शिक्षा और उस से जुड़े संवर्ग की सेवाओं से जुडी जानकारीयां ,आप तक आसानी से पहुंचाने का एक प्रयास है अध्यापक जगत
Wednesday, July 6, 2016
एम शिक्षा मित्र पर अध्यापको का बवाल कितना जायज ?- राशी राठौर देवास
राशी राठौर देवास-हर छोटे से छोटे गांव मै घंटी बजा के अपने कर्तव्य पर उपस्थित होने का पुख्ता प्रमाण देने वाला एक मात्र शासकीय सेवक अध्यापक/शिक्षक ही है। हर विभाग के कार्यो का बोझ ढोते हुऐ ,सेकडो गैर शैक्षणिक कार्यो मै उलझाये रखने के बाद भी अध्यापको/शिक्षको से कर्तव्य निष्ठा का प्रमाण मांगा जा रहा है।निश्चित ही एम शिक्षा मित्र एक उम्दा पहल है क्योंकि इसके माध्यम से जमीनी स्तर तक के शासकीय सेवक को जवाबदेह बनाया जाता है। अध्यापको की सालो लंबित मुख्य मांग यही है की पहले हमे शिक्षको के समान सुविधाएं दी जाये फिर हमसे एम मित्र उपस्थित ली जाये।देखा जाये तो ये कोई तर्क नही बनता है की अन्य कर्मचारी के समान सुविधा नही मिलने की वजह से अध्यापको को अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाही या लेटलतीफी के अधिकार मिलना चाहिए। किन्तु एक विभाग के दो शासकीय सेवक को समान कार्य के लिऐ भिन्न भिन्न वेतनमान एवं समान नियम व अनुशासन लागू होना किसी भी मानवीय हृदय को झकझोर देने और विरोध से भर देने के लिऐ पर्याप्त है।शासन के इस भेदभाव भरे नियमों का समर्थन हमारे देश का संविधान भी नही करता। इन्टरनेट कन्क्टीवीटी के मामले भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के हालात बद से बदतर है।समस्याओ से भरे एम मित्र के समक्ष कई रूकावटे है। उदाहरण के तौर पर देखे तो मई माह मै हुऐ ग्रामीण क्षेत्रों के राजस्व विभाग के सर्वे को अंजाम देने वाले अध्यापक आज भी विद्यालय छोडकर कभी सरकारी कम्प्यूटर कक्ष के तो कभी निजी कियोस्क के चक्कर लगा रहै है। इन्टरनेट कन्क्टीवीटी तो बदतर है ही किन्तु अक्सर मोबाइल से सिग्नल ही गायब हो जाते है। कई बार शाला प्रभारी को विभिन्न कार्यों हेतु बहार जाना होता। चने फुटाने खाने वालो पर मंहगे एन्डराइड मोबाइल का बोझ क्यू। तकनीकी समस्या से शिक्षक गैर हाजिर दर्शाये जाने पर जवाबदेह कौन। विभिन्न निजी संस्थानों मै भी कर्मचारी की उपस्थिति सुनिश्चित करवाने हेतू उपकरण गेट पास संस्थान के द्वारा उपलब्ध करवाया जाता है। इन कुछ कमियों को हटाने से शासन की यह योजना शिक्षा को गुणवत्ता पूर्ण बनाने मै सहायक सिध्द हो सकती है।किन्तु सरकार को यह समझना चाहिए की अशांत और विरोध से भरे सेवक से बेहतर परिणाम की नही ब्लकि क्रान्ति की ही उम्मीद की सकती है। क्योकी बल से व्यवहार बदला जा सकता है , विचार नही ।
डी.एल.एड. पाठ्यक्रम में प्रवेश प्रक्रिया हेतु संशोधित समय-सारणी दिनांक 05 जुलाई 2016
शासकीय जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों में तथा अशासकीय महाविद्यालयों में डी.एल.एड. पाठ्यक्रम में प्रवेश प्रक्रिया हेतु संशोधित समय-सारणी दिनांक 05 जुलाई 2016 अादेश पीडीएफ मे प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें
कर्मी कल्चर कँहा खत्म हुआ ? विचार करें cm साहब
माननीय मुख्यमंत्री जी हमेशा कहते है, मैंने कर्मी कल्चर समाप्त किया, निश्चित रूप से उनका सराहनीय प्रयास रहा, इसमें कोई दोराय नही है,, उन्होंने क्रमशः अध्यापक संवर्ग की बेहतरी के लिए भी संवेदनशीलता के साथ निर्णय लिए, उसका भी हमने हमेशा स्वागत किया,, लेकिन2003 मे जिस प्रकार के वादे किये गए, सरकार अभी भी उससे दूर ही खड़ी दिखाई देती है,, सरकार को अध्यापक संवर्ग की समस्या पर राजनैतिक या कूटनीतिक दृष्टिकोण की अपेक्षा भावनात्मक दृष्टिकोण से समस्या का त्वरित निराकरण करना चाहिए।।ओर जब कर्मी कल्चर समाप्त कर दिया, तो अतिथि कल्चर किस बात का हिस्सा है,, शिक्षित बेरोजगारो का शोषण बन्द होना चाहिए।सभी नियुक्तिया मुख्यधारा की हो, ताकि उनमे जिम्मेदारी का भाव हो,, तभी हम स्वर्णिम mp के ड्रीम को साकार कर पाएंगे।।इस पर सरकार व समाज दोनों गंभीरता से विचार करे,, यही विनम्र अनुरोध,,,,,प्रशान्त दीक्षित जिलाध्यक्ष राज्य अध्यापक संघ खंडवा।।
Tuesday, July 5, 2016
विभाग की नई व्यवस्था से शिक्षकों / अध्यापको को नहीं मिला वेतन
विभाग की नई व्यवस्था से शिक्षकों / अध्यापको को नहीं मिला वेतन - स्कूल शिक्षा विभाग ने कहा- पारदर्शिता लाने के लिए की गई व्यवस्था
भोपाल - स्कूल शिक्षा विभाग की वेतन के लिए बनाई गई नई व्यवस्था सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को भारी पड़ रही है। इस कारण उन्हें अब तक जून का वेतन नहीं मिला है। वेतन मिलने में अभी एक सप्ताह और लग सकता है। ऐसे में उन्हें आगामी दिनों में आने वाले त्योहार व अन्य खर्चों को लेकर चिंता सताने लगी है। उधर, स्कूल शिक्षा विभाग नई व्यवस्था को सिस्टम में पारदर्शिता लाने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ रहा है।
दरअसल, विकास खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) को वित्त से संबंधित काम सौंप दिया गया है। पहले प्राचार्य स्तर पर शिक्षकों को वेतन दिया जाता था। नई व्यवस्था लागू होने के बाद से प्रदेश के लाखों शिक्षक इससे प्रभावित हो रहे हैं। राजधानी के एक शिक्षक आरके गुप्ता का कहना है कि उनका वेतन महीने की 30 तारीख को खाते में आ जाता था, लेकिन इस बार नहीं आया। इसे लेकर प्राचार्यों और जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के चक्कर काटना पड़ रहे हैं। विभाग के अफसरों ने बताया कि जब स्कूलों के प्राचार्य वेतन और मानदेय का डाटा एजुकेशन पोर्टल पर उपलब्ध करवाएंगे, तब बिल जनरेट होंगे। इसके बाद प्राचार्य अपने हस्ताक्षर कर इसे विकास खंड शिक्षा अधिकारी को उपलब्ध करवाएंगे। इसके बाद शिक्षकों को वेतन मिलेगा।
यह हो रही दिक्कत
विभाग के अधिकारियों ने बताया कि संकुल स्तर से जानकारी एकत्र की जा रही है। इसे पोर्टल पर चढ़ाया जाएगा, ताकि कर्मचारी के पद और वेतनमान की जानकारी मिल सके। हालांकि बीईओ कार्यालयों में पर्याप्त स्टाफ भी नहीं है। यह भी एक बड़ी समस्या है। इस वजह से कर्मचारियों का डाटाबेस तैयार करने में समय लग रहा है।
ये है नई व्यवस्था
सरकारी स्कूलों में कार्यरत कर्मचारियों के वेतन-भत्ते, कार्यालयीन व्यय और विभागीय योजनाओं में जो भी खर्चा होगा, वह विकास खंड शिक्षा अधिकारी के कार्यालय से होगा। इसकी मॉनीटरिंग का दायित्व जिला शिक्षा अधिकारियों को सौंपा गया है। विकास खंड अधिकारी कार्यालय में अगर अतिरिक्त अमला, कम्प्यूटर आदि की जरूरत होगी तो इसके लिए उत्कृष्ट विद्यालयों, मॉडल स्कूल और संकुल शालाओं में उपलब्ध संसाधानों का उपयोग किया जा सकता हैं।
पेचीदगी बढ़ गई है
शिक्षकों को अब तक वेतन नहीं दिया गया है। नई व्यवस्था से पेचीदगी बढ़ गई हैं। ईद भी आने वाली है। वेतन नहीं मिलने से शिक्षकों को दिक्कत हो रही है। इस व्यवस्था का कोई औचित्य नहीं है।
- अरविंद भूषण श्रीवास्तव, प्रदेश संयोजक, तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ शिक्षा समिति
जल्द मिल जाएगा वेतन
अभी तक वेतन न मिलने की शिकायत मेरे पास नहीं आई है। नई व्यवस्था पर काम चल रहा है। करीब 32 हजार शिक्षकों को वेतन मिल चुका है। बिल प्राप्त होने पर बचे हुए शिक्षकों को भी वेतन मिल जाएगा। 30 हजार शिक्षकों के बिल प्रक्रिया में हैं, जिन पर कार्रवाई चल रही है। सभी को जल्द वेतन मिल जाएगा।
नीरज दुबे, आयुक्त लोक शिक्षण
स्त्रोत नईदुनिया
25 जुलाई को भोपाल रैली में पहुंचिए-जगदीश यादव
शिक्षाकर्मी से अध्यापक बनने के बाद शिक्षक बनने के लिए
शिक्षा विभाग में संविलियन के आंदोलन को ताकतवर बनाएं
25 जुलाई को भोपाल रैली में पहुंचिए
अध्यापक साथियो,
राज्य अध्यापक संघ ने अपने गठन के साथ ही संघर्ष का रास्ता चुना, जिसमें हमें लगातार सफलता मिलती रही है। 500 का शिक्षाकर्मी आज 25000 का अध्यापक हो चुका है, अब उसे शिक्षक का दर्जा दिलाने जैसा महत्वपूर्ण काम करना है, जो शिक्षा विभाग में संविलियन से ही संभव है, इसीलिए हमने प्रदेश भर में संविलियन यात्रा के जरिए आंदोलन शुरू किया, जिसके तहत 25 जुलाई 2016 को भोपाल में हल्लाबोल रैली कर विधानसभा का घेराव किया जाएगा। 25 जुलाई की रैली की तैयारियां उसी दिन से शुरू हो चुकी थीं, जब सरकार ने विसंगतियोंभरा गणपत्रक जारी किया था। हमारे संगठन ने गणपत्रक की होली जलाकर विरोध शुरू कर दिया था और 10 जून से भोपाल में अनिश्चितकालीन धरना जारी है। हमारे संगठन ने तय किया है कि हम सरकार को अध्यापकों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करने देंगे, इसीलिए हमने निर्णायक संघर्ष का ऐलान किया। हमारा यही संघर्ष हमें शिक्षा विभाग में पहुंचाएगा। इस लड़ाई को लडऩा और जीतना ही हमारा एकमात्र मकसद है, इसीलिए सभी अध्यापक साथियों से अनुरोध है कि वे प्रदेश में चल रही संविलियन यात्रा में शामिल हों और 25 जुलाई को अधिक से अधिक संख्या में भोपाल पहुंचे।
जीतने के लिए जरूरी है लडऩा?
छठवें वेतनमान की लड़ाई राज्य अध्यापक संघ 2013 में जीत चुका था। सरकार चार किश्तों में छठवें वेतनमान का समझौता राज्य अध्यापक संघ के पूर्व प्रांताध्यक्ष एवं विधायक मुरलीधर पाटीदार से कर चुकी थी, जिसकी तीन किश्तें मिल भी चुकी हैं, इसीलिए अब अंतिम और निर्णायक संघर्ष शिक्षा का निजीकरण रोकने तथा अध्यापकों का शिक्षा विभाग में संविलियन का होना था, जिसकी रणनीति भी 2013 के छठवें वेतनमान के समझौते के समय ही बनाई जा चुकी थी। शिक्षा विभाग में संविलियन की लड़ाई को लडऩे और जीतने के लिए राज्य अध्यापक संघ ने अपने पदाधिकारियों एवं सदस्यों को तैयार करने का काम उसी वक्त से शुरू कर दिया था। 2013 में हुए इस समझौते के बाद संगठन की ब्लाक, जिला एवं प्रांतीय बैठकों में शिक्षा के निजीकरण को रोकने, अध्यापकों का शिक्षा विभाग में संविलियन एवं संविदा नीति को समाप्त करने जैसे महत्वपूर्ण सवालों पर विचार-विमर्श होता था। इससे स्पष्ट है कि राज्य अध्यापक संघ शुरू से ही अध्यापकों, संविदा शिक्षकों एवं दूसरे अस्थाई कर्मचारियों के भविष्य के प्रति चिंतित रहा है। राज्य अध्यापक संघ गंभीर विचार विमर्श के बाद ही संघर्ष के मैदान में उतरता रहा है, जिस कारण उसे आंदोलनों के दौरान जीत भी मिलती रही है।
सरकार कर रही अध्यापकों को कमजोर?
सरकार अपनी खुफिया एजेंसियाों के जरिए हमारे संगठन की तैयारियों की जानकारी जुटाती रहती है, सरकार को डर था कि राज्य अध्यापक संघ छठवें वेतनमान के बाद शिक्षा विभाग में संविलियन के लिए निर्णायक आंदोलन में जाने वाला है, इसीलिए उसने अपने समर्थकों के जरिए छठवें वेनतमान को लेकर असमय ही आंदोलन शुरू करवा दिया। इस दौरान सरकार के दो एजेंट जिस तरह सक्रिय दिखाई दिए, उससे स्पष्ट है कि सरकार अध्यापकों की एकता को कमजोर कर उनके अंदर भ्रम की स्थिति पैदा करना चाहती है, जिसमें कुछ समय के लिए वह कुछ हद तक सफल भी हुई। सरकार के इशारे पर चले आंदोलन से अध्यापकों को तो फायदा नहीं हुआ, उल्टे अध्यापकों में भ्रम पैदा हो गया। सरकार के इस षड्यंत्र को समझे बिना ही सोशल मीडिया पर अध्यापक एवं उनके नेता एक-दूसरे पर ही आरोप प्रत्यारोप करने लगे, जिसका फायदा भी सरकार ने उठाया और विसंगितयों भरा गणनापत्रक जारी कर दिया। अध्यापकों के साथ इस तरह का धोखा करने का साहस सरकार को कहां से मिला? कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार ने 2013 के बाद अध्यापकों की एकता को कमजोर करने का एकमात्र काम किया है। सरकार ने अध्यापकों से डरना छोड़ दिया है, सरकार ऐसा मानकर चल रही है कि अध्यापक कुछ नहीं कर पाएंगे, वे आपस में ही लड़ झगड़कर घर बैठ जाएंगे। यही वह स्थिति है जिसके चलते सरकार मनमानी कर रही है। अब अध्यापकों को यह साबित करना है कि हम सरकार को मनमानी की इजाजत किसी भी कीमत पर नहीं दे सकते, इसीलिए राज्य अध्यापक संघ संविलियन यात्रा के जरिए सरकार को चेता रहा है कि यदि किए हुए वादे से मुकरने की कोशिश हुई, तब प्रदेश का अध्यापक खामोश नहीं बैठेगा।
क्यों जरूरी है संविलियन के लिए संघर्ष?
500 रुपए महीने का शिक्षाकर्मी यदि आज 25000 रुपए महीने का अध्यापक है तो यह किसी की मेहरबानी से नहीं बल्कि राज्य अध्यापक संघ के नेतृत्व में चले आंदोलनों की बदौलत ही है। 25,000 रुपए महीने के वेतन तक पहुंचने के लिए हम लोगों ने अनगिनत संघर्ष किए हैं। प्रदेश भर में शिक्षा बचाओ यात्राएं निकालीं। सबको शिक्षा सबको काम जैसा नारा देकर आम लोगों को आंदोलनों से जोड़ा। आंदोलन करते हुए जेलों तक गए। दर्जनों पदयात्राएं निकलीं। दिल्ली में संसद मार्ग जाम किया है। शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ प्रदेश भर में जागरुकता अभियान जलाए। राज्य अध्यापक संघ के यह कुछ ऐतिहासिक अभियान थे, जिनके कारण सरकार डरी और शिक्षाकर्मी से अध्यापक बनाया और वेतन भत्ते भी बढ़ाए। उपरोक्त अभियानों के दौरान भी राज्य अध्यापक संघ का स्पष्ट कहना था कि हमारा अंतिम लक्ष्य शिक्षा विभाग में संविलियन है, इसीलिए अध्यापक इन जीतों से संतुष्ट होकर नहीं बैठा और वह अब तक लड़ रहा है। संघर्ष से ही जीत मिलती है, यह साबित हो चुका है, इसीलिए शिक्षा विभाग में संविलियन के लिए लडऩा जरूरी है। संविलियन यात्रा इसी निर्णायक एवं अंतिम संघर्ष की तैयारियों के लिए शुरू की गई है, जिसके तहत 25 जुलाई को भोपाल में हल्ला बोल रैली की जाएगी। यही रैली प्रदेश के लाखों अध्यापकों का भविष्य तय करेगी, इसीलिए सभी अध्यापकों को इस रैली में पहुंचने के लिए अभी से तैयारियां शुरू करनी होंगी।
आंदोलन के अलावा दूसरा रास्ता नहीं?
ऐसा नहीं है कि राज्य अध्यापक संघ ने अध्यापकों की मांगों के लिए सरकार से बातचीत नहीं की। 2013 में हुए छठवें वेतनमान के समझौते के बाद भी हमने लगातार सरकार से बातचीत जारी रखी। लंबित सभी मांगों पर बातचीत की। सरकार ने इस दौरान सिर्फ आश्वासन ही दिए, उसने आश्वासन के जरिए तीन साल निकाल दिए हैं, इसीलिए अब राज्य अध्यापक संघ किसी भी तरह के आश्वासन पर विश्वासन नहीं करेगा। अब हमारा संगठन निर्णायक और अंतिम संघर्ष के रास्ते पर चल पड़ा है, जिसमें जीत अध्यापकों को ही मिलेगी, ऐसा पूरा भरोसा और विश्वास है। सरकार बीसियों साल से अध्यापकों का शोषण करती आ रही है, अध्यापक की पूरी जवानी सरकार का शोषण सहते हुए गुजरी है इसीलिए बुढ़ापे को संभारने के लिए आंदोलन जरूरी है और ऐसा आंदोलन जो हमें शिक्षा विभाग का शिक्षक बनवा सके। राज्य अध्यापक संघ संविलियन यात्रा के जरिए ऐसा ही आंदोलन विकसित कर रहा है। आईए राज्य अध्यापक संघ के इस महत्वपूर्ण और निर्णायक आंदोलन का हिस्सा बनें और 25 जुलाई 2016 को होने वाले विधानसभा के घेराव में अधिक से अधिक संख्या में भोपाल पहुंचे।
लड़े हैं, तभी जीते हैं
लड़ोगे तो ही जीतोगे।
आपका
जगदीश यादव
प्रांताध्यक्ष
राज्य अध्यापक संघ, मध्यप्रदेश।
शिक्षकों के अवकाश स्वीकृति एवं गैर शिक्षकीय कार्य में नियोजन बाबत २०१४
| शिक्षकों के अवकाश स्वीकृति एवं गैर शिक्षकीय कार्य में नियोजन बाबत २०१४ आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें |
शिक्षकों को गैरशिक्षकीय कार्य में लगाने पर रोक विषयक २००९
शिक्षकों को गैरशिक्षकीय कार्य में लगाने पर रोक विषयक २००९ आदेश पीडीऍफ़ मे प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें

शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्य में न लगायें जाने के संबंध में २०१२
शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्य में न लगायें जाने के संबंध में २०१२ आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें

आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें
शिक्षकों को B.L.O. के दायित्व से मुक्त रखने के संबंध में 2013
शिक्षकों को B.L.O. के दायित्व से मुक्त रखने के संबंध में २०१३
आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें
शिक्षकों को B.L.O. के दायित्व से मुक्त रखने के संबंध में २०१३
आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करेंस्कूल शिक्षा विभाग के शिक्षकों एवं कर्मचारियों को BLO ड्यूटी से कार्यमुक्ति रखने बाबत 2015
स्कूल शिक्षा विभाग के शिक्षकों एवं कर्मचारियों को BLO ड्यूटी से कार्यमुक्ति रखने बाबत 2015 आदेश की पीडीऍफ़ कॉपी प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें

Monday, July 4, 2016
अतिथि शिक्षक रखने की नियमावली 2010-2013
हाई स्कुल / हायर सेकेंडरी के नियम 2010 और माध्यमिक और प्राथमिक के नियम 2013 पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इन लिंक को ओपन करें
हाई स्कूल /हायर सेकेंडरी स्कूलों में अतिथि शिक्षक रखने की नियमावली /प्रकिया /शैक्षणिक योग्यता /मानदेय से सम्बंधित जानकारी। भाग -1 दीपक हलवे जी से साभार
हाई स्कूल /हायर सेकेंडरी स्कूलों में अतिथि शिक्षक रखने की नियमावली /प्रकिया /शैक्षणिक योग्यता /मानदेय से सम्बंधित जानकारी। भाग -२ दीपक हलवे जी से साभार
प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय में अतिथि शिक्षक रखने की नियमावली /प्रकिया /शैक्षणिक योग्यता /मानदेय से सम्बंधित आदेश २०१३
Saturday, July 2, 2016
संकुल प्राचार्य के आहरण संवितरण के ही अधिकार समाप्त किये गए है ,प्रशासकीय अधिकार समाप्त नहीं किये गए हैं - स्पष्टीकरण २ जुलाई २०१६
आहरण संवितरण की नयी वयवस्था अंतर्गत संकुल प्राचार्य के आहरण संवितरण के ही अधिकार समाप्त किये गए है ,प्रशासकीय अधिकार समाप्त नहीं किये गए हैं । आज दिनाक २ जुलाई २०१६ को जारी स्पष्टीकरण में आयुक्त लोक शिक्षण संचालनालय ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है की । में व्यवस्था में केवल आहरण की व्यवस्था विकास खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय से की जायेगी प्राचार्यो के वित्तीय और प्रशासकीय अधिकारों में कोई परिवर्तन नहीं होगा ,अर्थात हमारे अवकाश स्वीकृति और अन्य कार्य संकुल प्राचार्य ही करेंगे ,साथ ही अध्यापक संवर्ग के वेतन की व्यवस्था भी पूर्ववत जरी रहेगी और उनके बिल एजुकेशन पोर्टल पर जनरेट करने का कार्य संकुल प्राचार्य ही करेंगे और उसके बाद BEO कार्यालय में भुगतान हेतु बिल भेजे जायेंगें । मेरा निजी मत है की यदि शिक्षा विभाग यही करना चाहता है तो फिर नविन व्यवस्था लागु ही नहीं करना चाहिए ,या यह भी संभव है की प्राचार्यो के अधिकार समाप्त करने का कार्य नियमो में संशोधन के उपरांत ही संभव है हो सकता है की जब तह नियमो में संशोधन न हो यह व्यवस्था लागु रहे । आदेश पीडीऍफ़में प्राप्त करने के लिये इस लिंक को ओपन करें

शासकीय शालाओं में आहरण एवं संवितरण की नवीन व्यवस्था की समीक्षा
शासकीय शालाओं में आहरण एवं संवितरण की नवीन व्यवस्था की समीक्षा आयुक्त महोदय द्वारा प्रत्येक दिवस की जायेगी आदेश दिनांक 30 जून 2016
आदेश पीडीऍफ़ मे प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें

Friday, July 1, 2016
अध्यापक संवर्ग के संविलियन (स्थान्तरण) की तैयारिया प्रारम्भ
आयुक्त लोकशिक्षण संचलनालय ने वर्ष 2016 में अध्यापक संवर्ग के ऑन लाइन संवलियन (स्थान्तरण) की कार्यवाही करने के लिए एजुकेशन पोर्टल पर अध्यापक संवर्ग की सही सही जानकारी अपडेट करने के आदेश सभी जिला कलेक्टर को दिए हैं।
नया सॉफ्टवेयर नेशनल इनफ़ोरमनेशन सेंटर ( NIC ) द्वारा तैयार किया जा रहा है । इस सत्र में नई स्थानातरण निति की प्रतीक्षा में बैठे अध्यापको की उम्मीद को पंख मिल गए है ।
अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था के संबंध में आदेश जारी

सरकारी कर्माचारी को अपनी छवि सुधारने के लिए काम करना चाहिए और काम के बारे में खुद भी बताना चाहिए- रविश कुमार
आपने सुना ही होगा कि पांच दस हज़ार करोड़ की कंपनी के सीईओ की तनख्वाह कई बार प्रति माह दो से दस करोड़ तक हो जाती है। आप सुनते होंगे कि फलां सीईओ हाफ पैंट में भी दफ्तर जाता है। रात को ईमेल करता है, खूब काम करके आता है। बड़ा कूल है। हम मीडिया वाले भी वाह वाह करते हैं। भारत सरकार ने इस साल फरवरी में योजना और गैर योजना मदों के लिए करीब बीस लाख करोड़ का बजट पेश किया। तब उसके कैबिनेट सचिव का वेतन कुल मिलाकर सवा दो लाख रुपये प्रति माह तक का है। जो सातवें वेतन आयोग के बाद ढाई लाख के आस पास हो जाएगा। कुल 25-30 हज़ार की बढ़ोतरी का कितना जश्न मना सकते हैं। क्या आप दर्शक यह समझते हैं कि भारत सरकार के कैबिनेट सचिव या सचिव कभी दफ्तर टाइम पर नहीं जाते, जब मन करता है तभी जाते हैं, कोई काम नहीं करते। अगर ऐसा है तो सरकार भी काम नहीं करती होगी। मैं जितना जानता हूं सचिव स्तर या ज़िलाधिकारी स्तर के अफसरों के पास सांस लेने की फुर्सत नहीं होती है। कॉरपोरेट का कूल सीईओ और मालिक कई बार हज़ारों करोड़ की कंपनी डुबो देते हैं। सरकारी बैंक को चूना लगाकर लंदन भाग जाता है। क्या आपने कभी सुना है कि कैबिनेट सचिव ने भारत सरकार ही डुबो दी।
धारणा का इलाज दुनिया के किसी अस्पताल में नहीं है। ज़रूर सरकारी अधिकारियों के पास इतने अधिकार होते हैं कि उसके दम पर वे अवैध रूप से करोड़ों रुपये कमा लेते हैं। मगर रिश्वतखोरों के हिसाब से सैलरी का हिसाब तो नहीं होगा न। अपनी इस छवि के लिए सरकारी अधिकारी और कर्मचारी भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। कई कर्माचारियों ने ग़रीब जनता को जिस तरह से परेशान किया है उसके कारण भी जनता उनकी सैलरी वृद्धि को शक की निगाह से देख रही है। उन्हें अपनी छवि सुधारने के लिए काम करना चाहिए और काम के बारे में खुद भी बताना चाहिए। जब हम सरकारी कर्माचारी कहते हैं तो यह समझना चाहिए कि वो कोई एक मूर्ति का नाम नहीं है। कोई पुलिस का जवान है, कोई अर्धसैनिक बल है, कोई सैनिक है। कोई टीचर है, कोई रेल का ड्राईवर है, कोई गटर साफ करने वाला कर्मचारी है तो कोई बिजली के हाईवोल्टेज तार बांधने वाला कर्मचारी है। सरकार की अनगिनत सेवाओं के लिए अलग अलग काम और पद हैं। सरकार के तहत काम करने वाले ज़्यादातर मध्यम से लेकर नीचले स्तर के कर्मचारी हैं। कॉरपोरेट में हर साल सैलरी बढ़ जाती है। सरकार के यहां दस साल बाद बढ़ी है तो उम्मीद कुछ ज़्यादा हो सकती है। इस बार जो बड़े स्तर के अधिकारी हैं उनका वेतन पुराने बेसिक का रेशनलाइज़ेशन इंडेक्स 2.62 से लेकर 2.67 तक रहा। सबसे कम तनख़्वाह वाले कर्मचारियों के लिए रेशनलाइज़ेशन इंडेक्स 2.57 रहा। इसे आप मोटा मोटी ये समझ सकते हैं कि कम वेतन पाने वालों की सैलरी कम बढ़ी और और ज्यादा पाने वालों की ज़्यादा। नीचले स्तर पर देखेंगे तो सैलरी दो से ढाई हज़ार ही बढ़ी है। कर्मचारियों का कहना है कि डीए बढ़ते बढ़ते 125 प्रतिशत हो गया था जिसके कारण हमें उतनी ही सैलरी मिल रही थी जितनी बढ़ी है। हमें कुछ भी फायदा नहीं हुआ।
सरकार के पास संसाधन सीमित होते हैं और सबको खुश नहीं कर सकती है। छठा वेतन आयोग जब लागू हुआ था तो दो साल का एरियर मिला था। सातवें वेतन आयोग में सिर्फ छह महीने का एरियर मिलेगा मगर पैसा इसी साल मिलेगा। सरकार जब इसे ऐतिहासिक बता रही थी उसी समय 33 लाख कर्मचारियों में से 32 लाख कर्मचारियों के संगठन हड़ताल पर जाने का एलान कर रहे थे। इनका कहना है कि सारा लाभ ऊंचे स्तर के अफसरों ने ले लिया। नीचे वाले को कम मिला बल्कि कुछ मिला ही नहीं। हमारे सहयोगी हिमांशु शेखर मिश्रा ने जो केस स्टडी की हैं।
रमन शर्मा 36 साल से रेलवे में काम करते हुए डेपुटी चीफ पर्सनल आफिसर के पद पर पहुंचे हैं। अभी इन्हें कुल वेतन 91,823 रुपये मिलता था। 36 साल की नौकरी के बाद पहली बार सैलरी एक लाख से ऊपर गई है। क्योंकि सातवें वेतन आयोग के कारण इनका वेतन 1,04,100 रुपये हो गया है। यानी दस साल के बाद कुल वेतन 12,277 रुपये बढ़ गया है। लेकिन नए पीएफ कायदों के बाद इनमें से 4918 रुपये पीएफ में और कटेंगे। टैक्स का अतिरिक्त बोझ 2455 रुपये होगा। टेक होम यानी हाथ में सिर्फ 4904 रुपये ज्यादा आएगा। अमित जैन 29 साल से रेलवे में हैं और अब एग्जिक्यूटिव इंजीनियर हैं। अमित जैन की कुल सैलरी 76700 रुपये से बढ़कर 89540 रुपये हो गई है। सातवें वेतन आयोग से इनकी नई सैलरी अब 89540 रुपये हो गई है। कुल बढोतरी 12,940 रुपये की है। लेकिन नए पीएफ कायदों के बाद इनमें से 4290 रुपये पीएफ में और कटेंगे। टैक्स का अतिरिक्त बोझ 2600 रुपये होगा, यानी टेक होम सिर्फ 6050 रुपये बढ़ा।
अर्ध सैनिक बलों को चंद भत्तों में कुछ राहत मिली है तो वेतन वृद्धि को लेकर वे भी बहुत खुश नहीं हैं। सेना के लोगों की अपनी नाराज़गी है। उनका कहना है कि सेना में 80 फीसदी से अधिक जवान हैं। उनकी सैलरी न्यूनतम 18000 की गई है जो डीए के 125 फीसदी बढ़ने के कारण पहले से ही मिल रही थी। नए वेतन में 2000 के आस पास ही वृद्धि हुई है। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर कह चुके थे कि हमने सेना के वेतन के लिए काफी ज़ोर लगाया। कुछ मांगे मानी गईं कुछ नहीं मानी गई। रेलवे के एक कर्मचारी ने फेसबुक पर लिखा है कि उनके विभाग के कुछ ग्रेड में 300 रुपये की बढ़ोत्तरी हुई है। हम इसे सत्यापित नहीं कर सकते लेकिन हम ऐसे कर्मचारी संगठन की तलाश कर रहे हैं जो इस वेतन वृद्धि से खुश हो। अगर कोई बहुत खुश है तो ज़रूर संपर्क करें मैं उसे प्राइम टाइम में मौका दूंगा।
Pew Research Center ने 2014 में एक विश्लेषण पेश किया था जिसके अनुसार 2011 के वेतन के आधार पर दुनिया भर में आबादी का सिर्फ 13 प्रतिशत हिस्सा ही मिडिल इनकम में आता है। 56 फीसदी लोग निम्न आय में आते हैं और 15 फीसदी ग़रीब। सिर्फ 7 प्रतिशत उच्चतम आय वाले हैं और 9 फीसदी उच्च मध्यम आय में आते हैं।
सरकार ने ग्रेच्युटी सीमा दस लाख से बढ़ा कर 20 लाख कर दी है। घर बनाने/खरीदने के लिए अब अग्रिम राशि साढ़े सात लाख की जगह 25 लाख तक निकाली जा सकेगी। एक राय यह है कि इसके कारण अर्थव्यवस्था में गति आएगी। अगर आई तो सरकारी कर्मचारियों को अलग से बोनस मिलना चाहिए। दूसरी राय है कि यह अर्थव्यवस्था पर बोझ है। सातवें वेतन आयोग को पढ़ते हुए कुछ धारणायें ध्वस्त होती नज़र आईं। जैसे हम समझते हैं कि केंद्रीय कर्मचारी सरकार पर बोझ हैं। कुछ तथ्य रिपोर्ट से निकाल कर रखता हूं ताकि आईपीएस से लेकर दारोगा की तैयारी में काम आ सके।
- 2010 में जितने पद मंज़ूर किये गए थे उनका 86 प्रतिशत ही भरा गया था।
- 2014 में जितने पद मंज़ूर किये गए थे उनका 82 प्रतिशत ही भरा गया।
- 2014 में 40 लाख 49 हज़ार पद मंज़ूर थे, भर्ती किये गए 33.02 लाख।
- साढ़े सात लाख कर्मचारियों का बोझ मौजूदा कर्मचारियों पर भी पड़ा होगा।
2014 के मंज़ूर पदों की संख्या के हिसाब से केंद्र सरकार 7 लाख लोगों को नौकरी दे सकती है। जबकि केंद्र सरकार साल में एक लाख लोगों को ही रोज़गार देती है। बेरोज़गार अपनी रैलियों में इस आंकड़े का इस्तमाल कर सकते हैं। सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट में अमेरिका और भारत के केंद्रीय कर्मचारियों की तुलना की गई है। एक लाख की आबादी पर भारत में केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 139 है। अमेरिका आबादी में भारत से कम है, वहां एक लाख की आबादी पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 668 है। बताइये जिससे हम सीख कर प्राइवेटाइज़ कर रहे हैं उसके यहां कितने सरकारी कर्मचारी हैं हमारे यहां कितने। यही नहीं रिपोर्ट में लिखा है कि डाक, संचार और रेलवे तो व्यावसायिक गतिविधि हैं। उनके कर्मचारियों की संख्या निकाल दें, इसके साथ गृहमंत्रालय के पुलिस और सैन्य बलों को निकला दें तो केंद्रीय कर्मचारियों की वास्तविक संख्या 4 लाख 18 हज़ार ही है। जो बहुत छोटा है। रिपोर्ट में इन्हें कोर ऑफ गर्वमेंट आफ इंडिया कहा गया है।
स्त्रोत NTDV प्रेम टाइम इंट्रो
Thursday, June 30, 2016
M-शिक्षा मित्र अध्यापक संवर्ग के लिए नहीं हैं -सुरेश यादव रतलाम
यदि कोई अधिकारी अध्यापक संवर्ग /संविदा शाळा शिक्षक को मोबाईल पर M शिक्षा मित्र एप लोड करने का कहे तो उन श्रीमान से एक ही प्रश्न करे की ,क्या शिक्षक को मिलने वाला हर लाभ ,अध्यापक को अपने आप प्रदान किया जाता है ?
साथियों किसी भी अधिकारी के दबाव में न आयें ,यह योजना सिर्फ शिक्षा विभाग अंतर्गत कार्यरत शिक्षको और कर्मचारियों के लिए हैं ,सम्पूर्ण आदेश में कंही भी (आप आदेश का अवलोकन करें ) ," निकायो में कार्यरत अध्यापक संवर्ग " शब्द का उल्लेख नहीं है ,इस लिए कोई अधिकारी हम पर न तो स्मार्ट फोन लेने के लिए दबाव बना सकता है ,और न ही फोन नहीं लेने के कारण कोई भी अध्यापक संवर्ग का वेतन रोक सकता है।
सुरेश यादव कार्यकारी जिलाध्यक्ष राज्य अध्यापक संघ रतलाम
1 सितम्बर 15 का अादेश की पीडीएफ कॉपी प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें
25 मई 2016 का अादेश की पीडीएफ कॉपी प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें
शासकीय शालाओ मे आहरण संवितरण कार्य के लिये प्रभावशाली की गई नवीन व्यवस्था के क्रियांवयन के सम्बन्ध मे
शासकीय शालाओ मे आहरण संवितरण कार्य के लिये प्रभावशाली की गई नवीन व्यवस्था के क्रियांवयन के सम्बन्ध मे अादेश की पीडीएफ कॉपी प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें
खत्म होगी आठवीं तक फेल नहीं करने की नीति
नई दिल्ली। लंबी प्रतीक्षा के बाद आखिरकार केंद्र सरकार ने संकेत दे दिए हैं कि नई शिक्षा नीति का स्वरूप कैसा होगा। बुधवार को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे के अहम बिंदू जारी कर दिए गए। केंद्र सरकार के ट्विटर हैंडल माईगोव इंडिया पर जारी करते हुए हालांकि यह साफ नहीं किया कि बिंदू कैसे तैयार किए गए। पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रह्माण्यम की अध्यक्षता में बनाई गई मसौदा समिति की रिपोर्ट की इसमें कोई चर्चा नहीं है। न ही यह बताया गया कि इसे जारी करने से पहले राज्यों से कोई चर्चा हुई या नहीं।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय की ओर से जारी अहम बिंदू या 'इनपुट' में स्कूलों में छात्रों के सीखने के स्तर पर गंभीर चिंता जताई गई है। इसमें साफ तौर पर कहा गया कि आठवीं तक बच्चों को फेल नहीं करने की मौजूदा नीति को बदला जाएगा क्योंकि इससे छात्रों के अकादमिक प्रदर्शन पर गंभीर असर पड़ा है। इसे पांचवीं तक सीमित किया जाएगा। इसी तरह प्रस्ताव किया गया है कि आइएएस और आइपीएस की तरह शिक्षा व्यवस्था के लिए अलग अखिल भारतीय कैडर तैयार किया जाए जिसका नियंत्रण मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पास हो।
प्रस्ताव किया गया कि सभी राज्य छात्रों को पांचवीं तक की शिक्षा उनकी मातृभाषा अथवा स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में दें। इसी तरह अंग्रेजी के महत्व को रेखांकित करते हुए इसे दूसरी भाषा का दर्जा देने की सिफारिश की गई है। व्यापक स्तर पर ओपन ऍानलाइन पाठ्यक्रम शुरू करने की जरूरत पर ध्यान देते हुए इस काम के लिए अलग से स्वायत्त संस्थान शुरू करने की सिफारिश की है। स्थानीय और राष्ट्रीय जरूरतों को ध्यान में रखते हुए नियमित रूप से ऑनलाइन पाठ्यक्रम तैयार किया जाएगा।
इससे पहले मंत्रालय ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा तैयार करने के लिए पूर्व कैबिनेट सचिव टीएसआर सुब्रह्माण्यम की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। मगर उनके अनुरोध के बावजूद एचआरडी मंत्री स्मृति ईरानी ने उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक करने से इन्कार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि मसौदा तभी जारी होगा, जब राज्यों से एक बार फिर संपर्क कर लिया जाएगा। हालांकि बुधवार को जारी मसौदे में सुब्रह्माण्यम समिति की अधिकांश सिफारिशें शामिल कर ली गई हैं। मगर इसकी भाषा इस समिति की रिपोर्ट से पूरी तरह से अलग है।
स्त्रोत नईदुनिया
सातवां वेतनमान :- राज्य सरकार जल्द करेगी आयोग का गठन
भोपाल। केंद्र सरकार द्वारा बुधवार को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी देने के बाद राज्य सरकार ने भी नए वेतन आयोग के गठन का मन बना लिया है। राज्य सरकार ने प्रदेश के कर्मचारियों को सातवां वेतनमान देने की तैयारी शुरू कर दी है। प्रदेश के वित्त मंत्री जयंत मलैया ने बताया कि केंद्र सरकार से वेतन आयोग की रिपोर्ट मिलते ही आयोग के गठन की कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि मलैया ने आयोग के गठन की समयसीमा नहीं बताई। उन्होंने ये जरूर कहा कि राज्य सरकार भी अपने कर्मचारियों को सातवां वेतनमान देगी यह तय है। वित्त मंत्री ने कहा कि नीतिगत मामला होने से कैबिनेट में इस पर फैसला किया जाएगा।
जिस तारीख से केंद्र अपने कर्मचारियों को वेतन लाभ देगी, उसी तारीख से राज्य में भी नए वेतनमान का लाभ दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि राजनीतिक सरगर्मियां खत्म हो जाएं और केंद्र से सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें मिल जाएं, इसके बाद एक्सपर्ट के साथ बैठकर सिफारिशों का परीक्षण कर आयोग के गठन का निर्णय लेंगे। उन्होंने भरोसा दिलाया कि किसी भी सूरत में राज्य के कर्मचारियों का नुकसान नहीं होने देंगे।
राज्य के कर्मचारियों को सातवां वेतनमान कब से मिलेगा, यह पूछने पर मलैया ने कहा कि केंद्रीय तिथि से ही दिया जाएगा। उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने प्रदेश के कर्मचारियों को छठवें वेतनमान का लाभ एक जनवरी 2006 से दिया है।
हालांकि इसकी अधिसूचना विधानसभा चुनाव के ठीक पहले 10 सितंबर 2008 को जारी हुई थी। सरकार ने एक सितंबर 2008 से छठां वेतनमान मूल वेतन में जोड़ा था और एक जनवरी 2006 से 31 अगस्त 2008 तक की एरियर्स राशि कर्मचारियों के खातों में जमा कराई थी।
स्त्रोत - नईदुनिया
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Wednesday, July 6, 2016
एम शिक्षा मित्र पर अध्यापको का बवाल कितना जायज ?- राशी राठौर देवास
राशी राठौर देवास-हर छोटे से छोटे गांव मै घंटी बजा के अपने कर्तव्य पर उपस्थित होने का पुख्ता प्रमाण देने वाला एक मात्र शासकीय सेवक अध्यापक/शिक्षक ही है। हर विभाग के कार्यो का बोझ ढोते हुऐ ,सेकडो गैर शैक्षणिक कार्यो मै उलझाये रखने के बाद भी अध्यापको/शिक्षको से कर्तव्य निष्ठा का प्रमाण मांगा जा रहा है।निश्चित ही एम शिक्षा मित्र एक उम्दा पहल है क्योंकि इसके माध्यम से जमीनी स्तर तक के शासकीय सेवक को जवाबदेह बनाया जाता है। अध्यापको की सालो लंबित मुख्य मांग यही है की पहले हमे शिक्षको के समान सुविधाएं दी जाये फिर हमसे एम मित्र उपस्थित ली जाये।देखा जाये तो ये कोई तर्क नही बनता है की अन्य कर्मचारी के समान सुविधा नही मिलने की वजह से अध्यापको को अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाही या लेटलतीफी के अधिकार मिलना चाहिए। किन्तु एक विभाग के दो शासकीय सेवक को समान कार्य के लिऐ भिन्न भिन्न वेतनमान एवं समान नियम व अनुशासन लागू होना किसी भी मानवीय हृदय को झकझोर देने और विरोध से भर देने के लिऐ पर्याप्त है।शासन के इस भेदभाव भरे नियमों का समर्थन हमारे देश का संविधान भी नही करता। इन्टरनेट कन्क्टीवीटी के मामले भारत के ग्रामीण क्षेत्रों के हालात बद से बदतर है।समस्याओ से भरे एम मित्र के समक्ष कई रूकावटे है। उदाहरण के तौर पर देखे तो मई माह मै हुऐ ग्रामीण क्षेत्रों के राजस्व विभाग के सर्वे को अंजाम देने वाले अध्यापक आज भी विद्यालय छोडकर कभी सरकारी कम्प्यूटर कक्ष के तो कभी निजी कियोस्क के चक्कर लगा रहै है। इन्टरनेट कन्क्टीवीटी तो बदतर है ही किन्तु अक्सर मोबाइल से सिग्नल ही गायब हो जाते है। कई बार शाला प्रभारी को विभिन्न कार्यों हेतु बहार जाना होता। चने फुटाने खाने वालो पर मंहगे एन्डराइड मोबाइल का बोझ क्यू। तकनीकी समस्या से शिक्षक गैर हाजिर दर्शाये जाने पर जवाबदेह कौन। विभिन्न निजी संस्थानों मै भी कर्मचारी की उपस्थिति सुनिश्चित करवाने हेतू उपकरण गेट पास संस्थान के द्वारा उपलब्ध करवाया जाता है। इन कुछ कमियों को हटाने से शासन की यह योजना शिक्षा को गुणवत्ता पूर्ण बनाने मै सहायक सिध्द हो सकती है।किन्तु सरकार को यह समझना चाहिए की अशांत और विरोध से भरे सेवक से बेहतर परिणाम की नही ब्लकि क्रान्ति की ही उम्मीद की सकती है। क्योकी बल से व्यवहार बदला जा सकता है , विचार नही ।
लेखिका स्वयं अध्यापक हैं।
डी.एल.एड. पाठ्यक्रम में प्रवेश प्रक्रिया हेतु संशोधित समय-सारणी दिनांक 05 जुलाई 2016
शासकीय जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों में तथा अशासकीय महाविद्यालयों में डी.एल.एड. पाठ्यक्रम में प्रवेश प्रक्रिया हेतु संशोधित समय-सारणी दिनांक 05 जुलाई 2016 अादेश पीडीएफ मे प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें
कर्मी कल्चर कँहा खत्म हुआ ? विचार करें cm साहब
माननीय मुख्यमंत्री जी हमेशा कहते है, मैंने कर्मी कल्चर समाप्त किया, निश्चित रूप से उनका सराहनीय प्रयास रहा, इसमें कोई दोराय नही है,, उन्होंने क्रमशः अध्यापक संवर्ग की बेहतरी के लिए भी संवेदनशीलता के साथ निर्णय लिए, उसका भी हमने हमेशा स्वागत किया,, लेकिन2003 मे जिस प्रकार के वादे किये गए, सरकार अभी भी उससे दूर ही खड़ी दिखाई देती है,, सरकार को अध्यापक संवर्ग की समस्या पर राजनैतिक या कूटनीतिक दृष्टिकोण की अपेक्षा भावनात्मक दृष्टिकोण से समस्या का त्वरित निराकरण करना चाहिए।।ओर जब कर्मी कल्चर समाप्त कर दिया, तो अतिथि कल्चर किस बात का हिस्सा है,, शिक्षित बेरोजगारो का शोषण बन्द होना चाहिए।सभी नियुक्तिया मुख्यधारा की हो, ताकि उनमे जिम्मेदारी का भाव हो,, तभी हम स्वर्णिम mp के ड्रीम को साकार कर पाएंगे।।इस पर सरकार व समाज दोनों गंभीरता से विचार करे,, यही विनम्र अनुरोध,,,,,प्रशान्त दीक्षित जिलाध्यक्ष राज्य अध्यापक संघ खंडवा।।
Tuesday, July 5, 2016
विभाग की नई व्यवस्था से शिक्षकों / अध्यापको को नहीं मिला वेतन
विभाग की नई व्यवस्था से शिक्षकों / अध्यापको को नहीं मिला वेतन - स्कूल शिक्षा विभाग ने कहा- पारदर्शिता लाने के लिए की गई व्यवस्था
भोपाल - स्कूल शिक्षा विभाग की वेतन के लिए बनाई गई नई व्यवस्था सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को भारी पड़ रही है। इस कारण उन्हें अब तक जून का वेतन नहीं मिला है। वेतन मिलने में अभी एक सप्ताह और लग सकता है। ऐसे में उन्हें आगामी दिनों में आने वाले त्योहार व अन्य खर्चों को लेकर चिंता सताने लगी है। उधर, स्कूल शिक्षा विभाग नई व्यवस्था को सिस्टम में पारदर्शिता लाने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ रहा है।
दरअसल, विकास खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) को वित्त से संबंधित काम सौंप दिया गया है। पहले प्राचार्य स्तर पर शिक्षकों को वेतन दिया जाता था। नई व्यवस्था लागू होने के बाद से प्रदेश के लाखों शिक्षक इससे प्रभावित हो रहे हैं। राजधानी के एक शिक्षक आरके गुप्ता का कहना है कि उनका वेतन महीने की 30 तारीख को खाते में आ जाता था, लेकिन इस बार नहीं आया। इसे लेकर प्राचार्यों और जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के चक्कर काटना पड़ रहे हैं। विभाग के अफसरों ने बताया कि जब स्कूलों के प्राचार्य वेतन और मानदेय का डाटा एजुकेशन पोर्टल पर उपलब्ध करवाएंगे, तब बिल जनरेट होंगे। इसके बाद प्राचार्य अपने हस्ताक्षर कर इसे विकास खंड शिक्षा अधिकारी को उपलब्ध करवाएंगे। इसके बाद शिक्षकों को वेतन मिलेगा।
यह हो रही दिक्कत
विभाग के अधिकारियों ने बताया कि संकुल स्तर से जानकारी एकत्र की जा रही है। इसे पोर्टल पर चढ़ाया जाएगा, ताकि कर्मचारी के पद और वेतनमान की जानकारी मिल सके। हालांकि बीईओ कार्यालयों में पर्याप्त स्टाफ भी नहीं है। यह भी एक बड़ी समस्या है। इस वजह से कर्मचारियों का डाटाबेस तैयार करने में समय लग रहा है।
ये है नई व्यवस्था
सरकारी स्कूलों में कार्यरत कर्मचारियों के वेतन-भत्ते, कार्यालयीन व्यय और विभागीय योजनाओं में जो भी खर्चा होगा, वह विकास खंड शिक्षा अधिकारी के कार्यालय से होगा। इसकी मॉनीटरिंग का दायित्व जिला शिक्षा अधिकारियों को सौंपा गया है। विकास खंड अधिकारी कार्यालय में अगर अतिरिक्त अमला, कम्प्यूटर आदि की जरूरत होगी तो इसके लिए उत्कृष्ट विद्यालयों, मॉडल स्कूल और संकुल शालाओं में उपलब्ध संसाधानों का उपयोग किया जा सकता हैं।
पेचीदगी बढ़ गई है
शिक्षकों को अब तक वेतन नहीं दिया गया है। नई व्यवस्था से पेचीदगी बढ़ गई हैं। ईद भी आने वाली है। वेतन नहीं मिलने से शिक्षकों को दिक्कत हो रही है। इस व्यवस्था का कोई औचित्य नहीं है।
- अरविंद भूषण श्रीवास्तव, प्रदेश संयोजक, तृतीय वर्ग शासकीय कर्मचारी संघ शिक्षा समिति
जल्द मिल जाएगा वेतन
अभी तक वेतन न मिलने की शिकायत मेरे पास नहीं आई है। नई व्यवस्था पर काम चल रहा है। करीब 32 हजार शिक्षकों को वेतन मिल चुका है। बिल प्राप्त होने पर बचे हुए शिक्षकों को भी वेतन मिल जाएगा। 30 हजार शिक्षकों के बिल प्रक्रिया में हैं, जिन पर कार्रवाई चल रही है। सभी को जल्द वेतन मिल जाएगा।
नीरज दुबे, आयुक्त लोक शिक्षण
स्त्रोत नईदुनिया
25 जुलाई को भोपाल रैली में पहुंचिए-जगदीश यादव
शिक्षाकर्मी से अध्यापक बनने के बाद शिक्षक बनने के लिए
शिक्षा विभाग में संविलियन के आंदोलन को ताकतवर बनाएं
25 जुलाई को भोपाल रैली में पहुंचिए
अध्यापक साथियो,
राज्य अध्यापक संघ ने अपने गठन के साथ ही संघर्ष का रास्ता चुना, जिसमें हमें लगातार सफलता मिलती रही है। 500 का शिक्षाकर्मी आज 25000 का अध्यापक हो चुका है, अब उसे शिक्षक का दर्जा दिलाने जैसा महत्वपूर्ण काम करना है, जो शिक्षा विभाग में संविलियन से ही संभव है, इसीलिए हमने प्रदेश भर में संविलियन यात्रा के जरिए आंदोलन शुरू किया, जिसके तहत 25 जुलाई 2016 को भोपाल में हल्लाबोल रैली कर विधानसभा का घेराव किया जाएगा। 25 जुलाई की रैली की तैयारियां उसी दिन से शुरू हो चुकी थीं, जब सरकार ने विसंगतियोंभरा गणपत्रक जारी किया था। हमारे संगठन ने गणपत्रक की होली जलाकर विरोध शुरू कर दिया था और 10 जून से भोपाल में अनिश्चितकालीन धरना जारी है। हमारे संगठन ने तय किया है कि हम सरकार को अध्यापकों के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं करने देंगे, इसीलिए हमने निर्णायक संघर्ष का ऐलान किया। हमारा यही संघर्ष हमें शिक्षा विभाग में पहुंचाएगा। इस लड़ाई को लडऩा और जीतना ही हमारा एकमात्र मकसद है, इसीलिए सभी अध्यापक साथियों से अनुरोध है कि वे प्रदेश में चल रही संविलियन यात्रा में शामिल हों और 25 जुलाई को अधिक से अधिक संख्या में भोपाल पहुंचे।
जीतने के लिए जरूरी है लडऩा?
छठवें वेतनमान की लड़ाई राज्य अध्यापक संघ 2013 में जीत चुका था। सरकार चार किश्तों में छठवें वेतनमान का समझौता राज्य अध्यापक संघ के पूर्व प्रांताध्यक्ष एवं विधायक मुरलीधर पाटीदार से कर चुकी थी, जिसकी तीन किश्तें मिल भी चुकी हैं, इसीलिए अब अंतिम और निर्णायक संघर्ष शिक्षा का निजीकरण रोकने तथा अध्यापकों का शिक्षा विभाग में संविलियन का होना था, जिसकी रणनीति भी 2013 के छठवें वेतनमान के समझौते के समय ही बनाई जा चुकी थी। शिक्षा विभाग में संविलियन की लड़ाई को लडऩे और जीतने के लिए राज्य अध्यापक संघ ने अपने पदाधिकारियों एवं सदस्यों को तैयार करने का काम उसी वक्त से शुरू कर दिया था। 2013 में हुए इस समझौते के बाद संगठन की ब्लाक, जिला एवं प्रांतीय बैठकों में शिक्षा के निजीकरण को रोकने, अध्यापकों का शिक्षा विभाग में संविलियन एवं संविदा नीति को समाप्त करने जैसे महत्वपूर्ण सवालों पर विचार-विमर्श होता था। इससे स्पष्ट है कि राज्य अध्यापक संघ शुरू से ही अध्यापकों, संविदा शिक्षकों एवं दूसरे अस्थाई कर्मचारियों के भविष्य के प्रति चिंतित रहा है। राज्य अध्यापक संघ गंभीर विचार विमर्श के बाद ही संघर्ष के मैदान में उतरता रहा है, जिस कारण उसे आंदोलनों के दौरान जीत भी मिलती रही है।
सरकार कर रही अध्यापकों को कमजोर?
सरकार अपनी खुफिया एजेंसियाों के जरिए हमारे संगठन की तैयारियों की जानकारी जुटाती रहती है, सरकार को डर था कि राज्य अध्यापक संघ छठवें वेतनमान के बाद शिक्षा विभाग में संविलियन के लिए निर्णायक आंदोलन में जाने वाला है, इसीलिए उसने अपने समर्थकों के जरिए छठवें वेनतमान को लेकर असमय ही आंदोलन शुरू करवा दिया। इस दौरान सरकार के दो एजेंट जिस तरह सक्रिय दिखाई दिए, उससे स्पष्ट है कि सरकार अध्यापकों की एकता को कमजोर कर उनके अंदर भ्रम की स्थिति पैदा करना चाहती है, जिसमें कुछ समय के लिए वह कुछ हद तक सफल भी हुई। सरकार के इशारे पर चले आंदोलन से अध्यापकों को तो फायदा नहीं हुआ, उल्टे अध्यापकों में भ्रम पैदा हो गया। सरकार के इस षड्यंत्र को समझे बिना ही सोशल मीडिया पर अध्यापक एवं उनके नेता एक-दूसरे पर ही आरोप प्रत्यारोप करने लगे, जिसका फायदा भी सरकार ने उठाया और विसंगितयों भरा गणनापत्रक जारी कर दिया। अध्यापकों के साथ इस तरह का धोखा करने का साहस सरकार को कहां से मिला? कहने की जरूरत नहीं है कि सरकार ने 2013 के बाद अध्यापकों की एकता को कमजोर करने का एकमात्र काम किया है। सरकार ने अध्यापकों से डरना छोड़ दिया है, सरकार ऐसा मानकर चल रही है कि अध्यापक कुछ नहीं कर पाएंगे, वे आपस में ही लड़ झगड़कर घर बैठ जाएंगे। यही वह स्थिति है जिसके चलते सरकार मनमानी कर रही है। अब अध्यापकों को यह साबित करना है कि हम सरकार को मनमानी की इजाजत किसी भी कीमत पर नहीं दे सकते, इसीलिए राज्य अध्यापक संघ संविलियन यात्रा के जरिए सरकार को चेता रहा है कि यदि किए हुए वादे से मुकरने की कोशिश हुई, तब प्रदेश का अध्यापक खामोश नहीं बैठेगा।
क्यों जरूरी है संविलियन के लिए संघर्ष?
500 रुपए महीने का शिक्षाकर्मी यदि आज 25000 रुपए महीने का अध्यापक है तो यह किसी की मेहरबानी से नहीं बल्कि राज्य अध्यापक संघ के नेतृत्व में चले आंदोलनों की बदौलत ही है। 25,000 रुपए महीने के वेतन तक पहुंचने के लिए हम लोगों ने अनगिनत संघर्ष किए हैं। प्रदेश भर में शिक्षा बचाओ यात्राएं निकालीं। सबको शिक्षा सबको काम जैसा नारा देकर आम लोगों को आंदोलनों से जोड़ा। आंदोलन करते हुए जेलों तक गए। दर्जनों पदयात्राएं निकलीं। दिल्ली में संसद मार्ग जाम किया है। शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ प्रदेश भर में जागरुकता अभियान जलाए। राज्य अध्यापक संघ के यह कुछ ऐतिहासिक अभियान थे, जिनके कारण सरकार डरी और शिक्षाकर्मी से अध्यापक बनाया और वेतन भत्ते भी बढ़ाए। उपरोक्त अभियानों के दौरान भी राज्य अध्यापक संघ का स्पष्ट कहना था कि हमारा अंतिम लक्ष्य शिक्षा विभाग में संविलियन है, इसीलिए अध्यापक इन जीतों से संतुष्ट होकर नहीं बैठा और वह अब तक लड़ रहा है। संघर्ष से ही जीत मिलती है, यह साबित हो चुका है, इसीलिए शिक्षा विभाग में संविलियन के लिए लडऩा जरूरी है। संविलियन यात्रा इसी निर्णायक एवं अंतिम संघर्ष की तैयारियों के लिए शुरू की गई है, जिसके तहत 25 जुलाई को भोपाल में हल्ला बोल रैली की जाएगी। यही रैली प्रदेश के लाखों अध्यापकों का भविष्य तय करेगी, इसीलिए सभी अध्यापकों को इस रैली में पहुंचने के लिए अभी से तैयारियां शुरू करनी होंगी।
आंदोलन के अलावा दूसरा रास्ता नहीं?
ऐसा नहीं है कि राज्य अध्यापक संघ ने अध्यापकों की मांगों के लिए सरकार से बातचीत नहीं की। 2013 में हुए छठवें वेतनमान के समझौते के बाद भी हमने लगातार सरकार से बातचीत जारी रखी। लंबित सभी मांगों पर बातचीत की। सरकार ने इस दौरान सिर्फ आश्वासन ही दिए, उसने आश्वासन के जरिए तीन साल निकाल दिए हैं, इसीलिए अब राज्य अध्यापक संघ किसी भी तरह के आश्वासन पर विश्वासन नहीं करेगा। अब हमारा संगठन निर्णायक और अंतिम संघर्ष के रास्ते पर चल पड़ा है, जिसमें जीत अध्यापकों को ही मिलेगी, ऐसा पूरा भरोसा और विश्वास है। सरकार बीसियों साल से अध्यापकों का शोषण करती आ रही है, अध्यापक की पूरी जवानी सरकार का शोषण सहते हुए गुजरी है इसीलिए बुढ़ापे को संभारने के लिए आंदोलन जरूरी है और ऐसा आंदोलन जो हमें शिक्षा विभाग का शिक्षक बनवा सके। राज्य अध्यापक संघ संविलियन यात्रा के जरिए ऐसा ही आंदोलन विकसित कर रहा है। आईए राज्य अध्यापक संघ के इस महत्वपूर्ण और निर्णायक आंदोलन का हिस्सा बनें और 25 जुलाई 2016 को होने वाले विधानसभा के घेराव में अधिक से अधिक संख्या में भोपाल पहुंचे।
लड़े हैं, तभी जीते हैं
लड़ोगे तो ही जीतोगे।
आपका
जगदीश यादव
प्रांताध्यक्ष
राज्य अध्यापक संघ, मध्यप्रदेश।
शिक्षकों के अवकाश स्वीकृति एवं गैर शिक्षकीय कार्य में नियोजन बाबत २०१४
| शिक्षकों के अवकाश स्वीकृति एवं गैर शिक्षकीय कार्य में नियोजन बाबत २०१४ आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें |
शिक्षकों को गैरशिक्षकीय कार्य में लगाने पर रोक विषयक २००९
शिक्षकों को गैरशिक्षकीय कार्य में लगाने पर रोक विषयक २००९ आदेश पीडीऍफ़ मे प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें

शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्य में न लगायें जाने के संबंध में २०१२
शिक्षकों को गैर शैक्षणिक कार्य में न लगायें जाने के संबंध में २०१२ आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें

आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें
शिक्षकों को B.L.O. के दायित्व से मुक्त रखने के संबंध में 2013
शिक्षकों को B.L.O. के दायित्व से मुक्त रखने के संबंध में २०१३
आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें
शिक्षकों को B.L.O. के दायित्व से मुक्त रखने के संबंध में २०१३
आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करेंस्कूल शिक्षा विभाग के शिक्षकों एवं कर्मचारियों को BLO ड्यूटी से कार्यमुक्ति रखने बाबत 2015
स्कूल शिक्षा विभाग के शिक्षकों एवं कर्मचारियों को BLO ड्यूटी से कार्यमुक्ति रखने बाबत 2015 आदेश की पीडीऍफ़ कॉपी प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें

Monday, July 4, 2016
अतिथि शिक्षक रखने की नियमावली 2010-2013
हाई स्कुल / हायर सेकेंडरी के नियम 2010 और माध्यमिक और प्राथमिक के नियम 2013 पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इन लिंक को ओपन करें
हाई स्कूल /हायर सेकेंडरी स्कूलों में अतिथि शिक्षक रखने की नियमावली /प्रकिया /शैक्षणिक योग्यता /मानदेय से सम्बंधित जानकारी। भाग -1 दीपक हलवे जी से साभार
हाई स्कूल /हायर सेकेंडरी स्कूलों में अतिथि शिक्षक रखने की नियमावली /प्रकिया /शैक्षणिक योग्यता /मानदेय से सम्बंधित जानकारी। भाग -२ दीपक हलवे जी से साभार
प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय में अतिथि शिक्षक रखने की नियमावली /प्रकिया /शैक्षणिक योग्यता /मानदेय से सम्बंधित आदेश २०१३
Saturday, July 2, 2016
संकुल प्राचार्य के आहरण संवितरण के ही अधिकार समाप्त किये गए है ,प्रशासकीय अधिकार समाप्त नहीं किये गए हैं - स्पष्टीकरण २ जुलाई २०१६
आहरण संवितरण की नयी वयवस्था अंतर्गत संकुल प्राचार्य के आहरण संवितरण के ही अधिकार समाप्त किये गए है ,प्रशासकीय अधिकार समाप्त नहीं किये गए हैं । आज दिनाक २ जुलाई २०१६ को जारी स्पष्टीकरण में आयुक्त लोक शिक्षण संचालनालय ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है की । में व्यवस्था में केवल आहरण की व्यवस्था विकास खंड शिक्षा अधिकारी कार्यालय से की जायेगी प्राचार्यो के वित्तीय और प्रशासकीय अधिकारों में कोई परिवर्तन नहीं होगा ,अर्थात हमारे अवकाश स्वीकृति और अन्य कार्य संकुल प्राचार्य ही करेंगे ,साथ ही अध्यापक संवर्ग के वेतन की व्यवस्था भी पूर्ववत जरी रहेगी और उनके बिल एजुकेशन पोर्टल पर जनरेट करने का कार्य संकुल प्राचार्य ही करेंगे और उसके बाद BEO कार्यालय में भुगतान हेतु बिल भेजे जायेंगें । मेरा निजी मत है की यदि शिक्षा विभाग यही करना चाहता है तो फिर नविन व्यवस्था लागु ही नहीं करना चाहिए ,या यह भी संभव है की प्राचार्यो के अधिकार समाप्त करने का कार्य नियमो में संशोधन के उपरांत ही संभव है हो सकता है की जब तह नियमो में संशोधन न हो यह व्यवस्था लागु रहे । आदेश पीडीऍफ़में प्राप्त करने के लिये इस लिंक को ओपन करें

शासकीय शालाओं में आहरण एवं संवितरण की नवीन व्यवस्था की समीक्षा
शासकीय शालाओं में आहरण एवं संवितरण की नवीन व्यवस्था की समीक्षा आयुक्त महोदय द्वारा प्रत्येक दिवस की जायेगी आदेश दिनांक 30 जून 2016
आदेश पीडीऍफ़ मे प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें

Friday, July 1, 2016
अध्यापक संवर्ग के संविलियन (स्थान्तरण) की तैयारिया प्रारम्भ
आयुक्त लोकशिक्षण संचलनालय ने वर्ष 2016 में अध्यापक संवर्ग के ऑन लाइन संवलियन (स्थान्तरण) की कार्यवाही करने के लिए एजुकेशन पोर्टल पर अध्यापक संवर्ग की सही सही जानकारी अपडेट करने के आदेश सभी जिला कलेक्टर को दिए हैं।
नया सॉफ्टवेयर नेशनल इनफ़ोरमनेशन सेंटर ( NIC ) द्वारा तैयार किया जा रहा है । इस सत्र में नई स्थानातरण निति की प्रतीक्षा में बैठे अध्यापको की उम्मीद को पंख मिल गए है ।
अतिथि शिक्षकों की व्यवस्था के संबंध में आदेश जारी

सरकारी कर्माचारी को अपनी छवि सुधारने के लिए काम करना चाहिए और काम के बारे में खुद भी बताना चाहिए- रविश कुमार
आपने सुना ही होगा कि पांच दस हज़ार करोड़ की कंपनी के सीईओ की तनख्वाह कई बार प्रति माह दो से दस करोड़ तक हो जाती है। आप सुनते होंगे कि फलां सीईओ हाफ पैंट में भी दफ्तर जाता है। रात को ईमेल करता है, खूब काम करके आता है। बड़ा कूल है। हम मीडिया वाले भी वाह वाह करते हैं। भारत सरकार ने इस साल फरवरी में योजना और गैर योजना मदों के लिए करीब बीस लाख करोड़ का बजट पेश किया। तब उसके कैबिनेट सचिव का वेतन कुल मिलाकर सवा दो लाख रुपये प्रति माह तक का है। जो सातवें वेतन आयोग के बाद ढाई लाख के आस पास हो जाएगा। कुल 25-30 हज़ार की बढ़ोतरी का कितना जश्न मना सकते हैं। क्या आप दर्शक यह समझते हैं कि भारत सरकार के कैबिनेट सचिव या सचिव कभी दफ्तर टाइम पर नहीं जाते, जब मन करता है तभी जाते हैं, कोई काम नहीं करते। अगर ऐसा है तो सरकार भी काम नहीं करती होगी। मैं जितना जानता हूं सचिव स्तर या ज़िलाधिकारी स्तर के अफसरों के पास सांस लेने की फुर्सत नहीं होती है। कॉरपोरेट का कूल सीईओ और मालिक कई बार हज़ारों करोड़ की कंपनी डुबो देते हैं। सरकारी बैंक को चूना लगाकर लंदन भाग जाता है। क्या आपने कभी सुना है कि कैबिनेट सचिव ने भारत सरकार ही डुबो दी।
धारणा का इलाज दुनिया के किसी अस्पताल में नहीं है। ज़रूर सरकारी अधिकारियों के पास इतने अधिकार होते हैं कि उसके दम पर वे अवैध रूप से करोड़ों रुपये कमा लेते हैं। मगर रिश्वतखोरों के हिसाब से सैलरी का हिसाब तो नहीं होगा न। अपनी इस छवि के लिए सरकारी अधिकारी और कर्मचारी भी कम ज़िम्मेदार नहीं हैं। कई कर्माचारियों ने ग़रीब जनता को जिस तरह से परेशान किया है उसके कारण भी जनता उनकी सैलरी वृद्धि को शक की निगाह से देख रही है। उन्हें अपनी छवि सुधारने के लिए काम करना चाहिए और काम के बारे में खुद भी बताना चाहिए। जब हम सरकारी कर्माचारी कहते हैं तो यह समझना चाहिए कि वो कोई एक मूर्ति का नाम नहीं है। कोई पुलिस का जवान है, कोई अर्धसैनिक बल है, कोई सैनिक है। कोई टीचर है, कोई रेल का ड्राईवर है, कोई गटर साफ करने वाला कर्मचारी है तो कोई बिजली के हाईवोल्टेज तार बांधने वाला कर्मचारी है। सरकार की अनगिनत सेवाओं के लिए अलग अलग काम और पद हैं। सरकार के तहत काम करने वाले ज़्यादातर मध्यम से लेकर नीचले स्तर के कर्मचारी हैं। कॉरपोरेट में हर साल सैलरी बढ़ जाती है। सरकार के यहां दस साल बाद बढ़ी है तो उम्मीद कुछ ज़्यादा हो सकती है। इस बार जो बड़े स्तर के अधिकारी हैं उनका वेतन पुराने बेसिक का रेशनलाइज़ेशन इंडेक्स 2.62 से लेकर 2.67 तक रहा। सबसे कम तनख़्वाह वाले कर्मचारियों के लिए रेशनलाइज़ेशन इंडेक्स 2.57 रहा। इसे आप मोटा मोटी ये समझ सकते हैं कि कम वेतन पाने वालों की सैलरी कम बढ़ी और और ज्यादा पाने वालों की ज़्यादा। नीचले स्तर पर देखेंगे तो सैलरी दो से ढाई हज़ार ही बढ़ी है। कर्मचारियों का कहना है कि डीए बढ़ते बढ़ते 125 प्रतिशत हो गया था जिसके कारण हमें उतनी ही सैलरी मिल रही थी जितनी बढ़ी है। हमें कुछ भी फायदा नहीं हुआ।
सरकार के पास संसाधन सीमित होते हैं और सबको खुश नहीं कर सकती है। छठा वेतन आयोग जब लागू हुआ था तो दो साल का एरियर मिला था। सातवें वेतन आयोग में सिर्फ छह महीने का एरियर मिलेगा मगर पैसा इसी साल मिलेगा। सरकार जब इसे ऐतिहासिक बता रही थी उसी समय 33 लाख कर्मचारियों में से 32 लाख कर्मचारियों के संगठन हड़ताल पर जाने का एलान कर रहे थे। इनका कहना है कि सारा लाभ ऊंचे स्तर के अफसरों ने ले लिया। नीचे वाले को कम मिला बल्कि कुछ मिला ही नहीं। हमारे सहयोगी हिमांशु शेखर मिश्रा ने जो केस स्टडी की हैं।
रमन शर्मा 36 साल से रेलवे में काम करते हुए डेपुटी चीफ पर्सनल आफिसर के पद पर पहुंचे हैं। अभी इन्हें कुल वेतन 91,823 रुपये मिलता था। 36 साल की नौकरी के बाद पहली बार सैलरी एक लाख से ऊपर गई है। क्योंकि सातवें वेतन आयोग के कारण इनका वेतन 1,04,100 रुपये हो गया है। यानी दस साल के बाद कुल वेतन 12,277 रुपये बढ़ गया है। लेकिन नए पीएफ कायदों के बाद इनमें से 4918 रुपये पीएफ में और कटेंगे। टैक्स का अतिरिक्त बोझ 2455 रुपये होगा। टेक होम यानी हाथ में सिर्फ 4904 रुपये ज्यादा आएगा। अमित जैन 29 साल से रेलवे में हैं और अब एग्जिक्यूटिव इंजीनियर हैं। अमित जैन की कुल सैलरी 76700 रुपये से बढ़कर 89540 रुपये हो गई है। सातवें वेतन आयोग से इनकी नई सैलरी अब 89540 रुपये हो गई है। कुल बढोतरी 12,940 रुपये की है। लेकिन नए पीएफ कायदों के बाद इनमें से 4290 रुपये पीएफ में और कटेंगे। टैक्स का अतिरिक्त बोझ 2600 रुपये होगा, यानी टेक होम सिर्फ 6050 रुपये बढ़ा।
अर्ध सैनिक बलों को चंद भत्तों में कुछ राहत मिली है तो वेतन वृद्धि को लेकर वे भी बहुत खुश नहीं हैं। सेना के लोगों की अपनी नाराज़गी है। उनका कहना है कि सेना में 80 फीसदी से अधिक जवान हैं। उनकी सैलरी न्यूनतम 18000 की गई है जो डीए के 125 फीसदी बढ़ने के कारण पहले से ही मिल रही थी। नए वेतन में 2000 के आस पास ही वृद्धि हुई है। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर कह चुके थे कि हमने सेना के वेतन के लिए काफी ज़ोर लगाया। कुछ मांगे मानी गईं कुछ नहीं मानी गई। रेलवे के एक कर्मचारी ने फेसबुक पर लिखा है कि उनके विभाग के कुछ ग्रेड में 300 रुपये की बढ़ोत्तरी हुई है। हम इसे सत्यापित नहीं कर सकते लेकिन हम ऐसे कर्मचारी संगठन की तलाश कर रहे हैं जो इस वेतन वृद्धि से खुश हो। अगर कोई बहुत खुश है तो ज़रूर संपर्क करें मैं उसे प्राइम टाइम में मौका दूंगा।
Pew Research Center ने 2014 में एक विश्लेषण पेश किया था जिसके अनुसार 2011 के वेतन के आधार पर दुनिया भर में आबादी का सिर्फ 13 प्रतिशत हिस्सा ही मिडिल इनकम में आता है। 56 फीसदी लोग निम्न आय में आते हैं और 15 फीसदी ग़रीब। सिर्फ 7 प्रतिशत उच्चतम आय वाले हैं और 9 फीसदी उच्च मध्यम आय में आते हैं।
सरकार ने ग्रेच्युटी सीमा दस लाख से बढ़ा कर 20 लाख कर दी है। घर बनाने/खरीदने के लिए अब अग्रिम राशि साढ़े सात लाख की जगह 25 लाख तक निकाली जा सकेगी। एक राय यह है कि इसके कारण अर्थव्यवस्था में गति आएगी। अगर आई तो सरकारी कर्मचारियों को अलग से बोनस मिलना चाहिए। दूसरी राय है कि यह अर्थव्यवस्था पर बोझ है। सातवें वेतन आयोग को पढ़ते हुए कुछ धारणायें ध्वस्त होती नज़र आईं। जैसे हम समझते हैं कि केंद्रीय कर्मचारी सरकार पर बोझ हैं। कुछ तथ्य रिपोर्ट से निकाल कर रखता हूं ताकि आईपीएस से लेकर दारोगा की तैयारी में काम आ सके।
- 2010 में जितने पद मंज़ूर किये गए थे उनका 86 प्रतिशत ही भरा गया था।
- 2014 में जितने पद मंज़ूर किये गए थे उनका 82 प्रतिशत ही भरा गया।
- 2014 में 40 लाख 49 हज़ार पद मंज़ूर थे, भर्ती किये गए 33.02 लाख।
- साढ़े सात लाख कर्मचारियों का बोझ मौजूदा कर्मचारियों पर भी पड़ा होगा।
2014 के मंज़ूर पदों की संख्या के हिसाब से केंद्र सरकार 7 लाख लोगों को नौकरी दे सकती है। जबकि केंद्र सरकार साल में एक लाख लोगों को ही रोज़गार देती है। बेरोज़गार अपनी रैलियों में इस आंकड़े का इस्तमाल कर सकते हैं। सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट में अमेरिका और भारत के केंद्रीय कर्मचारियों की तुलना की गई है। एक लाख की आबादी पर भारत में केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 139 है। अमेरिका आबादी में भारत से कम है, वहां एक लाख की आबादी पर केंद्रीय कर्मचारियों की संख्या 668 है। बताइये जिससे हम सीख कर प्राइवेटाइज़ कर रहे हैं उसके यहां कितने सरकारी कर्मचारी हैं हमारे यहां कितने। यही नहीं रिपोर्ट में लिखा है कि डाक, संचार और रेलवे तो व्यावसायिक गतिविधि हैं। उनके कर्मचारियों की संख्या निकाल दें, इसके साथ गृहमंत्रालय के पुलिस और सैन्य बलों को निकला दें तो केंद्रीय कर्मचारियों की वास्तविक संख्या 4 लाख 18 हज़ार ही है। जो बहुत छोटा है। रिपोर्ट में इन्हें कोर ऑफ गर्वमेंट आफ इंडिया कहा गया है।
स्त्रोत NTDV प्रेम टाइम इंट्रो






















