शिक्षा और उस से जुड़े संवर्ग की सेवाओं से जुडी जानकारीयां ,आप तक आसानी से पहुंचाने का एक प्रयास है अध्यापक जगत
Wednesday, May 24, 2017
Wednesday, April 26, 2017
संसाधनों के अभावो के बावजूद भी वर्षो से अव्वल हे सरकारी स्कूल -अरविंद रावल
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने अभी हाल ही में यह कहा हे कि यदि निजी स्कूल अच्छी और बेहतर सुविधा देते हे तो फ़ीस बढ़ाएंगे ! मुख्यमंत्रीजी का यह भी कहना हे कि यदि निजी स्कूलों की फ़ीस पर सरकार का नियंत्रण हुआ तो अच्छे स्कूल प्रदेश से बहार चले जायेगे और यदि निजी स्कूलों की फ़ीस पर सरकार का नियंत्रण हुआ तो गुणवत्ता कमजोर होगी ! माननीय मुख्यमंत्रीजी की इस बात से प्रदेश के निजी स्कूल के संचालक सहमत हो सकते हे किन्तु प्रदेश की जनता सहमत नहीं हो सकती हे ! क्योकि प्रदेश सरकार के पास खुद का सरकारी शिक्षा का एक बहुत बड़ा अमला मौजूद है उसके बाद भी निजी स्कूलों पर सरकार का मेहरबान होना गैर लाजमी लगता हे ! एक और देश में केंद्र व् राज्य सरकारे व् न्यायालय भी निजी स्कूलों की प्रतिवर्ष बेहताशा फ़ीस वृद्धि को लेकर उस पर शिकंजा कसने की बात कर प्रयास रहे हे वही दूसरी और मध्यप्रदेश की सरकार के मुखिया ही खुद निजी स्कूलों की फ़ीस वर्द्धि की वकालत कर रहे हे जो निश्चित ही यह चिंतन का विषय हे !
मध्यप्रदेश में सरकारी स्कूलों की दशा क्या हे इससे खुद सरकार अच्छे से वाकिफ भी हे ? मध्यप्रदेश में प्राथमिक से लेकर हायर सेकंडरी तक करीब सवा लाख स्कूल वर्तमान में संचालित हे ! मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूल आज भी कम संसाधन और सुविधा के अभावो के बावजूद भी निजी स्कूलों से बेहतर ही शिक्षा देकर परिणाम दे रहे हे ! मध्यप्रदेश में सालो से बच्चो के अनुपात में शिक्षकों की कमी चली आ रही हे ! हाई स्कूलों और हायर सेकंडरी स्कूलों में विषय विशेषज्ञ शिक्षकों के नहीं होने के बाद भी प्रति वर्ष बोर्ड परीक्षाओ के परिणाम में प्रदेश के सरकारी स्कूल और उनके बच्चे ही बाज़ी मारते आये हे ! प्रदेश के सरकारी स्कूलों में प्रदेश की गरीब व् मध्यम वर्ग की जनता के बच्चे पढ़ते हे ! प्रदेश सरकार सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बेहतरी के नाम पर करोडो रुपयों का बजट प्रतिवर्ष शिक्षा पर खर्च करती हे ! निशुल्क शिक्षा, निशुल्क पाठ्य पुस्तके, निशुल्क गणवेश, मध्यान भोजन, छात्रवृति आदि कई सुविधाएं सरकारी स्कूलों के बच्चो को प्रतिवर्ष सरकार द्वारा शिक्षा को बढ़ावा देने के नाम पर दी जाती हे जबकि इसके इतर निजी स्कूलों में पड़ने वाले बच्चो के अभिभावकों को हर चीज का दाम उसकी मूल कीमत से दो से तीन गुना तक चुकाना पढ़ते हे !
मध्यप्रदेश की सरकारी स्कूलों में भले निजी स्कूलों की तरह भव्य चकाचोंध वाली बिल्डिंगे नहीं हे! भले ही निजी स्कूलों की तरह पर्याप्त मात्रा में शिक्षक नहीं हे और न ही अन्य संसाधन मौजूद हे उसके बावजूद भी प्रदेश के सरकारी स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में निजी स्कूलों से वर्षो से अव्वल ही रहे हे ! माननीय मुख्यमंत्रीजी आप व् आपकी सरकार द्वारा प्रदेश की सरकारी शिक्षा के बेहतरी के प्रतिवर्ष कई कदम उठाये जाते हे उसके बाद भी प्रदेश की सरकारी शिक्षा के ढांचे में कुछ कमिया रह जाती हे अगर मध्यप्रदेश सरकार द्वारा प्रतिवर्ष 25 प्रतिशत बच्चे निजी स्कूलों को देना बंद कर दे और शिक्षकों के वर्गभेद समाप्त कर छात्रों के अनुपात में शिक्षकों की व्यवस्था कर प्रदेश के सभी शिक्षकों को समान कार्य समान वेतन देने की व्यवस्था ईमानदारी से लागु कर दे तो प्रदेश का हर सरकारी स्कूल चाहे वह प्राथमिक हो या हायर सेकंडरी स्कूल वह निजी विद्यालयों की तरह ही मजबूत गुणवत्तायुक्त शिक्षा देने लगेगे !
माननीय मुख्यमंत्रीजी आप बेहद सवेदनशील और गरीबो का दर्द समझने वाले मुख्यमंत्री के तोर पर देशभर में जाने जाते हे ! आप हम सभी अपनी अपनी माटी के सरकारी स्कूलों में पढ़कर ही आज इस मुकाम पर पहुंचे हे ! सरकारी स्कुल प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की रीड की हड्डी होते हे ! मध्यप्रदेश के बारे में अब तो यहा तक कहा जाने लगा हे कि यहां पीढ़ियों को बर्बाद करने वाले मदिरालय जोरशोर से खोले जाते हे और पीढ़ियो को आबाद करने वाले विद्यालयों को चुपचाप बंद कर दिया जाता हे ! प्रदेश में निजी विद्यालयों को बढ़ावा देने के चलते प्रतिवर्ष करीब एक हजार सरकारी स्कुल छात्रों की कम संख्या के नाम पर बंद किये जाते हे ! माननीय मुख्यमंत्रीजी प्रदेश में अब तक दस हजार से ज्यादा सरकारी स्कुल बंद किये जा चुके जो बेहद चिंतन का विषय हे ! उम्मीद हे आप व् सरकार इस विषय पर भी गंभीरता पूर्वक चिंतन कर प्रदेश की गरीब मध्यम वर्ग की जनता के बच्चो के सरकारी स्कूलों को बंद होने से बचाएंगे ?
- अरविन्द रावल झाबुआ म.प्र. (लेखक स्वयं अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार हैं )
Sunday, April 23, 2017
युक्ति युक्तकरण एक अंत की शुरूआत-कृष्णा परमार(रतलाम)
वर्तमान में जारी हुई मध्य प्रदेश अतिशेष शिक्षकों की संख्या साठ हजार तक पहुंच गई है जो की शिक्षा विभाग की बदहाल स्थिति को दर्शाता है अभी कुछ दिन पहले सरकार ने घोषणा की थी कि 41 हजार संविदा शिक्षकों की नियुक्ति की जाएगी उस समय बेरोजगार युवाओं में यह आस बंधी थी कि चलो कुछ तो राहत मिलेगी लेकिन अब यह असंभव सा प्रतीत हो रहा है क्योंकि जब 60 हजार शिक्षक पहले से ही अतिशेष है, तो नई नियुक्ति कहां दी जा सकती हैं खैर जैसे तैसे इस वर्ष तो इन अतिशेष शिक्षकों का समायोजन कर दिया जाएगा |
लेकिन वह स्थिति दूर नहीं जब शिक्षा विभाग का हाल भी मध्य प्रदेश परिवहन विभाग , मध्यप्रदेश तिलहन संघ जैसा हो जाएगा कि अतिशेष शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति पर दूसरे विभागों में भेजा जाएगा जैसे राजस्व, पुलिस , पंचायत कर्मचारी आदि और अधिकतर को समय से पूर्व ही सेवानिवृत्ति दे दी जाएगी जब धीरे धीरे स्कूल ही बंद होते जा रहे हैं तो नई नियुक्ति की आवश्यकता ही कहां पड़ेगी |
अभी वर्तमान में बेतूल जिले में एक प्रयोग कॉल किया जा रहा है 15 किलोमीटर के दायरे में आने वाली समस्त शालाओं को बंद करके एक ही जगह पर उन सभी छात्रों को बस द्वारा लाया जाएगा | ऐसी स्थिति में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि शायद हम इस पीढ़ी के आखरी सरकारी अध्यापक या शिक्षक हैं , क्योंकि जब विभाग ही नहीं रहेगा तो कर्मचारियों का क्या काम है और शिक्षा विभाग पर हो रहा हर एक प्रयोग ताबूत की कील साबित हो रहा है ऐसा ताबूत जिसमें से शायद शिक्षा विभाग का जिंदा निकलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा प्रतीत होता है | कृष्णा परमार (सैलाना जिला रतलाम) लेखक स्वयं अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार हैं।
Wednesday, April 12, 2017
Tuesday, April 4, 2017
ग्रामीण निकाय की ग्राम पंचायतों के नगरीय निकाय में परिवर्तित होने पर शिक्षाकर्मी/संविदा शाला शिक्षक/अध्यापक संवर्ग की नियुक्ति एवं वरिष्ठता के सम्बन्ध में मार्गदर्शन
आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करे

Friday, March 31, 2017
इंतजार का फल कड़वा ( अध्यापक स्थान्तरण के संदर्भ में )- कृष्णा परमार सैलाना जिला रतलाम
इंतजार का फल कड़वा ( अध्यापक स्थान्तरण के संदर्भ में )- कृष्णा परमार सैलाना जिला रतलाम
आखीरकार 18 साल के लंबे इंतजार के बाद फल मिला वो भी कड़वा आज हम बात कर रहे हैं ऐसे निवाले की जो अध्यापकों के हाथ तो आ गया पर मुंह न लग पाया जी हां हम बात कर रहे हैं बहुप्रतीक्षित स्थानांतरण निति की बहुप्रतीक्षित शब्द इसलिए कि पुराणों में देवता भी इतनी लंबी तपस्या नहीं कर पाए जितनी कि मध्य प्रदेश की आम अध्यापक कहे जाने वाले इस प्राणी ने की है 18 साल की लंबी तपस्या के बाद उसे जो फल मिला इस कहावत को भी झूठा साबित करता है कि इंतजार का फल मीठा होता है अब तो ऐसा लगता है जैसे श्रवण के पिता का श्राप राजा दशरथ की बजाए मध्यप्रदेश के अध्यापकों को जा लगा कि जाओ तुम अपने परिवार और बच्चों से दूर रहकर तड़प तड़प कर जीवन बिताओगे न ही तुम अपने बच्चों की फूलों जैसी हंसी देख पाओगे नहीं तुम उनका बचपन जी पाओगे पत्नी तुम्हारी विरह वेदना में तड़पती रहेगी और ना ही तुम अपने मां बाप के बुढ़ापे का सहारा बन पाओगे | इतना घोर श्राप तो राजा दशरथ को भी ना लगा था |
अब आते हैं मुद्दे की बात पर अध्यापकों के लिए ट्रांसफर पालिसी जो कि 1 अप्रैल से जारी होने वाली है उपरोक्त स्थिति वहीं पर निर्मित हो रही हैं ट्रांसफर केवल 1 जिले से दूसरे जिले में ही होंगे लेकिन हम आपको बता दें कि जिले में एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी 100 से लगाकर 150 किलोमीटर तक है और यदि कोई अध्यापक जिला बदलकर ट्रांसफर लेता है तो वह ऐसी स्थिति में और भी अधिक दूरी पर पहुंच जाएगा |अब इस परिस्थिति में कोई क्योंकर आफत मोल लेना चाहेगा केवल कुछ गिने चुने अध्यापक ही इस पॉलिसी का लाभ ले पाएंगे यह पॉलिसी कुल मिलाकर हाथी के दांत जैसी है इसे आप और हम केवल छू सकते हैं महसूस कर सकते हैं देख सकते हैं पर इसका उपयोग नहीं कर सकते हैं हम अध्यापक अपील करते हैं सभी अध्यापक जगत के पदाधिकारियों से की इस अनु उपयोगी स्थानांतरण नीति का विरोध करें एवं बंधन मुक्त स्थानांतरण नीति जारी करवाएं | जिससे कि हमारे अध्यापक साथियों की 18 साल से चल रही तपस्या को सफल बनाया जावे एवं इंतजार के फल को फिर से मीठा किया जाए जिससे कि इंतजार का फल फिर से मीठा हो जाए |
यह लेखक के निजी विचार है लेखक स्वयं अध्यापक हैं।
Wednesday, March 22, 2017
Friday, March 3, 2017
Saturday, February 25, 2017
अध्यापक की मृत्यु होने पर आश्रित परिवार के लिये अनुग्रह राशि रूपये 50000
आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें
Wednesday, February 22, 2017
2008 के बाद अध्यापकों की संविलियन नीति को मंजूरी । सदन में स्कूली शिक्षा मंत्री इस मामले में विस्तृत वक्तव्य देंगे।
Thursday, February 9, 2017
Wednesday, February 8, 2017
संविदा शाला शिक्षक भर्ती 2017 प्रक्रिया ,अतिथि अनुभव प्रमाण पत्र प्रक्रिया 2017 (आदेश 2015)
Monday, January 16, 2017
वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACR) के सामान्य नियम
लेंकिन देखने में आता है कि हमारे वर्षिक गोपनीय प्रतिवेदन लिखने की व्यवस्था बेतरतिब ही चलती है ? और हम साथी भी इसके प्रति जागरूक नहीं रहते हैं। तृतीय श्रेणी कर्मचारियों के वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACR)के सामान्य नियम क्या है इस पोस्ट के माध्यम से बताने का प्रयास करूँगा।
वर्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACR)
प्रत्येक वित्त वर्ष अनुसार लिखी जाती है। यानी 1 अप्रैल से 31 मार्च तक की अवधी के कार्य ,व्यवहार आचरण का आकलन किया जाता है ।
ACR में श्रेणी विभाजन और अंक इस प्रकार होते हैं।
क-4 अंक -उत्कृष्ट
ख-3 अंक -बहुत अच्छा
ग -2 अंक -अच्छा
घ -1 अंक -औसत
ङ -0 अंक -घटिया
ACR में कर्मचारी के विरुद्ध प्रतिकुल टिपण्णी की जा रही है तो DDO या कार्यलय प्रमुख का दायित्व है कि वह सम्बंधित को इस आशय का सुचना पत्र प्रदान करे ,और कर्मचारी अपने विरुद्ध की गयी प्रतिकुल टिपण्णी को विलोपित करवाने के लिए अभ्यावेदन दे सके । अथवा प्रतिकूल टिपण्णी का सुचना पत्र इस लिए भी आवश्यक है क्योंकि कर्मचारी अपने कार्य व्यवहार आचरण में सुधार कर सके ।
अभ्यावेदन पर सामान्य रूप से प्रतिकुल टिपण्णी विपलोपित करने का अधिकार टिपण्णी अंकित करने वाले अधिकारी के सबसे पहले उच्च पद के अधिकारी को होता है ।
क्रमोन्नति और पदोन्नति में पिछले 5 वर्षों की ACR देखी जाती है , 5 वर्षों में 10 या अधिक अंक प्राप्त करने वाला कर्मचारी पात्र माना जाता है ।
Saturday, December 31, 2016
खादी वस्त्र ही नही ,अपितु विचार भी है-सुनिल भारी, कन्नौद(देवास)
राष्ट्रनायक महात्मा गाँधीजी ने खादी को जन आस्था का केंद्र बना दिया.. जब आजादी का आंदोलन अपने चरम पर था, तब गाँधीजी अंग्रेजो से आजादी के साथ साथ सामाजिक, आर्थिक,राजनैतिक एवम् सांस्कृतिक आजादी के पक्षधर थे...वे खादी के माध्यम से हमारे कृषक वर्ग को समृद्ध करना चाहते थे.... इसलिये उन्होने खादी को भरपूर बढ़ावा दिया....उनके एक आह्वान पर सूत,चरखा और खादी आंदोलन की पहचान बन चुके थे.. चरखे की प्रवाहमान गति अहिंसक क्रांति को गतिमान कर रही थी,गाँधीजी चरखे के माध्यम से साधारण जन मानस की चेतना उद्वेलित करने मे सफल रहे..लोगो ने खादी के विचार को अपनाकर स्वदेशी को अपना समर्थन दिया...चरखा अहिंसक क्रांति की पहचान बन गया.. इस तरह खादी साधारण जनमानस के साथ साथ भारत की पहचान बन गई... कृषि कार्य मे बचे समय मे कृषक वर्ग सूत कातते.....और इस तरह खादी हमारे जीवन मे रच बस गई..
खादी, ह्रदय को पवित्र कर हर्षाती है ।
तीन रंग की खादी चूनर ओढ़े, देखो,
आजादी की दुल्हिनयाँ मुस्काती है ।
किंतु शनैः शनैः खादी, आउट आॅफ फैशन समझा जाने लगा, आर्थिक उदारीकरण और बढ़ते वैश्विक बाजारीकरण ने खादी उद्योग को समाप्ति की कगा़र पर पँहुचाने मे कोई कसर नही छोड़ी...जबसे मेक इन इंडिया प्रभावी हुआ तभी से खादी को समृद्ध बनाने की योजनाएं कागज़ो से बाहर निकलकर क्रियान्वित होने लगी... एसे मे राज्य शासन का अपने कर्मचारियों को खादी को सप्ताह मे एक दिवस स्वैच्छिक करने के निर्णय का भरपूर समर्थन करना चाहिये.. मेरा तो मानना है कि खादी पहनने संबंधी आदेश को अनिवार्य करना चाहिये.. कम से कम सप्ताह मे एक दिन खादी का उपयोग अवश्य करे ...
कन्नौद, जिला देवास (मप्र)
Comments system
Wednesday, May 24, 2017
Wednesday, April 26, 2017
संसाधनों के अभावो के बावजूद भी वर्षो से अव्वल हे सरकारी स्कूल -अरविंद रावल
मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान ने अभी हाल ही में यह कहा हे कि यदि निजी स्कूल अच्छी और बेहतर सुविधा देते हे तो फ़ीस बढ़ाएंगे ! मुख्यमंत्रीजी का यह भी कहना हे कि यदि निजी स्कूलों की फ़ीस पर सरकार का नियंत्रण हुआ तो अच्छे स्कूल प्रदेश से बहार चले जायेगे और यदि निजी स्कूलों की फ़ीस पर सरकार का नियंत्रण हुआ तो गुणवत्ता कमजोर होगी ! माननीय मुख्यमंत्रीजी की इस बात से प्रदेश के निजी स्कूल के संचालक सहमत हो सकते हे किन्तु प्रदेश की जनता सहमत नहीं हो सकती हे ! क्योकि प्रदेश सरकार के पास खुद का सरकारी शिक्षा का एक बहुत बड़ा अमला मौजूद है उसके बाद भी निजी स्कूलों पर सरकार का मेहरबान होना गैर लाजमी लगता हे ! एक और देश में केंद्र व् राज्य सरकारे व् न्यायालय भी निजी स्कूलों की प्रतिवर्ष बेहताशा फ़ीस वृद्धि को लेकर उस पर शिकंजा कसने की बात कर प्रयास रहे हे वही दूसरी और मध्यप्रदेश की सरकार के मुखिया ही खुद निजी स्कूलों की फ़ीस वर्द्धि की वकालत कर रहे हे जो निश्चित ही यह चिंतन का विषय हे !
मध्यप्रदेश में सरकारी स्कूलों की दशा क्या हे इससे खुद सरकार अच्छे से वाकिफ भी हे ? मध्यप्रदेश में प्राथमिक से लेकर हायर सेकंडरी तक करीब सवा लाख स्कूल वर्तमान में संचालित हे ! मध्यप्रदेश के सरकारी स्कूल आज भी कम संसाधन और सुविधा के अभावो के बावजूद भी निजी स्कूलों से बेहतर ही शिक्षा देकर परिणाम दे रहे हे ! मध्यप्रदेश में सालो से बच्चो के अनुपात में शिक्षकों की कमी चली आ रही हे ! हाई स्कूलों और हायर सेकंडरी स्कूलों में विषय विशेषज्ञ शिक्षकों के नहीं होने के बाद भी प्रति वर्ष बोर्ड परीक्षाओ के परिणाम में प्रदेश के सरकारी स्कूल और उनके बच्चे ही बाज़ी मारते आये हे ! प्रदेश के सरकारी स्कूलों में प्रदेश की गरीब व् मध्यम वर्ग की जनता के बच्चे पढ़ते हे ! प्रदेश सरकार सरकारी शिक्षा व्यवस्था की बेहतरी के नाम पर करोडो रुपयों का बजट प्रतिवर्ष शिक्षा पर खर्च करती हे ! निशुल्क शिक्षा, निशुल्क पाठ्य पुस्तके, निशुल्क गणवेश, मध्यान भोजन, छात्रवृति आदि कई सुविधाएं सरकारी स्कूलों के बच्चो को प्रतिवर्ष सरकार द्वारा शिक्षा को बढ़ावा देने के नाम पर दी जाती हे जबकि इसके इतर निजी स्कूलों में पड़ने वाले बच्चो के अभिभावकों को हर चीज का दाम उसकी मूल कीमत से दो से तीन गुना तक चुकाना पढ़ते हे !
मध्यप्रदेश की सरकारी स्कूलों में भले निजी स्कूलों की तरह भव्य चकाचोंध वाली बिल्डिंगे नहीं हे! भले ही निजी स्कूलों की तरह पर्याप्त मात्रा में शिक्षक नहीं हे और न ही अन्य संसाधन मौजूद हे उसके बावजूद भी प्रदेश के सरकारी स्कूल शिक्षा के क्षेत्र में निजी स्कूलों से वर्षो से अव्वल ही रहे हे ! माननीय मुख्यमंत्रीजी आप व् आपकी सरकार द्वारा प्रदेश की सरकारी शिक्षा के बेहतरी के प्रतिवर्ष कई कदम उठाये जाते हे उसके बाद भी प्रदेश की सरकारी शिक्षा के ढांचे में कुछ कमिया रह जाती हे अगर मध्यप्रदेश सरकार द्वारा प्रतिवर्ष 25 प्रतिशत बच्चे निजी स्कूलों को देना बंद कर दे और शिक्षकों के वर्गभेद समाप्त कर छात्रों के अनुपात में शिक्षकों की व्यवस्था कर प्रदेश के सभी शिक्षकों को समान कार्य समान वेतन देने की व्यवस्था ईमानदारी से लागु कर दे तो प्रदेश का हर सरकारी स्कूल चाहे वह प्राथमिक हो या हायर सेकंडरी स्कूल वह निजी विद्यालयों की तरह ही मजबूत गुणवत्तायुक्त शिक्षा देने लगेगे !
माननीय मुख्यमंत्रीजी आप बेहद सवेदनशील और गरीबो का दर्द समझने वाले मुख्यमंत्री के तोर पर देशभर में जाने जाते हे ! आप हम सभी अपनी अपनी माटी के सरकारी स्कूलों में पढ़कर ही आज इस मुकाम पर पहुंचे हे ! सरकारी स्कुल प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था की रीड की हड्डी होते हे ! मध्यप्रदेश के बारे में अब तो यहा तक कहा जाने लगा हे कि यहां पीढ़ियों को बर्बाद करने वाले मदिरालय जोरशोर से खोले जाते हे और पीढ़ियो को आबाद करने वाले विद्यालयों को चुपचाप बंद कर दिया जाता हे ! प्रदेश में निजी विद्यालयों को बढ़ावा देने के चलते प्रतिवर्ष करीब एक हजार सरकारी स्कुल छात्रों की कम संख्या के नाम पर बंद किये जाते हे ! माननीय मुख्यमंत्रीजी प्रदेश में अब तक दस हजार से ज्यादा सरकारी स्कुल बंद किये जा चुके जो बेहद चिंतन का विषय हे ! उम्मीद हे आप व् सरकार इस विषय पर भी गंभीरता पूर्वक चिंतन कर प्रदेश की गरीब मध्यम वर्ग की जनता के बच्चो के सरकारी स्कूलों को बंद होने से बचाएंगे ?
- अरविन्द रावल झाबुआ म.प्र. (लेखक स्वयं अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार हैं )
Sunday, April 23, 2017
युक्ति युक्तकरण एक अंत की शुरूआत-कृष्णा परमार(रतलाम)
वर्तमान में जारी हुई मध्य प्रदेश अतिशेष शिक्षकों की संख्या साठ हजार तक पहुंच गई है जो की शिक्षा विभाग की बदहाल स्थिति को दर्शाता है अभी कुछ दिन पहले सरकार ने घोषणा की थी कि 41 हजार संविदा शिक्षकों की नियुक्ति की जाएगी उस समय बेरोजगार युवाओं में यह आस बंधी थी कि चलो कुछ तो राहत मिलेगी लेकिन अब यह असंभव सा प्रतीत हो रहा है क्योंकि जब 60 हजार शिक्षक पहले से ही अतिशेष है, तो नई नियुक्ति कहां दी जा सकती हैं खैर जैसे तैसे इस वर्ष तो इन अतिशेष शिक्षकों का समायोजन कर दिया जाएगा |
लेकिन वह स्थिति दूर नहीं जब शिक्षा विभाग का हाल भी मध्य प्रदेश परिवहन विभाग , मध्यप्रदेश तिलहन संघ जैसा हो जाएगा कि अतिशेष शिक्षकों को प्रतिनियुक्ति पर दूसरे विभागों में भेजा जाएगा जैसे राजस्व, पुलिस , पंचायत कर्मचारी आदि और अधिकतर को समय से पूर्व ही सेवानिवृत्ति दे दी जाएगी जब धीरे धीरे स्कूल ही बंद होते जा रहे हैं तो नई नियुक्ति की आवश्यकता ही कहां पड़ेगी |
अभी वर्तमान में बेतूल जिले में एक प्रयोग कॉल किया जा रहा है 15 किलोमीटर के दायरे में आने वाली समस्त शालाओं को बंद करके एक ही जगह पर उन सभी छात्रों को बस द्वारा लाया जाएगा | ऐसी स्थिति में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि शायद हम इस पीढ़ी के आखरी सरकारी अध्यापक या शिक्षक हैं , क्योंकि जब विभाग ही नहीं रहेगा तो कर्मचारियों का क्या काम है और शिक्षा विभाग पर हो रहा हर एक प्रयोग ताबूत की कील साबित हो रहा है ऐसा ताबूत जिसमें से शायद शिक्षा विभाग का जिंदा निकलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन सा प्रतीत होता है | कृष्णा परमार (सैलाना जिला रतलाम) लेखक स्वयं अध्यापक हैं और यह उनके निजी विचार हैं।
Wednesday, April 12, 2017
Tuesday, April 4, 2017
ग्रामीण निकाय की ग्राम पंचायतों के नगरीय निकाय में परिवर्तित होने पर शिक्षाकर्मी/संविदा शाला शिक्षक/अध्यापक संवर्ग की नियुक्ति एवं वरिष्ठता के सम्बन्ध में मार्गदर्शन
आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करे

Friday, March 31, 2017
इंतजार का फल कड़वा ( अध्यापक स्थान्तरण के संदर्भ में )- कृष्णा परमार सैलाना जिला रतलाम
इंतजार का फल कड़वा ( अध्यापक स्थान्तरण के संदर्भ में )- कृष्णा परमार सैलाना जिला रतलाम
आखीरकार 18 साल के लंबे इंतजार के बाद फल मिला वो भी कड़वा आज हम बात कर रहे हैं ऐसे निवाले की जो अध्यापकों के हाथ तो आ गया पर मुंह न लग पाया जी हां हम बात कर रहे हैं बहुप्रतीक्षित स्थानांतरण निति की बहुप्रतीक्षित शब्द इसलिए कि पुराणों में देवता भी इतनी लंबी तपस्या नहीं कर पाए जितनी कि मध्य प्रदेश की आम अध्यापक कहे जाने वाले इस प्राणी ने की है 18 साल की लंबी तपस्या के बाद उसे जो फल मिला इस कहावत को भी झूठा साबित करता है कि इंतजार का फल मीठा होता है अब तो ऐसा लगता है जैसे श्रवण के पिता का श्राप राजा दशरथ की बजाए मध्यप्रदेश के अध्यापकों को जा लगा कि जाओ तुम अपने परिवार और बच्चों से दूर रहकर तड़प तड़प कर जीवन बिताओगे न ही तुम अपने बच्चों की फूलों जैसी हंसी देख पाओगे नहीं तुम उनका बचपन जी पाओगे पत्नी तुम्हारी विरह वेदना में तड़पती रहेगी और ना ही तुम अपने मां बाप के बुढ़ापे का सहारा बन पाओगे | इतना घोर श्राप तो राजा दशरथ को भी ना लगा था |
अब आते हैं मुद्दे की बात पर अध्यापकों के लिए ट्रांसफर पालिसी जो कि 1 अप्रैल से जारी होने वाली है उपरोक्त स्थिति वहीं पर निर्मित हो रही हैं ट्रांसफर केवल 1 जिले से दूसरे जिले में ही होंगे लेकिन हम आपको बता दें कि जिले में एक स्थान से दूसरे स्थान की दूरी 100 से लगाकर 150 किलोमीटर तक है और यदि कोई अध्यापक जिला बदलकर ट्रांसफर लेता है तो वह ऐसी स्थिति में और भी अधिक दूरी पर पहुंच जाएगा |अब इस परिस्थिति में कोई क्योंकर आफत मोल लेना चाहेगा केवल कुछ गिने चुने अध्यापक ही इस पॉलिसी का लाभ ले पाएंगे यह पॉलिसी कुल मिलाकर हाथी के दांत जैसी है इसे आप और हम केवल छू सकते हैं महसूस कर सकते हैं देख सकते हैं पर इसका उपयोग नहीं कर सकते हैं हम अध्यापक अपील करते हैं सभी अध्यापक जगत के पदाधिकारियों से की इस अनु उपयोगी स्थानांतरण नीति का विरोध करें एवं बंधन मुक्त स्थानांतरण नीति जारी करवाएं | जिससे कि हमारे अध्यापक साथियों की 18 साल से चल रही तपस्या को सफल बनाया जावे एवं इंतजार के फल को फिर से मीठा किया जाए जिससे कि इंतजार का फल फिर से मीठा हो जाए |
यह लेखक के निजी विचार है लेखक स्वयं अध्यापक हैं।
Wednesday, March 22, 2017
Friday, March 3, 2017
Saturday, February 25, 2017
अध्यापक की मृत्यु होने पर आश्रित परिवार के लिये अनुग्रह राशि रूपये 50000
आदेश पीडीऍफ़ में प्राप्त करने के लिए इस लिंक को ओपन करें
Wednesday, February 22, 2017
2008 के बाद अध्यापकों की संविलियन नीति को मंजूरी । सदन में स्कूली शिक्षा मंत्री इस मामले में विस्तृत वक्तव्य देंगे।
Thursday, February 9, 2017
Wednesday, February 8, 2017
संविदा शाला शिक्षक भर्ती 2017 प्रक्रिया ,अतिथि अनुभव प्रमाण पत्र प्रक्रिया 2017 (आदेश 2015)
Monday, January 16, 2017
वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACR) के सामान्य नियम
लेंकिन देखने में आता है कि हमारे वर्षिक गोपनीय प्रतिवेदन लिखने की व्यवस्था बेतरतिब ही चलती है ? और हम साथी भी इसके प्रति जागरूक नहीं रहते हैं। तृतीय श्रेणी कर्मचारियों के वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACR)के सामान्य नियम क्या है इस पोस्ट के माध्यम से बताने का प्रयास करूँगा।
वर्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACR)
प्रत्येक वित्त वर्ष अनुसार लिखी जाती है। यानी 1 अप्रैल से 31 मार्च तक की अवधी के कार्य ,व्यवहार आचरण का आकलन किया जाता है ।
ACR में श्रेणी विभाजन और अंक इस प्रकार होते हैं।
क-4 अंक -उत्कृष्ट
ख-3 अंक -बहुत अच्छा
ग -2 अंक -अच्छा
घ -1 अंक -औसत
ङ -0 अंक -घटिया
ACR में कर्मचारी के विरुद्ध प्रतिकुल टिपण्णी की जा रही है तो DDO या कार्यलय प्रमुख का दायित्व है कि वह सम्बंधित को इस आशय का सुचना पत्र प्रदान करे ,और कर्मचारी अपने विरुद्ध की गयी प्रतिकुल टिपण्णी को विलोपित करवाने के लिए अभ्यावेदन दे सके । अथवा प्रतिकूल टिपण्णी का सुचना पत्र इस लिए भी आवश्यक है क्योंकि कर्मचारी अपने कार्य व्यवहार आचरण में सुधार कर सके ।
अभ्यावेदन पर सामान्य रूप से प्रतिकुल टिपण्णी विपलोपित करने का अधिकार टिपण्णी अंकित करने वाले अधिकारी के सबसे पहले उच्च पद के अधिकारी को होता है ।
क्रमोन्नति और पदोन्नति में पिछले 5 वर्षों की ACR देखी जाती है , 5 वर्षों में 10 या अधिक अंक प्राप्त करने वाला कर्मचारी पात्र माना जाता है ।
Saturday, December 31, 2016
खादी वस्त्र ही नही ,अपितु विचार भी है-सुनिल भारी, कन्नौद(देवास)
राष्ट्रनायक महात्मा गाँधीजी ने खादी को जन आस्था का केंद्र बना दिया.. जब आजादी का आंदोलन अपने चरम पर था, तब गाँधीजी अंग्रेजो से आजादी के साथ साथ सामाजिक, आर्थिक,राजनैतिक एवम् सांस्कृतिक आजादी के पक्षधर थे...वे खादी के माध्यम से हमारे कृषक वर्ग को समृद्ध करना चाहते थे.... इसलिये उन्होने खादी को भरपूर बढ़ावा दिया....उनके एक आह्वान पर सूत,चरखा और खादी आंदोलन की पहचान बन चुके थे.. चरखे की प्रवाहमान गति अहिंसक क्रांति को गतिमान कर रही थी,गाँधीजी चरखे के माध्यम से साधारण जन मानस की चेतना उद्वेलित करने मे सफल रहे..लोगो ने खादी के विचार को अपनाकर स्वदेशी को अपना समर्थन दिया...चरखा अहिंसक क्रांति की पहचान बन गया.. इस तरह खादी साधारण जनमानस के साथ साथ भारत की पहचान बन गई... कृषि कार्य मे बचे समय मे कृषक वर्ग सूत कातते.....और इस तरह खादी हमारे जीवन मे रच बस गई..
खादी, ह्रदय को पवित्र कर हर्षाती है ।
तीन रंग की खादी चूनर ओढ़े, देखो,
आजादी की दुल्हिनयाँ मुस्काती है ।
किंतु शनैः शनैः खादी, आउट आॅफ फैशन समझा जाने लगा, आर्थिक उदारीकरण और बढ़ते वैश्विक बाजारीकरण ने खादी उद्योग को समाप्ति की कगा़र पर पँहुचाने मे कोई कसर नही छोड़ी...जबसे मेक इन इंडिया प्रभावी हुआ तभी से खादी को समृद्ध बनाने की योजनाएं कागज़ो से बाहर निकलकर क्रियान्वित होने लगी... एसे मे राज्य शासन का अपने कर्मचारियों को खादी को सप्ताह मे एक दिवस स्वैच्छिक करने के निर्णय का भरपूर समर्थन करना चाहिये.. मेरा तो मानना है कि खादी पहनने संबंधी आदेश को अनिवार्य करना चाहिये.. कम से कम सप्ताह मे एक दिन खादी का उपयोग अवश्य करे ...
कन्नौद, जिला देवास (मप्र)












































