पर सीधे जिला स्तर पर ही जानकारी मिल सकेगी और निराकरण हो सकेगा । जानकारी के लिए बता दे कि इस मामले पर राज्य अध्यापक संघ के जिला शाखा मण्डला अध्यक्ष डीके सिंगौर द्वारा माननीय उच्च न्यायालय जबलपुर में याचिका दायर की गई थी। याचिका क्र डब्लू.पी. 8339/2016 पर 10 मई को माननीय न्यायाधिपति राजेन्द्र मेनन की कोर्ट में सुनवाई हुईं।

       राज्य अध्यापक संघ की ओर से एडव्होकेट रोहित सोहगोरा ने पैरवी करते हुये कोर्ट को बताया कि अध्यापक सवंर्ग के लिये लागू अंशदायी पेंशन योजना के अंतर्गत प्रतिमाह 10 प्रतिशत राशि अध्यापकों के खाते से काटकर और उतनी ही राशि शासन द्वारा मिलाकर कुल वेतन की 20 प्रतिशत राशि प्रतिमाह नियमित रूप से एनएसडीएल में जमा करने का प्रावधान है लेकिन 15 माह से अध्यापकों का अंशदान एनएसडीएल में जमा नहीं हुआ है।सभी 8 प्रतिवादियों को नोटिस जारी करते हुये 6 सप्ताह के अंदर जवाब पेश करने को कहा है। जिला शाखा अध्यक्ष डी.के.सिंगौर ने बताया कि संघ रिज्वाइंडर फाइल कर गुमशुदा कटोत्रा के समायोजन पर भी वित्त विभाग के प्रावधान के अनुसार ब्याज जमा कराने की मांग की थी। याचिका की में इसी सप्ताह सुनवाई हो सकती है।   शिक्षा विभाग इस सम्बन्ध में नियम और समय सिमा निर्धारित कर  रहा है।  विभागीय सूत्रों के अनुसार  कोर्ट में जवाब देने के पहले नियम बना दिए जाएंगे ।
    विदित रहे
 नियम और समय सिमा  नियमित कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए तय की गयी है ऐसे ही नियम अध्यापक संवर्ग के लिए भी बनाये जा सकते हैं। 








प्राधानाध्यापक एवं प्राचार्य द्वारा दो कालखण्ड अध्यापन करवाने विषयक

प्राधानाध्यापक (प्राथमिक/ माध्यमिक शाला ) एवं प्राचार्य ( हाईस्कूल / हायर सेकेण्ड्री स्कूल ) द्वारा दो कालखण्ड अध्यापन करवाने  विषयक ,आदेश पुनः जारी कर दिया गया है
आदेश की पीडीएफ कॉपी प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करे।



2 अगस्त काे फिर मंत्रालय में वार्ता में सम्मिलित होने से पहले अध्यापक हित में अपने प्रस्ताव तो सार्वजनिक करें

जो साथी 25 जुलाई की तारीख से कह रहे हैं कि प्रशासनिक अधिकारियों से उनकी वार्ता सफल हुई है ।और प्रस्ताव उनके मन मुक़ाबिक ही बना कर भेजा गया है ।वे कल 2 अगस्त काे फिर मंत्रालय में वार्ता में सम्मिलित होने से पहले अध्यापक हित में अपने प्रस्ताव तो सार्वजनिक करें।साथ ही कल वार्ता में सम्मिलित होने वाले सभी वार्ताकार इस बात का ध्यान रखें कि यदि 2007 से 2 वेतन वृर्द्धि लगाकर (1998 में नियुक्त साथियो की ) 6टवा वेतन मान की गणना नहीं की गयी और 1 सितम्बर 2013 को सेवा पुस्तिका में दर्ज हो भले ही नगद लाभ 1 जनवरी 2016 से मिले । यह नहीं मिले तो सभी वार्ताकार कल एक का काम करें की अन्य कुछ भी लेकर न आएं। एक काम कर लेवे , अंतरिम राहत में। सुधार करवा लें और 2013 के आदेश अनुसार 2017 में ही वेतन मान स्वीकार कर लें ।में मेरे गणना पत्रक भी सार्वजनिक कर रहा हूँ इसमें 119 प्रतिशत महंगाई भत्ते से गणना कि गयी है । 1 जनवरी 2016 को यह मिलना चाहिए ।अन्यथा कुछ भी हमें स्वीकार्य नहीं ।आप सभी जानते है यदि अंतरिम राहत में सुधार होता है तो सहायक अध्यापक जो 4700,4800,5000 का लाभ ,वरिष्ठ अध्यापक को 3350,3550,3750 का लाभ होगा और अध्यापक को2050, 2250,2600 का लांभ होगा ।सभी साथी समझें तत्काल लांभ की अपेक्षा लंबे समय में मिलने वाला लांभ की तरफ देखना चाहिये ।सुरेश यादव रतलाम एक आम अध्यापक । 9926809650




छात्रवृत्ति के आहरण एवं संवितरण अधिकार विकासखंड शिक्षा अधिकारीयों को स्थानांतरित करने विषयक

समेकित छात्रवृत्ति योजना अंतर्गत आहरण एवं संवितरण अधिकार विकासखंड शिक्षा अधिकारीयों को स्थानांतरित करने विषयक आदेश जारी
आदेश पीडीऍफ़ में देखने के लिए इस लिंक को ओपन करें



राज्य अध्यापक संघ मंडला की मांग ,शिक्षको के नाम बिना जांच के सार्वजानिक न करें

मंडला - शुक्रवार को राज्य अध्यापक संघ के पदाधिकारी जिला शाखा अध्यक्ष डी.के.सिंगौर की अगुवाई में कलेक्टर मण्डला श्रीमति प्रीति मैथिल से मुलाकात की और बताया कि लापरवाह शिक्षकों की शिकायत आम जनता द्वारा आपके दूरभाष में करने के प्रावधान के चलते बिना जांच के और बिना दोष सिद्ध हुये ही शिक्षकों के नाम समाचार पत्र और सोशल मीडिया में प्रकाशित और प्रसारित किये जा रहे हैं जो कि अनुचित है। 
राज्य अध्यापक संघ को प्रशासन के इस निर्णय से आपत्ति नहीं है, लेकिन जब तक जांच न हो और दोष सिद्ध न हो शिक्षक अध्यापक का नाम समाचार पत्रों में प्रकाशित नहीं होना चाहिये क्योंकि कई मामलों में शिक्षक निर्दोष भी रहते हैं। आपसी रंजिश, द्वैषता और अनुचित लाभ नहीं मिलने आदि के कारण भी लोगों के द्वारा शिक्षकों की शिकायत कर दी जाती है। सोशल मीडिया के चलते भी निर्दोष शिक्षक का बहुत ज्यादा दुष्प्रचार हो जाता है। 

कलेक्टर को अवगत कराया गया कि नैझर में पदस्थ अध्यापक चरण लाल झारिया के मामले में ऐसा ही हुआ है अतिथि शिक्षक नहीं रखे जाने पर ग्राम के व्यक्ति द्वारा झूठी शिकायत की गई और उसका नाम समाचार पत्रों और फेसबुक में समाचार प्रसारित किया गया। कलेक्टर ने संघ के तर्क से सहमत होते हुये कहा कि पहले तो समाचार पत्र और सोशल मीडिया में नाम देने का कोई निर्देश नहीं दिया गया है और यदि ऐसा हुआ है तो अब बिना जांच और दोष सिद्व हुये नाम प्रचारित नहीं किया जायेगा। 

संघ ने फ्लेक्स में महिला शिक्षिकाओं के मोबाइल नम्बर न लिखे जाने केे आग्रह को अस्वीकार कर दिया। संघ ने मण्डला में बच्चों को यूनिफार्म वितरण का मुद्दा भी उठाया। कलेक्टर ने वितरित की जाने वाली यूनिफार्म का सेम्पल मंगाया है। कलेक्टर ने अध्यापकों से कई मुद्दो पर चर्चा की और बच्चों की पढ़ाई की ओर जोर देने हेतु निर्देशित किया। प्रतिनिधि मण्डल में डी.के.सिंगौर,राकेश चौरसिया, प्रकाश सिंगौर, सुनील नामदेव,राजकुमार रजक,मंशाराम झारिया, चंद्रशेखर तिवारी लखन शुक्ला,बंसंत मिश्रा,श्याम सिंगरौरे,मोनू विश्वकर्मा,हरिलाल वरकडे़,ओमकार सिंह थे।