Saturday, July 16, 2016

मूल मातृ संगठन का यह नया रूप ( जगदीश यादव ) आश्वस्त करता है -विनोद कुमार शर्मा अशेाकनगर

विनोद कुमार शर्मा - शिक्षा संविलियन यात्रा के अंतर्गत श्री जगदीश यादव एवं श्री दर्शन सिंह चौधरी दिनांक 14.07.2016 को अशेाकनगर में थे । मैंने यह बात स्पष्टता से रखी कि पाटीदार अध्यापकों के मास लीडर थे, उनके नेतृत्व में अध्यापकों ने सरकारों की मक्कारी को कई बार झुकाया है । परन्तु अब जब वे विधायक हैं, तो साफ है कि सरकार का समर्थक संगठन विरोधी होगा ही । मुंह फुलाना एवं गाली बकना एक साथ नहीं किया जा सकता  । क्योंकि उन्होंने लाखों लोगों के प्रेम की तुलना में अपनी स्वाभाविक महत्वाकांक्षा को ही तरजीह दी है । पहले भी हम कई बार इस बात को कहते रहे हैं कि सरकार एवं सरकार विरोध दो अलग अलग दिशायें हैं । मैंने दोनो साथियों से कहा कि वे पूरा समय लें और हमें कन्वेंश करें कि वे किस तरह पाटीदार से अलग हैं । क्योंकि अभी तक मेरा यही मानना था कि जगदीश यादव एक डमी आदमी हैं । जो कि पाटीदार के संगठन को न छोड़ने के, विरोध के कारण फोटो की तरह लाये गये हैं । मैंने मेरे बोलने की शुरूआत में उनको संबोधित तक नहीं किया था परन्तु..............मुझे खुशी है जगदीश यादव, पाटीदार के संरक्षण में आंदोलन सीखने के बाद, पाटीदार समर्थन से ही अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद,  पाटीदार के सरकारी  प्रेम के प्रभाव में नहीं हैं । वे बेहतर ढंग से अपनी बात रखना जानते हैं । तार्किक हैं । साफ बात करते हैं ।  दर्शन सिंह चौधरी जी जनहित के लिए हौल टाईमर   हैं । एक अध्यापक का इस तरह जीवन चुनना हम सबके लिये गौरव देता है । दोनेां लोगों ने साफ बातें कीं, इतिहास को खंगाला गया, नये आंदोलन पर भी बात हुई, खूबियों खामियों का साफ जिक्र हुआ । सभी संगठनों के जिलाध्यक्ष इस कार्यक्रम में मौजूद थे । सभी लोग उनसे कन्वेंश हुये । कई उदाहरणों से  वे यह बताने में सफल हुये कि पाटीदार का सरकार में होना संगठन राज्य अध्यापक संघ को रत्ती मात्र भी उनसे प्रभावित नहीं करता । ...............मैं तो धार्मिक और कर्मकाण्डी आदमी नहीं हूं, मुझे तो इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता, परन्तु ये दोनों लोग पक्के धार्मिक लोग भी हैं । जगदीश यादव जब इस बात को समझा रहे थे कि उनकी प्रतिबद्धता अध्यापकों से कितनी है ? इसका पीक चढ़ते चढ़ते उन्होंने यहां तक कहा कि मैंने मैहर की शारदापीठ पर मां शारदा के सामने यह कसम खाई है कि मैं अपने संगठन के प्रति जीवन भर प्रतिबद्धता से काम करूंगा एवं संविलियन जैसे लक्ष्य पूरे नहीं हो जाने तक किसी भी सीमा तक जाकर काम करूंगा । कभी भी अध्यापक हित की तुलना में किसी भी तरह का लाभ संबंध एवं यश को महत्व नहीं दूंगा । ..........ये बात तो मैं भी जानता हूं कि पाटीदार का टिकिट एवं आंदोलन के समझाोंतों का आपस में कोई संबंध नहीं है । क्योंकि इनमें सात माह का अंतर है । जबकि टिकिट वितरण की एक रात के हर घंटे दस लोागेां के नाम उपर नीचे हो जाते हैं । ...........मैं पाटीदार पर यह आरोप कभी नहीं लगाता कि उन्होंने अध्यापक हितों के बदले विधायक पद लिया है । अध्यापक हित में उन्होंने बेहतर समझौते किये । उनमें जो खामियां बाद में आई वे सरकार की मक्कारी से पैदा हुई हैं । .......... मेरा यह मानना है कि शिवराज सिंह यह मानते थे कि पाटीदार मास लीडर है इसे तोड़ना अध्यापकों के आंदोलनों को वर्षों के लिये बिना रीढ़ का बना देगा । तथा शेष नेताओं में राजनीतिक महत्वाकांक्षा आ जायेगी जिससे कुर्सी को लार टपकाने वाले ही नेता बनेंगे, जिन्हे तोड़ना आसान होता है । पाटीदार के जाने से आम अध्यापक में अविश्वास घर कर गया । जिसको देखो वही कह देता है कि हम यहां आंदोलन करते हैं, नेता वहां हमें बेच देते हैं । यही मुख्य नुकसान है जो पाटीदार के विधायक बनने से आंदोलन को हुआ है । ........... ..... इस तरह मैं मानता हूं कि शिवराजसिंह की  राजनैतिक चतुराई जीती .....एवं सामान्य यश की महत्वाकांक्षा जिसका बीज हर आदमी में होता है ........ पाटीदार अपनी उस महत्वाकांक्षा को जीत नहीं सके । ......और उन्होंने लाखों लोागेां के प्रेम की तुलना में यश, पद एवं धन को महत्व दिया । .....यह भी सही है कि आज तक शिवराजसिंह जी जैसा आदमी प्रशासन में नहीं रहा कि खुद शोषित कहते हैं कि वे तो देना चाहते हैं अधिकारी या कोई दूसरे लोग उसे नहीं देने दे रहे । आम अध्यापक की वाल भी देखो तो साफ है कि बहुसंख्यक लोग उन्हे अच्छा मानते हैं एवं जिम्मदारी दूसरे लोागेां पर ही डालते हैं । यह राजनैतिक मक्कारी की पराकाष्ठा है । वे सब प्रकार के हमारे विभाजनों के लिये मेहनत करते हैं । ग्यारह संगठन, प्रत्येक को उनका आश्वासन, आशीर्वाद एवं पीठ पर हाथ । अपाक्स सपाक्स जैसा नाटक जो आंदेालनरत कर्मचारियों को जाति के आधार पर भी लड़वा दे । वे जितनी प्रकार से डिवाईड करवा सकते हैं करेंगे । .......... अर्थात वे सफल रहे और वे हमें जिस तरह चलाना चाह रहे हैं हम वैसे ही चल रहे हैं । मनोहर दुबे संयुक्त मोर्चा में हैं, जिनके अथक परिश्रम से 2013 के आंदेालन की कब्र खोदने का प्रयास हुआ । बृजेश  शर्मा जी अशोकनगर आये थे तो उनसे कहा था कि इसका जबाव दो कि आप अभी भी आंदोलन के रथ में दोनों तरफ घोड़े जोतोगे तो रथ आगे कैसे बढ़ेगा । चार आगे खींचने वाले चार पीछे खींचने वाले । .............. उन दिनों जो  सरकार के पांव चाटने की धुन बजाते थे आजकल संघर्ष का राग गा रहे हैं । ....... हर अध्यापक को यह साफ होना चाहिये की सरकार समर्थन एवं संघर्ष एक साथ्  कतई संभव नहीं हैं । ..... जगदीश यादव के अनुसार 25 का घेराव संविलियन के लिये शुरूआत का शंखनाद है । जिसे हम लगातार संघर्ष् के द्वारा प्राप्त करेंगे । संविलियन ही एक मात्र कुंजी जिसके मिलने पर सभी समस्यायें अपने आप खुल जायेंगी । सरकार भी हमें उलझाकर चुनाव तक छंटवा सांंतवा एवं गणनापत्रक जैसी चीजों तक सीमित करना चाहती है । इससे आगे बढ़कर हमें एक मात्र मांग संविलियन का राग शुरू करना चाहिये । यह बेहतर ढंग है ।
         मैं इन दोनों लोागेां से सहमत हुआ एवं मुझे उनकी बातेां से  हृदय की बात लगी । सभी संगठन प्रमुखों ने भी माना कि ये दोनों दिल से बात कर रहे हैं । प्रदेश के नये वातावरण में जब अच्छे, बुरे, गिरगिट सब तरह का नेतृत्व मौजूद है ...उन सबके बीच हमारे मूल मातृ संगठन का यह नया रूप आश्वासन देने वाला लगा । शुभकामनाएं ।।

लेखक स्वय अध्यापक है और यह उनके निजी विचार हैं .

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Saturday, July 16, 2016

मूल मातृ संगठन का यह नया रूप ( जगदीश यादव ) आश्वस्त करता है -विनोद कुमार शर्मा अशेाकनगर

विनोद कुमार शर्मा - शिक्षा संविलियन यात्रा के अंतर्गत श्री जगदीश यादव एवं श्री दर्शन सिंह चौधरी दिनांक 14.07.2016 को अशेाकनगर में थे । मैंने यह बात स्पष्टता से रखी कि पाटीदार अध्यापकों के मास लीडर थे, उनके नेतृत्व में अध्यापकों ने सरकारों की मक्कारी को कई बार झुकाया है । परन्तु अब जब वे विधायक हैं, तो साफ है कि सरकार का समर्थक संगठन विरोधी होगा ही । मुंह फुलाना एवं गाली बकना एक साथ नहीं किया जा सकता  । क्योंकि उन्होंने लाखों लोगों के प्रेम की तुलना में अपनी स्वाभाविक महत्वाकांक्षा को ही तरजीह दी है । पहले भी हम कई बार इस बात को कहते रहे हैं कि सरकार एवं सरकार विरोध दो अलग अलग दिशायें हैं । मैंने दोनो साथियों से कहा कि वे पूरा समय लें और हमें कन्वेंश करें कि वे किस तरह पाटीदार से अलग हैं । क्योंकि अभी तक मेरा यही मानना था कि जगदीश यादव एक डमी आदमी हैं । जो कि पाटीदार के संगठन को न छोड़ने के, विरोध के कारण फोटो की तरह लाये गये हैं । मैंने मेरे बोलने की शुरूआत में उनको संबोधित तक नहीं किया था परन्तु..............मुझे खुशी है जगदीश यादव, पाटीदार के संरक्षण में आंदोलन सीखने के बाद, पाटीदार समर्थन से ही अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद,  पाटीदार के सरकारी  प्रेम के प्रभाव में नहीं हैं । वे बेहतर ढंग से अपनी बात रखना जानते हैं । तार्किक हैं । साफ बात करते हैं ।  दर्शन सिंह चौधरी जी जनहित के लिए हौल टाईमर   हैं । एक अध्यापक का इस तरह जीवन चुनना हम सबके लिये गौरव देता है । दोनेां लोगों ने साफ बातें कीं, इतिहास को खंगाला गया, नये आंदोलन पर भी बात हुई, खूबियों खामियों का साफ जिक्र हुआ । सभी संगठनों के जिलाध्यक्ष इस कार्यक्रम में मौजूद थे । सभी लोग उनसे कन्वेंश हुये । कई उदाहरणों से  वे यह बताने में सफल हुये कि पाटीदार का सरकार में होना संगठन राज्य अध्यापक संघ को रत्ती मात्र भी उनसे प्रभावित नहीं करता । ...............मैं तो धार्मिक और कर्मकाण्डी आदमी नहीं हूं, मुझे तो इससे कोई प्रभाव नहीं पड़ता, परन्तु ये दोनों लोग पक्के धार्मिक लोग भी हैं । जगदीश यादव जब इस बात को समझा रहे थे कि उनकी प्रतिबद्धता अध्यापकों से कितनी है ? इसका पीक चढ़ते चढ़ते उन्होंने यहां तक कहा कि मैंने मैहर की शारदापीठ पर मां शारदा के सामने यह कसम खाई है कि मैं अपने संगठन के प्रति जीवन भर प्रतिबद्धता से काम करूंगा एवं संविलियन जैसे लक्ष्य पूरे नहीं हो जाने तक किसी भी सीमा तक जाकर काम करूंगा । कभी भी अध्यापक हित की तुलना में किसी भी तरह का लाभ संबंध एवं यश को महत्व नहीं दूंगा । ..........ये बात तो मैं भी जानता हूं कि पाटीदार का टिकिट एवं आंदोलन के समझाोंतों का आपस में कोई संबंध नहीं है । क्योंकि इनमें सात माह का अंतर है । जबकि टिकिट वितरण की एक रात के हर घंटे दस लोागेां के नाम उपर नीचे हो जाते हैं । ...........मैं पाटीदार पर यह आरोप कभी नहीं लगाता कि उन्होंने अध्यापक हितों के बदले विधायक पद लिया है । अध्यापक हित में उन्होंने बेहतर समझौते किये । उनमें जो खामियां बाद में आई वे सरकार की मक्कारी से पैदा हुई हैं । .......... मेरा यह मानना है कि शिवराज सिंह यह मानते थे कि पाटीदार मास लीडर है इसे तोड़ना अध्यापकों के आंदोलनों को वर्षों के लिये बिना रीढ़ का बना देगा । तथा शेष नेताओं में राजनीतिक महत्वाकांक्षा आ जायेगी जिससे कुर्सी को लार टपकाने वाले ही नेता बनेंगे, जिन्हे तोड़ना आसान होता है । पाटीदार के जाने से आम अध्यापक में अविश्वास घर कर गया । जिसको देखो वही कह देता है कि हम यहां आंदोलन करते हैं, नेता वहां हमें बेच देते हैं । यही मुख्य नुकसान है जो पाटीदार के विधायक बनने से आंदोलन को हुआ है । ........... ..... इस तरह मैं मानता हूं कि शिवराजसिंह की  राजनैतिक चतुराई जीती .....एवं सामान्य यश की महत्वाकांक्षा जिसका बीज हर आदमी में होता है ........ पाटीदार अपनी उस महत्वाकांक्षा को जीत नहीं सके । ......और उन्होंने लाखों लोागेां के प्रेम की तुलना में यश, पद एवं धन को महत्व दिया । .....यह भी सही है कि आज तक शिवराजसिंह जी जैसा आदमी प्रशासन में नहीं रहा कि खुद शोषित कहते हैं कि वे तो देना चाहते हैं अधिकारी या कोई दूसरे लोग उसे नहीं देने दे रहे । आम अध्यापक की वाल भी देखो तो साफ है कि बहुसंख्यक लोग उन्हे अच्छा मानते हैं एवं जिम्मदारी दूसरे लोागेां पर ही डालते हैं । यह राजनैतिक मक्कारी की पराकाष्ठा है । वे सब प्रकार के हमारे विभाजनों के लिये मेहनत करते हैं । ग्यारह संगठन, प्रत्येक को उनका आश्वासन, आशीर्वाद एवं पीठ पर हाथ । अपाक्स सपाक्स जैसा नाटक जो आंदेालनरत कर्मचारियों को जाति के आधार पर भी लड़वा दे । वे जितनी प्रकार से डिवाईड करवा सकते हैं करेंगे । .......... अर्थात वे सफल रहे और वे हमें जिस तरह चलाना चाह रहे हैं हम वैसे ही चल रहे हैं । मनोहर दुबे संयुक्त मोर्चा में हैं, जिनके अथक परिश्रम से 2013 के आंदेालन की कब्र खोदने का प्रयास हुआ । बृजेश  शर्मा जी अशोकनगर आये थे तो उनसे कहा था कि इसका जबाव दो कि आप अभी भी आंदोलन के रथ में दोनों तरफ घोड़े जोतोगे तो रथ आगे कैसे बढ़ेगा । चार आगे खींचने वाले चार पीछे खींचने वाले । .............. उन दिनों जो  सरकार के पांव चाटने की धुन बजाते थे आजकल संघर्ष का राग गा रहे हैं । ....... हर अध्यापक को यह साफ होना चाहिये की सरकार समर्थन एवं संघर्ष एक साथ्  कतई संभव नहीं हैं । ..... जगदीश यादव के अनुसार 25 का घेराव संविलियन के लिये शुरूआत का शंखनाद है । जिसे हम लगातार संघर्ष् के द्वारा प्राप्त करेंगे । संविलियन ही एक मात्र कुंजी जिसके मिलने पर सभी समस्यायें अपने आप खुल जायेंगी । सरकार भी हमें उलझाकर चुनाव तक छंटवा सांंतवा एवं गणनापत्रक जैसी चीजों तक सीमित करना चाहती है । इससे आगे बढ़कर हमें एक मात्र मांग संविलियन का राग शुरू करना चाहिये । यह बेहतर ढंग है ।
         मैं इन दोनों लोागेां से सहमत हुआ एवं मुझे उनकी बातेां से  हृदय की बात लगी । सभी संगठन प्रमुखों ने भी माना कि ये दोनों दिल से बात कर रहे हैं । प्रदेश के नये वातावरण में जब अच्छे, बुरे, गिरगिट सब तरह का नेतृत्व मौजूद है ...उन सबके बीच हमारे मूल मातृ संगठन का यह नया रूप आश्वासन देने वाला लगा । शुभकामनाएं ।।

लेखक स्वय अध्यापक है और यह उनके निजी विचार हैं .

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